अरावली पर्वतमाला विवाद- खनन संरक्षण और सुप्रीम कोर्ट के नए नियमों का समग्र अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण

अरावली पर्वतमाला विवाद- खनन संरक्षण और सुप्रीम कोर्ट के नए नियमों का समग्र अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण

अरावली पर्वतमाला भारतीय उपमहाद्वीप की पर्यावरणीय रीढ़, जलवायु संतुलन का आधार और रेगिस्तान को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है

अरावली पर्वतमाला विवाद को खनन बनाम पर्यावरण की सरल बहस में सीमित करना गलत होगा, इस मुद्दे पर केवल सोशल मीडिया के नारों पर नहीं बल्कि तथ्यों विज्ञान और कानून के आधार पर संवाद हो- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया/महाराष्ट्र

संबंधित फोटो

वैश्विक स्तरपर अरावली पर्वतमाला केवल भारत की एक भौगोलिक संरचना नहीं है,बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की पर्यावरणीय रीढ़,जलवायुसंतुलन का आधार और रेगिस्तान को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है। लगभग 200 करोड़ वर्ष पुरानी यह पर्वतमाला मानव सभ्यता से भी कहीं अधिक प्राचीन है। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिक विकास,खनन,शहरीकरण और नीतिगत अस्पष्टताओं के चलते आज यही पर्वतमाला अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। हाल ही में खनन से जुड़े नए नियमों और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लेकर सोशल मीडिया पर # सेव अरावाल्ली जैसे हैशटैग ट्रेंड कराए जा रहे हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि ये नियम अरावली को बचाने के बजाय उसे कमजोर करेंगे।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि  इस पृष्ठभूमि में यह आवश्यक हो जाता है कि पूरे विवाद का तथ्यात्मक, कानूनी वैज्ञानिक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से सोशल प्रिंटर इलेक्ट्रिक मीडिया पर चल रहे विचारों के आदान- प्रदान व डिबेट क़ा समग्र विश्लेषण किया जाए, जो मीडिया में आ रही जानकारी के आधार पर है।

साथियों बात कर हम  अरावली पर्वतमाला, भौगोलिक विस्तार और ऐतिहासिक महत्व को समझने की करें तो अरावली पर्वतमाला भारत के पश्चिमी भाग में गुजरात, राजस्थान,हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है और इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1,47,000 वर्ग किलोमीटर है।यह पर्वतमाला गुजरात के पालनपुर से शुरू होकर दिल्ली तक जाती है। अरावली की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर (1722 मीटर) माउंट आबू में स्थित है। यह पर्वतमाला थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर फैलने से रोकती है और उत्तर भारत के भूजल स्तर, मानसून पैटर्न और जैव विविधता को संतुलित रखने में निर्णायक भूमिका निभाती है।इतिहास की दृष्टि से अरावली ने हड़प्पा सभ्यता, राजपूत राज्यों और मुगल काल में भी जल स्रोतों,खनिजों और प्राकृतिक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य किया।अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिक मानकों के अनुसार इतनी प्राचीन पर्वतमालाएं पृथ्वी पर बहुत कम बची हैं, इसलिए अरावली का संरक्षण केवल भारत नहीं बल्कि वैश्विक पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी है।खनिज संपदा और खनन का आकर्षणअरावली पर्वतमाला खनिज संसाधनों से भरपूर है।यहां तांबा, जिंक, लेड, ग्रेनाइट, मार्बल और कॉपर जैसे मूल्यवान खनिज पाए जाते हैं। औद्योगिक विकास और निर्माण क्षेत्र की बढ़ती मांग ने अरावली को खनन उद्योग के लिए अत्यंत आकर्षक बना दिया।विशेषकर राजस्थान और हरियाणा में दशकों तक अनियंत्रित और अवैध खनन हुआ, जिससे पहाड़ों का क्षरण, जंगलों का विनाश और जल स्रोतों का सूखना शुरू हो गया।यही वह बिंदु है जहां विकास और संरक्षण के बीच टकराव पैदा होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही बहस अमेज़न, एंडीज़ और अफ्रीकी रिफ्ट वैली में देखी गई है।

साथियों बात अगर हम चार राज्यों, चार अलग- अलग नियम,भ्रम और पारदर्शिता का संकट इसको समझने की करें तो, अरावली पर्वतमाला चार राज्यों में फैली होने के कारण हर राज्य के अपने-अपने खनन और पर्यावरणीय नियम थे। कहीं पहाड़ियों की परिभाषा अलग थी, कहीं ऊंचाई की सीमा नहीं थी, तो कहीं वन क्षेत्र की पहचान अस्पष्ट थी।इस असमानता के कारण न केवलप्रशासनिक भ्रम पैदा हुआ बल्कि खनन माफिया ने भी इसी अस्पष्टता का लाभ उठाया।अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण शासन (इंविरोंमेन्टल गवर्नेंस) के सिद्धांतों के अनुसार, साझा प्राकृतिक संसाधनों के लिए एकरूप नियमों की आवश्यकता होती है। इसी सिद्धांत के तहत अरावली के लिए भी एक समान नीति की मांग लंबे समय से उठ रही थी।

साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप- न्यायपालिका की निर्णायक भूमिका इसको समझने की करें तो, पर्यावरण संरक्षण के मामलों में भारतीय सुप्रीम कोर्ट की भूमिका वैश्विक स्तर पर सराही जाती है। गंगा, यमुना, ताज ट्रेपेज़ियम और वनों के संरक्षण में कोर्ट के हस्तक्षेप मिसाल रहे हैं। अरावली के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीरता को समझते हुए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया।इस समिति में पर्यावरण मंत्रालय, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया,चारों राज्यों के वन विभाग के अधिकारी और स्वयं सुप्रीम कोर्ट के प्रतिनिधि शामिल थे। यह संरचना अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण आयोगों के अनुरूप थी, जहां नीति, विज्ञान और न्याय का सटीक समन्वय होता है। समिति की सिफारिशें और नवंबर 2025 की मंजूरी-समिति ने विस्तृत सर्वेक्षण,उपग्रह चित्रों, भूवैज्ञानिक डेटा और पर्यावरणीय प्रभावआकलन के आधार पर अपनी सिफारिशें सुप्रीम कोर्ट को सौंपीं।नवंबर 2025 में कोर्ट ने इन सिफारिशों को मंजूरी दी।यही वे सिफारिशें हैं जो आज विवाद का केंद्र बनी हुई हैं।पहली सिफारिश,100 मीटर ऊंचाई की परिभाषा-नई व्यवस्था के अनुसार, सिर्फ 100 मीटर या उससे ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माना जाएगा।ऐसे क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित होगा।आलोचकों का कहना है किइससे 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को खनन के लिए खोल दिया जाएगा।किंतु समिति का तर्क है कि वैज्ञानिक रूप से पर्वतमाला की पहचान ऊंचाई, निरंतरता और भूगर्भीय संरचना से होती है।अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिक मानकों में भी पर्वत और पहाड़ी के बीच यही अंतर किया जाता है।दूसरी सिफारिश,500 मीटर निरंतरता का सिद्धांत-दूसरा महत्वपूर्ण नियम यह है कि यदि 100 मीटर से ऊंची दो पहाड़ियों के बीच की दूरी 500 मीटर से कम है, तो उस पूरे क्षेत्र को अरावली पर्वत श्रृंखला माना जाएगा और वहां खनन नहीं होगा।यहनियम पर्वतमाला की भौगोलिक निरंतरता को बचाने के लिए है, ताकि खनन के कारण पहाड़ टुकड़ों में न टूट जाएं।यह सिद्धांत यूरोपियन अल्प्स और अमेरिकी अपलाचियन पर्वतमालाओं में भी अपनाया जाता है।सरकार का पक्ष- 90 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षित सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन नियमों के लागू होने से अरावली का करीब 90 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षित हो जाएगा। खनन केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र,यानी लगभग 278 वर्ग किलोमीटर में ही संभव होगा। सरकार का दावा है कि इससे अवैध खनन रुकेगा, नियमों में स्पष्टता आएगी और पर्यावरणीय निगरानी बेहतर होगी।

साथियों बातें कर हम सोशल मीडिया बनाम तथ्य- # सेव अरावल्ली विवाद इसको समझने की करें तो, सोशल मीडिया पर चल रहे अभियानों में भावनात्मक अपील अधिक और तथ्य कम दिखाई देते हैं। कई पोस्ट्स में यह दावा किया गया कि अरावली को कानूनी रूप से खत्म किया जा रहा है,जबकि वास्तविकता यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश संरक्षण को कानूनी मजबूती प्रदान करते हैं।यह प्रवृत्ति वैश्विक स्तर पर भी देखी जाती है, जहां जटिल पर्यावरणीय नीतियों को सरल नारों में प्रस्तुत कर भ्रम फैलाया जाता है।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय तुलना,भारत की नीति कहां खड़ी है इसको समझने की करें तो,यदि हम ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और चिली जैसे देशों से तुलना करें, तो वहां खनन की अनुमति केवल सीमित नियंत्रित और वैज्ञानिक रूप से परिभाषित क्षेत्रों में दी जाती है। भारत में अरावली के लिए बनाए गए नए नियम इसी वैश्विकमानक के अनुरूप हैं।वास्तविक चुनौती,नियम नहीं,उनका क्रियान्वयन अरावली संकट की जड़ केवल नियमों में नहीं,बल्कि उनके ईमानदार क्रियान्वयन में है।यदिस्थानीय प्रशासन, पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया और निगरानी तंत्र मजबूत नहीं हुए, तो सबसे अच्छे नियम भी निष्प्रभावी हो सकते हैं।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि  संरक्षण बनाम भ्रम,अरावली पर्वतमाला विवाद को केवल खनन बनाम पर्यावरण की सरल बहस में सीमित करना गलत होगा। सुप्रीम कोर्ट के नए नियम, यदि सही संदर्भ में देखें, तो वे अरावली को बचाने का एक ठोस कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं। आवश्यकता है कि इस मुद्दे पर तथ्य, विज्ञान और कानून के आधार पर संवाद हो, न कि केवल सोशल मीडिया के नारों पर।अरावली का संरक्षण केवल आज की पीढ़ी के लिए नहीं, बल्कि आने वाली सदियों के लिए भारत की जल, जलवायु और जीवन सुरक्षा का प्रश्न है।

इंडिया से भारत नाम परिवर्तन प्राइवेट मेंबर बिल 2025 – संवैधानिक प्रावधानों,ऐतिहासिक आधारों और सांस्कृतिक पहचान का समग्र विश्लेषण

इंडिया से भारत नाम परिवर्तन प्राइवेट मेंबर बिल 2025 – संवैधानिक प्रावधानों,ऐतिहासिक आधारों और सांस्कृतिक पहचान का समग्र विश्लेषण

भारत नाम प्रस्ताव देश की आत्मा, ऐतिहासिक पहचान और समकालीन राष्ट्रीयता के बीच एक संवाद स्थापित करता है।

भारत नाम वेदों,पुराणों, महाभारत और कूटनीतिक साहित्य में हजारों वर्षों से मौजूद है,जो केवल एक नाम नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर यह गूंज उठना शुरू हुई है क़ि भारत का नाम क्या होना चाहिए,इंडिया या भारत यह प्रश्न भारतीय राजनीतिक इतिहास में भी समय-समय पर चर्चा का विषय रहा है। दिसंबर 2025 के शीतकालीन सत्र में जयपुर से एक सांसद द्वारा एक महत्वपूर्ण प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में यह प्रस्ताव फिर से संसद के केंद्र में आ गया है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत कहा है। इस प्रस्ताव ने न केवल संसद बल्कि विशेषज्ञों,इतिहासकारों, संवैधानिक विद्वानों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी एक नई बहस को जन्म दिया है। प्रस्ताव में कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भाषाई तर्क प्रस्तुत किए गए,जिनके आधार पर भारत को राष्ट्र का एकमात्र आधिकारिक नाम घोषित करने की मांग उठाई गई है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि प्रस्ताव देश की आत्मा ऐतिहासिक पहचान और समकालीन राष्ट्रीयता के बीच एक संवाद स्थापित करता है।इस प्रस्ताव के अनुसार, यह तथ्य सर्वविदित है कि भारतीय उपमहाद्वीप को सदियों से विश्व के विभिन्न हिस्सों में अलग- अलग नामों से जाना जाता रहा है,सिंधु घाटी सभ्यता के कारण इंडस, फ़ारसी भाषाई प्रभाव के कारण हिंदोस से हिंदुस्तान, और वैदिक परंपरा के मूल में भारत नाम।भारत शब्द का उल्लेख वेदों पुराणों उपनिषदों से लेकर महाभारत और कूटनीतिक साहित्य तक प्राचीन काल से मिलता है।प्रस्ताव का पहला मुख्य तर्क यही है कि भारत वह प्राचीन, सभ्यतागत और सांस्कृतिक नाम है, जिससे यह भूमि सहस्राब्दियों से पहचानी जाती रही है। संसद में दिए गए वक्तव्य में कहा गया कि जिस देश को हम सदियों से मदर इंडिया या मदर लैंड कहते रहे हैं, उसका वास्तविक, ऐतिहासिक और साहित्यिक नाम भारत ही है।दिसंबर 2025 में जयपुर से एक सांसद द्वारा संसद के शीतकालीन सत्र में एक महत्वपूर्ण प्राइवेट मेंबर बिल प्रस्तुत किया गया, जिसमें यह प्रस्ताव रखा गया कि राष्ट्र का नाम इंडिया से बदलकर भारत कर दिया जाए। यह प्रस्ताव केवल भाषाई या शब्दावली परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, औपनिवेशिक इतिहास, संवैधानिक प्राथमिकताओं और सांस्कृतिक आत्मसम्मान से जुड़ा हुआ है।बिल में कई संरचनात्मक तर्क,ऐतिहासिक साक्ष्य अंतरराष्ट्रीय संदर्भ और संविधान आधारित प्रावधान शामिल किए गए, जो भारत को राष्ट्र का एकमात्र आधिकारिक नाम घोषित करने की मांग करते हैं।मैं इस लेख के माध्यम से इस बिल के मुख्य प्रावधानों, ऐतिहासिक दावों, तर्कों और उनके प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
साथियों बात अगर हम भारत नाम की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें इसको समझने की करें तो,बिल के प्रारंभिक भाग में यह उल्लेख किया गया है कि जिस देश को हम सदियों से भारतवर्ष कहते आए हैं, उसका मूल नाम भारत ही है। बिल के अनुसार, यह नाम वेदों, पुराणों, महाभारत और कूटनीतिक साहित्य में हजारों वर्षों से मौजूद है। ब्रिटिश शासनकाल से पूर्व अंतरराष्ट्रीय यात्रियों, विद्वानों और इतिहासकारों ने इस भूमि को भारत के रूप में ही संबोधित किया।बिल का तर्क है कि भारत शब्द केवल एक नाम नहीं बल्कि सभ्यता की आत्मा, सांस्कृतिक मूल्यों आध्यात्मिक दर्शन और राष्ट्रीय पहचान का प्रतिनिधि है।बिल में यह स्पष्ट किया गया है कि इंडिया शब्द का औपचारिक उपयोग कॉलोनियल पीरियड में बढ़ा और ब्रिटिश प्रशासन ने इसे सरकारी दस्तावेज़ों में मानक रूप में स्थापित कर दिया।हालाँकि भारतीय समाज ने हमेशा साहित्य, संस्कृति, धर्म और दार्शनिक परंपरा में भारत शब्द का ही उपयोग किया। बिल में कहा गया है कि आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी औपनिवेशिक शब्दावली का उपयोग करना एक राष्ट्रीय विसंगति है, जिसे सुधारने का यही उचित समय है।

साथियों बात अगर हम संविधान का अनुच्छेद 1 और बिल का मुख्य संवैधानिक आधार इसको समझने की करें तो बिल का सबसे महत्वपूर्ण आधार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 है जिसमें लिखा है:“इंडिया, दैट इज भारत, शैल बी ए यूनियन ऑफ़ स्टेट्स”बिल में कहा गया:
संविधान ने भारत को मूल नाम और इंडिया को अनुवाद या वैकल्पिक नाम के रूप में रखा।हिंदी संस्करण और कई भारतीय भाषाओं के स्वीकृत संस्करणों में राष्ट्र का नाम भारत ही है।संविधान की व्याख्या के अनुसार, जब कोई एक नाम मूल है, तो राष्ट्रीय सम्मान, दस्तावेज़ों, सरकारी संचार और अंतरराष्ट्रीय पहचान में वही नाम प्राथमिक होना चाहिए। बिल में यह भी प्रस्ताव रखा गया है कि आवश्यकता होने पर संविधान के अंग्रेज़ी अनुवाद में संशोधन किया जाए ताकि इंडिया शब्द को हटाकर केवल भारत नाम ही सभी दस्तावेज़ों में प्रयोग किया जाए।

साथियों बात अगर हम बिल में शामिल प्रस्तावित प्रावधानों को समझने की करें तो,बिल में निम्नलिखित मुख्य प्रावधानों का उल्लेख किया गया है: (अ) राष्ट्र का एकमात्र आधिकारिक नाम भारत घोषित किया जाए।यह प्रावधान कहता है किसरकारी दस्तावेज़, पासपोर्ट, मुद्रा, कोर्ट रिकॉर्ड, राजपत्र, मंत्रालयों के नाम, विदेश मंत्रालय के दस्तावेज़ अंतरराष्ट्रीय समझौते सबमें केवल“भारत” लिखा जाए। “रिपब्लिक ऑफ़ इंडिया” को बदलकर “रिपब्लिक ऑफ़ भारत” या “भारत गणराज्य” कियाजाए (ब) सभी संवैधानिक और गैर-संवैधानिक दस्तावेज़ों में इंडिया शब्द का उपयोगचरणबद्ध तरीके से बंद हो। बिल में 3 वर्षों की संक्रमण अवधि का प्रस्ताव रखा गया है।इस अवधि में सरकारी एजेंसियाँ अपने दस्तावेज़ वेबसाइट,साइनेज और एम्बलम अपडेट करेंगी। (क़) स्कूल, विश्वविद्यालय और अन्य अकादमिक पाठ्यक्रमों में भारत नाम को मानक रूप में लागू किया जाए।इतिहास, राजनीति, भूगोल और नागरिक शास्त्र की पुस्तकों में भारत का ही उपयोग हो।सीबीएसई, एनसीईआरटी तथा यूजीसी को निर्देश जारी करने का प्रस्ताव। (ड)अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ भारत का आधिकारिक नाम भारतके रूप में दर्ज कराया जाए।यूएन आईएमफ, वर्ल्ड बैंक,डब्लूटीओ यूनेस्को आदि में नाम अपडेशन का प्रस्ताव। (ई) संविधान के अंग्रेज़ी अनुवाद में संशोधन करके इंडिया शब्द को हटाया जाए।सभी आधिकारिकअनुवादों में प्राथमिकता भारत को दी जाए। (फ़) नागरिकों और वैश्विक मंचों पर भी राष्ट्र का एकीकृत नाम उपयोग में लाया जाए।बिल कहता है कि “एक स्वतंत्र राष्ट्र को एक ही पहचान और एक ही नाम होना चाहिए।”इन प्रावधानों का उद्देश्य राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान को एकीकृतकरना और औपनिवेशिक अवशेषों से छुटकारा पाना है।

