अमेरिक़ी जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट सेंटर रिपोर्ट 2026 -क्या जलवायु परिवर्तन हमारी नींद चुरा रहा है? -बढ़ती गर्म रातें,घटती गहरी नींद और मानव स्वास्थ्य पर मंडराता वैश्विक संकट -अब जलवायु परिवर्तन का नया पैमाना होगी हमारी नींद? -समग्र व्यापक विश्लेषण।

अमेरिक़ी जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट सेंटर रिपोर्ट 2026 -क्या जलवायु परिवर्तन हमारी नींद चुरा रहा है? -बढ़ती गर्म रातें,घटती गहरी नींद और मानव स्वास्थ्य पर मंडराता वैश्विक संकट -अब जलवायु परिवर्तन का नया पैमाना होगी हमारी नींद? -समग्र व्यापक विश्लेषण।

जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उठाया गया प्रत्येक कदम अब हमारी आने वाली पीढ़ियों की स्वस्थ,गहरी और सुकूनभरी नींद की रक्षा का नया पैमाना भी संकल्प होगा।

वैश्विक और स्थानीय स्तरपर नींद का संकट भी जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती हो सकता है? -स्लीप हेल्थ को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा तात्कालिक बनाने की ज़रूरत -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन पर अधिकांश चर्चा बाढ़,सूखा,समुद्र-स्तर वृद्धि और भीषण हीटवेव तक सीमित रही है।किंतु अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित किया है,जो प्रत्यक्ष रूप से हर व्यक्ति के जीवन,स्वास्थ्य, उत्पादकता और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। वह है नींद का नुकसान (स्लीप लॉस)। अमेरिका की जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट सेंटर द्वारा 2020 से 2025 के बीच विश्व के 1,300 से अधिक शहरों (लगभग 1,338 शहरों) पर किए गए विश्लेषण में पाया गया कि बढ़ते रात्रिकालीन तापमान के कारण एक औसत व्यक्ति वैश्विक स्तरपर प्रति वर्ष लगभग 56 घंटे की नींद खो रहा है। भारत के कई बड़े शहरों में यह नुकसान 65 से 93 घंटे प्रति वर्ष तक पहुँच गया है।अध्ययन में यह भी बताया गया कि इस तापमान- जनित नींद हानि का कम से कम लगभग 10 प्रतिशत भाग सीधे मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते यह कहना चाहूंगा कि यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है क़ि यह मूल दावा काफी हद तक सही है,लेकिन इसमें एक छोटा-सा स्पष्टीकरण आवश्यक है। अध्ययन यह नहीं कहता कि पूरे भारत का प्रत्येक नागरिक 65-93 घंटे की नींद खो रहा है,बल्कि यह आँकड़ा भारत के कई बड़े शहरों के लिए है। उदाहरण के तौर पर चेन्नई में लगभग 93 घंटे, मुंबई में लगभग 84 घंटे और कोलकाता में लगभग 80 घंटे वार्षिक नींद हानि का अनुमान लगाया गया। वैश्विक औसत लगभग 56 घंटे प्रतिवर्ष बताया गया।

साथियों, भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय देश में समस्या इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यहाँ गर्मी अब केवल दिन तक सीमित नहीं रहती। पहले सूर्यास्त के बाद तापमान में पर्याप्त गिरावट आ जाती थी, जिससे शरीर को ठंडा होने और गहरी नींद (डीप स्लीप) में जाने का अवसर मिलता था। अब महानगरों में कंक्रीट, डामर, वाहनों की गर्मी और हरित क्षेत्र में कमी के कारण अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट विकसित हो गया है।परिणाम स्वरूप रात का तापमान भी ऊँचा बना रहता है और शरीर अपनी प्राकृतिक ताप- नियंत्रण प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाता।यही कारण है कि भारत के अनेक शहरों में लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि रात में भी बेचैनी बनी रहती है और नींद सटीकता से  बार-बार टूटती है।
साथियों,चिकित्सकीय दृष्टि से देखा जाए तो गहरी नींद मानव शरीर की प्राकृतिक मरम्मत प्रक्रिया है। इसी अवस्था में मस्तिष्क दिनभर की सूचनाओं को व्यवस्थित करता है,स्मरण शक्ति मजबूत होती है,प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय होता है,हार्मोन संतुलित होते हैं तथा हृदय एवं रक्त वाहिनियों को विश्राम मिलता है। यदि लगातार गहरी नींद कम हो जाए तो सबसे पहले मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन निर्णय क्षमता में कमी और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई दिखाई देती है। इसके बाद धीरे-धीरे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग, स्ट्रोक, अवसाद, चिंता तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।

साथियों, वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि शरीर को सोने के लिए अपने आंतरिक तापमान को थोड़ा कम करना पड़ता है। यदि रात का वातावरण अधिक गर्म हो, तो यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है। व्यक्ति को नींद आने में अधिक समय लगता है,रात में कई बार जागना पड़ता है और सबसे महत्वपूर्ण,गहरी नींद का समय घट जाता है। यही कारण है कि सुबह उठने के बाद भी व्यक्ति स्वयं को थका हुआ महसूस करता है।इसका प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। नींद की कमी सीधे अर्थव्यवस्था पर भी असर डालती है। पर्याप्त नींद न मिलने से कर्मचारियों की कार्यक्षमता घटती है, औद्योगिक दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ता है, विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। जब किसी देश की बड़ी आबादी लगातार कम गुणवत्ता वाली नींद लेने लगे तो उसका प्रभाव राष्ट्रीय उत्पादकता और आर्थिक विकास पर भी दिखाई देता है।

साथियों, भारत में यह चुनौती इसलिए भी अधिक जटिल है क्योंकि यहाँ तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है। कंक्रीट के जंगल, कम होते पेड़, एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्म हवा, घनी आबादी और सीमित खुले स्थान शहरों को दिन और रात दोनों समय अधिक गर्म बनाए रखते हैं। गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवार, जिनके पास पर्याप्त शीतलन व्यवस्था नहीं होती, इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।हाल के वर्षों में भारत के अनेक क्षेत्रों में यह भी देखा गया है कि गर्म रातों के दौरान अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी मामलों में वृद्धि होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रात के समय शरीर को पर्याप्त ठंडक और आराम न मिले तो दिनभर की गर्मी से उत्पन्न तनाव समाप्त नहीं हो पाता, जिससे स्वास्थ्य जोखिम सटीकता से कई गुना बढ़ जाते हैं।

