चाईबासा

चाईबासा: झारखंड ही नहीं पूरे देश के आदिवासी न हिंदू थे, न हिंदू है, और न हिंदू होंगें। द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य श्री सदानंद सरस्वती का वक्तव्य पूरी तरह से पूर्वाग्रह से ग्रसित है।

उनके द्वारा दी गई संदेश किसी खास धारणा से दी गई है,जिसमें तटस्थता की घोर अभाव है। झारखंड पुनरूत्थान अभियान के संयोजक सन्नी सिंकु शंकराचार्य की उस संदेश का प्रतिवाद करता है। उनको पता है आदिवासी बहुत ही निर्मल,निश्चल,निर्दोष होते है। उनके अनुसार इन्हें कुछ भी बोलकर बरगलाया जा सकता है। उनका यही भावना शंकराचार्य की उपाधि को धूमिल करता है। साधु संत से तटस्थता की उम्मीद की जाती है।जिनका जो यतार्थ है उसे उसी रूप में स्वीकार कर मानवीय मूल्यों की दिशा में उत्प्रेरित करने की उम्मीद की जाती है। वैसा होने से उपाधि धारक व्यक्तित्व के प्रति सम्मान की भावना ही जागृत होती है। पर आदिवासी जीवन दर्शन और धर्म पर वैसे उपाधि धारक व्यक्तित्व से ऐसे ओछा संदेश उनकी व्यक्तित्व और गरिमा ही खंडित होते हुए दिखाई देता है। वे बखूबी जानते है आदिवासी हिंदू उतराधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर है। उनका अपना सदियों से चली आ रही प्रथागत कानून है। तब तो उच्चतम न्यायालय भी बेटियों को संपति के अधिकार में समानता की व्याख्या और निर्णय देने के बाद भी आदिवासी बेटियों के लिए सुसंगत कानून बनाने की उल्लेख करती है। शंकराचार्य सदानंद सरस्वती को पता है कि आदिवासी का आस्था कर्मकांड पर आधारित न होकर प्रकृति पर आधारित है।जिसमे आदिवासी बेटियों का भी समान रूप से भागीदारी होता है। संपति के मामले में भी अविवाहित आदिवासी बेटियों को जीवनपर्यंत भूमि का उपयोग कर जीवन यापन करने का स्वाभाविक अधिकार प्राप्त है।आदिवासियों का पर्व त्योहार किसी अवतार पर आधारित नहीं, बल्कि पूरी तरह से प्रकृति पर आधारित है। जिसका किसी भी धर्म के साथ कोई संबंध नहीं है। ये अपने रीति रिवाजों के आधार पर विवाह करते हैं। प्रथागत आदिवासी आस्था के अनुसार विवाह और उतराधिकार से जुड़े मामलों में सभी विशेष अधिकारों को बनाए रखने के लिए हमारा जीवन का अपना तरीका है। इसीलिए झारखंड सहित देश के आदिवासियों को अपने धर्म का पालन प्रथागत मान्यता के आधार पर करने दी जाय यही श्रेयस्कर होगा। बल्कि केंद्र सरकार गृह विभाग जल्द से जल्द आदिवासियों की चिर प्रतीक्षित विलग धर्म कोड व कॉलम की मांग को जनगणना प्रपत्र में यथाशीघ्र शामिल करे। ताकि ब्रिटिश हुकूमत के कार्यकाल में जिस प्रकार आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड और कॉलम हुआ करता था। जिसे स्वतंत्र देश में हटाया गया। उसे अपेक्षित मांग के आधार पर पुनर्स्थापित किया जाय । ऐसे भी मान्यता प्राप्त बौद्ध ,जैन और अन्य धर्मावलंबी से आदिवासियों की जनसंख्या देश में अत्यधिक है।





