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

साथियों बात अगर हम शहरों के नाम बदले जा सकते हैं, तो राष्ट्र का क्यों नहीं? इसको समझने की करें तो,बिल में यह बेहद मजबूत तर्क दिया गया कि भारत ने पिछले वर्षों में शहरों और राज्यों के नाम उनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्वरूप में बदले, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, प्रयागराज, गुरुग्राम इत्यादि।तो सवाल यह है कि यदि शहरों और स्थानों के नाम उनके सांस्कृतिक मूल के अनुरूप बदले जा सकते हैं, तो देश के नाम को उसके मूल स्वरूप भारत में क्यों नहींलौटाया जाए? इस तर्क के अनुसार, यदि स्थानों के औपनिवेशिक नाम बदले जा सकते हैं, तो देश के नाम पर भी समान सिद्धांत लागू होना चाहिए।संस्कृति, सभ्यता और भारत की पहचान बिल का चौथा तर्क सांस्कृतिक और सभ्यतागत आयाम पर केंद्रित है। प्रस्ताव में कहा गया,भारत शब्द में हजारों वर्षों के धार्मिक, सामाजिक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक मूल्यों की परंपरा निहित है।महाभारत,विष्णु पुराण और अन्य ग्रंथों मेंभारतवर्ष का उल्लेख मिलता है।सभ्यता और संस्कृति का वास्तविक प्रतीक भारत है,न कि इंडिया इस परिप्रेक्ष्य में बिल स्पष्ट करता है कि भारत मात्र एक नाम नहीं बल्कि एक निरंतर सभ्यता की पहचान है,जो समयराजनीति और राजवंशों से परे है।अंग्रेज़ी अनुवाद में विसंगति और सुधार का प्रस्ताव,बिल में कहा गया है कि अंग्रेज़ीट्रांसलेशन की वजह से इंडिया शब्द प्रशासनिक रूप से प्रमुख हो गया।बिल काप्रस्ताव अंग्रेज़ी अनुवाद समिति बनाई जाए।यह समिति संविधान एवं अन्यकानूनी दस्तावेज़ों के अंग्रेज़ी संस्करण को भारत नाम के अनुरूप परिवर्तित करेगी।

साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय संदर्भ,विश्व साहित्य में भारत का उल्लेख इसको समझने की करें तो बिल के अनुसार:जर्मनी ने 1800 के दशक में भारत को भारत कहा था।कई अंतरराष्ट्रीय यात्रियों, ह्वेनसांग मेगास्थनीज़, फाह्यान, अल-बिरूनी,ने भारत को एक एकीकृत सांस्कृतिक इकाई भारतवर्ष कहा है।विश्व साहित्य तथा विदेशी शोधों में भी यह शब्द अक्सर मिलता है।इस तर्क के अनुसार,भारत कीअंतरराष्ट्रीय पहचान ऐतिहासिक रूप से भारत शब्द के साथ अधिक संगत बैठती है। स्वतंत्र राष्ट्र के लिए एक नाम की आवश्यकता है बिल के अंतिम तर्क में कहा गया:एक स्वतंत्र राष्ट्र को अपनी पहचान के लिए एक ही नाम रखना चाहिए।इंडिया और भारत दोनों नामों का समानांतर उपयोग भ्रम पैदा करता है।संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक मंचों पर एक ही नाम से जाना जाना अंतरराष्ट्रीय स्थिति को मजबूत करता है।इस दृष्टिकोण से बिल यह मांग करता है कि स्वतंत्र भारत को, संवैधानिक मान्यता प्राप्त नाम भारत के आधार पर अपनी पहचान तय करनी चाहिए।
साथियों बात अगर हम इंडिया का नाम भारत होने के संभावित फायदे और नुकसान इसको समझने की करें तो इसके मुख्य फायदे यह माने जाते हैं कि भारत नाम राष्ट्र की प्राचीन सभ्यता, ऐतिहासिक विरासत और स्वदेशी पहचान को अधिक स्पष्ट रूप से दर्शाता है। इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान सुदृढ़ हो सकती है, जैसे नेपाल या ईरान ने अपने पारंपरिक नामों को अपनाकर किया।इसके अतिरिक्त भारत नाम संवैधानिक रूप से पहले से मान्य है, जिससे घरेलू स्तर पर आत्मगौरव और सांस्कृतिक एकरूपता की भावना मजबूत हो सकती है।हालाँकि, इसके नुकसान भी व्यावहारिक स्तर पर महत्वपूर्ण हैं। वैश्विक व्यापार, कूटनीति, पासपोर्ट, अंतरराष्ट्रीय संधियों, निवेश दस्तावेजों और ब्रांडिंग में इंडिया नाम लंबे समय से स्थापित है। इसे बदलने से बड़े पैमाने पर प्रशासनिक व्यय, दस्तावेजों के पुनर्लेखन की लागत और अस्थायी भ्रम उत्पन्न हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार साझेदारों के लिए भी संक्रमण काल चुनौतीपूर्ण होगा। इसके अलावा,इंडिया ब्रांडवैश्विक अर्थव्यवस्था में एक स्थिरपहचान रखता है; अचानक परिवर्तन विदेशी निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पुरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि,भारत नाम परिवर्तन बिल केवल शब्द परिवर्तन का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि यह उस गहरे प्रश्न से संबंधित है कि आख़िर भारत अपनी राष्ट्रीय पहचान को कैसे प्रस्तुत करना चाहता है?प्रस्ताव में ऐतिहासिकता, सांस्कृतिक निरंतरता, संविधान, अंतरराष्ट्रीय संदर्भ और औपनिवेशिक विरासत सभी तत्व शामिल हैं।यदि यह प्रस्ताव स्वीकृत होता है, तो भारत की पहचान विश्व मंच पर एक प्राचीन सभ्यता आधारित राष्ट्र के रूप में और अधिक सशक्त होगी।यदि यह प्रस्ताव आगे बहस के लिए भेजा जाता है, तो यह आने वाले वर्षों में राजनीतिक, संवैधानिक और सांस्कृतिक विमर्श का केंद्र रहेगा।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 92841414252

गुरु नानक जयंती महोत्सव 5 नवंबर 2025, एक दिव्य चेतना का अवतरण-सतगुरु नानक प्रगटिया मिटी धुंध जग चानण होआ।

गुरु नानक जयंती महोत्सव 5 नवंबर 2025, एक दिव्य चेतना का अवतरण-सतगुरु नानक प्रगटिया मिटी धुंध जग चानण होआ।

पूरी दुनियां में गूंजा,धन गुरु नानक सारा जग तारिया – प्रकाशोत्सव की पावन बेला से जग पवित्र हुआ

गुरु नानक देव जी केवल सिख धर्म के प्रथम गुरु ही नहीं थे, बल्कि समूची मानवता के लिए एक विश्वगुरु, एक आध्यात्मिक क्रांति के प्रणेता थे- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर पूरी दुनियां में सतगुरु नानक प्रगटिया मिट्टी धुंध जग चानण होआ, हुकमे अंदर सभ क़ो,बाहर हुकम ना कोए,सिमर सिमर सुख पावहुँ सिमरन कर मन मेरे, सबना ज़ियादा इक दाता, सो मैं विसर ना जाई, वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतेह-श्रद्धा भाव से आंखें बिछाए भक्तगण केनयन तृप्त हुए,नानक नाम चढ़दी कला तेरे भाणे सरबत दा भला के संदेश के साथ पूरे विश्व में  स्थित सभी गुरुद्वारे सिख धर्म के पहले गुरु और संस्थापक श्री गुरुनानक देव जी महाराज का 556 वाँ प्रकाशोत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है।उनका जन्म पंजाब के तलवंडी (ननकाना साहिब) में कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था, जो 2025 में 5 नवंबर को पड़ रहा है। यह दिन “गुरु नानक प्रकाश उत्सव” के नाम से मनाया जाता है, जब सिख और अन्य धर्मावलंबी गुरु नानक की शिक्षाओं को स्मरण करते हुए नाम जप, कीर्तन, लंगर और सेवा करते हैं।

इस पावन मौके पर सिख, सिंधी समुदाय के अलावा अन्य समुदाय के लोग भी माथा टेकने गुरुद्वारा पहुंच रहे है। गुरु नानक देव जी (1469-1539) केवल सिख धर्म के प्रथम गुरु ही नहीं थे, बल्कि समूची मानवता के लिए एक विश्वगुरु, एक आध्यात्मिक क्रांति के प्रणेता थे।हालांकि प्रकाशपर्व को लेकर अनेक दिनों से चल रहे प्रभातफेरी उपरांत जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल के जयकारे लगाते हुए गुरु नानक देव जी महाराज के प्रकाश पर्व के उपलक्ष्य में हर नगर कीर्तन की तरह प्रभात फेरी निकाली गई है। सिखों के पहले पातशाह श्री गुरु नानक देव जी महाराज, जिनका नाम लेने मात्र से मानो आत्मिक शांति का अहसास होने लगता है। श्री गुरु नानक देव जी सिखों के ही नहीं, अपितु समस्त मानव जाति के लिए आदर्श हैं। उनकी शिक्षाएं, उनके विचार और उनके कर्म आज हर मनुष्य को प्रकाश के मार्ग पर ले जाते हैं। गुरु साहब ने अपना पूरा जीवन लोक भलाई के लिए समर्पित कर दिया। चूंकि दिनांक 5 नवंबर 2025 को हम वैश्विक स्तरपर बाबा गुरु नानक देवजी का प्रकाशोत्सव मना रहे हैं, इसलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से इस आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगे, पूरी दुनियाँ में गूंजा धन गुरु नानक सारा जग तारिया – सतगुरु नानक प्रगटिया मिटी धुंध जग चानण होआ,पावन बेला से जग पवित्र हुआ।

साथियों बात कर हम बाबा गुरु नानक देव के पावन जन्म की करें तो, बाबाजी का जन्म एक खत्रीकुल में रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गाँव (अभी पाकिस्तान में पंजाब प्रान्त में जिसका नाम आगे चलकर ननकाना पड़ गया) में कार्तिकी पूर्णिमा को हुआ था।कुछ विद्वान इनकी जन्मतिथि 15 अप्रैल 1469 मानते हैं, किंतु प्रचलित तिथि कार्तिक पूर्णिमा ही है, जो अक्टूबर-नवंबर में दीवाली के 15 दिन बाद पड़ती है। उनके पिता का नाम मेहता कालू और माता का नाम तृप्ता देवी था, जबकि बहन बेबे नानकी थीं।गुरु साहिब बचपन से ही प्रखर बुद्धि के स्वामी थे। लड़कपन से वे सांसारिक मोहमाया के प्रति काफी उदासीन रहा करते थे। पढ़ने-लिखने में बिल्कुल भी रुचि नहीं थी, लेकिन उनका सारा समय आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत होता था। उनके बाल्यकाल में कई ऐसी चमत्कारी घटनाएं हुई, जिसके बाद लोग उन्हे दिव्य शख्सियत मानने लगे।

साथियों बात अगर हम बाबा गुरु नानक देव के बाल्यापन से युवापन की करें तो, बाबाजी का मन पढ़ने में नही लगता था, हालाँकि वे तेज बुद्धि के थे। उन्होंने 7-8 साल की उम्र में ही स्कूल छोड़ दिया था। उनका ध्यान शुरुआत से ही आध्यात्म की तरफ था,तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। आगे चलकर इनका विवाह सोलह वर्ष की आयु में गुरदासपुर जिले में लाखौकी नामक स्थान की कन्या सुलक्खनी से हुआ था। 32 वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र श्रीचंद का जन्म हुआ था और चार वर्ष पश्चात् दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ था। नानक का मन गृहस्थी में नही लगा इसलिए उन्होंने 1507 में अपने दोनों पुत्रों और पत्नी को अपने श्वसुर के घर छोड़ दिया और अपने चार साथियों रामदास,मरदाना, लहना, बाला के साथ तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े।

साथियों बात अगर हम बाबा गुरु नानक देव के दर्शन आधारशिला की करें तो, नानक देव जी के दर्शन की आधारशिला यह है कि वे सर्वेश्वरवादी थे।जिसका मतलब होता है कि ईश्वर सब जगह है अर्थात संसार के सभी तत्त्वों, पदार्थों और प्राणियों में ईश्वर विद्यमान है एवं ईश्वर ही सब कुछ है।नानक जी मूर्ती पूजा के विरोधी थे इसके अलावा उन्होंने हिंदू धर्म में फैली कुरीतिओं का सदैव विरोध किया था। उन्होंने एक परमात्मा की उपासना के मार्ग को बताया था, यही कारण है कि उनके विचारों को हिंदु और मुसलमान दोनों धर्मों के लोगों ने पसंद किया जाता है।संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं। हिंदी साहित्य में गुरुनानक भक्तिकाल के अतंर्गत आते हैं और वे भक्तिकाल में निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी शाखा से संबंध रखते हैं।

साथियों बात अगर हम सतगुरु नानक प्रगटिया मिटी धुंध की करें तो, सतगुरु नानक प्रगट्या, मिटी धुंध जग चानन होया, कलतारण गुरु नानक आया, ज्यों कर सूरज निकलया तारे छपे अंधेरपोलावा। गुरु नानक देव के प्रकाश पर्व पर यह शबद गुरुद्वारों में गूंजायमान हो रहे हैं। कथा वाचक अपनी वाणी व रागी ढाडी जत्थे अपने कीर्तन से गुरु की महिमा का जो बखान कर रहे हैं, उसे गुरु घर में पहुंची संगत आस्था के समंदर में गोते लगा रही है। पूरे विश्व के गुरुद्वारों में जहां हजारों की तादाद में संगत माथा टेकने को उमड़ रही है। संगत ने जोड़ा घर, लंगर व बर्तन की सेवा कर रही है। पवित्र सरोवर के पानी से खुद को पवित्र कर रही है। बता दें श्री गुरुनानक देव जी का जीवन सदैव समाज के उत्थान में बीता। उस समय का समाज अंध विश्वासों और कर्मकांडों के मकड़जाल में फंसा हुआ था।ऐसे जटिल दौर में गुरुनानक देवजी ने प्रकट होकर समाज में आध्यात्मिक चेतना जगाने का जो काम किया, उसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। श्री गुरुनानक देव जी ने अपने उपदेशों में निरंकार पर जोर दिया। उन्होंने कहा धार्मिक ग्रंथ का ज्ञान ऐसी नैया है, जो अंधविश्वास के भवसागर से पार उतारती है। ये ज्ञान हमें निरंकार के देश की तरफ लेकर जाता है, जिसके समक्ष सिख आज भी नतमस्तक होते हैं।सिखमत का आगाज़ ही एक से होता है। सिखों के धर्म ग्रंथ में एक की ही व्याख्या है। एक को निरंकार, पारब्रह्म आदि नामों से जाना जाता है। निरंकार का स्वरूप श्रीगुरुग्रंथ साहिब की शुरुआत में बताया है जिसे आम भाषा में गुरु साहिब के उपदेशों का मूल मन्त्र भी कहते हैं। यह ग्रंथ पंजाबी भाषा और गुरुमुखी लिपि में है। इसमें मुख्यत:कबीर, रैदास और मलूकदास जैसे भक्त कवियों की वाणियाँ सम्मिलित हैं।
साथियों बात अगर हम बाबा जी की चार उदासियों की करें तो, गुरु साहिब चारों दिशाओं में घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देने लगे। 1521 ईस्वी तक उन्होंने चार यात्रा चक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य स्थान शामिल थे। इन यात्राओं को पंजाबी में उदासियाँ के नाम से जाना जाता है। गुरु नानक देव जी मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं रखते थे। नानक जी के अनुसार ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर ही है। उन्होंने हमेशा ही रुढ़ियों और कुरीतियों का विरोध किया। उनके विचारों से नाराज तत्कालीन शासक इब्राहिम लोदी ने उन्हें कैद तक कर लिया था। पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोदी हार गया और राज्य बाबर के हाथों में आ गया, तो उन्हें कैद से मुक्ति मिली।

साथियों बात अगर हम बाबा जी के जीवन की आखिरी सांस तक लोग भलाई के काम करने की करेंतो,जीवन के अंतिम दिनों में गुरु साहिब के लोकहित में किए गए कामों की प्रसिद्धि हवा में घुलती फूलों की महक की तरह हर तरफ फैल चुकी थी। अपने परिवार के साथ मिलकर वे मानवता की सेवा में पूरा समय व्यतीत करने लगे।

उन्होंने करतारपुर नाम से एक नगर बसाया, जो अब पाकिस्तान के नारोवाल जिले में स्थित है।अपनी चार उदासियों के बाद गुरुनानक देव जी 1522 में करतारपुर साहिब में बस गए। उनके माता-पिता का परलोक गमन भी इसी जगह पर हुआ था।करतारपुर साहिब में ही गुरुनानक साहिब ने सिख धर्म की स्थापना की थी। उन्होंने रावी नदी के किनारे सिखों के लिए एक नगर बसाया और यहां खेती कर नाम जपो, किरत करो और वंड छको का उपदेश दिया। करतारपुर साहिब में उन्होंने अपने जीवन के आखिरी 17 साल बिताए। यहीं पर 22 सितंबर 1539  ईस्वी को उन्होंने समाधि ले ली। ज्योति ज्योत समाने से पहले गुरु साहिब ने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव जी के नाम से जाने गए।
साथियों बात अगर हम बाबा जी के चार मित्रों की करें तो, सिख धर्म के प्रथम गुरु गुरुनानक देवी जी के चार शिष्य थे। यह चारों ही हमेशा बाबाजी के साथ रहा करते थे। बाबाजी ने अपनी लगभग सभी उदासियां अपने इन चार साथियों के साथ पूरी की थी। इन चारों के नाम हैं-मरदाना लहणा , बाला और रामदास के साथ पुरी की थी।