साथियों, मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव भी अत्यंत गंभीर है। लगातार नींद की कमी व्यक्ति में अवसाद, चिंता तनाव,भावनात्मक अस्थिरता तथा निर्णय क्षमता में गिरावट ला सकती है। कई अध्ययनों ने संकेत दिया है कि जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक गर्मी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ा सकती है जिसमें विशेषकर उन समुदायों में जो पहले से सामाजिक या आर्थिक दबावों का सामना कर रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए केवल एयर कंडीशनर ही समाधान नहीं हैं। वैज्ञानिक शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने,छतों पर परावर्तक (कूलरूफ़) तकनीक अपनाने,वर्षा जल संरक्षण, बेहतर वेंटिलेशन वाले भवन, शहरी वृक्षारोपण, ऊर्जा- कुशल निर्माण सामग्री और हीट एक्शन प्लान को अधिक प्रभावी बनाने की सलाह दे रहे हैं। साथ ही नागरिकों को भी रात में कमरे का तापमान कम रखने, पर्याप्त पानी पीने, सोने से पहले भारी भोजन और कैफीन से बचने तथा नियमित नींद का समय बनाए रखने जैसी आदतें सटीकता से  अपनानी चाहिए।
साथियों, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न नींद का संकट सभी आयु वर्गों को समान रूप से प्रभावित नहीं करता। बच्चे, किशोर,गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग और पहले से हृदय मधुमेह या श्वसन संबंधी रोगों से पीड़ित लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं। बच्चों में गहरी नींद मस्तिष्क के विकास, सीखने की क्षमता, स्मरण शक्ति तथा शारीरिक वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक होती है। यदि लगातार गर्म रातों के कारण उनकी नींद बाधित होती है तो पढ़ाई, व्यवहार, एकाग्रता और मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। युवाओं में नींद की कमी अवसाद, चिंता,डिजिटल लत, कार्यक्षमता में गिरावट और सड़क दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ाती है।वहींबुजुर्गों में पहले से ही नींद हल्की होती है,इसलिए अत्यधिक गर्म रातें उनके लिए उच्च रक्तचाप, हृदयाघात और स्ट्रोक का खतरा और अधिक बढ़ा देती हैं। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन का यह प्रभाव केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि पीढ़ियों के भविष्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य से सटीकता से जुड़ा हुआ विषय बन गया है।

साथियों,भारत के महानगरों तथा तेजी से विकसित हो रहे मध्यम शहरों में कंक्रीट,डामर की सड़कों,ऊँची इमारतों वाहनों तथा एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्म हवा के कारण ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। शहर दिनभर सूर्य की ऊष्मा को अपने भीतर संचित कर लेते हैं और रात के समय धीरे-धीरे उसे छोड़ते रहते हैं। परिणामस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों का रात्रिकालीन तापमान कई डिग्री अधिक बना रहता है। यही कारण है कि लोगों को देर रात तक बेचैनी महसूस होती है, बार-बार नींद खुलती है और सुबह उठने पर भी थकान बनी रहती है। यदि शहरी नियोजन में हरित क्षेत्र, जलाशय, खुली भूमि, वृक्षारोपण तथा ‘कूल रूफ’ जैसी तकनीकों को प्राथमिकता नहीं दी गई तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। हमें ध्यान देना होगा जलवायु परिवर्तन और अर्थव्यवस्था का अदृश्य संबंध नींद की कमी केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। पर्याप्त नींद न मिलने से कर्मचारियों की उत्पादकता घटती है, निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है, औद्योगिक दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ती है तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है। विश्व स्तर पर यदि करोड़ों लोग हर वर्ष दर्जनों घंटे कीगुणवत्तापूर्ण नींद खो रहे हैं तो उसका प्रभाव सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), श्रम उत्पादकता, स्वास्थ्य बजट और सामाजिक कल्याण पर भी दिखाई देगा। इसलिए विशेषज्ञ अब जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि आर्थिक विकास, मानव पूंजी और राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता का भी मुद्दा मान रहे हैं।
भारत के लिए समय की माँग सटीकता से राष्ट्रीय स्लीप हेल्थ मिशन हैँ।

साथियों, भारत ने हीट एक्शन प्लान, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और जलवायु परिवर्तन से संबंधित अनेक योजनाएँ शुरू की हैं, किंतु अब आवश्यकता इस बात की है कि ‘स्लीप हेल्थ’ को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनाया जाए। राष्ट्रीय स्तर पर नींद संबंधी
जागरूकता अभियान, स्कूलों और कॉलेजों में स्वस्थ नींद की शिक्षा, अस्पतालों में स्लीप क्लीनिकों का विस्तार, शहरों में रात्रिकालीन तापमान की निगरानी तथा वैज्ञानिक शहरी नियोजन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि आज इस दिशा में समन्वित प्रयास किए जाते हैं तो भविष्य में करोड़ों लोगों को मानसिक और शारीरिक बीमारियों से बचाया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध हरित विकास की नीति वास्तव में स्वस्थ और सुकूनभरी नींद की भी नीति है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करे इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अब जलवायु परिवर्तन का नया पैमाना होगी हमारी नींद अब यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रहा। यह मानव स्वास्थ्य,मानसिक संतुलन, उत्पादकता शिक्षा, अर्थव्यवस्था और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा वैश्विक मुद्दा बन चुका है। यदि बढ़ती गर्म रातों को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक और स्थानीय स्तर पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में नींद का संकट भी जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हो सकता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उठाया गया प्रत्येक कदम केवल पृथ्वी को बचाने का प्रयास नहीं होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की स्वस्थ, गहरी और सुकूनभरी नींद की रक्षा का भी संकल्प होगा।

संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

विक्रम-1 से भारत-ब्रिटेन एफ़टीए तक -क्या जुलाई 2026 विश्व अर्थव्यवस्था और भारतीय शेयर बाजार का टर्निंग पॉइंट है? -भारत दुनियाँ की नई सेफ ग्रोथ डेस्टिनेशन बन रहा है?

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युद्ध, व्यापार और तकनीक का त्रिकोण: क्या भारतीय शेयर बाजार वैश्विक उथल- पुथल में बनेगा निवेशकों की पहली पसंद?

वैश्विक संकट बनाम भारत की आर्थिक उड़ान- युद्ध की आंच, व्यापार की ताकत और अंतरिक्ष की छलांग -क्या भारतीय शेयर बाजार व अर्थव्यवस्था दुनियाँ की नई सेफ ग्रोथ डेस्टिनेशन बन रहा है? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर जुलाई 2026 के दूसरे सप्ताह में विश्व और भारत में अनेक ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने निवेशकों,उद्योग जगत, नीति- निर्माताओं तथा वैश्विक वित्तीय संस्थानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। रविवार दिनांक 18 जुलाई 2026 को भारत में निजी क्षेत्र के पहले ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 के प्रक्षेपण की दिशा में ऐतिहासिक प्रगति जिसने पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया,भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते  का 15 जुलाई से लागू होना,20 जुलाई से 13 अगस्त 2026 प्रारंभ होने वाला संसद का मानसून सत्र,पश्चिम एशिया में ईरान- अमेरिका संघर्ष का विस्तार तथा होरमुज़ क्षेत्र में बढ़ता सैन्य तनाव,साथ ही ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की भ्रष्टाचार धारणा रिपोर्ट जैसे घटनाक्रम केवल समाचार नहीं हैं, बल्कि वैश्विक पूंजी प्रवाह,ऊर्जा कीमतों,मुद्रा बाजार, निवेश विश्वास और आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक हैं। जिस पर पूरे विश्व की निगाहें हैं इसलिए मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र पूरे भारत व अंतरराष्ट्रीय स्तरपर इस आर्टिकल के माध्यम से इन डेवलपमेंट्स कों शेयर कर बताना चाहूंगा कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था व शेयर मार्केट पर क्या असर पड़ेगा। भारत के लिए सबसे सकारात्मक घटनाओं में निजी अंतरिक्ष क्षेत्र का तेजी से उभरना है। स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 मिशन भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी की नई शुरुआत का प्रतीक है। सरकार के अनुसार भारत का अंतरिक्ष उद्योग 2030 तक लगभग 40-45 अरब डॉलर और 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य रखता है। इससे एयरोस्पेस, रक्षा,इलेक्ट्रॉनिक्स,सैटेलाइट सेवाओं,कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा उच्च तकनीकी विनिर्माण क्षेत्र की सूचीबद्ध कंपनियों में दीर्घकालिक निवेश आकर्षित होने की संभावना है। विदेशी निवेशकों के लिए भी यह संकेत है कि भारत केवल सेवा आधारित अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि उच्च प्रौद्योगिकी निर्माण की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