कहते हैं कि 1499 में उनकी सुल्तानपुर में मुस्लिम कवि मरदाना के साथ मित्रता हो गई। मरदाना तलवंड से आकर यहीं गुरु नानक का सेवक बन गया था और अन्त तक उनके साथ रहा। गुरु नानक देव अपने पद गाते थे और मरदाना रवाब बजाताथा,मरदाना ने गुरुजीकी चार प्रमुख उदासियों में उनके साथ यात्रा की। मरदाना ने गुरुजी के साथ 28 साल में लगभग दो उपमहाद्वीपों की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने तकरीबन 60 से ज्यादा प्रमुख शहरों का भ्रमण किया। जब गुरुजी मक्का की यात्रा पर थे तब मरदाना उनके साथ थे।गुरुजी के दो और शिष्य थेजिसका नाम बाला और रामदास था। मरदाना, बाला और रामदास तीनों ने ही गुरुजी की उदासियों में उनका साथ दिया और वे हरदम उनकी सेवा में लगे रहे।लहना नाम के भी गुरुजी के एक प्रसिद्ध शिष्य थे। कहते हैं कि लहना जी माता रानी ज्वालादेवी के परमभक्त थे। एक दिन उन्होंने गुरुनानक के एक अनुयायी भाई जोधा सिंह खडूर निवासी से उन्होंने गुरुनानक के शबद सुने और वे उससे बहुत ही प्रभावित हुए और वे बाबाजी से मिलने जा पहुंचे। भाई मरदाना वो मुस्लिम घर में पैदा हुए थे  बाबा नानक जहां भी कहीं बाहर यात्राओं पर गए, भाई मरदाना हमेशा उनके साथ रहे। गुरबाणी के संगीत में उनकी गहरी छाप है। कहा जाता है कि जब तक भारत का बंटवारा नहीं हुआ था, तब तक पाकिस्तान के ननकाना साहिब और करतारपुर के गुरु ग्रंथ दरबार साहिब गुरुद्वारे में गुरबाणी पर संगीत की थाप उनके वंशज ही करते थे। नानक और मरदाना एक ही गांव में पैदा हुए। ये तलवंडी में हुआ, जो अब पाकिस्तान के ननकाना साहिब में है। तब गांवों में आमतौर पर हिंदू-मुसलमानों के बीच कोई खाई नहीं थी। सब मिलजुलकर रहते थे करीब 300 -400 साल पहले हमारी सामाजिक संरचना यूं भी खासी अलग और भाईचारे वाली होती थी।नानक और मरदाना दोनों बचपन के दोस्त थे। हालांकि मरदाना बड़े थे। ऐसे भी बचपन की दोस्ती ना तो धर्म की दीवारों को मानती है और ना ही ऊंच-नीच को नानक बड़े और अमीर खानदान से वास्ता रखते थे तो मरदाना उस मुस्लिम मरासी परिवार से ताल्लुक रखते थे, जो गरीब थे और जिनका ताल्लुक संगीत के साजों से था।राम दी चिड़िया, राम दा खेत चुग लो चिड़ियो, भर-भर पेट।। यह लिखी गयी दो लाइन्स गुरुनानक जी की जिंदगी भर की फिलोसोफी को बयां कर देतीं हैं।

अतः अगर हम पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि गुरु नानक जयंती महोत्सव 5 नवंबर 2025
पर विशेष-सतगुरु नानकप्रगटिया मिटी धुंध जग चानण होआ।वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतेह-श्रद्धा भाव से आंखेंबिछाए भक्तगण के नयन तृप्त हुए.पूरी दुनियां में गूंजा,धन गुरु नानक सारा जग तारिया – प्रकाशोत्सव की पावन बेला से जग पवित्र हुआ।

संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

ट्रंप-ज़िनपिंग के बीच समझौता वास्तव में अमेरिका की रणनीतिक सफ़लता है, या चीन की शतरंजी चाल का एक हिस्सा -एक सटीक विश्लेषण

ट्रंप-ज़िनपिंग के बीच समझौता वास्तव में अमेरिका की रणनीतिक सफ़लता है, या चीन की शतरंजी चाल का एक हिस्सा -एक सटीक विश्लेषण

दक्षिण कोरिया बुसान बैठक- संवाद या शक्ति प्रदर्शन?“छह साल बाद एक फ्रेम में दिखे डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग- वैश्विक शक्ति संतुलन की नई परिभाषा”

दक्षिण कोरिया बुसान ट्रंप- ज़िनपिंग मुलाक़ात -दुनियाँ के लिए एक प्रतीकात्मक संदेश है,कि वैश्विक शांति का रास्ता संवाद से गुजरता है, जिसमें विश्वास और समानता की भावना हो, ज़ो नहीं दिखा-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर दुनियाँ की निगाहें आज दक्षिण कोरिया के बुसान शहर पर टिकी थीं, जहाँ लगभग छह वर्षों केअंतराल के बाद अमेरिकी राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक ही फ्रेम में नजर आए। यह दृश्य प्रतीकात्मक रूप से जितना साधारण दिखा,उतना ही भू-राजनीतिक दृष्टि से गूढ़ था। दोनों नेता विश्व राजनीति की दो ऐसी ध्रुवीय शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो पिछले एक दशक से अधिक समय से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से वैश्विक आर्थिक, सैन्य और वैचारिक प्रतिस्पर्धा में लिप्त हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यद्यपि मंच साझा करने का दृश्य शांति और संवाद का संदेश देता है, किंतु दोनों के बीच उपस्थित कूटनीतिक दूरी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी। यह दूरी मात्र शारीरिक नहीं, बल्कि नीतिगत, विचारधारात्मक और शक्ति-प्रदर्शन की गहराइयों में निहित है।साउथ कोरिया के बुसान में हुई यह बैठक औपचारिक रूप से एशिया- पैसिफिक क्षेत्र में आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा मुद्दों पर केंद्रित थी। लेकिन इसके पीछे वास्तविक उद्देश्य था,वैश्विक शक्ति समीकरणों को पुनः परिभाषित करना। ट्रंप, जो दोबारा अमेरिकी राजनीति के केंद्र में लौट आए हैं, अपनी पूर्ववर्ती नीतियों के समान ही इस बार भी “अमेरिका फर्स्ट” एजेंडा लेकर आए हैं। दूसरी ओर, शी जिनपिंग, जो अपनी तीसरी कार्यावधि में चीन को एक आर्थिक और सैन्य सुपरपावर के रूप में स्थापित करने की दिशा में अग्रसर हैं, इस बैठक को एक मंच के रूप में देख रहे थे,जहाँ चीन अपनी रणनीतिक आत्मनिर्भरता का प्रदर्शन कर सके।

एडवोकेट किशन सनमुखदास

हालांकि, इन दोनों के बीच हुए संवाद की प्रकृति में ठंडापन झलक रहा था।ऐसा प्रतीत हुआ मानो दोनों नेता एक औपचारिक कूटनीतिक आवश्यकता के तहत एक साथ बैठे हों, न कि आपसी विश्वास या सामरिक साझेदारी के उद्देश्य से बैठक की।

साथियों बात अगर हम दक्षिण कोरिया बुसान बैठक चीन-रूस ऊर्जा गठबंधन और अमेरिकी मौन को समझने की करें तो, वर्तमान वैश्विक ऊर्जा समीकरण में चीन और रूस के बीच का गठबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण है। रूस- यूक्रेन युद्ध के बाद, जब पश्चिमी देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तब चीन ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि की।आज चीन रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बन चुका है।लेकिन बुसान की बैठक में, जहाँ ट्रंप ने भारत पर रुस से तेल खरीदने पर 50 पर्सेंट टैरिफ लगाने जैसे कठोर आर्थिक कदमों की घोषणा की थीं, वहीं उन्होंने चीन-रूस ऊर्जा गठबंधन के मुद्दे पर आश्चर्यजनक मौन बनाए रखा। ताइवान चीन संबंधों पर भी यह मौन तथा 10 पर्सेंट टैरिफ कम करना अमेरिका की रणनीतिक विवशता को दर्शाता है,क्योंकि ट्रंप भली-भांति जानते हैं कि रूस के तेल व्यापार में चीन की भागीदारी पर सीधा प्रश्न उठाना एक व्यापक जियो- इकोनॉमिक टकराव को जन्म दे सकता है।दूसरी ओर, ट्रंप भारत के उभरते व्यापारिक प्रभाव और डॉलर-मुक्त ऊर्जा सौदों से असहज हैं। इसलिए उन्होंने भारत पर टैरिफ बढ़ाकर आर्थिक दबाव बनाने की रणनीति अपनाई ,यह चीन के बजाय एक सॉफ्ट टारगेट पॉलिसी की झलक है।अमेरिका और चीन की प्रतिद्वंद्विता अब केवल आर्थिक नहीं रही,यह अब सॉफ्ट पावर बनाम हार्ड पॉलिटिक्स की लड़ाई बन चुकी है। चीन अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव,टेक्नोलॉजी हब्स और डिजिटल युआन के माध्यम से एक वैकल्पिक वैश्विक आर्थिक व्यवस्था तैयार कर रहा है। वहीं अमेरिका अपने पुराने सहयोगियों जापान, दक्षिण कोरिया,ऑस्ट्रेलिया और भारत (क्वाड के ज़रिए) के साथ सामरिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।बुसान बैठक इस व्यापक संघर्ष का एक कूटनीतिक मंच बनकर उभरी। ट्रंप और शी जिनपिंग दोनों ने अपने-अपने राजनीतिक हितों को साधने की कोशिश की,परंतु विश्वास की पुनर्स्थापना अभी बहुत दूर दिख रही है।

साथियों बात अगर हम ट्रंप की गर्मजोशी और शी जिनपिंग की भावहीनता-दो व्यक्तित्व, दो रणनीतियाँ मंत्र को समझने की करें तो,जब बैठक की शुरुआत हुई, ट्रंप पूरे उत्साह और आत्मविश्वास में दिखाई दिए। उन्होंने शी जिनपिंग की ओर बढ़ते हुए अत्यंत गर्मजोशी से हाथ मिलाया। यह वही ट्रंप हैं,जिन्होंने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान “ट्रेड वॉर” के जरिए चीन की अर्थव्यवस्था को चुनौती दी थी,लेकिन साथ ही समय- समय पर व्यक्तिगत संबंधों की राजनीति का भी प्रयोग किया। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट,आत्मीयता और कैमरों की ओर देखने का आत्मविश्वास था,यह ट्रंप की विशिष्ट शैली है, जो वे अक्सर कूटनीतिक मंचों पर दिखाते हैं।इसके विपरीत,शी जिनपिंग का चेहरा लगभग भावहीन था, न मुस्कुराहट,न तनाव,न ही कोई प्रतिक्रिया। यह चीन की कूटनीतिक परंपरा का हिस्सा है,जहाँ “संयम”और “भावनाओं का नियंत्रण” नेतृत्व की परिपक्वता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस बार उनकी शांति एक गहरी असहमति या असंतोष का संकेत भी दे रही थी। यह संकेत उस अविश्वास का था,जो अमेरिका और चीन के बीच पिछले कुछ वर्षों में और गहराता गया है,विशेषकर ट्रेड वॉर, टेक्नोलॉजी कंट्रोल्स, साउथ चाइना सी विवाद, और ताइवान के मुद्दों के कारण।

साथियों बात अगर हम ट्रंप का “अकेले चलना”,शक्ति प्रदर्शन या संदेश? कुछ समझने की करें तो,बैठक के समापन पर जब सभी नेता अपने-अपने मार्ग की ओर बढ़े, तो ट्रंप ने शी जिनपिंग के साथ कुछ औपचारिक शब्दों का आदान-प्रदान करने के बाद उन्हें उनकी गाड़ी तक छोड़ा फिर वहां से अकेले प्रस्थान किया। यह दृश्य मीडिया के कैमरों में कैद हुआ और तुरंत अंतरराष्ट्रीय सुर्खियाँ बन गया। विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का “अकेले चलना” किसी अनायास घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि एक सामरिक संकेत था,यह दिखाने के लिए कि अमेरिका किसी पर निर्भर नहीं है और वह विश्व मंच पर एकाकी नेतृत्व करने में सक्षम है। इसके विपरीत, शी जिनपिंग ने इस दृश्य को पूरी तरह नज़र अंदाज़ किया। उनका शांत और संयमित व्यवहार यह दर्शा रहा था कि चीन भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से ऊपर उठकर रणनीतिक स्तर पर सोच रहा है। यह उनके “सॉफ्ट पॉवर” और “कूटनीतिक मौन”की नीति का प्रतीक है,जहाँ प्रतिक्रियाएँ शब्दों से नहीं, बल्कि नीतियों से दी जाती हैं।

साथियों बात अगर हम ट्रंप की मीडिया रणनीति और “10 में से 12” अंक देने को समझने की करें तो,मीटिंग के बाद अमेरिकी मीडिया में ट्रंप ने बयान दिया कि वे इस बैठक को “सफल” मानते हैं और उसे 10 में से 12 अंक देते हैं। यह बयान उनके विशिष्ट अंदाज़ का हिस्सा था अतिशयोक्ति पूर्ण, आत्मविश्वासी और मीडिया आकर्षण केंद्रित। ट्रंप जानते हैं कि उनकी राजनीतिक पहचान केवल नीतियों से नहीं, बल्कि नैरेटिव कंट्रोल से बनती है।उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि वे एक ऐसे नेता हैं,जो हरपरिस्थिति में विजयी दिखाई देते हैं।यह अमेरिकी मतदाताओं के लिए एक मनोवैज्ञानिक संकेत था कि ट्रंप वैश्विक कूटनीति में फिर से सक्रिय हैं और “अमेरिका की प्रतिष्ठा” को पुनः स्थापित कर रहे हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीयविश्लेषकों का मत इससे भिन्न है। उनका कहना है कि ट्रंप की यह सफलता घोषणा अधिकतर प्रचारात्मक थी, क्योंकि बैठक में किसी ठोस नीति या समझौते की घोषणा नहीं हुई।

साथियों बातअगर हम ट्रंप व ज़िनपिंग क़ी बुसान बैठक के भू-राजनीतिक निहितार्थ को समझने की करें तो, बुसान की बैठक केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी,यह आने वाले दशक की अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला संकेत थी। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा अब भू-अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल प्रभुत्व और कूटनीतिक गठबंधनों में परिलक्षित होगी।ट्रंप और शी जिनपिंग के चेहरे के भाव, उनकी शारीरिक भाषा, और उनके मौन तक ने इस बात को स्पष्ट कर दिया कि यह शीत युद्ध का नया संस्करण शुरू हो चुका है,एक ऐसा युद्ध, जिसमें हथियार नहीं बल्कि टैरिफ, टेक्नोलॉजी और ट्रेड ब्लॉक इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

साथियों बात अगर हम भारत की भूमिका, संतुलनकारी शक्ति को समझने की करें तो,इस पूरी परिदृश्य में भारत की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहाँ ट्रंप भारत पर टैरिफ बढ़ाकर आर्थिक दबाव बना रहे हैं, वहीं भारत अब वैश्विक मंचों पर रणनीतिक आत्मनिर्भरता और मल्टी- अलाइनमेंट की नीति अपना रहा है। भारत न तो अमेरिका की कठपुतली है,न चीन का समर्थक ,बल्कि वह दोनों के बीच एक तटस्थ शक्ति संतुलनकारी देश के रूप में उभर रहा है। ट्रंप का भारत पर टैरिफ लगाना यह भी दर्शाता है कि अमेरिका अब भारत को केवल सहयोगी नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के रूप में देखने लगा है। वहीं चीन भारत को एशिया में अमेरिका की कूटनीति का विस्तार मानता है। इस जटिल त्रिकोणीय संबंध में, भारत का हर कदम अब वैश्विक शक्ति समीकरणों को प्रभावित करता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि एक फ्रेम में दो विपरीत ध्रुव,छह वर्षों बाद एक ही मंच पर दिखाई दिए ट्रंप और शी जिनपिंग,परंतु उनके बीच की मानसिक दूरी शायद पहले से भी अधिक बढ़ चुकी है। ट्रंप की राजनीति “सीधे टकराव और मीडिया प्रभुत्व” पर आधारित है, जबकि शी जिनपिंग “रणनीतिक संयम और दीर्घकालिक योजनाओं” के प्रतीक हैं।यह मुलाकात दुनियाँ के लिए एक प्रतीकात्मक संदेश है, कि वैश्विक शांति का रास्ता संवाद से गुजरता है,लेकिन संवाद तभी फलदायी होता है जब उसमें विश्वास और समानता की भावना हो। बुसान की यह मुलाकात फिलहाल विश्वास नहीं,बल्कि अविश्वास का संकेत बनकर उभरी है।ट्रंप और शी जिनपिंग भले ही एक फ्रेम में कैद हुए हों,लेकिन उनके बीच की विचारधारात्मक और नीतिगत दूरी आज भी उतनी ही गहरी है,जितनी प्रशांत महासागर के दोनों किनारों के बीच की दूरी।

संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9359653465

47 वाँ आसियांन शिखर सम्मेलन 26 से 28 अक्टूबर 2025- मलेशिया की राजधानी क़ुआलालम्पुर- समावेशिता एवं स्थिरता

47 वाँ आसियांन शिखर सम्मेलन 26 से 28 अक्टूबर 2025- मलेशिया की राजधानी क़ुआलालम्पुर- समावेशिता एवं स्थिरता

दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में समावेशी विकास, सामाजिक आर्थिक पक्षों का समुचित समन्वय, और पर्यावरणीय तथा स्थिरता संबंधी चिंताओं को प्रमुखता दी जाएगी

अमेरिका भारत सहित बड़े विकसित देश शामिल होने से आसियान अब केवल क्षेत्रीय मंच नहीं बल्कि एक वैश्विक संवाद केंद्र बनने की प्रक्रिया में है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया,महाराष्ट्र

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर दक्षिण- पूर्व एशिया के संगठन (आसियांन) का 47 वाँ संस्करण, 26 से 28 अक्टूबर 2025 तक मलेशिया की राजधानी क़ुआलालम्पुर में आयोजित होने जा रहा है।मलेशिया इस वर्ष आसियान की अध्यक्षता कर रहा है,और उन्होंने इस सम्मेलन के लिए थीम तय की है, समावेशिता एवं स्थिरता, इस थीम के अंतर्गत दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में समावेशी विकास, सामाजिक,आर्थिक पक्षों का समुचित समन्वय, और पर्यावरणीय तथा स्थिरता संबंधी चिंताओं को प्रमुखता दी जा रही है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि इस आयोजन की विशेषता यह है कि इस बार आसियांन के दस सदस्य देशों के साथ-साथ अनेक संवाद साझेदार और वैश्विक शक्तियों के शीर्ष नेताओं की भागीदारी अपेक्षित है, जिससे यह सम्मेलन सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बता दें, भारतीय पीएम इस शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होंगे,पीएम अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों के कारण संबंधित बैठकों में भाग लेने के लिए संभवत: मलेशिया नहीं जाएंगे, मीडिया की मानें तो भारत की ओर से विदेश मंत्री इस बैठक में हिस्सा लेंगे और भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे यहां बताना जरूरी है कि इस आसियान बैठक में डोनाल्ड ट्रंप भी आ रहे हैं,ऐसे में संभावना थी कि अगर मोदी जाते हैं तो ट्रंप संग उनकी मुलाकात हो सकती थी, मगर अब मुलाकात का इंतजार बढ़ गया है।

साथियों बात अगर हम इस सम्मेलन की पृष्ठभूमि और भू-राजनीतिक महत्व को समझने की करें तोआसियान का मूल उद्देश्य है दक्षिण-पूर्व एशिया के दस सदस्य देशों ब्रुनेई, कंबोडिया,इंडोनेशिया,लाओस,मलेशिया,म्याँमार, फिलीपींस, सिंगापुर ,थाईलैंड तथा वियतनाम, में राजनीतिक -सुरक्षा,आर्थिक और सामाजिक- सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ाना। वर्ष 2025 में मलेशियाअध्यक्षत्व संभाले हुए है, जो आसियान के लिए एक अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए क्योंकि दक्षिण-पूर्व एशिया वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-रणनीति के बदलते केंद्रों में तेजी से उठा है, और चुनौती इसलिए क्योंकि इस क्षेत्र में अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा,रसद व आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान, जलवायु परिवर्तन, और मानवीय व राजनीतिक तनावों का दबाव लगातार बढ़ रहा है।इस सम्मेलन में न सिर्फ आसियान के दस सदस्य देश उपस्थित होंगे, बल्कि उनकी निगाहें उन डायलॉग पार्टनर देशों पर भी हैं जिनके साथ आसियान का व्यापक सामरिक-आर्थिक नेटवर्क बना हुआ है।उदाहरणस्वरूप, डोनाल्ड ट्रम्प की उपस्थिति की पुष्टि हो चुकी है,इसके अतिरिक्त, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, भारत, ऑस्ट्रेलिया, रूस जैसे बड़े बाहरी देश भी चर्चा के दायरे में हैं।यह व्यापक भागीदारी इस बात का संकेत है कि आसियान अब केवल क्षेत्रीय मंच नहीं बल्कि एक वैश्विक संवाद केंद्र बनने की प्रक्रिया में है।

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया,महाराष्ट्र

साथियों बात अगर हम एजेंडा, विषय औरप्राथमिकताओं अवसरों व चुनौतियों को समझने की करें तो,थीम क़ा उद्देश्य है कि विकास का लाभ समस्त सदस्य देशों- समुदायों तक पहुँच सके और सहयोग की संरचना सतत हो।मुख्य एजेंडा में शामिल होंनें की संभावना है, दक्षिण- चीन सागर में समुद्री एवं सुरक्षा विवाद, म्याँमार में नागरिक संकट, आपूर्ति श्रृंखला व आर्थिक निर्भरताएं, डिजिटल अर्थव्यवस्था व जुड़ाव, जलवायु परिवर्तन व सतत विकास, और निस्संदेह बाहरी शक्तियों के साथ रणनीतिक संवाद। इसके अलावा, व्यापार और निवेश को तत्परता से आगे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाना इस शिखर सम्मेलन की बड़ी प्राथमिकता होगी क्योंकि वैश्विक आर्थिक माहौल अस्थिर हो रहा है।अवसर और चुनौतियाँ -इस सम्मेलन के माध्यम से आसियान को अनेक अवसर मिल रहे हैं। जैसे-(1) वैश्विक संपर्क बढ़ाना,(2) बहुपक्षीय साझेदारी को गहरा करना, (3) क्षेत्रीय आवाज को सशक्त बनाना, और (4)आर्थिक तथा डिजिटल संक्रमण में नेतृत्व करना।उदाहरण स्वरूप, मलेशिया ने वर्ष 2025 में आसियान अध्यक्ष रहते हुए डिजिटल अर्थव्यवस्था ढाँचे पर जोर दिया है। चुनौतियाँ कम नहीं हैं,अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन-मध्यस्थता, म्याँमार की अंदरूनी स्थिति, दक्षिण-चीन सागर में तनाव, बढ़ती आर्थिक असममिताएँ और सदस्य देशों के बीच विकास की खाई ) जैसी समस्याएं आसियान के समक्ष खड़ी हैं।
साथियों बात अगर कर हम भारत-आसियान संबंध एवं भारत की भूमिका को समझने की करें तो भारत के लिए यह सम्मेलन विशेष महत्व रखता है क्योंकि भारत ने आसियान के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी स्थापित की है और पोस्ट-2025 दृष्टिकोण तैयार कर रहा है। उपरांत, भारत अपनी अर्थव्यवस्था,सामाजिक शक्ति व रणनीतिक प्रासंगिकता के चलते आसियान क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस सम्मेलन के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि भारत के पीएम ने इस सम्मेलन में वर्चुअल उपस्थिति की बात कही है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत आसियान मंच पर सक्रिय है, हालांकि सीधी उपस्थिति न हो पाने का तथ्य भी राजनीति- कूटनीति के आयाम को दर्शाता है।
साथियों बात अगर हम अमेरिका -आसियान तथा चीन- आसियान संबंधों का नए परिप्रेक्ष्य में पुनर्संयोजन को समझने की करें तो, अमेरिका की इस क्षेत्र में वापसी और चीन की गहरी दक्षिण-पूर्व एशिया में हिस्सेदारी दोनों ही आसियान की भूमिकाओं को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। उदाहरणस्वरूप, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की उपस्थिति और चीन-रूस-इंडिया समेत अन्य शक्तियों की संभावित उपस्थिति इस क्षेत्र को वैश्विक मुकाबले के केंद्र में ला रही है। इसके मद्देनज़र आसियान को चाहिए कि वह अपनी “आसियान-सेंट्रलिटी” को सुदृढ़ करे,अर्थात् सदस्य देशों का नेतृत्व एवं निर्णय-प्रक्रिया स्वयं आसियान के अंतर्गत रहे, न कि बाहरी शक्तियों द्वारा नियंत्रित हो जाए।आर्थिक एवं व्यापारिक आयाम-इस सम्मेलन के पूर्व 25-26 अक्टूबर को,एक दिन पहले, आसियान बिज़नेस एंड इन्वेस्टमेंट सम्मिट 2025 का आयोजन भी कुआलालम्पुर में होने जा रहा है, जिसमें वैश्विक सीईओ और व्यावसायिक नेतृत्व भाग लेगा।यह दर्शाता है कि सिर्फ राजनीतिगत मंच नहीं, बल्कि आर्थिक-वाणिज्यिक संवाद का भी एक प्रमुख अवसर इस सम्मेलन के दौरान मौजूद होगा। इस तरह, इस शिखर सम्मेलन को आर्थिक उन्नति, निवेश प्रवाह, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आपूर्ति श्रृंखला पुनर्संरचना, हरित वित्त जैसे क्षेत्रों में ‘प्रेरणा बिंदु’ के रूप में देखा जा सकता है।

साथियों बात अगर हम सुरक्षा,समुद्री तथा मानवीय चुनौतियों को समझने की करें तो, नियोजन में इस क्षेत्र में विशेष रूप से ध्यान दिया गया है,जैसे पूर्वी एशिया में समुद्री सीमाओं की स्थिति,म्याँमार में राजनीतिक- सामाजिक संकट, दक्षिण-चीन सागर में तनाव, तथा जलवायु -प्रेरित आपदाएँ। उल्लेखनीय यह भी है कि रूस की उपस्थिति या उसकी प्रतिनिधि तैनाती पर अभी निश्चितता नहीं पुतिन के आने पर प्रश्न चिह्न है,इससे यह स्पष्ट होता है कि सुरक्षा-रणनीति, वैश्विक शक्ति-संतुलन, तथा मानवीय अवस्था-मध्यस्थता जैसे जटिल विषय इस सम्मेलन के एजेंडा में अहम भूमिका निभाएंगे।स्थिरता जलवायु परिवर्तन तथा डिजिटल संक्रमण- मलेशिया की अध्यक्षता के तहत, आसियान इस वर्ष “डिजिटल अर्थव्यवस्था फ्रेमवर्क एग्रीमेंट” को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहा है। साथ ही, सदस्यों के बीच हरित वित्त, सतत निवेश व आपूर्ति श्रृंखला की लोच पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यह दृष्टिकोण वैश्विक अर्थव्यवस्था की अस्थिरता, जलवायु आपदाओं तथा ऊर्जा-संकट की चुनौतियों के बीच आसियान को अगुआ बनाने का अवसर देता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि 26-28 अक्टूबर 2025 को कुआलालम्पुर में आयोजित होने वाला 47वाँ आसियान शिखर सम्मेलन एक समय-सापेक्ष आयोजन है यह दक्षिण-पूर्व एशिया को वैश्विक मंच पर पुनःस्थापित करने का अवसर प्रस्तुत करता है,जबकि इसकी सफलता मुख्यतः इस बात पर निर्भर करेगी कि सदस्य देश एवं भागीदार देशों ने कितनी सक्रियता, सहयोग और साझा दृष्टिकोण दिखाया है।यदि सम्मेलन में स्पष्ट निर्णय, ठोस संवाद, निवेश व साझेदारी के नए मॉडल तथा रणनीतिक समझौते सामने आते हैं, तो यह आसियान के संदर्भ में एक ‘टर्निंग प्वाइंट’ साबित हो सकता है। दूसरी ओर, यदि सम्मेलन केवल बयानों तक सीमित रहा,तात्कालिक प्रभाव न दिखा पाया, या बाहरी शक्तियों द्वारा आसियान सेंट्रलिटी को चुनौती मिली, तो यह अवसर खो सकता है।

संकलनकर्ता लेखक-कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

भाई दूज 2025-दीपावली रूपी माला का पांचवा और अंतिम चमकता मोती, स्नेह, सौहार्द और प्रीति का अंतिम दीप

भाई दूज 2025-दीपावली रूपी माला का पांचवा और अंतिम चमकता मोती, स्नेह, सौहार्द और प्रीति का अंतिम दीप

भाई दूज 2025-भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के प्रेम और कर्तव्य का वैश्विक प्रतीक

भाई दुज़ पर्व बहन को ‘सद्भावना की वाहक’ और ‘आशीर्वाद की प्रदात्री’ के रूप में देखा जाता है,जो अपने भाई के लिए प्रेम का दीप जलाती है-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर भाई दूज,यह पर्व न केवल दीपावली के पांच दिवसीय महोत्सव का समापन करता है,बल्कि पारिवारिक संबंधों में निहित स्नेह, प्रेम और सुरक्षा की भावना का दिव्य उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। जहां धनतेरस से दीपावली की शुरुआत होती है

वहीं भाई दूज उस श्रृंखला का भावनात्मक चरम है, जब बहन अपने भाई की दीर्घायु और समृद्धि की मंगल कामना करती है। 22अक्टूबर 2025, मंगलवार को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल भारतीय समाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आज यह विश्वभर में प्रवासी भारतीयों के बीच पारिवारिक एकता, आत्मीयता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बन चुका है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं, कि भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के संबंध को सबसे पवित्र और आत्मीय रिश्ता माना गया है। रक्षाबंधन और भाई दूज,दोनों पर्व इस रिश्ते की गरिमा को दर्शाते हैं, किंतु दोनों में एक सूक्ष्म अंतर है। रक्षाबंधन पर बहन अपने भाई को रक्षा सूत्र बांधकर उसकी रक्षा की कामना करती है और भाई वचन देता है कि वह अपनी बहन की हर परिस्थिति में रक्षा करेगा। इस दिन भाई अपनी बहन को अपने घर बुलाता है।वहीं भाई दूज पर परंपरा उलट जाती है,बहन अपने भाई को अपने घर आमंत्रित करती है, उसका स्वागत करती है, तिलक लगाती है,भोजन कराती है और उसकी लंबी उम्र व समृद्धि की मंगलकामना करती है। यह भूमिका का परिवर्तन इस बात का प्रतीक है कि रिश्तों की गरिमा एकतरफा नहीं, बल्कि परस्पर है। जैसे भाई बहन की रक्षा करता है, वैसे ही बहन भी अपने स्नेह और शुभकामनाओं से भाई के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और संतुलन भरती है।भारत के विविध प्रांतों में तथा वैश्विक स्तरपर भाई दूज को अलग-अलग नामों और रीति- रिवाजों से मनाया जाता है।उत्तर भारत में इसे “भाई दूज” कहा जाता है, जहां बहनें अपने भाई को तिलक लगाकर भोजन कराती हैं। महाराष्ट्र और गोवा में इसे “भाऊबीज” कहा जाता है,जहां बहनें आरती कर भाई को पान, सुपारी और मिठाई देती हैं।बंगाल में इसे “भाई फोटा” कहा जाता है,और यहां बहनें अपने भाइयों को चंदन का तिलक लगाती हैं तथा विशेष मंत्र का उच्चारण करती हैं।नेपाल में इसे “भाई टीका” कहा जाता है, जो वहां का राष्ट्रीय त्योहार है और पाँच दिन तक चलने वाले तिहार उत्सव का हिस्सा है।21वीं सदी में जब दुनियाँ तकनीकी रूप से जुड़ रही है लेकिन भावनात्मक रूप से दूर हो रही है,तब भाई दूज जैसे पर्व वैश्विक समाज को यह सिखाते हैं कि मानवता की सबसे बड़ी शक्ति रिश्ते हैं अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और खाड़ी देशों में बसे प्रवासी भारतीय आज इस पर्व को धूमधाम से मनाते हैं। वहां की भूमि पर यह केवल भारतीयता का प्रतीक नहीं बल्कि संस्कृति के अंतरराष्ट्रीय संवाद का माध्यम बन चुका है।भाई दूज आज विश्व समुदाय को यह संदेश देता है कि सच्चे संबंध स्वार्थ से नहीं, बल्कि आत्मीयता से बनते हैं। यह पर्व वैश्वीकरण की दौड़ में पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण का जीवंत उदाहरण है।सभी परंपराओं में भाव एक ही है,भाई की सुरक्षा और बहन के स्नेह का सम्मान। यही विविधता भारतीय संस्कृति की एकता में अनेकता का सबसे चूँकि भाई दूज 2025-दीपावली रूपी माला का पांचवा और अंतिम चमकता मोती,स्नेह, सौहार्द और प्रीति का अंतिम दीप हैँ,इसलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से व इस आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगेभाई दूज 2025-भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के प्रेम और कर्तव्य का वैश्विक प्रतीक हैँ।


साथियों बात अगर हम, भाई दूज क़े सामाजिक और पारिवारिक आयाम को समझने की करें तो,आधुनिक समाज में जहां परिवार छोटे होते जा रहे हैं और रिश्तों में दूरी बढ़ रही है, वहां भाई दूज जैसे पर्व सामाजिक एकता और पारिवारिक पुनर्सयोजन का अवसर प्रदान करते हैं। इस दिन बहनें अपने मायके जाती हैं, पुराने संबंधों को फिर से जीवित करती हैं और भावनात्मक संवाद का सेतु बनाती हैं।भाई दूज का पर्व हमें यह सिखाता है कि परिवार केवल रक्त संबंध नहीं, बल्कि भावनाओं की बुनावट है। जिस घर में यह पर्व मनाया जाता है, वहां स्नेह, आस्था और संवाद का वातावरण स्वतः निर्मित हो जाता है।यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के सम्मान और उनकी भूमिका की पहचान का भी अवसर है। बहन को ‘सद्भावना की वाहक’ और ‘आशीर्वाद की प्रदात्री’ के रूप में देखा जाता है, जो अपने भाई के लिए प्रेम का दीप जलाती है।
साथियों बात अगर हम भाई दूज 2025 आध्यात्मिकता, परंपरा और आधुनिकता का संगम को समझने की करें तो, भाई दूज 2025 के आगमन के साथ दीपावली की श्रृंखला पूर्ण होती है, लेकिन उसके साथ ही यह पर्व एक नवीन आरंभ का प्रतीक भी है। यह दिन केवल भाई और बहन के मिलन का नहीं, बल्कि परिवार, समाज और संस्कृति के पुनर्संयोजन का भी अवसर है।आधुनिक समाज में जहां रिश्ते डिजिटल माध्यमों तक सीमित हो रहे हैं,वहां भाई दूज हमें सिखाता है कि स्पर्श, स्नेह और साथ का कोई विकल्प नहीं।जब बहन तिलक लगाती है, तब वह केवल प्रतीकात्मक क्रिया नहीं कर रही होती, बल्कि वह भाई के जीवन में संरक्षण, आशीर्वाद और शुभता का संचार कर रही होती है। यही उस प्रेम की शक्ति है जो न समय, न दूरी और न मृत्यु से बंधी होती है।


साथियों बात अगर हम,भाई दूज का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पहलू को समझने की करें तो, भारतीय त्यौहार केवल धार्मिक न होकर वैज्ञानिक और मनो वैज्ञानिक दृष्टि से भी गहरे अर्थ रखते हैं। भाई दूज का पर्व दीपावली के बाद आता है,जब वातावरण में ठंड का आगमन होता है, खेतों में नई फसलें आने लगती हैं और परिवार एक साथ समय बिताते हैं। यह मौसम सामाजिक एकत्रीकरण और मानसिक नवजीवन के लिए उपयुक्त होता है।भाई दूज पर तिलक लगाने की परंपरा का भी वैज्ञानिक आधार है। चंदन, कुमकुम और अक्षत का प्रयोग मस्तक के उस भाग (अज्ञा चक्र) पर किया जाता है जो मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र है। इस तिलक से शरीरमें ऊर्जा संतुलित होती है और भावनात्मक जुड़ाव का अनुभव गहरा होता है।इसके अतिरिक्त, भाई- बहन का मिलन और आत्मीय संवाद सामाजिक मानसिक स्वास्थ्य को भी सुदृढ़ करता है। यह पर्व परिवार में संवाद, संवेदना और समर्थन की भावना को प्रबल तथा सटीक बनाता है।