साथियों, 15 जुलाई 2026 से भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते का लागू होना भारतीय निर्यातकों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है।वस्त्र,ऑटो कंपोनेंट फार्मास्यूटिकल्स इंजीनियरिंग, कृषि-प्रसंस्करण, रत्न एवं आभूषण तथा आईटी सेवाओं को बेहतर बाजार मिलने की संभावना है। यदि निर्यात बढ़ता है तो भारतीय कंपनियों के मुनाफे में वृद्धि हो सकती है,जिसका सकारात्मक प्रभाव शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है।साथ ही विदेशी कंपनियों का भारत में निवेश बढ़ने से रोजगार, उत्पादन और कर संग्रह में भी वृद्धि संभव है।
साथियों, 20 जुलाई से 13 अगस्त तक प्रस्तावित संसद का मानसून सत्र निवेशकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहेगा क्योंकि इस दौरान कर सुधार,एमएसएमई,निवेश, बैंकिंग तथा अन्य आर्थिक विधेयकों पर चर्चा और निर्णय संभावित हैं। यदि सुधारवादी नीतियां आगे बढ़ती हैं तो बाजार इसे सकारात्मक संकेत के रूप में देख सकता है। वहीं यदि राजनीतिक गतिरोध बढ़ता है और महत्वपूर्ण विधेयक लंबित रह जाते हैं तो निवेशकों में अस्थायी अनिश्चितता भी उत्पन्न हो सकती है।दूसरी ओर, पश्चिम एशिया का संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा जोखिम बना हुआ है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता सैन्य तनाव तथा खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष की घटनाएं तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। यदि होरमुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल संभव है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग आयात करता है,इसलिए तेल महंगा होने पर महंगाई, चालू खाते का घाटा और वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा प्रभाव भारतीय शेयर बाजार के विभिन्न क्षेत्रों पर अलग- अलग पड़ सकता है। तेल विपणन कंपनियों, विमानन, परिवहन, रसायन और पेंट उद्योग पर लागत का दबाव बढ़ सकता है, जबकि तेल एवं गैस खोज, ऊर्जा तथा रक्षा क्षेत्र की कुछ कंपनियों को लाभ मिल सकता है। इसलिए बाजार में क्षेत्रवार प्रदर्शन में बड़ा अंतर दिखाई दे सकता है।अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजार सामान्यतः युद्ध और भू- राजनीतिक तनाव के समय जोखिम से बचने की रणनीति अपनाते हैं। ऐसे समय निवेशक शेयरों से धन निकालकर सोना,अमेरिकी डॉलर, सरकारी बॉन्ड और अन्य सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख करते हैं। यदि पश्चिम एशिया का संघर्ष लंबा चलता है तो वैश्विक पूंजी बाजारों में अस्थिरता बनी रह सकती है और उभरते देशों में विदेशी निवेश का प्रवाह धीमा पड़ सकता है।

साथियों, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की भ्रष्टाचार धारणा रिपोर्ट भी निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है। यदि किसी देश की रैंकिंग कमजोर होती है तो विदेशी निवेशक शासन व्यवस्था, नियामकीय पारदर्शिता और कारोबारी वातावरण को लेकर अधिक सतर्क हो सकते हैं। हालांकि किसी एक रिपोर्ट के आधार पर निवेश निर्णय नहीं लिए जाते, फिर भी दीर्घकाल में पारदर्शिता, न्यायिक दक्षता और नीति-स्थिरता विदेशी निवेश आकर्षित करने के सटीकता से प्रमुख आधार बने रहते हैं।

साथियों, 17 जुलाई 2026 तक भारतीय शेयर बाजार का समग्र रुझान यह संकेत देता है कि निवेशक एक ओर भारत की विकास क्षमता, एफटीए,अंतरिक्ष क्षेत्र और बुनियादी ढांचा सुधारों को सकारात्मक रूप में देख रहे हैं,वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशिया के संकट और वैश्विक महंगाई के जोखिमों को लेकर सतर्क भी हैं। ऐसी स्थिति में बाजार में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक माना जाता है।शेयर बाजार पर प्रभाव का आकलन संभावनाओं परआधारित होता है, क्योंकि वास्तविक बाजार अनेक घरेलू एवं वैश्विक कारकों से प्रभावित होता है।विदेशी संस्थागत निवेशकों की रणनीति भी इसी संतुलन पर निर्भर करेगी।यदि वैश्विक जोखिम बढ़ते हैं तो वे कुछ समय के लिए पूंजी सुरक्षित बाजारों में स्थानांतरित कर सकते हैं,लेकिन भारत की मजबूत विकास दर, जनसांख्यिकीय लाभ, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विनिर्माण विस्तार दीर्घकालिक निवेश को आकर्षित करते रह सकते हैं।भारतीय रुपया भी इन घटनाओं से प्रभावित हो सकता है। तेल महंगा होने और विदेशी निवेश में कमी आने पर रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि निर्यात वृद्धि,एफटीए के लाभ तथा निरंतर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश रुपये को समर्थन दे सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
साथियों, नीट पेपर लीक प्रकरण में केंद्रीय शिक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर जारी राजनीतिक विवाद तथा लगभग 21 दिनों के आंदोलन के बाद सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को रविवार दिनांक 18 जुलाई 2026 धरना स्थल से पुलिस द्वारा हटाकर अस्पताल में भर्ती कराए जाने जैसी घटनाएं स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक बहस और सामाजिक असंतोष को बढ़ाती हैं। यदि ऐसे घटनाक्रम लंबे समय तक जारी रहें, तो उनका अप्रत्यक्ष प्रभाव निवेशकों की धारणा (इन्वेस्टर सेंटीमेंट) और आर्थिक विश्वास (इकोनॉमिक कॉन्फिडेंस) पर पड़ सकता है। हालांकि भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन मुख्यतः कॉर्पोरेट आय,महंगाई,ब्याज दरों,विदेशी निवेश,वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और सरकारीनीतियों जैसे व्यापक आर्थिक कारकों से निर्धारित होता है, फिर भी बड़े राजनीतिक आंदोलनों या अस्थिरता के दौर में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। यदि विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण और सीमित दायरे में रहते हैं, तो उनका व्यापक आर्थिक प्रभाव सामान्यतः सीमित रहता है। लेकिन यदि वे देशव्यापी अवरोध, प्रशासनिक व्यवधान या नीति- निर्माण में देरी का कारण बनें, तो निवेशकों में सतर्कता बढ़ सकती है तथा कुछ समय के लिए पूंजी बाजार, पर्यटन, उपभोग और व्यापारिक गतिविधियों पर दबाव दिखाई दे सकता है। इसलिए ऐसी परिस्थितियों का समाधान लोकतांत्रिक संवाद, पारदर्शी जांच और संस्थागत विश्वास को मजबूत करने के माध्यम से किया जाना भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजारों की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए सटीकता से  अधिक अनुकूल माना जाता है।

साथियों, वैश्विक स्तरपर अमेरिका,यूरोप,जापान और चीन के बाजार भी इन घटनाओं से प्रभावित होंगे। ऊर्जा आयातक देशों के लिए तेल कीमतों में वृद्धि आर्थिक चुनौती बनेगी, जबकि ऊर्जा निर्यातक देशों को अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है। इससे वैश्विक पूंजी का पुनर्संतुलन देखने को मिल सकता है।यदि समग्र दृष्टि से देखा जाए तो भारत के सामने इस समय दो समानांतर चित्र दिखाई देते हैं। पहला, उच्च प्रौद्योगिकी,अंतरिक्ष, मुक्त व्यापार,डिजिटल अर्थव्यवस्था और सुधारवादी नीतियों के माध्यम से तेज आर्थिक विकास का अवसर। दूसरा, वैश्विक युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगाई और भू- राजनीतिक अस्थिरता जैसी चुनौतियां। आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन अवसरों का लाभ उठाते हुए बाहरी जोखिमों का कितनी कुशलता से सामना करती है।

अतःअगर उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि,जुलाई 2026 का यह सप्ताह भारत और विश्व की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा सकता है।यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव नियंत्रित रहता है और भारत सुधारों, निर्यात विस्तार, तकनीकी नवाचार तथा नीति-स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ता है, तो भारतीय शेयर बाजार दीर्घकाल में वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रह सकता है। वहीं यदि युद्ध का दायरा बढ़ता है, ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है और वैश्विक वित्तीय अस्थिरता गहराती है, तो अल्पकाल में विश्वभर के शेयर बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीति यही होगी कि वह अपने मजबूत घरेलू आर्थिक आधार, तकनीकी प्रगति और संतुलित विदेश नीति के माध्यम से इन वैश्विक चुनौतियों को अवसर में परिवर्तित करे।

संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

भारत की कूटनीतिक उड़ान बनाम पश्चिम एशिया का युद्ध: वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार के लिए अवसर, जोखिम और नई दिशा -समग्र व्यापक विश्लेषण।

भारत की कूटनीतिक उड़ान बनाम पश्चिम एशिया का युद्ध: वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार के लिए अवसर, जोखिम और नई दिशा -समग्र व्यापक विश्लेषण।

इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की सफ़ल त्रि-राष्ट्र यात्रा तथा ईरान -अमेरिका संघर्ष के बीच भारत की आर्थिक रणनीति।

विश्व अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां एक तरफ युद्ध से उत्पन्न जोखिम हैं, तो दूसरी ओर भारत के लिए नए आर्थिक अवसर भी तेजी से उभर रहे हैं।

गोंदिया/महाराष्ट्र।

वैश्विक स्तरपर भारतीय विदेश नीति,वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों के दृष्टिकोण से 11 जुलाई 2026 एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिन के रूप में दर्ज किया जाएगा। एक ओर भारतीय प्रधानमंत्री की छह दिवसीय इंडोनेशिया,ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड यात्रा 6 से 11 जुलाई 2026 छह दिवसीय यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न हुई,जिसमें अनेक रणनीतिक समझौते,निवेश साझेदारियां, रक्षा सहयोग,क्रिटिकल मिनरल्स, मुक्त व्यापार और तकनीकी सहयोग से जुड़े एमओयू हुए।दूसरी ओर,पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच समझौता टूटने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य हमले तेज होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार,समुद्री व्यापार, निवेशकों की धारणा और अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई।इन दोनों घटनाओं को यदि एक साथ देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि विश्व अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां एक तरफ युद्ध से उत्पन्न जोखिम हैं तो दूसरी ओर भारत के लिए नए आर्थिक अवसर भी तेजी से उभर रहे हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र वित्तीय दृष्टिकोण से बताना चाहूंगा कि भारतीय पीएम की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड यात्रा केवल एक राजनयिक दौरा नहीं थी बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक नीति का महत्वपूर्ण विस्तार थी। इंडोनेशिया के साथ रक्षा उत्पादन,समुद्री सुरक्षा तथा लगभग 5,400 करोड़ रूपए के रक्षा सहयोग,ऑस्ट्रेलिया के साथ क्रिटिकल मिनरल्स, लिथियम, दुर्लभ खनिज, शिक्षा,ऊर्जा तथा सेमीकंडक्टर सहयोग और न्यूजीलैंड के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते ने यह संकेत दिया कि भारत केवल व्यापार नहीं बढ़ाना चाहता बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में एक निर्णायक भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इससे भारत के विनिर्माण,निर्यात,रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स, ग्रीन एनर्जी और हाई-टेक उद्योगों को सटीकता से नई गति मिलने की संभावना है।

साथियों भारतीय शेयर बाजार के दृष्टिकोण से देखें तो इन समझौतों का सबसे अधिक लाभ रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स सेमीकंडक्टर,खनन,नवीकरणीय ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, पोर्ट, जहाजरानी और निर्यात आधारित कंपनियों को मिलने की संभावना है। निवेशकों की सोच सामान्यतः भविष्य की संभावनाओं पर आधारित होती है।जब किसी देश के साथ दीर्घकालिक व्यापारिक समझौते होते हैं,तब विदेशी निवेशकों का विश्वास मजबूत होता है।यही कारण है कि ऐसे कूटनीतिक समझौते अक्सर बाजार को दीर्घकालिक मजबूती प्रदान करते हैं,भले ही अल्पकाल में वैश्विक घटनाओं के कारण सटीकता से उतार- चढ़ाव बना रहे।