साथियों बात अगर हम भाई दूज का पौराणिक आध्यात्मिक आधार व नारी सशक्तिकरण क़े संदेश को समझने की करें तो भाई दूज का मूल आधार यमराज और उनकी भगिनी यमुना की पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि यमराज, जो मृत्यु के देवता हैं, एक बार लंबे समय बाद अपनी बहन यमुना के घर पहुंचे। यमुना ने अपने भाई का आदरपूर्वक स्वागत किया, तिलक लगाया,आरती उतारी और उन्हें स्वादिष्ट भोजनकराया। यमराज बहन की इस आत्मीयता से अत्यंत प्रसन्न हुएऔर वरदान दिया कि जो भी इस दिन अपनी बहन के घर जाकर तिलक ग्रहण करेगा और स्नेहपूर्वक भोजन करेगा, उसे यमलोक का भय नहीं रहेगा।इस कथा में न केवल धार्मिक भावार्थ निहित है, बल्कि यह मानवीय संबंधों की अमरता, आत्मीयता और परस्पर श्रद्धा की झलक भी देता है। यमराज जो मृत्यु के प्रतीक माने जाते हैं, उनके द्वारा बहन के स्नेह से जीवन और दीर्घायु का वरदान मिलना यह सिखाता है कि प्रेम ही वह शक्ति है जो मृत्यु और भय पर भी विजय पा सकती है। भाई दूज केवल भाइयों का नहीं, बल्कि बहनों की गरिमा और शक्ति का भी उत्सव है। यह पर्व इस बात का प्रतीक है कि नारी केवल रक्षा की पात्र नहीं, बल्कि रक्षा की प्रदात्री भी है।यमराज की बहन यमुना ने अपने स्नेह से मृत्यु के देवता को भी जीवन का वरदान देने को प्रेरित किया। यह कथा इस विचार को पुष्ट करती है कि स्त्री का प्रेम और आशीर्वाद अमृत समान है, जो जीवन में ऊर्जा, उत्साह और उद्देश्य भर देता है।आधुनिक युग में जब नारी समाज में आत्मनिर्भरता और नेतृत्व की दिशा में अग्रसर है, तब भाई दूज उस सांस्कृतिक विरासत का स्मरण कराता है जो बहन को परिवार के केंद्र में रखती है,एक ऐसी शक्ति के रूप में जो सृजन,संतुलन और प्रेम का स्रोत है।


अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि भाई दूज का वैश्विक संदेशयह हैँ कि,भाई दूज केवल भारतीय पर्व नहीं, बल्कि मानवता का उत्सव है। यह हमें याद दिलाता है कि इस संसार में सबसे अमूल्य धरोहर हमारे रिश्ते हैं,जो न किसी धर्म, जाति या भौगोलिक सीमा में बंधे हैं।भाई दूज का संदेश है,“जहां स्नेह है, वहां जीवन है; जहां संबंध हैं, वहां स्थायित्व है।”दीपावली रूपी माला का यह अंतिम दीप न केवल घरों में उजाला करता है, बल्कि मनुष्य के हृदय में प्रेम, कृतज्ञता और बंधुत्व का आलोक फैलाता है।2025 का भाई दूज इस युग की उस पुकार का उत्तर है, जो रिश्तों के पुनर्जागरण की ओर अग्रसर है, एक ऐसा समाज जहां प्रेम, संवाद, सहयोग और संवेदना सबसे बड़ा धर्म हो।

गुरु नानक देव जी की कार्तिक प्रभात फेरी महोत्सव -23 अक्टूबर से 5 नवंबर 2025- धन गुरु नानक सारा जग तारिया -आस्था,सेवा और उनकी अनंत ज्योति का विश्वव्यापी उत्सव

गुरु नानक देव जी की कार्तिक प्रभात फेरी महोत्सव -23 अक्टूबर से 5 नवंबर 2025- धन गुरु नानक सारा जग तारिया -आस्था,सेवा और उनकी अनंत ज्योति का विश्वव्यापी उत्सव

पवित्र प्रभात फेरी व गुरु नानक जयंती एक वैश्विक पर्व बन चुकी है। यूनेस्को ने भी गुरु नानक की शिक्षाओं को “वैश्विक मानवता की धरोहर”कहा है

गुरु नानक की ज्योति से आलोकित ,पंद्रह दिवसीय कार्तिक प्रभात फेरी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का पर्व है,यह समाज में एकता, सेवा, समानता और प्रेम का दीप प्रज्वलित करती है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया/महाराष्ट्र

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर भारत की भूमि ऋषियों,संतों औरगुरुओं की तपस्थली रही है। यहाँ हर पर्व और परंपरा का एक गहन आध्यात्मिक अर्थ निहित है। इन्हीं अमूल्य परंपराओं में से एक है,सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी की जयंती से पहले मनाया जाने वाला कार्तिक प्रभात फेरी महोत्सव जो केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक यात्रा है, जो समाज को सत्य, प्रेम, समानता और सेवा के पथ पर अग्रसर करती है।

यह प्रभात फेरी 23 अक्टूबर से आरंभ होकर 5 नवंबर 2025 तक चलेगी, यह अवधि न केवल भक्तिभाव और सेवा का प्रतीक है,बल्कि सामाजिक जागरण और मानवता के समरसता संदेश की पुनः पुष्टि का अवसर भी है। पूरे कार्तिक मास की पवित्रता, अनुशासन और भक्ति की प्रतीक होगी। प्रभात फेरी का आरंभ कार्तिक मास के आरंभ (8 अक्टूबर) के बाद विशेष रूप से गुरु नानक जयंती की तैयारियों के साथ किया जाता है,और यह गुरु पर्व की पूर्णिमा (5 नवंबर) पर सम्पन्न होती है। इस अवधि में देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में श्रद्धालु सुबह- सुबह कीर्तन, भजन, और सेवा के माध्यम से गुरु की शिक्षाओं को आत्मसात करते हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र स्वयंम भी प्रभात फेरी में शामिल हुआ हूं और देखा हूंकि प्रातःकाल लगभग 3:30 या 4 बजे गुरुद्वारों से प्रारंभ होती है।श्रद्धालु संगत एकत्र होकर गुरु ग्रंथ साहिब के आगे मत्था टेकते हैं, और फिर “कीर्तन सोहिला ”या“ जपजी साहिब” का पाठ करते धन गुरु नानक, सारा जग तारिया,जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल के जय घोष करते हुए गाँव या नगर की गलियों से होकर गुजरते हैं। मार्ग में लोग अपने घरों के बाहर दीये जलाकर, फूलों से स्वागत कर इस यात्रा को धन्य करते हैं। फेरी के अंत में गुरुद्वारे में प्रसाद सेवा होती है जिसमें सभी धर्मों के लोग साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।

इस दौरान बच्चों और युवाओं को भी सिखाया जाता है कि गुरु की सच्ची भक्ति केवल पूजा में नहीं, बल्कि सेवा और भक्ति भाव में भी है। यह विशेष रूप से गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव से जुड़ी हुई है। आज गुरु नानक देव जी का संदेश केवल पंजाब या भारत तक सीमित नहीं है, दुनियाँ के 150 से अधिक देशों में प्रभात फेरियां निकाली जाती हैं।लंदन में साउथहॉल गुरुद्वारा से हजारों श्रद्धालु प्रभात फेरी में भाग लेते हैं।कनाडा के वैंकूवर में भारतीय मूल के लोगों के साथ स्थानीय नागरिक भी इस भक्ति उत्सव में शामिल होते हैं।सिंगापुर, मलेशिया, दुबई, अमेरिका, केन्या, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सिख समुदाय और अन्य धर्मों के लोग भी गुरु नानक के उपदेशों से प्रेरित होकर प्रभात फेरियों का आयोजन करते हैं।इस प्रकार कार्तिक प्रभात फेरी आज एक वैश्विक सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बन चुकी है। प्रभात फेरी में भाग लेने वालों के जीवन में यह अनुभव गहरा आध्यात्मिक परिवर्तन लाता है। भोर के समय जब पूरा वातावरण शांत होता है और वाहेगुरु का नाम गूंजता है, तब व्यक्ति के भीतर की अशांति मिटने लगती है। यह अनुभव बताता है कि आस्था केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का मार्ग


साथियों बात अगर हम गुरुनानक देव जी की कार्तिक प्रभात फेरी 2025 को समझने की करें तो“सतगुरु की अरदास, प्रभात की प्रभा से विश्व आलोकित ”वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।आस्था, भक्ति और मानवता के इस पावन संगम में जब सूरज की पहली किरण धरा को स्पर्श करती है, तो गुरबाणी की मधुर वाणी के साथ “वाहेगुरु” का नाम गुंजायमान हो उठता है। यही वह क्षण होता है जब कार्तिक प्रभात फेरी की शुरुआत होती है,वह अनूठी परंपरा जिसे गुरु नानक देव जी ने आध्यात्मिक जागरण और मानवीय एकता का प्रतीक बनाया। पूरे 15 दिवसीय भक्तिमय कालखंड में सिख श्रद्धालु सहित सिंधी व अन्य समाज गुरु नानक जयंती की तैयारी और साधना में डूबे रहेंगे।“प्रभात फेरी” का शाब्दिक अर्थ है,प्रभात (सुबह) के समय की आस्था यात्रा। यह फेरी केवल चलना नहीं, बल्कि संगत (सामूहिकता) के रूप में भक्ति का प्रसार है। जब सूर्योदय से पहले की शांति में भक्तजन “वाहे गुरु,सतनाम” धन गुरु नानक सारा जग तारिया के नाम का उच्चारण करते हुए गलियों, चौपालों और रास्तों से गुजरते हैं, तब यह वातावरण आध्यात्मिक प्रकाश से भर जाता है। प्रभात फेरी आत्मशुद्धि का माध्यम है, यह सिख व अन्य धर्म की उस भावना का प्रतीक है जिसमें कहा गया है कि “नाम जपो, किरत करो,वंड छको”अर्थात ईश्वर का स्मरण करो, ईमानदारी से कार्य करो और सबमें बाँटो। यह लगभग 14 दिनों की धार्मिक यात्रा गुरु नानक जयंती की तैयारी का सबसे पवित्र चरण मानी जाती है। भारत में अमृतसर, पटियाला, लुधियाना, आनंदपुर साहिब, दिल्ली, नांदेड़, पटना साहिब जैसे गुरुद्वारों में प्रभात फेरियों की विशेष व्यवस्था की जाती है।परंतु अब यह परंपरा सीमित नहीं रही।कनाडा,अमेरिका ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, सिंगापुर और दुबई जैसे देशों में बसे सिख समुदाय भी इसे अत्यंत श्रद्धा से मनाते हैं। लंदन के साउथहॉल, वैंकूवर, मेलबर्न, टोरंटो, और कैलिफ़ोर्निया के गुरुद्वारों से प्रभात फेरियाँ निकलती हैं, जिनमें न केवल भारतीय मूल के लोग बल्कि विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोग भी भाग लेते हैं। इस तरह यह पर्व “ग्लोबल यूनिटी ऑफ़ स्पिरिचुअल एनर्जी” का प्रतीक बन गया है।


साथियों बात अगर हम इतिहास में प्रभात फेरी की परंपरा व आधुनिक रूप में पर्यावरण और समाज के प्रति संदेश को समझने की करें तो,गुरु नानक देव जी ने 15 वीं शताब्दी में जब आध्यात्मिक यात्रा आरंभ की थी, तब वे अक्सर अपने शिष्यों के साथ प्रभात बेला में भक्ति गीत गाया करते थे। यही परंपरा आगे चलकर प्रभात फेरी के रूप में स्थापित हुई। उनकी यह शिक्षाएँ उस युग में सामाजिक अंधकार में प्रकाश की किरण बनकर फैलीं गुरु नानक देव जी ने जात- पात, अंधविश्वास और धार्मिकभेदभाव के विरुद्ध आवाज़ उठाई और मनुष्य को उसके कर्म और सत्यनिष्ठा से परिभाषित करने की प्रेरणा दी। प्रभात फेरी इन्हीं सिद्धांतों को पुनर्जीवित करती है,यह केवल धार्मिक रिवाज नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और मानवता के जागरण का पर्व है,इस वर्ष की प्रभात फेरी में कई गुरुद्वारों ने ग्रीन प्रभात फेरी की पहल की है। इसका उद्देश्य है कि भक्ति के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा भी की जाए। पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता सिख धर्म की मूल भावना से जुड़ी है,क्योंकि गुरुनानक देवजी ने कहा था “पवण गुरु, पानी पिता, माता धरत महत।”इस संदेश के अनुरूप श्रद्धालु पौधरोपण, प्लास्टिक-मुक्त आयोजन और साइकिल प्रभात फेरी जैसी गतिविधियाँ करेंगे। अमृतसर, दिल्ली, पटना साहिब और नांदेड़ के गुरुद्वारों ने इस वर्ष “एक पौधा एक श्रद्धालु अभियान” भी प्रारंभ किया है।


साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्तिक प्रभात फेरी का विस्तार को समझने की करेंतो,21वीं सदी में प्रभात फेरी का स्वरूप अत्यंत वैश्विक हो गया है। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय ने इसे “फेस्टिवल ऑफ़ मॉर्निंग डिवोशन”के रूप में स्थापित किया है।कनाडा और ब्रिटेन में सिख समुदाय स्थानीय सरकारों के सहयोग से विशेष परमिट लेकर सड़कों पर प्रभात फेरी निकालता है। इसमें न केवल धार्मिक गीत बल्कि इंटरफेथ संवाद भी होते हैं, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, क्रिश्चियन, ज्यू और बौद्ध धर्मों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। इससे गुरु नानक की सार्वभौमिक शिक्षा “एक ओंकार सतनाम”का विश्व संदेश फैलता है कि सत्य एक है, परंतु उसे पाने के मार्ग अनेक हैं।गुरु नानक देव जी का दर्शन अत्यंत व्यापक था। उन्होंने कहा “न को हिन्दू न मुसलमान,”अर्थात इंसान को धर्म से नहीं, उसके कर्म से आँकना चाहिए।प्रभात फेरी इसी विचारधारा की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। जब समाज के लोग एक साथ चलकर नाम जपते हैं, तब जाति, धर्म, भाषा और वर्ग का भेद मिट जाता है।यह एक ऐसा आयोजन है जो आत्मा और समाज दोनों को जोड़ता है। इसमें हर व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि “हम सब ईश्वर के एक ही प्रकाश के अंश हैं।”


साथियों बात अगर कर हम पवित्र प्रभात फेरी गुरु नानक जयंती 5 नवंबर 2025 क़े समापन का पवित्र क्षण को समझने की करें तो,5 नवंबर 2025 को जब कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरु नानक जयंती मनाई जाएगी, तब प्रभात फेरी अपने चरम पर होगी। इस दिन सिख गुरुद्वारों में अखंड पाठ, दीवान सजावट,भव्य नगर कीर्तन, लंगर सेवा, और दीयों की रोशनी से वातावरण भक्ति-मय होगादेशभर के गुरुद्वारों में रात भर “शबद कीर्तन”गूंजता रहेगा। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, नांदेड़ का हज़ूर साहिब, पटना साहिब, दिल्ली का बंगला साहिब और पाकिस्तान के करतारपुर साहिब में लाखों श्रद्धालु एक साथ “वाहे गुरु” के नाम का स्मरण करेंगे।यह दृश्य केवल धार्मिक नहीं बल्कि मानवता की एकता का उत्सव होगा।


साथियों बात अगर हम पवित्र प्रभात फेरी को समाज और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक होने की करें तोआज के युग में जब दुनिया भौतिकता और प्रतिस्पर्धा के जाल में उलझी है, तब प्रभात फेरी युवाओं को एक नया दृष्टिकोण देती है। यह उन्हें सिखाती है कि सफलता का अर्थ केवल धन नहीं, बल्कि आत्म- संतोष और सेवा भावना है।कई स्कूलों और कॉलेजों में इस दौरान गुरु नानक अध्ययन सप्ताह आयोजित किए जाते हैं, जहाँ छात्र उनके जीवन, यात्राओं (उदासियों) और शिक्षाओं का अध्ययन करते हैं।


अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि, कार्तिक प्रभात फेरी 2025 केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता एकता और आध्यात्मिकता की विश्व यात्रा है। 23 अक्टूबर से 5 नवंबर तक का यह कालखंड हर हृदय को गुरु नानक देव जी की वाणी से भर देगा“नाम जपो कीरत करो, वंड छको।”यह पंद्रह दिन का सफर केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर तय होता है। जैसे सूरज अंधकार मिटाता है, वैसे ही गुरु नानक देव जी की प्रभात फेरी मानवता के हृदय में प्रकाश जगाती है,एक ऐसा प्रकाश जो सीमाओं से परे है, जो सभी को जोड़ता है, और जो कहता है,“वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।”
गुरु नानक की वाणी हमें फिर याद दिलाती है, “सभ में जोत, जोत है सोई; तिस दै चानण सब में चानण होई।”(हर प्राणी में एक ही प्रकाश है, ईश्वर की ज्योति सबमें समान है।)

संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावानानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी 19 अक्टूबर 2025 -अंधकार से प्रकाश, अहंकार से विनम्रता और नरक से मुक्ति का आध्यात्मिक पर्व

छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी 19 अक्टूबर 2025 -अंधकार से प्रकाश, अहंकार से विनम्रता और नरक से मुक्ति का आध्यात्मिक पर्व

नरक चतुर्दशी क़ो हम अपने भीतर की अंधकारमय प्रवृत्तियों, क्रोध, लोभ, द्वेष, असत्य, आलस्य और नकारात्मक विचारों का वध करने का संकल्प लेते हैं।

आज का नरकासुर,पर्यावरण प्रदूषण, लालच आधारित अर्थव्यवस्था, असमानता, और मानसिक तनाव के रूप में हमारे जीवन को घेर रहा है। अब हमें पहले से भी अधिक प्रासंगिक होना है-एडवोकेट किशन सनमुखदासभावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर भारत की सांस्कृतिक औरधार्मिक परंपराएँ विश्वभर में अपनी गहराई, आध्यात्मिकता और मानवता के संदेश के लिए जानी जाती हैं। दीपावली का पंचदिवसीय महापर्व केवल एक उत्सव नहीं बल्कि मानव जीवन के आत्मिक उत्थान का प्रतीक माना जाता है।इस पंचदिवसीय श्रृंखला का दूसरा दिन“छोटी दिवाली” या “नरक चतुर्दशी”कहलाता है।वर्ष 2025 में यह पावन दिवस 19 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन का महत्व केवल दीप प्रज्ज्वलन तक सीमित नहीं, बल्कि यह मानव जीवन के भीतर बसे अंधकार,नकारात्मकता और अहंकार को मिटाने का प्रतीकात्मक संदेश देता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह पर्व भारत ही नहीं,बल्कि विश्वभर में बसे भारतवंशियों के बीच भी समान श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। छोटी दिवाली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि यह मानवता के भीतर छिपे अंधकार,जैसे अहंकार, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध और मोह,पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।चूँकि हमें अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से जानना कि आखिर छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी क्यों कहा जाता है, इस दिन किसकी पूजा की जाती है और यह पर्व क्यों मनाया जाता है?