साथियों, न्यूजीलैंड के साथ रिकॉर्ड समय में संपन्न मुक्त व्यापार समझौता,40 साल का सूखा खत्म! 35000 करोड़ का होगा ट्रेड, समझौते हुए?- भारत -न्यूजीलैंड ने तैयार किया विजन 2030, भारतीय कृषि,डेयरी, फार्मास्यूटिकल्स,आईटी सेवाओं वस्त्र उद्योग,खाद्य प्रसंस्करण तथा इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए नए अवसर लेकर आया है। यदि दोनों देशों के बीच व्यापार 2030 तक दोगुना होता है तो भारत के निर्यातकों, बंदरगाहों, कंटेनर लॉजिस्टिक्स बैंकिंग और बीमा क्षेत्र को भी अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होगा। इससे भारतीय रुपये की स्थिरता और विदेशी मुद्रा भंडार पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

साथियों, ऑस्ट्रेलिया के साथ क्रिटिकल मिनरल्स साझेदारी भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य की अर्थव्यवस्था इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स,सौर ऊर्जा,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर उद्योग पर आधारित होगी। लिथियम, कोबाल्ट तथा अन्य दुर्लभ खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति भारत को चीन पर निर्भरता कम करने का अवसर देती है। इससे मेक इन इंडिया,आत्मनिर्भर भारत और उच्च मूल्य विनिर्माण को नई गति मिलने की संभावना है।इंडोनेशिया के साथ रक्षा सहयोग और समुद्री सुरक्षा समझौते हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की सामरिक स्थिति को मजबूत करते हैं। ब्रह्मोस जैसे रक्षा निर्यात भारतीय रक्षा उद्योग के लिए वैश्विक बाजार खोल सकते हैं। रक्षा निर्यात में वृद्धि का सीधा लाभ सार्वजनिक और निजी दोनों रक्षा कंपनियों, अनुसंधान संस्थानों और सहायक उद्योगों को मिलेगा। इससे रोजगार, उत्पादन और निर्यात आय में सटीकता से वृद्धि होगी।

साथियों, इन सकारात्मक संकेतों के बीच पश्चिम एशिया से आने वाली खबरें वैश्विक बाजारों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। ईरान और अमेरिका के बीच समझौता टूटने तथा दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने वैश्विक निवेशकों को जोखिम से बचने की रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है। जब भी विश्व में युद्ध या बड़े भू- राजनीतिक तनाव उत्पन्न होते हैं, तब निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों जैसे सोना, अमेरिकी डॉलर और सरकारी बॉन्ड की ओर रुख करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि उभरते बाजारों से विदेशी निवेश का अस्थायी बहिर्वाह शुरू हो सकता है।भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है।यदि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बना रहता है और तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची रह सकती हैं। इससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा, चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है, रुपये पर दबाव आ सकता है तथा घरेलू महंगाई में वृद्धि की आशंका बनेगी। पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, उर्वरक, प्लास्टिक, रसायन तथा परिवहन लागत बढ़ने से लगभग हर क्षेत्र प्रभावित हो सकता है।भारतीय शेयर बाजार में ऐसे समय सबसे अधिक दबाव विमानन, ऑटोमोबाइल, पेंट, टायर, सीमेंट, रसायन और उपभोक्ता वस्तु क्षेत्रों पर दिखाई देता है क्योंकि इनकी उत्पादन लागत ऊर्जा पर काफी निर्भर करती है। दूसरी ओर तेल एवं गैस उत्पादन,रक्षा, ऊर्जा अवसंरचना तथा कुछ कमोडिटी आधारित कंपनियों को अपेक्षाकृत लाभ मिल सकता है।यही कारण है कि युद्धकालीन परिस्थितियों में सेक्टर रोटेशन तेजी से देखने को मिलता है।

साथियों, अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। अमेरिका, यूरोप और एशिया के प्रमुख बाजार युद्ध संबंधी समाचारों पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। यदि संघर्ष लंबा चलता है तो वैश्विक विकास दर प्रभावित हो सकती है, समुद्री मालभाड़ा बढ़ सकता है, बीमा लागत बढ़ सकती है और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव आ सकता है। इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लाभ पर असर पड़ सकता है।हालांकि भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सकारात्मक पक्ष यह भी है कि विश्व की अनेक कंपनियां अब अपनी आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण करना चाहती हैं। चीन-प्लस-वन रणनीति, हिंद- प्रशांत साझेदारी और भारत के साथ बढ़ते व्यापारिक समझौते भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने का अवसर प्रदान कर रहे हैं।यदि भारत समय पर अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स श्रम सुधार और उत्पादन क्षमता को मजबूत करता है तो वह युद्ध से उत्पन्न वैश्विक पुनर्संतुलन का वास्तव में बहुत बड़ा लाभ उठा सकता है।

साथियों, विदेशी संस्थागत निवेशकों की दृष्टि से भारत आज भी सबसे आकर्षक उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। मजबूत घरेलू मांग, डिजिटल अर्थव्यवस्था युवा कार्यबल, तेज बुनियादी ढांचा विकास, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं और स्थिर वित्तीय प्रणाली भारत को अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश गंतव्य बनाती हैं। यही कारण है कि अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के बावजूद दीर्घकालिक निवेशकों का विश्वास बना रह सकता है।भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती महंगाई नियंत्रण और विकास दर के बीच संतुलन बनाए रखने की होगी। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो मौद्रिक नीति, राजकोषीय प्रबंधन और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ेगी। साथ ही रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू गैस उत्पादन का महत्व और बढ़ जाएगा।

साथियों, विश्व अर्थव्यवस्था के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो वर्तमान समय दो विपरीत धाराओं का संगम है। पहली धारा युद्ध, ऊर्जा संकट,महंगाई और अनिश्चितता की है।दूसरी धारा तकनीकी निवेश,हरित ऊर्जा,डिजिटल परिवर्तन,रक्षा आधुनिकीकरण और नए व्यापारिक गठबंधनों की है। भारत की त्रि-राष्ट्र यात्रा दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करती है,जबकि ईरान-अमेरिका संघर्षपहली धारा का। आने वाले वर्षों में जो देश इन दोनों चुनौतियों के बीच संतुलन स्थापित कर पाएंगे, वही वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की दौड़ में आगे रहेंगे।
साथियों, भारत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह आज केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि एक विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार, रक्षा सहयोगी,तकनीकी भागीदार और विनिर्माण केंद्र के रूप में उभर रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती भूमिका, मुक्त व्यापार समझौते,रक्षा निर्यात, क्रिटिकल मिनरल्स साझेदारी और वैश्विक निवेश आकर्षित करने की क्षमता भारत को आने वाले दशक में विश्व अर्थव्यवस्था के प्रमुख विकास इंजन के रूप में सटीकता से स्थापित कर सकती है।