एडवोकेट किशन सनमुखदासभावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र


साथियों बात अगर हम छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी क्यों कहा जाता है,इसको जानने की करें तो अधर्म,अहंकार और अंधकार पर धर्म,नम्रता और प्रकाश की विजय का प्रतीक हैँ,छोटी दिवाली का नाम“नरक चतुर्दशी”इसलिए पड़ा क्योंकि यह दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध से जुड़ा हुआ है।हिंदूधर्मग्रंथों के अनुसार, नरकासुर नामक असुर ने अत्याचार और अधर्म का साम्राज्य स्थापित कर रखा था। उसने पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों को आतंकित कर रखा था। नारी की अस्मिता का अपमान, साधुओं का अपमान और दैवीय शक्तियों को चुनौती देना उसका स्वभाव बन गया था। अंततः भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार में,अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर उसका अंत किया।कहा जाता है कि जब नरकासुर का वध हुआ, तो उसने अंतिम समय में श्रीकृष्ण से वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु के दिन जो लोग स्नान और दीपदान करें, उन्हें नरक का भय न रहे। भगवान श्रीकृष्ण ने यह वरदान स्वीकार किया।तभी से यह दिन “नरक चतुर्दशी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसका अर्थ है, वह चतुर्दशी जो नरक से मुक्ति का मार्ग दिखाए।छोटी दिवाली इसीलिए कही जाती है क्योंकि यह मुख्य दिवाली के एक दिन पहले आती है, और इसमें दीप जलाने की परंपरा आरंभ हो जाती है। परंतु इसके पीछे का भाव कहीं अधिक गहरा है,यह दिन हमें सिखाता है कि असली नरक बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और असत्य के रूप में है। जब हम इनसे मुक्त होते हैं, तब सच्ची “छोटी दिवाली” हमारे जीवन में आती है-जब हम अपने भीतर के अंधकार को सटीक दूर कर आत्मिक प्रकाश जलाते हैं आधुनिक वैश्विक संदर्भ में यदि देखें तो “नरक चतुर्दशी” एक सार्वभौमिक संदेश देती है कि प्रत्येक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के भीतर जो अंधकार,अन्याय, हिंसा, लालच और भेदभाव,फैला हुआ है,उसे सत्य, सद्भाव और प्रकाश से मिटाना ही सच्चा उत्सव है। यह दिन हर व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि नरकासुर जैसी प्रवृत्तियाँ हर युग में मौजूद रहती हैं,बस उनके रूप बदलते रहते हैं। आज का नरकासुर पर्यावरण प्रदूषण,लालच आधारित अर्थव्यवस्था, असमानता, और मानसिक तनाव के रूप में हमारे जीवन को घेर रहा है। इसलिए छोटी दिवाली का संदेश आधुनिक समय में पहले से भी अधिक प्रासंगिक है।


साथियों बात अगर हम नरक चतुर्दशी के दिन किसकी पूजा की जाती है, इसको समझने की करें तो,नरक चतुर्दशी के दिन तीन प्रमुख देवताओं की पूजा की परंपरा है,यमराज,भगवान श्रीकृष्ण,और देवी लक्ष्मी।(क)यमराज पूजा-इस दिन यमराज की पूजा का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर यमराज को दीपदान करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं सताता और उसे यमलोक का दर्शन नहीं करना पड़ता। इसे “यम दीपदान” कहा जाता है।घर के बाहरदक्षिण दिशा में एक दीप जलाकर कहा जाता है,”मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालिना श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥” इसका अर्थ है कि इस दीप के माध्यम से मैं यमराज को प्रसन्न कर उनसे दीर्घायु और सुखमय जीवन की प्रार्थना करता हूँ।(ख) श्रीकृष्ण पूजा-भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन अधर्म पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए उन्हें विजयी और धर्म के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। भक्त उनके चरणों में पुष्प, फल और दीप अर्पित करते हैं। उनके साथ देवी सत्यभामा की भी पूजा की जाती है, क्योंकि नरकासुर के वध में देवी का योगदान महत्वपूर्ण रहा था। (ग) लक्ष्मी पूजा और रूप चौदस-इस दिन “रूप चौदस” भी कहा जाता है। प्रातःकाल तेल स्नान, उबटन, और शुद्धिकरण के बाद सौंदर्य और स्वास्थ्य की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन स्नान और शुद्ध आचरण करता है, उसके शरीर और मन में दीर्घकालिक सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।रूप चौदस के दिन स्त्रियाँ और पुरुष दोनों अपने रूप, स्वास्थ्य और आभा की रक्षा के लिए स्नान, तेल, चंदन और सुगंधित वस्तुओं का उपयोग करते हैं। यह न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि यह शरीर से विषाक्त तत्वों को निकालने और त्वचा को स्वस्थ रखने का उपाय माना गया है।आधुनिक वैश्विक समाज में जहां “वेलनेस” और “मेंटल हेल्थ” की चर्चा प्रमुख हो गई है, नरक चतुर्दशी की यह परंपरा हमें यह बताती है कि आत्मिक और शारीरिक शुद्धता दोनों का संगम ही सच्चा स्वास्थ्य है।


साथियों बात अगर हम नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है इसको समझने की करें तो,आत्मशुद्धि, पाप मुक्ति और प्रकाश की ओर मानव यात्रा का उत्सव हैँ,नरक चतुर्दशी का मुख्य उद्देश्य केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और पापमुक्ति का मार्ग है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन में हर मनुष्य से भूलें होती हैं, और उन भूलों से ऊपर उठने के लिए आत्मचिंतन, स्नान और दीपदान के माध्यम से हम भीतर का “नरक” साफ कर सकते हैं।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करता है, वह पापों से मुक्त होता है। इस स्नान को “अभ्यंग स्नान” कहा जाता है। यह केवल शारीरिक शुद्धि नहीं,बल्कि मानसिक और भावनात्मक शुद्धि का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि तेल से स्नान करने से शरीर से नकारात्मक ऊर्जा निकलती है, और मन में प्रकाश का प्रवेश होता है।नरक चतुर्दशी हमें यह सिखाती है कि हर व्यक्ति के भीतर दो शक्तियाँ होती हैं,एक अंधकारमय (नरकासुर जैसी) और दूसरी प्रकाशमय (कृष्ण जैसी)। इस दिन हम अपने भीतर की अंधकारमय प्रवृत्तियों,जैसे क्रोध, लोभ, द्वेष, असत्य, आलस्य और नकारात्मक विचारों का वध करने का संकल्प लेते हैं। जब व्यक्ति इस अंतर्द्वंद से ऊपर उठता है, तभी वह सच्चा “प्रकाश” प्राप्त करता है।आज जब पूरी दुनिया तनाव, असमानता,युद्ध औरआत्मकेंद्रित जीवनशैली से जूझ रही है, तब नरक चतुर्दशी जैसे पर्व वैश्विक समाज को यह प्रेरणा देते हैं कि आत्मशुद्धि, विनम्रता और प्रकाश की ओर बढ़ना ही मानवता का मार्ग है। यह केवल धार्मिक दिन नहीं बल्कि “स्पिरिचुअल रीसेट डे” कहा जा सकता है,जब हम अपने भीतर के अंधकार को पहचानते हैं और उसे मिटाने का संकल्प लेते हैं।


साथियों बातें अगर हम छोटी दिवाली का सांस्कृतिक, सामाजिक और वैश्विक महत्व की करें तो,भारत में छोटी दिवाली का उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक एकता, पारिवारिक प्रेम और सामूहिक स्वच्छता का भी प्रतीक है। गाँवों और नगरों में लोग इस दिन अपने घरों की अंतिम सफाई करते हैं, मिट्टी के दीये जलाते हैं, और पड़ोसियों के साथ मिठाइयाँ बांटते हैं। यह पर्व समाज में “साझा प्रकाश” का संदेश देता है कि अंधकार केवल अपने घर से नहीं, पूरी बस्ती से मिटाना चाहिए।अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में छोटी दिवाली का संदेश सार्व भौमिक है,यह केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं। आज अमेरिका,ब्रिटेन,कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में बसे भारतीय समुदाय इस दिन न केवल दीप जलाते हैं बल्कि स्थानीय समाज को भी इसमें शामिल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपियन संसद और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ दीपावली को “ग्लोबल सेलिब्रेशन ऑफ़ लाइट ” के रूप में मान्यता दे चुकी हैं। ऐसी स्थिति में छोटी दिवाली का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह मुख्य दीपावली से एक दिन पहले मानवता के भीतर के नरक को मिटाने की तैयारी का दिन है।नरक चतुर्दशी का गूढ़ अर्थ केवल पौराणिक कथा तक सीमित नहीं है।“नरक”का अर्थ है,मानसिक पीड़ा,अवसाद,लालच,और वह अंधकार जो मनुष्य के भीतर उसे असत्य के मार्ग पर ले जाता है। “चतुर्दशी” का अर्थ है — पूर्णता के पूर्व की अवस्था, अर्थात् वह क्षण जब प्रकाश पूरी तरह प्रकट होने वाला है। इसलिए नरक चतुर्दशी का दिन आत्मिक परिवर्तन का समय है,जब मनुष्य अपने भीतर झाँककर कहता है:“अब मैं अंधकार से मुक्त होकर प्रकाश की ओर बढ़ूँगा।” यह आत्मसंवाद ही नरक चतुर्दशी का सार है। श्रीकृष्ण का नरकासुर वध केवल बाह्य घटना नहीं, बल्कि एक प्रतीक है,जब मनुष्य अपनी इच्छाओं और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करता है, तब वह “नरकासुर”का अंत करता है।


अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि इस प्रकार छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी केवल दीपों का पर्व नहीं,बल्कि आत्मज्ञान, शुद्धि और अहंकार मुक्ति का दिन है। यह हमें सिखाती है कि असली उत्सव बाहर नहीं, भीतर मन में होता है। जब हम अपने भीतर के अंधकार को दूर करते हैं, तो पूरी दुनिया रोशन होती है।इस दिन किया गया दीपदान केवल घर के द्वार को नहीं, बल्कि आत्मा के द्वार को भी प्रकाशित करता है। यमराज की आराधना हमें मृत्यु का भय नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सजगता सिखाती है। श्रीकृष्ण की पूजा हमें धर्म की रक्षा और अन्याय के अंत का संदेश देती है, जबकि लक्ष्मी पूजा हमें सिखाती है कि सौंदर्य केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक पवित्रता में निहित है।छोटी दिवाली 2025 इसीलिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि मानवता को यह स्मरण कराने का अवसर है कि जब तक भीतर का अंधकार मिटेगा नहीं, तब तक बाहर के दीप अधूरे रहेंगे। यह पर्व विश्व के हर कोने में रहने वाले व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है,“हम अपने भीतर का नरकासुर समाप्त करें, तभी सच्ची दिवाली आएगी।”

संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावानानी गोंदिया महाराष्ट्र

धनतेरस 18 अक्टूबर 2025- समृद्धि, स्वास्थ्य, आस्था और वैश्विक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक पर्व

धनतेरस 18 अक्टूबर 2025- समृद्धि, स्वास्थ्य, आस्था और वैश्विक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक पर्व

भारत में धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ, वाहन और गहने खरीदने की परंपरा है

आधुनिक युग में धनतेरस ने अपने धार्मिक स्वरूप से आगे बढ़कर वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों को भी अपने साथ जोड़ा है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर भारत की संस्कृति में दीपावली केवल एक दिन का उत्सव नहीं,बल्कि पाँच दिवसीय आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा है। इस यात्रा की शुरुआत जिस दिन से होती है,वह दिन है धनतेरस,समृद्धि, आरोग्य और शुभारंभ का पर्व। वर्ष 2025 में धनतेरस 18 अक्टूबर, शनिवार को मनाया जा रहा है। यह दिन न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में बसे करोड़ों भारतीयों के लिए दिवाली की शुरुआत का प्रतीक है। आधुनिक युग में धनतेरस ने अपने धार्मिक स्वरूप से आगे बढ़कर वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों को भी अपने साथ जोड़ा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि धनतेरस का उद्भव वैदिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। पुराणों में उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय, देवताओं और असुरों के बीच जब अमृत कलश प्राप्त हुआ,उसी समय धन्वंतरि भगवान,जो आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं,अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।यही दिन त्रयोदशी तिथि का था, जो कार्तिक कृष्ण पक्ष की होती है। इसी कारण इसे धन्वंतरि त्रयोदशी कहा गया,जो आगे चलकर“धनतेरस”के नाम से प्रसिद्ध हुआ।धन्वंतरि देव का आगमन जीवन में स्वास्थ्य, दीर्घायु और संतुलन का प्रतीक है। भारत में प्राचीन काल से ही स्वास्थ्य को धन के समान माना गया है “आरोग्यं परमं भाग्यं, स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्।” अर्थात् आरोग्य ही सबसे बड़ा धन है। इसीलिए धनतेरस पर लोग न केवल सोना-चांदी या बर्तन खरीदते हैं,बल्कि आरोग्य, स्वच्छता और संतुलित जीवन के संकल्प भी लेते हैं।


साथियों बात अगर हम धनतेरस: शुभ क्रय और आर्थिकप्रतीकवाद को समझने की करें तो, भारत में धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ, वाहन और गहने खरीदने की परंपरा है। इसे शुभ मुहूर्त का प्रतीक माना जाता है। यह दिन वर्ष का वह क्षण होता है जब अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता भावनाओं का चरमोत्कर्ष देखा जाता है। 2025 के लिए अनुमान है कि भारतीय बाजार में धनतेरस पर लगभग 65,000 करोड़ रूपए से अधिक का कारोबार होगा,जिसमें आभूषण उद्योग,वाहन,मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण,गृह सज्जा और स्टील-बर्तन उद्योग अग्रणी होंगे।इस दिन का आर्थिक महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुबई, लंदन, न्यूयॉर्क, सिंगापुर, मेलबर्न, टोरंटो और नैरोबी जैसे महानगरों में बसे प्रवासी भारतीय समुदाय भी इस दिन ‘धनतेरस शॉपिंग फेस्टिवल’आयोजित करते हैं। यह दर्शाता है कि भारतीय परंपरा अब एक वैश्विक ब्रांड पहचान में परिवर्तित हो चुकी है।


साथियों बात अगर हम आयुर्वेद और स्वास्थ्य का दिवस:धन्वंतरि पूजा का गूढ़ अर्थ, पर्यावरणीय दृष्टिकोण व सामाजिक एकजुट को समझने की करें तो धनतेरस केवल धन-संपदा का नहीं,बल्कि स्वास्थ्य-संपदा का पर्व हैभगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है। इस दिन चिकित्सक, वैद्य, फार्मासिस्ट, योग प्रशिक्षक और स्वास्थ्य संस्थान विशेष पूजन-अर्चन करते हैं।2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन और आयुष मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से “ग्लोबल आयुर्वेदा वैलनेस डे” के रूप में धनतेरस को मान्यता देने की पहल भी चल रही है। यह एक ऐसी ऐतिहासिक दिशा होगी जिसमें भारतीय चिकित्सा ज्ञान को वैश्विक आयुर्विज्ञान के मानचित्र पर स्थान मिलेगा।धनतेरस और पर्यावरणीय दृष्टिकोण-धनतेरस का एक गहरा संदेश“संपन्नता के साथ स्थिरता”का भी है। वर्तमान समय में जब उपभोक्तावाद चरम पर है, यह पर्व हमें याद दिलाता है कि वास्तविक समृद्धि वही है जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखे।मिट्टी के दीपक जलाना, तांबे- पीतल के बर्तन खरीदना, और स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देना पर्यावरणीय दृष्टि से भी सार्थक कदम हैं।


वर्ष 2025 में पर्यावरणविदों ने यह आह्वान किया है कि धनतेरस पर इको-फ्रेंडली खरीदारी की जाए,जैसे ऊर्जा-संवर्धन करने वाले उपकरण, सौर लैंप, या स्थायी धातु से बने उत्पाद। यह कदम “ग्रीन धनतेरस” की अवधारणा को आगे बढ़ा रहा है।धनतेरस और सामाजिक एकजुटता-धनतेरस का एक बड़ा पक्ष सामाजिक समरसता और सहानुभूति का है। परंपरागत रूप से इस दिन घर में दीप जलाए जाते हैं ताकि अंधकार, गरीबी और दुख को दूर किया जा सके। आधुनिक संदर्भ में इसका अर्थ है,समाज के वंचित वर्ग तक प्रकाश पहुँचाना।अनेक सामाजिक संगठन और एनजीओ धनतेरस के दिन गरीबों को वस्त्र, बर्तन और मिठाइयाँ वितरित करते हैं।कटनी, वाराणसी, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, दुबई और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में प्रवासी भारतीय संगठन इस दिन “शेयर द लाइट मूवमेंट”नामक कार्यक्रम चलाते हैं,जिसमें जरूरतमंद परिवारों के घर रोशनी और मुस्कान पहुँचाई जाती है।


साथियों बात अगर हम विश्व पटल पर धनतेरस का विस्तार को समझने की करें तो, आज धनतेरस केवल भारतीयों का त्योहार नहीं रह गया है। यह एक ग्लोबल सांस्कृतिक इवेंट बन चुका है।लंदन में “दिवाली ऑन द स्क्वायर ” नाम से जो आयोजन होता है,वहाँ हर वर्ष लाखों लोग भाग लेते हैं। इस आयोजन की शुरुआत धनतेरस के दिन होती है।सिंगापुर, मलेशिया, फिजी, मॉरीशस, ट्रिनिडाड, और कनाडा जैसे देशों में धनतेरस के अवसर पर “फेस्टिवल ऑफ़ वेल्थ एंड हेल्थ”नाम से सार्वजनिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।2025 में अमेरिका के न्यू जर्सी, डलास, और कैलिफोर्निया के भारतीय संघों ने भी धनतेरस पर “ग्लोबल धन्वन्तरि कांफ्रेंस 2025” आयोजित करने की घोषणा की है। इस सम्मेलन में स्वास्थ्य, योग, आयुर्वेद और वित्तीय जागरूकता पर चर्चा होगी,जो दिखाता है कि यह पर्व कितनी बहुआयामी प्रासंगिकता रखता है।
साथियों बात अगर हम धनतेरस और डिजिटल युग कीकांबिनेशन को समझने की करें तो ,वर्तमान डिजिटल युग में धनतेरस ने नई पहचान प्राप्त की है। ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म्स जैसे अमेज़ॉन, फ्लिपकार्ट टाटा क्लिक, और रिलायंस डिजिटल इस दिन विशेष “धनतेरस फेस्टिव सेल ” लॉन्च करते हैं।2025 में इन ऑनलाइन बिक्री से भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में लगभग 25,000 करोड़ रूपए का अतिरिक्त प्रवाह होने का अनुमान है।डिजिटल पेमेंट्स, यूपीआई और रुपे कार्ड जैसी तकनीकें इस दिन के आर्थिक व्यवहार को पारदर्शिता और गति देती हैं।