साथियों,11 जुलाई 2026 शाम हुई भारतीय पीएम के त्रि-राष्ट्रीय छह दिवसीय दौरे में भारत- न्यूजीलैंड का विजन 2030 दोनों देशों के रिश्तों में नई शुरुआत जैसा है, जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था व शेयर बाजारों मैं दूरगामी सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकता है।40 साल बाद हुई इस पहल से उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच व्यापार और सहयोग नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा, भारत और न्यूजीलैंड के रिश्तों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है. करीब 40 साल बाद न्यूजीलैंड के किसी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच हुई अहम बातचीत ने व्यापारिक रिश्तों के लिए नए रास्ता खोल दिए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने मिलकर ‘विजन 2030’ का रोडमैप तैयार किया है, जिसका मकसद दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना है. दोनों देशों की कोशिश है कि आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को करीब 35,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाया जाए.भारत और न्यूजीलैंड के बीच लंबे समय से अच्छे कूटनीतिक संबंध रहे हैं, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर दोनों देशों के बीच व्यापार की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ पाई थी. अब दोनों देशों ने इस अंतर को कम करने के लिए विजन 2030 तैयार किया है. ट्रेड डील लागू होने के बाद पहले दिन से ही न्यूजीलैंड के 57 प्रतिशत निर्यात को भारत में बिना टैरिफ के एंट्री मिलेगी. इससे न्यूजीलैंड के कृषि, फूड प्रोसेसिंग, डेयरी के सामान को भारतीय बाजार में पहुंच बनाने में मदद मिलेगी. वहीं, भारत को भी न्यूजीलैंड के बाजार में अपने उत्पादों के लिए बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद है. इस समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापार के नए रास्ते खुलेंगे।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि भारतीय पीएम की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड यात्रा भारत की आर्थिक कूटनीति को नई ऊंचाई देने वाली सिद्ध हो सकती है,जबकि ईरान- अमेरिका संघर्ष विश्व अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर जोखिम प्रस्तुत करता है। अल्पकाल में शेयर बाजारों में अस्थिरता,महंगाई और ऊर्जा लागत का दबाव बना रह सकता है,किंतु यदि भारत अपने सुधारों,व्यापारिक साझेदारियों, ऊर्जा सुरक्षा और निवेश वातावरण को मजबूत बनाए रखता है, तो वह इस वैश्विक संकट को भी अवसर में बदल सकता है।यही कारण है कि आज भारत के सामने चुनौती जितनी बड़ी है, संभावना उससे कहीं अधिक व्यापक है। आने वाले वर्षों में भारतीय शेयर बाजार, भारतीय उद्योग और भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य केवल घरेलू नीतियों पर नहीं बल्कि भारत की सक्रिय वैश्विक कूटनीति, रणनीतिक साझेदारियों और बदलते विश्व आर्थिक संतुलन को अवसर में बदलने की क्षमता पर भी निर्भर करेगा।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

एफ़एसएस एआई क़ा चला बड़ा डंडा एक्शन पार्ट-2-भ्रामक फ़ूड लेबलिंग पर कसता शिकंजा: क्या फ्रेश,प्योर,नेचुरल हेल्दी और ज़ीरो शुगर के दावों का युग अब समाप्त होने जा रहा है? -समग्र व्यापक विश्लेषण

एफ़एसएस एआई क़ा चला बड़ा डंडा एक्शन पार्ट-2-भ्रामक फ़ूड लेबलिंग पर कसता शिकंजा: क्या फ्रेश,प्योर,नेचुरल हेल्दी और ज़ीरो शुगर के दावों का युग अब समाप्त होने जा रहा है? -समग्र व्यापक विश्लेषण

6 जुलाई की कार्रवाई के ठीक दो दिन बाद, 8 जुलाई 2026 को एफ़एसएसएआई क़ा बड़ा एक्शन पार्ट-2

स्वस्थ भारत क़े निर्माण हेतु कठोर कानूनों क़े साथ सरकार की सतर्कता,नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता, उद्योग जगत की ईमानदारी और सबसे बढ़कर जागरूक उपभोक्ता की सक्रिय भागीदारी ज़रूरी -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी।

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर आज का उपभोक्ता केवलभोजन नहीं खरीदता,बल्कि स्वास्थ्य विश्वास और जीवनशैली भी खरीदता है।यही कारण है कि खाद्य उद्योग ने अपने उत्पादों पर फ्रेश,हेल्दी,प्योर,नेचुरल,100 प्रतिशत आर्गेनिक,ज़ीरो शुगर,नों एडेड शुगर, इम्युनिटी बूस्टर और होलसमथिंग जैसे आकर्षक शब्दों का व्यापक उपयोग शुरू कर दिया है। एफ़एसएस एआई ने भ्रामक विज्ञापनों और गलत लेबलिंग के खिलाफ अपने देशव्यापी अभियान का विस्तार कर दिया है। 6 जुलाई की कार्रवाई के ठीक दो दिन बाद,यानी 8 जुलाई 2026 को एफ़एसएस एआई ने बड़ा एक्शन पार्ट-2 लिया है।सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और इंस्टाग्राम पर आधिकारिक घोषणा करते हुए देश के तीन अन्य बड़े ब्रांडों को कारण बताओ (शो-कॉज ) नोटिस जारी किया है।इन शब्दों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव इतना गहरा होता है कि अधिकांश ग्राहक पैकेट के सामने लिखे दावों को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं और पीछे दिए गए वास्तविक तथ्यों को पढ़ने की आवश्यकता भी नहीं समझते।परिणाम स्वरूप,उपभोक्ता कई बार ऐसे उत्पाद खरीद लेते हैं जो वास्तव में उतने स्वास्थ्य वर्धक नहीं होते जितना उनका प्रचार किया जाता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी,गोंदिया,महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते आम जनता को यह जानकारी देना चाहूंगा कि अब भारत में इस प्रवृत्ति पर निर्णायक कार्रवाई की शुरुआत दिखाई दे रही है।भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफ़एसएस एआई ) ने कई कंपनियों को उनके भ्रामक दावों के संबंध में नोटिस जारी कर सात दिनों के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है। यह केवल कुछ कंपनियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे खाद्य उद्योग के लिए स्पष्ट संदेश है कि अब बिना वैज्ञानिक प्रमाण के किए गए स्वास्थ्य संबंधी दावों को सटीकता से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

साथियों, भारत में खाद्य सुरक्षा का पूरा कानूनी ढांचाखाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 पर आधारित है, जिसने पहले से लागू अनेक अलग- अलग खाद्यकानूनों को एकीकृत कर आधुनिक और वैज्ञानिक व्यवस्था प्रदान की। इस अधिनियम की धारा 24 विशेष रूप से भ्रामक विज्ञापनों और गलत दावों पर रोक लगाती है। कोई भी निर्माता, विक्रेता या कंपनी ऐसा विज्ञापन प्रकाशित नहीं कर सकती जो उत्पाद की गुणवत्ता,प्रकृति,संरचना या स्वास्थ्य संबंधी लाभों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करे अथवा उपभोक्ता को भ्रमित करे। यही कारण है कि यदि कोई कंपनी 100 प्रतिशत प्राकृतिक या पूर्णतः शुद्ध लिखती है तो उसे यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध करना होगा कि उसका दावा वस्तुतः सही है।इसी उद्देश्य से एफएसएसएआई (विज्ञापन एवं दावे) विनियम, 2018 लागू किए गए। इन विनियमों ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक स्वास्थ्य दावा, पोषण दावा अथवा गुणवत्ता संबंधी दावा वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। विशेष रूप से अनुसूची-5 में नेचुरल, फ्रेश,प्योर,ओरिजिनल तथा ट्रेडिशनल जैसे शब्दों के उपयोग के लिए अत्यंत कठोर मानदंड निर्धारित किए गए हैं। इन मानकों के अनुसार अधिकांश प्रसंस्कृत (प्रोसेसड) खाद्य पदार्थ वास्तव में नेचुरल अथवा फ्रेश कहलाने की पात्रता ही नहीं रखते। अर्थात केवल विपणन (मार्केटिंग) के उद्देश्य से इन शब्दों का उपयोग करना कानून का उल्लंघन माना जा सकता है।

साथियों,आज सबसे अधिक भ्रम ज़ीरो शुगर और नों एडेड शुगर जैसे शब्दों को लेकर है। सामान्य उपभोक्ता दोनों को समान समझता है,जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से दोनों का अर्थ अलग-अलग है। नों एडेड शुगर का अर्थ केवल इतना है कि निर्माण प्रक्रिया के दौरान अतिरिक्त चीनी नहीं मिलाई गई। इसका अर्थ यह नहीं कि उत्पाद में प्राकृतिक शर्करा या अन्य प्रकार की शर्करा मौजूद नहीं है। कई कंपनियां सुक्रोज,माल्टोडेक्सट्रिन, हाई- फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप,डेक्सट्रोज, इनवर्ट शुगर,कॉन्सन्ट्रेटेड फ्रूट जूस अथवा अन्य कार्बोहाइड्रेट स्रोतों का उपयोग करती हैं, जो शरीर में जाकर अंततः ग्लूकोज में परिवर्तित होते हैं। इसलिए केवल पैकेट के सामने लिखे आकर्षक दावे पर विश्वास करना उपभोक्ता के लिए सटीकता से जोखिमपूर्ण हो सकता है।
साथियों भारतीय कानून केवल खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है।उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के अंतर्गत गठित केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण को भी भ्रामक विज्ञापनों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का अधिकार प्राप्त है। यह संस्था स्वतः संज्ञान लेकर कंपनियों पर भारी आर्थिक दंड लगा सकती है, विज्ञापन वापस लेने का आदेश दे सकती है तथा आवश्यक होने पर ऐसे प्रचार में शामिल प्रसिद्ध व्यक्तियों पर भी प्रतिबंध लगा सकती है। इस प्रकार एफएसएसएआई और सीसीपीए मिलकर उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और आर्थिक हितों की दोहरी सुरक्षा प्रदान करते हैं।भारत की संघीय व्यवस्था में कानून केंद्र बनाता है,किंतु उसका वास्तविक क्रियान्वयन राज्यों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक राज्य में खाद्य सुरक्षा आयुक्त नियुक्त होते हैं, जिनके अधीन नामित अधिकारी और खाद्य सुरक्षा अधिकारी कार्य करते हैं।यहीअधिकारी खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण करते हैं,नमूने लेते हैं,प्रयोगशाला परीक्षण कराते हैं, उल्लंघन पाए जाने पर उत्पाद जब्त करते हैं तथा न्यायालयों में अभियोजन चलाते हैं। यदि किसी कंपनी का उत्तर असंतोषजनक पाया जाता है तो उसका लाइसेंस निलंबित या रद्द भी किया जा सकता है। इस प्रकार केंद्रीय नियमों का वास्तविक प्रभाव राज्य स्तर के प्रभावी प्रवर्तन पर निर्भर करता है।

साथियों, वर्तमान कार्रवाई केवल कुछ कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय खाद्य उद्योग के लिए एक व्यापक चेतावनी है कि भविष्य में बिना वैज्ञानिक आधार के किसी भी प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी दावे स्वीकार नहीं किए जाएंगे।यदि किसी उत्पाद कोइम्युनिटी बूस्टर, हार्ट हेल्दी,डायबिटिक फ्रेंडली अथवा पूर्णतः प्राकृतिक कहा जाता है, तो निर्माता को उसके समर्थन में वैज्ञानिक अनुसंधान, परीक्षण तथा प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। केवल विपणन की भाषा अब पर्याप्त नहीं होगी।उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वे सही उत्पाद की पहचान कैसे करें। किसी भी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ को खरीदते समय केवल सामने लिखे दावों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। सबसे पहले पीछे दी गई इंग्रेडिट्स लिस्ट को पढ़ना चाहिए। कानून के अनुसार सामग्री घटते क्रम में लिखी जाती है। यदि किसी तथाकथित हेल्दी बिस्कुट में सबसे पहले मैदा और दूसरे स्थान पर चीनी लिखी है, तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि वही उसकी प्रमुख सामग्री है।इसी प्रकार पोषण संबंधी तालिका में प्रति 100 ग्राम चीनी, सोडियम, संतृप्त वसा और ऊर्जा की मात्रा देखनी चाहिए। कंपनियां कई बार बहुत छोटे सर्विग साइज का उपयोग करके वास्तविक मात्रा कम दिखाई देती हैं।इसलिए प्रति 100 ग्राम का कॉलम ही सही तुलना का सटीक आधार होता है।
साथियों, प्रत्येक उपभोक्ता को उत्पाद पर अंकित 14 अंकों का एफएसएसएआई लाइसेंस नंबर अवश्य देखना चाहिए। यही नंबर बताता है कि उत्पाद अधिकृत इकाई द्वारा निर्मित है। आवश्यकता पड़ने पर इस लाइसेंस नंबर का सत्यापन भी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त निर्माण तिथि समाप्ति तिथि,शाकाहारी अथवा मांसाहारी चिह्न एलर्जी संबंधी चेतावनी तथा भंडारण संबंधी निर्देशों को भी गंभीरता से पढ़ना चाहिए।

साथियों, भारत ने भी अपने नियमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित किया है। हालांकि अभी भी एक महत्वपूर्ण सुधार शेष है,फ्रंट- ऑफ-पैक लेबलिंग अनेक विशेषज्ञ वर्षों से सुझाव दे रहे हैं कि जिन खाद्य पदार्थों में अत्यधिक चीनी, नमक या संतृप्त वसा हो, उनके पैकेट के सामने ही स्पष्ट चेतावनी अंकित की जाए। इससे उपभोक्ता बिना पूरा पैकेट पढ़े भी जोखिम का प्रारंभिक आकलन कर सकेगा। विश्व के अनेक देशों में ऐसी प्रणाली सफल सिद्ध हुई है और भारत में भी इसे शीघ्र लागू करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।वर्तमान समय में खाद्य उद्योग केवल स्वाद नहीं बेच रहा, बल्कि स्वास्थ्य की छवि भी बेच रहा है। उपभोक्ता का मनोविज्ञान इस प्रकार प्रभावित किया जाता है कि वह चमकीले रंग, आकर्षक पैकेजिंग और स्वास्थ्य संबंधी दावों के आधार पर निर्णय लेने लगता है। यही कारण है कि आधुनिक उपभोक्ता के लिए वैज्ञानिक जागरूकता उतनी ही आवश्यक है जितनी कानूनी सुरक्षा।यदि उपभोक्ता स्वयं सामग्री सूची,पोषण तालिका और लाइसेंस विवरण पढ़ने की आदत विकसित कर ले, तो भ्रामक विपणन का प्रभाव स्वतःकम हो जाएगा।एफएस एसएआई द्वारा हाल में जारी नोटिस भारतीय खाद्य विनियमन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत हैं। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि केवल विपणन की भाषा के सहारे उपभोक्ताओं को प्रभावित करने की संस्कृति अब स्वीकार नहीं की जाएगी। यह कदम ईमानदार कंपनियों के लिए भी लाभकारी है, क्योंकि इससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा और गुणवत्ता आधारित बाजार सटीकता से विकसित होगा।