धनतेरस अब केवल बाजारों की चमक तक सीमित नहीं, बल्कि यह डिजिटल समृद्धि का प्रतीक भी बन चुका है,जो “नए भारत” की पहचान को दर्शाता है।
साथियों बात अगर हम परिवार और परंपरा,घर की लक्ष्मी का स्वागत व धनतेरस और आधुनिक युवा पीढ़ी को समझने की करें तो,धनतेरस के दिन भारतीय घरों में सुबह से ही सजावट शुरू हो जाती है। लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करते हैं, नए वस्त्र पहनते हैं और द्वार पर स्वस्तिक और शुभ-लाभ के चिन्ह बनाते हैं। सायंकाल के समय दीपदान किया जाता है,विशेषकर तुलसी और मुख्य द्वार पर दीप जलाने का विधान है।गृहस्थ इस दिन “यम दीपदान” भी करते हैं,मान्यता है कि इस दीपक की ज्योति से मृत्यु और भय का निवारण होता है। यह प्रतीकात्मक रूप से “प्रकाश से अंधकार पर विजय” का संदेश देता है। घर की स्त्रियाँ इस दिन “लक्ष्मी आराधना” का प्रारंभ करती हैं, जिससे दीपावली की मुख्य पूजा का मंगल आरंभ माना जाता है।धनतेरस और आधुनिक युवा पीढ़ी-नई पीढ़ी के लिए धनतेरस केवल पूजा का दिन नहीं,बल्कि स्व-विकास और वित्तीय अनुशासन की प्रेरणा भी है।भारत के शहरी युवाओं में धनतेरस पर म्यूचुअल फंड, सोने के बॉन्ड, या डिजिटल गोल्ड में निवेश करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।2025 में वित्त विशेषज्ञों ने इसे “फाइनेंसियल वैलनेस फेस्टिवल” का नाम दिया है,जो दर्शाता है कि आज की पीढ़ी इस परंपरा को आर्थिक साक्षरता के माध्यम से पुनःपरिभाषित कर रही है।


साथियों बात अगर हम धनतेरस और भारतीय अर्थव्यवस्था का मनोवैज्ञानिक पहलू व धनतेरस और महिला सशक्तिकरण को समझने की करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था में त्योहारों का प्रभाव गहरा होता है।धनतेरस वह क्षण है जब करोड़ों उपभोक्ता नई खरीदारी के लिएसकारात्मक मानसिकता में होते हैं। इसउत्साह से मांग बढ़ती है,उत्पादन को गति मिलती है,और रोज़गार सृजन को बल मिलता है। अर्थशास्त्रियों का मत है कि भारत की जीडीपी में त्योहारों के सीज़न के दौरान लगभग 2पेर्सेंट तक का उछाल देखा जा सकता है।इस प्रकार धनतेरस केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि आर्थिक इंजन का उत्प्रेरक भी है।धनतेरस और महिला सशक्तिकरण -धनतेरस के दिन घर की “गृहलक्ष्मी” को केंद्र में रखा जाता है। यह सांस्कृतिक रूप से नारी शक्ति का सम्मान है।आज के युग में महिलाएँ न केवल परिवार की रक्षक हैं, बल्कि वित्तीय निर्णयों में समान भागीदारी निभा रही हैं। इस दिन कई बैंक और फिनटेक संस्थान महिलाओं के लिए “स्वर्ण निवेश योजना” या “धन लक्ष्मी सेविंग प्रोग्राम” जैसी योजनाएँ लॉन्च करते हैं।यह दिखाता है कि परंपरा और आधुनिकता का संगम किस प्रकार महिला सशक्तिकरण के माध्यम से सामाजिक समृद्धि में परिवर्तित हो रहा है।


अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि धनतेरस समृद्धि का नया अर्थ, धनतेरस 2025 केवल तिथि नहीं, बल्कि एक विचार हैँ कि सच्चा धन वह है जो बाँटने से बढ़ता है, और सच्ची समृद्धि वह है जो सबके जीवन में प्रकाश लाए। चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक हो या आध्यात्मिक धनतेरस हमें यह सिखाता है कि हर उपलब्धि का अर्थ तभी है जब वह साझी खुशी में परिवर्तित हो। इसलिए जब 18 अक्टूबर 2025 की संध्या में दीपक जलें, तो वे केवल घरों में नहीं, मानवता के हृदयों में भी उजियारा करें।यह धनतेरस नई चेतना,नईजिम्मेदारी और नई वैश्विक संस्कृति का उद्घोष बने,जहाँ आरोग्य, समृद्धि और सद्भाव एक साथ दीपित हों।

संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावानानी गोंदिया महाराष्ट्र

सत्य वह दौलत है जिसे पहले खर्च करो- जिंदगी भर आनंद पाओ, झूठ वह कर्ज़ है- क्षणिक सुख पाओ जिंदगी भर चुकाते रहो

सत्य वह दौलत है जिसे पहले खर्च करो- जिंदगी भर आनंद पाओ, झूठ वह कर्ज़ है- क्षणिक सुख पाओ जिंदगी भर चुकाते रहो

सच्चाई की राह, सुखद जीवन के लिए विनियोग- झूठ का गंतव्य दुखी जीवन की चरम सीमा- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया/महाराष्ट्र

भारत अपनी संस्कृति,आध्यात्मिकता, अहिंसा धर्मनिरपेक्षता,परमो धर्मा और सच्चाई की मूरत राजा हरिश्चंद्र इत्यादि अनेकों विशेषताओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र से यह मानता हूं कि एक झूठ के पीछे सव झूठ बोलना पड़ता है और झूठ के दलदल में मनुष्य घुसता चला जाता है।जिससे उसकी वर्तमान पीढ़ी तो ध्वस्त होती ही है पर आने वाली पीढ़ियों में भी यह दोष समाया रहता है।


साथियों बात अगर हम सच्चाई की साक्षात मूरत राजा हरिश्चंद्र की करें तो,सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र सदैव सत्य बोलते थे। वह अपने सत्य और न्याय के लिए जाने जाते थे। इसलिए आज भी उनकी कहानियां बड़े सम्मान के साथ सुनाई जाती हैं।हमने अपने बड़े बुजुर्गों से अनेक कई किस्से सुने हैं।हम,आज की जनरेशन करीब-करीब हर सच्चाई वाली बात में इस महान मूरत का नाम ज़रूर जोड़तेहैं।हमारे बड़े बुजुर्गों से हमने कई वाक्य सुने हैं, जैसे सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, सत्य की हार नहीं होती,सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं,सत्यमेव जयते।


साथियों बात अगर हम सत्यमेव जयते इसकी करें तो हम अनेक शासकीय,अशासकीय स्थानों पर इसका उल्लेख ज़रूर देखते हैं।यही सत्य है कि हमेशा सत्य की विजय होती है।

साथियों बात अगर हम भारतीय आध्यात्मिकता की करें तो हमें यही ज्ञान मिलता है कि सत्य व दौलत है जैसे पहले खर्च करो फिर जिंदगी भर आनंद पाओ और झूठ वह कर्ज है जिससे क्षणिक सुख पाओ और जिंदगी भर उसे चुकाते रहो बिल्कुल सत्य वचन!साथियों यह बात अगर मानव के हृदय में बस जाए तो वाह क्या बात है! हम पृथ्वी लोक में ही स्वर्ग के दर्शन कर सकेंगे।अगर हर भारतीय व्यक्ति चाहे वह सरकारी हो या शासकीय कर्मचारी, मंत्री हो या नेता, कार्यकर्ता हो या मालिक,सभी अगर सत्यता रूपी दौलत को पूरी निष्ठा से खर्च करें अर्थात ईमानदारी से अपनी अफसर शाही ड्यूटी, व्यापार-व्यवसायज दिनचर्या अर्थात जीवन के हर काम हर मोड़ पर सत्यता बरसाएगें तो वह खुद तो जीवन का आनंद जरूर पाएंगें परंतु उससे अधिक भारत को स्वर्ग जैसा सुंदर रचना बनाने में अहम रोल अदा करेगें। भारत एक अपराध मुक्त भारत की परिकल्पना में साकार होगा।कोई अदालत, पुलिस स्टेशन,जांच एजेंसियां नहीं होगी क्योंकि यह सब झूठ और अपराध को काटने के लिए ही बनाई गई हैं।


साथियों बात अगर हम झूठ की करें तो हमने अपने व्यवहारिक जीवन में देखा होगा कि बेईमान, रिश्वतखोर, झूठा, भ्रष्टाचारी, धोखेबाज इत्यादि तरह के मानव कभी अपने जीवन में सुखी नहीं होते। चाहे कितना भी अवैध धन कमा लें,उनके पीछे परिवार का, उनके स्वास्थ्य का, मानसिक हालत हमेशा दुखों में बनी रहती हैउनके शरीर के नसों में झूठ रूपी खून दौड़ता है और इन नकारात्मक झूठे व्यवहारों से उनका क्षणिक आर्थिक सुख मिलता है परंतु उसके लिए उनको जीवन भर कष्टों में गुजारना पड़ता है। जितना क्षणिक सुख प्राप्त होता है वह ब्याज सहित याने अतिरिक्त दुख सहित यहीं इस जीवन में भोगना पड़ता है और फिर अंत में पछताते हैं के ऐसा क्यों हुआ,ऊपर वाले से क्षमा याचना करते हैं।पर कहते हैं ना कि जब चिड़ियां चुग गई खेत,अब पछतावे क्या होए?

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र


साथियों बात अगर हम सत्य की गहराई की करें तो,सत्य दो प्रकार का होता है- एक व्यवहारिक सत्य और दूसरा वास्तविक। व्यवहारिक सत्य का अर्थ है जैसा देखा, जैसा सुना और जैसा अनुभव किया, उसको वैसा ही बोलना सत्य कहलाता है।व्यवहारिक सत्य में हो सकता है, जो एक के लिए सत्य है, वो दूसरे के लिए असत्य हो। वैसे तो हर व्यक्ति अपने मुताबिक अपना सत्य बना लेता है। यह व्यवहारिक सत्य, अनुभव, नजरिए और देश, काल के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। इसलिए इसमें मतभेद की संभावना बनी रहती है।ईमानदार और न्यायवादी व्यक्ति ही सत्य का पालन करता है।यह देखा गया है कि जो लोग ईमानदार होते हैं वह सदैव सच बोलते हैं। झूठे बेईमान और मक्कार लोग सदैव असत्य का फायदा लेकर अपना काम बनाते हैं। हम ऐसे लोगों से बचना चाहिए जो अपने फायदे के लिए (झूठ) असत्य बोलते हैं।सत्य का अर्थ है ‘सते हितम्’ अर्थात् जिसमें हित या कल्याण निहित हो। सत्य भूत, भविष्य एवं वर्तमान तीनों काल में एक सा रहता है तथा इससे यथार्थ का ज्ञान होता है। साधारण बातचीत में जो सच है, यथार्थ है उसे जानना, समझना, मानना, कहना एवं उसके अनुसार ही व्यवहार करना सत्य है। मानव बोध में सत्य के प्रति श्रद्धा एवं असत्य के प्रति घृणा स्वाभाविक रूप से पाई जाती है। मनुष्य जीवन के लिए सत्य सबसे बड़ी शक्ति हैं।जीवन तथा संसार के सत्य की तलाश कर उसे जीवन में अपनाना मानव मात्र का मूल उद्देश्य हैं।हमारी संस्कृति में सत्य को बड़ा महत्व दिया गया हैं।इस सम्बन्ध में एक महापुरुष ने ठीक ही कहा कि सत्य परेशान हो सकता है मगर पराजित नहीं. भारत की भूमि पर हरिश्चन्द्र जैसे राजा हुए जिनकी सत्यनिष्ठा के चलते वे सत्यवादी कहलाए।सत्य के रास्ते पर चलकर व्यक्ति बड़ी-बड़ी समस्या का समाधान आसानी से कर सकता है। सत्य के मार्ग पर चलकर कई लोगों ने सफलता प्राप्त कर अपना और अपने परिवार का भला किया है।सत्य के मार्ग पर चलकर कई लोगों ने सफलता प्राप्त कर दुनिया को बदला है । सत्य बोलने से व्यक्ति को सभी सम्मान देते हैं। ऐसा कहा जाता है कि तीन चीजें छुपाए नहीं छुपती- सूरज, चंद्रमा और सत्य। जो लोग सत्य का, न्याय का पक्ष लेते हैं उनकी प्रशंसा सभी लोग करते हैं।सत्य का साथ देने वालों को इतिहास स्वर्णिम पन्नों पर दर्ज करता है। परंतु जो लोग झूठ,असत्य का साथ देते हैं उनकी चारों ओर आलोचना होती है।

किसी ने खूब ही कहा है कि
चन्द्र टरै, सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार।’
पै दृढ़ हरिश्चन्द्र को टरै न सत्य विचार।..
सांच बराबर तप नहीं, झूंठ बराबर पाप।
जाके हृदय सांच है, ताके हृदय आप

किसी ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं, जिनमें सत्य भी प्रमुख स्थान रखता है।
‘धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।’
अर्थात् धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( अंतर्मन और शरीर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों से धर्म सम्मन आचरण), धी ( सत् बुद्धि), विद्या, सत्य एवं अक्रोध यानी हमेशा शांत रहना।
अतः अगर हम पूरे उपरोक्त विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करेंगे तो हम पाएंगे के सत्य व दौलत है जिसे पहले खर्च करो फिर जिंदगी भर आनंद पाओ और झूठ वह कर्ज है जिसमें सैनिक सुख पाओ फिर जिंदगी भर जो करते रहो और सच्चाई की राह सुखद जीवन के लिए एक विनियोग है तथा झूठ का गंतव्य दुखी जीवन की चरम सीमा है

संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9359653465

हरे माधव वर्सी पर्व 2025- आस्था की धरा पर अवतरित दिव्यता का अनुभव-अमृत वर्षा क़ा आभास

हरे माधव वर्सी पर्व 2025- आस्था की धरा पर अवतरित दिव्यता का अनुभव-अमृत वर्षा क़ा आभास

बाबा ईश्वर शाह की असीम अमृत वर्षा से ,भक्तों के हृदयों में उतरी करुणा की ज्योति

हरे माधव सत्संग में श्रद्धा,सेवा, भक्ति और अनुशासन का अद्भुत संगम देखने को मिला जो एक आध्यात्मिक क्रांति जैसा था- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर आध्यात्मिकता रूपी मिठास मेंडूबे भारत के मध्यप्रदेश की पावन धरा कटनी की शांत और पावन भूमि पर 9 और 10 अक्टूबर 2025 को ऐसा दृश्य उपस्थित हुआ जिसे शब्दों में बाँध पाना अपने आप में एक आध्यात्मिक साधना के समान है। हरे माधव सत्संग के वर्सी महोत्सव ने न केवल शहर बल्कि देश और विदेश के लाखों श्रद्धालुओं को एक सूत्र में पिरो दिया।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र व मेरे साथी मनोहर सुगानी सतना ने वहां की ग्राउंड रिपोर्टिंग की तो हमें इस दौरान श्रद्धा,सेवा,भक्ति और अनुशासन का अद्भुत संगम देखने को मिला। हमने स्वयंम इन दो दिवसीय सत्संग के दौरान ग्राउंड रिपोर्टिंग की,और यह अनुभव किसी साधारण धार्मिकआयोजन से कहीं अधिक एक आध्यात्मिक क्रांति जैसा था।

साथियों बात अगर हम भक्तों के अभूतपूर्व उत्साह की करें तो, हरे माधव दयाल,जिनकी करुणा और दया की गाथाएँ भक्तों के मुख से सहज ही फूट पड़ती हैं, उनके नाम का प्रभाव इस आयोजन में स्पष्ट रूप से झलकता दिखा।हर ओर “हरे माधव” का उच्चारण मानो वातावरण को पवित्र कर रहा था। भक्तों की आँखों में जो चमक थी, वह किसी बाहरी चमत्कार से नहीं बल्कि अंतर्मन में अनुभव की गई शांति और दयालुता की झिलमिल थी।इस सत्संग ने यह सिद्ध कर दियाकिआध्यात्मिकता तब ही सशक्त होती है जब उसमें मानवता की सुगंध हो।कटनी की इस पवित्र भूमि पर जैसे ही 9 अक्टूबर 2025 को सूर्योदय हुआ, हरे माधव दयाल के प्रति भक्ति की तरंगें पूरे शहर में फैल गईं, मानों बच्चे, महिलाएँ, बुजुर्ग और युवा सबकी एक ही चाह थी,”दयाल के दर्शन और सत्संग का श्रवण।”ऐसा लग रहा था मानो पूरा नगर ही भक्ति में रमा हुआ है।यह दृश्य केवल आँखों से नहीं, आत्मा से देखा जा सकता था।
साथियों बात अगर हम देश- विदेश से उमड़ा श्रद्धा का सागर, वैश्विक स्तरपर आध्यात्मिक एकता की करें तो इस वर्सी महोत्सव की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि इसमें भारत के अनेक राज्यों से अनुमानतः हजारों लाखों भक्तों ने इस दो दिवसीय सत्संग का लाभउठाया। भक्तों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि हरे माधव दयाल की शिक्षाएँ सीमाओं से परे जाकर मानवता को जोड़ रही हैं।जब मैंने ग्राउंड पर भक्तों से बात की, तो उन्होंने कहा“हम यहाँ किसी धर्म के अनुयायी बनकर नहीं, बल्कि प्रेम और शांति की तलाश में आए हैं। यहाँ जो अनुभव मिलता है, वह किसी भी किताब में नहीं।”इससे यह सिद्ध हुआ कि आज के वैश्विक युग में भी सच्ची आध्यात्मिकता वह है जो सभी जाति,भाषा और सीमाओं को मिटाकर मनुष्यता के सूत्र में जोड़ती है।

साथियों बात अगर हम सत्संग के पहले दिन 9 अक्टूबर 2025 अमृत वर्षा क़े प्रारंभ होने की करें तोपहले दिन का आरंभ मंगल वंदना और “ मेरे सतगुरां हम शरण तेरी आए ” के भक्ति स्वर से हुआ। वातावरण में घुली शांति,भजन के मधुर सुर और आरती की लौ ने ऐसा माहौल रचा कि मानो पूरा ब्रह्मांड उसी क्षण स्थिर हो गया हो।मैंने मोबाइल कैमरे की लेंस से जब भक्तों के चेहरों को कैद किया, तो हर चेहरे पर संतोष, श्रद्धा और आनंद की अनोखी अभिव्यक्ति थी। पहले दिन का मुख्य आकर्षण बाबा ईश्वर शाह साहिब जी का“दयाल संदेश”यानें अमृत वर्षा था,जिसमें कलश करुणा, क्षमा और आत्मचिंतन के महत्व पर प्रकाश डाला गया। सत्संग पंडाल में गूँजती मधुर वाणी ने हजारों मनों को छू लिया। ऐसा लगा मानो हृदय के भीतर छिपी सभी थकान, चिंता और अशांति उसी क्षण विलीन हो गई हो।
साथियों बात अगर हम सत्संग के दूसरे व अंतिम दिन 10 अक्टूबर 2025 की करें तो मानो आकाश से उतरती दिव्यता पृथ्वी को नमन कर रही हो,सुबह 10 बजे से ही भक्तों का सत्संग स्थल पर पहुंचना शुरू गया था,यह सामूहिक श्रद्धा और अनुशासन का अनुपम उदाहरण था। बच्चे अपने हाथों में फूल और झंडे लिए, युवा सेवा में तत्पर, बुजुर्गों के चेहरे पर आत्मिक आनंद। यह सब देखकर लगा कि जब आस्था और अनुशासन एक साथ चलें तो समाज में कितनी सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है।बाबाजी का आगमन विशाल जुलूस के साथ हुआ एलईडी स्क्रीन पर बाबा माधव शाह बाबा नारायण शाह की अनेक महिमाओं लीलाओं का वर्णन साक्षात रूप से भक्तों को दिखाया गया जिससे भक्तों के अनेक प्रश्नों की जिज्ञासा दूर हुई उसके पश्चात बाबा जी ने स्वयं अपने मुख से सत्संग की अमृत वर्षा की जिससे भक्तजन भाव विभोर हो उठे।

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

साथियों बात अगर हम सेवा के विविध रूप,व्यवस्थापन का अनुकरणीय उदाहरण की करें तो,यह मेरे लिए इस आयोजन का सबसे प्रेरणादायक पहलू था,इसकी उत्कृष्ट सेवा व्यवस्था। सत्संग परिसर में व्यवस्थापकों और स्वयंसेवकों ने जिस निष्ठा से सेवा दी, वह अपने आप में उदाहरण है, जिसकी मैं पूरी ग्राउंड रिपोर्टिंग कर मोबाइल कैमरे में सेव किया।पंडाल सेवा- विशाल पंडालों में बैठने, धूप से बचाव, वेंटिलेशन, और व्यवस्था इतनी सुचारू थी कि अनुमानतः हजारो लाखों की भीड़ होने के बावजूद कोई अव्यवस्था नहीं दिखी।चरण पादुका सेवा- श्रद्धालुओं के लिए चरण पादुका स्थल पर विनम्र भाव से सेवा करते स्वयंसेवक विनम्रता की प्रतिमूर्ति प्रतीत हो रहे थे।जल सेवा-ठंडा,शुद्ध जल उपलब्ध कराने के लिए अनेक जल स्टॉल लगाए गए थे, जहाँ लगातार सेवा चल रही थी।खोया-पाया सेवा: इतने बड़े आयोजन में कोई वस्तु खो जाए,तो तुरंत सूचना मिल जाए,भंडारा यानी लंगर सेवा तथा बर्तन थालियां धोने की सेवा में मैंने देखा कि बड़े-बड़े अमीरों उच्च स्तरीय लोग, भक्तों द्वारा ग्रहण किए गए भोजन की थालियों को मांझकर फ़िर पानी में फिर धो रहे थे जो मुझे सबसे अनमोल सेवा लगी उनकी यह सेवा रेखांकित करने योग्य है।पुलिस विभाग और सुरक्षा व्यवस्था-कटनी पुलिस और सुरक्षा दल ने अनुकरणीय कार्य किया। भीड़ नियंत्रण से लेकर ट्रैफिक प्रबंधन तक हर पहलू पर बारीकी से ध्यान दिया गया।मेडिकल सेवा-24 घंटे संचालित मेडिकल कैंप में डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ हर समय मौजूद रहे। किसी भी आपात स्थिति के लिए एम्बुलेंस व्यवस्था भी तत्पर थी।स्टालों में एक झाड़ माँ के नाम,पर्यावरणीय पहल- इस आयोजन की विशेषता रही “एक झाड़ माँ के नाम” पहल, जिसके अंतर्गत प्रत्येक भक्त ने एक पौधा रोपने का संकल्प लिया। आध्यात्मिकता को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का यह संदेश अत्यंत प्रेरणादायक था। विशेष रूप से व्यवस्थापकों सेवादारियों की सेवाएं अभूतपूर्व अनुशासन के रूप में दिखाई दी सत्संग स्थल के बाजू में हेड ऑफिस बनी हुई थी जहां से व्यवस्थापकों की हर सेवा पर नजर थी ताकि भक्तों को कोई तकलीफ ना हो,इन सभी व्यवस्थाओं को देखकर लगा कि जब सेवा भावना और संगठन शक्ति साथ मिलती है,तो कोई भी आयोजनकितना अनुशासितऔर प्रेरणादायक बन सकता है।

साथियों बात अगर हम व्यवस्था में अनुशासन और तकनीक का सुंदर संगम की करें तो,मेरी ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान मैंने पाया कि यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यवस्थापन का भी उत्कृष्ट उदाहरण था।आयोजकों ने आधुनिक तकनीक का भी प्रयोग किया था, सीसीटीवी निगरानी,एलईडी लाइव प्रसारण ताकि दूर बैठे भक्तों को भी स्पष्ट नजर आए,जैसी सुविधाएँ मौजूद थीं। इससे यह महोत्सव केवल एक भौतिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि डिजिटल आध्यात्मिकता का भी एक युगीन उदाहरण बन गया।

साथियों बात अगर हम भक्तों के भाव,अनुभवों की झंकार की करें तो,जब मैंने कुछ श्रद्धालुओं से बातचीत की, तो हर किसी की आवाज़ में भक्ति और भावनाओं की गहराई झलक रही थी।दमोह निवासी एक महिला ने कहा,“हम हर वर्ष आते हैं, लेकिन इस बार जो दिव्यता और शांति महसूस हुई, वह पहले कभी नहीं हुई। यह सचमुच अमृत वर्षा थी। ”कोल्हापुर से आए एक युवा भक्त ने कहा,“मैं तकनीकी क्षेत्र से हूँ, पर यहाँ आकर समझा कि असली ‘कनेक्शन’ईश्वर से जुड़ाव है, न कि इंटरनेट से।”इन सरल वाक्यों में वह आध्यात्मिक सत्य छिपा है जो जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन और सकारात्मकता का संदेश देता है।आध्यात्मिकता और समाजसेवा का संगम-हरे माधव सत्संग केवल उपदेश देने वाला मंच नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत सामाजिक आंदोलन भी है। इस महोत्सव के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता के क्षेत्र में अनेक जनसेवा अभियानों कि हमें प्रेरणा मिली।हरे माधव परमार्थ सेवा समिति कटनी द्वारा गरीब परिवारों के लिए स्वास्थ्य सेवा बाबा माधव शाह चिकित्सालय मासिक अनाज वितरण साहित्य अनेकयोजनाओं का संचालन किया जाता है।यह देखकर लगा कि सच्ची भक्ति वही है जो समाज में परिवर्तन का माध्यम बने। आध्यात्मिकता तभी सार्थक है जब वह मानवता के कार्यों में उतरकर समाज को उन्नति की दिशा में ले जाए।

साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से हरेमाधव सत्संग की प्रासंगिकता को समझने की करें तो,विश्व स्तर पर आज जब तनाव, हिंसा, युद्ध और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का दौर चल रहा है, तब हरे माधव दयाल का संदेश,“दयालता ही मानवता का आधार है”अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है। कटनी का यह आयोजन केवल धार्मिक भावनाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि“वसुधैव कुटुंबकम्” के भारतीय आदर्श का जीवंत प्रमाण था।कोल्हापुर मुंबई सहित अनेक मेट्रो सिटी से आए श्रद्धालुओं ने कहा कि उन्हें यहाँ वह “मेडिटेशनल एनर्जी” मिली जो किसी भी मानसिकचिकित्सा से अधिक प्रभावशाली है।

साथियों बात अगर हम मेरी ग्राउंड रिपोर्टिंग करें तो, मुझे इसके लिए संस्था या व्यवस्थापकों नें कहा नहीं था मैंने स्वतः संज्ञान से ग्राउंड रिपोर्टर की आत्मानुभूति,शब्दों से परे एक साक्षात्कार-जब मैंने इन दो दिनों की रिपोर्टिंग पूरी की,तो महसूस किया कि वकालत क़े पेशे जैसे केवल तथ्य नहीं, बल्कि अनुभूति का भी माध्यम है। कैमरे में कैद दृश्य भले सीमित हों, पर हृदय में जो दृश्य अंकित हुए, वे जीवनभर अमिट रहेंगे।मैंने देखा कि किस प्रकार भक्त भक्ति में डूबकर सेवा करते हैं, किस तरह व्यवस्थापक दिन-रात बिना थके अपने कर्तव्यों में लगे रहे,और कैसे एक संत का सन्देश लाखों के जीवन में प्रकाश बन जाता है।यह रिपोर्ट केवल रिपोर्ट नहीं, एक साक्षात्कार है, आत्मा का, श्रद्धा का,और मानवता का।

ग्राउंड रिपोर्टिंग लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226223918

क्रोध का विकराल रूप जुनून है, जो जीव पर सवार होकर जघन्य से जघन्य अपराध करा देता है।

क्रोध का विकराल रूप जुनून है, जो जीव पर सवार होकर जघन्य से जघन्य अपराध करा देता है।

गोंदिया/महाराष्ट्र

क्रोध में व्यक्ति आपा खो देता है-एक दोष को दूर करने के लिए अनेक कुतर्क पेश करता है।

क्रोध से उत्पन्न हुए अपराधों के औचित्य को सिद्ध करने के लिए क्रोधी व्यक्ति कुतर्क कर दूसरे को ही दोषी सिद्ध करता है – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

भारतीय संस्कृति, सभ्यता के बारे में हमने साहित्य और इतिहास के माध्यम से और भारत माता की गोद में रहकर पारिवारिक संस्कृति,मान सम्मान,रीति-रिवाजों से इसे प्रत्यक्ष महसूस भी कर रहे हैं। परंतु हमारे बड़े बुजुर्गों के माध्यम से हमने कई बार सतयुग का नाम सुने हैं, जिसका वर्णन वे स्वर्गलोक़ के तुल्य करते हैं। याने इतनी सुखशांति, अपराध मुक्ति, इमानदारी,शांति सरोवर तुल्य, कोई चालाकी चतुराई गलतफहमी या कुटिलता या भ्रष्टाचार नहीं, बस एक ऐसा युग कि कोई अगर कुछ दिन, माह के लिए बाहर गांव जाए तो अपने घरों को ताला तक लगाने की ज़रूरत नहीं!अब कल्पना कीजिए कि अपराध बोध मुक्त युग!मेरा मानना है कि हमारी पूर्व की पीढ़ियों ने ऐसा युग जिए होंगे तब यह बोध आगे की पीढ़ियों में आया,जिसे सतयुग के नाम से जरूर जाना जाता है।


साथियों बात अगर हम वर्तमान युग पर बड़े बुजुर्गों में चर्चा की करें तो इस इसे कलयुग नाम देते हैं, याने सभी प्रकार के अपराध बोध से युक्त संसार। हर तरह की बेईमानी, भ्रष्टाचार कुटिलता से भरा हुआ युग!आज भी बुजुर्गों का मानना है कि वह सतयुग फिर आएगा,याने आज की तकनीकी भाषा में अपराध मुक्त, भ्रष्टाचार बेईमानी कुटिलता मुक्त पारदर्शिता और अनेकता में एकता वाले भारत की परिकल्पना का युग।

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

साथियों बात अगर हम अपराध, भ्रष्टाचार, बेईमानी, कुटिलता से भरे जग की करें तो मेरा मानना है कि इसका मुख्य प्रवेश द्वार क्रोध, उत्तेजित स्वभाव व लालच है जिसमें आपराधिक बोध प्रवृत्ति का जन्म होता है और व्यक्ति क्रोध में हिंसा, अपराध, लालच, भ्रष्टाचार, बेईमानी और कुटिलता के अमानवीय कृति और अन्य गलत कार्यों की ओर मुड़ जाता है और आगे बढ़ते ही चले जाता है जब जीवन के असली महत्व का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। क्रोध की अभिव्यक्ति हमारे अंदर की कुंठा, हिंसा व द्वेष के कारण भी हो सकती है। वर्तमान काल में अपराधों के बढ़ने का एक प्रमुख कारण भीषण क्रोध ही है। क्रोध से उत्पन्न हुए अपराधों के औचित्य को सिद्ध करने के लिए क्रोधी व्यक्ति कुतर्क कर दूसरे को ही दोषी सिद्ध करता है। एक दोष को दूर करने के लिए अनेक कुतर्क पेश करता है। क्रोध में व्यक्ति आपा खो देता है। क्रोध में अंतत: बुद्धि निस्तेज हो जाती है और विवेक नष्ट हो जाता है। क्रोध का विकराल रूप जुनून है। आदमी पर जुनून सवार होने पर वह जघन्य से जघन्य अपराध कर बैठता है। जुनून की हालत में उसे मानवीय गुणों का न बोध रह पाता है और न ही ज्ञान। क्रोध मानव का सबसे बड़ा शत्रु है, बहुत बड़ा अभिशाप है।

साथियों बात अगर हम शांत, परोपकारी स्वभाव ही जीवन का मूल मंत्र की करें तोअभिभावकों, शिक्षकों को बच्चों को यह शिक्षा देना है और हम बड़ों को यह स्वतः संज्ञान लेना है कि माचिस की तीली बनने की बजाय शांत सरोवर बनना होगा, जिसमें कोई अंगारा भी फेंके तो स्वयं ही बुझ जाए, बस! यह भाव अगर हम मनीषियों के हृदय में समाहित हो जाए तो यह विश्व फिर सतयुग का रूप धारण करेगा जहां किसी तरह का कोई अपराध बोध या गलत काम का भाव नहीं होगा। सभी मनीषी जीव परोपकारी भाव से युक्त होंगे भाईचारा, प्रेम, सद्भाव की बारिश होगी जहां बिना ताले घरबार छोड़ कहीं भी जाने के भाव जागृत होंगे और हमारे बुजुर्गों का सतयुग रूपी सपना साकार होगा।

साथियों बात अगर हम स्वयं को माचिस की तीली याने क्रोधित होने पर विपरीत परिणामों की करें तो, क्रोध मनुष्य को बर्बाद कर देता है और उसे अच्छे बुरे का पता नही चलने देता, जिस कारण मनुष्य का इससे नुक्सान होता है। क्रोध मनुष्य का प्रथम शत्रु होता है। क्रोधी व्यक्ति आवेश में दूसरे का इतना बुरा नहीं जितना स्वयं का करता है। क्रोध व्यक्ति की बुद्धि को समाप्त करके मन को काला बना देता है।

साथियों बात अगर हम क्रोध को नियंत्रित कर समाप्त करने की तकनीकी की करें तोइलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अनुसार क्रोध के नकारात्मक प्रभाव पूरे इतिहास में देखे गए हैं। प्राचीन दार्शनिकों, धर्मपरायण व्यक्तियों और आधुनिक मनोवैज्ञानिकों द्वारा प्रतीत होने वाले अनियंत्रित क्रोध का मुकाबला करने की सलाह दी गई है। आधुनिक समय में, क्रोध को नियंत्रित करने की अवधारणा को मनोवैज्ञानिकों के शोध के आधार पर क्रोध प्रबंधनकार्यक्रमों में अनुवादित किया गया है।क्रोध प्रबंधन क्रोध की रोकथाम और नियंत्रण के लिए एक मनो-चिकित्सीय कार्यक्रम है ।

इसे क्रोध को सफलतापूर्वक तैनात करने के रूप में वर्णित किया गया है। क्रोध अक्सर हताशा का परिणाम होता है,या किसी ऐसी चीज से अवरुद्ध या विफल होने का अनुभव होता है जिसे विषय महत्वपूर्ण लगता है। अपनी भावनाओं को समझना क्रोध से निपटने का तरीका सीखने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। जिन बच्चों ने अपनी नकारात्मक भावनाओं को क्रोध डायरी में लिखा था, उन्होंने वास्तव में अपनी भावनात्मक समझ में सुधार किया, जिससे बदले में कम आक्रामकता हुई। जब अपनी भावनाओं से निपटने की बात आती है, तो बच्चे ऐसे उदाहरणों के प्रत्यक्ष उदाहरण देखकर सबसे अच्छा सीखने की क्षमता दिखाते हैं, जिनके कारण कुछ निश्चित स्तर पर गुस्सा आया। उनके क्रोधित होने के कारणों को देखकर, वे भविष्य में उन कार्यों से बचने की कोशिश कर सकते हैं या उस भावना के लिए तैयार हो सकते हैं जो वे अनुभव करते हैं यदि वे खुद को कुछ ऐसा करते हुए पाते हैं जिसके परिणामस्वरूप आमतौर पर उन्हें गुस्सा आता है, इसके साथ ही एकांत में जाकर ध्यान के माध्यम से क्रोध के विकारों को नष्ट करने का प्रयास करें तो ऋणात्मक ऊर्जा को मोड़कर हम सकारात्मक ऊर्जा से विवेक सम्मत निर्णय लेने में सक्षम हो सकते हैं।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि क्रोध का विकराल रूप जुनून है, जो जीव पर सवार होकर जघन्य से जघन्य अपराध करा देता है।क्रोध में व्यक्ति आपा खो देता है-एक दोष को दूर करने के लिए अनेक कुतर्क पेश करता हैक्रोध से उत्पन्न हुए अपराधों के औचित्य को सिद्ध करने के लिए क्रोधी व्यक्ति कुतर्क कर दूसरे को ही दोषी सिद्ध करता है

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9359653465

Design a site like this with WordPress.com
Get started