साथियों, विश्व स्तरपर भी भ्रामक खाद्य लेबलिंग एक गंभीर चिंता का विषय है। संयुक्त राष्ट्र के कोडेक्स एलिमेंटेरिय ने स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं कि किसी भी खाद्य उत्पाद पर किया गया दावा वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए तथा उपभोक्ता को भ्रमित नहीं करना चाहिए। यही वैश्विक मानक अधिकांश देशों की नीतियों का आधार है।यूरोपीय संघ ने इस क्षेत्र में विश्व का सबसे कठोर ढांचा विकसित किया है। वहां केवल वही स्वास्थ्य अथवा पोषण संबंधी दावे स्वीकार किए जाते हैं जिन्हें यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण द्वारा वैज्ञानिक रूपसेअनुमोदित किया गया हो। नेचुरल, हेल्दी अथवा प्योर जैसे सामान्य दावों का मनमाना उपयोग लगभग असंभव है। यदि दावा स्वीकृत सूची में नहीं है तो उसे पैकेट पर लिखना ही प्रतिबंधित है। इस कारण यूरोपीय उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी जानकारी उपलब्ध होती है।संयुक्त राज्य अमेरिका में एफडीए और एफ़टीसी मिलकर इस व्यवस्था का संचालन करते हैं। एफडीए खाद्य लेबलों की वैज्ञानिक सत्यता की जांच करता है, जबकि एफ़टीसी भ्रामक विज्ञापनों पर आर्थिक दंड लगाता है। अनेक स्वास्थ्य संबंधी दावों के साथ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक होता है कि संबंधित दावा सरकारी वैज्ञानिक प्रमाणन के अंतर्गत स्वीकृत नहीं है। इससे उपभोक्ता को भ्रमित होने की संभावना कम होती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि स्वस्थ भारत का निर्माण केवल कठोर कानूनों से संभव नहीं है। इसके लिए सरकार की सतर्कता नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता उद्योग जगत की ईमानदारी और सबसे बढ़कर जागरूक उपभोक्ता की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। जब उपभोक्ता पैकेट के सामने लिखे आकर्षक शब्दों के बजाय पीछे छिपे वैज्ञानिक तथ्यों को पढ़ना शुरू करेगा,तभी फ्रेश,प्योर, नेचुरल हेल्दी और ज़ीरो शुगर जैसे शब्द वास्तविक अर्थों में विश्वसनीय बन सकेंगे। यही उपभोक्ता अधिकारों की वास्तविक विजय होगी और यही आधुनिक खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य भी है।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

फ़िर पेपर लीक: अंदरूनी विश्वासघात- घर का भेदी लंका ढाए -युवाओं के भविष्य की चोरी या व्यवस्था की सबसे बड़ी विफ़लता व कमजोरी?

फ़िर पेपर लीक: अंदरूनी विश्वासघात- घर का भेदी लंका ढाए -युवाओं के भविष्य की चोरी या व्यवस्था की सबसे बड़ी विफ़लता व कमजोरी?

लाखों अभ्यर्थियों की तैयारी, यात्रा, मानसिक तनाव और भविष्य एक झटके में अधर में लटक जाना,पूरे देश की परीक्षा प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञों, मॉडरेटरों और संबंधित अधिकारियों क़ो भी केंद्रीय बजट तैयार करने वाली टीम की तरह एग्जाम होने तक पूर्ण गोपनीय वातावरण में रखने की तात्कालिक आवश्यकता।

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर घर का भेदी लंका ढाए,यह कहावत आज भारत की परीक्षा प्रणाली पर पहले से कहीं अधिक सटीक बैठती दिखाई देती है। कभी पानी की पाइपलाइन,गैस लाइन या टैंकर लीक होने की खबरें चर्चा का विषय होती थीं, लेकिन आज लीक शब्द सुनते ही लोगों के मन में पहला प्रश्न आता है, आज किस परीक्षा का पेपर लीक हुआ? यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक और ज्ञान- आधारित समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक है। किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होना केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के वर्षों के परिश्रम, सपनों और भविष्य की खुली चोरी है। जब एक विद्यार्थी दिन-रात मेहनत करके परीक्षा केंद्र तक पहुंचता है और अंतिम क्षणों में परीक्षा रद्द या स्थगित कर दी जाती है, तो उसका केवल समय और धन ही नहीं, बल्कि व्यवस्था पर विश्वास भी टूटता है। महाराष्ट्र शिक्षक पात्रता परीक्षा (महा टेट 2026) का परीक्षा से ठीक पहले स्थगित होना इसी गहरी बीमारी का सटीक ताजा उदाहरण है।महाराष्ट्र शिक्षक पात्रता परीक्षा रविवार 28 जून 2026 को आयोजित थी, किंतु एक दिन पहले ठाणे के भिवंडी क्षेत्र में पुलिस द्वारा पेपर लीक रैकेट का भंडाफोड़ किए जाने के बाद सरकार को परीक्षा तत्काल स्थगित करनी पड़ी। प्रारंभिक जांच में वास्तविक प्रश्नपत्र आरोपियों के पास मिलने की पुष्टि ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह कोई अफवाह नहीं, बल्कि संगठित अपराध था। लाखों अभ्यर्थियों की तैयारी,यात्रा, मानसिक तनाव और भविष्य एक झटके में अधर में लटक गया। यह घटना केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश की परीक्षा प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब राष्ट्रीय स्तर पर पेपर लीक की घटनाओं के बाद परीक्षा प्रणाली को लीक-प्रूफ बनाने के दावे किए गए थे,तब फिर ऐसी घटनाएं कैसे हो रही हैं? यदि सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो चुकी है,तो प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले अपराधियों तक कैसे पहुंच गया?इसका उत्तर केवल तकनीकी कमजोरी में नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर मौजूद मानवीय भ्रष्टाचार और संस्थागत मिलीभगत में छिपा है। पेपर लीक की लगभग हर बड़ी घटना यह संकेत देती है कि यह केवल बाहरी अपराधियों का काम नहीं होता। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर मुद्रण, पैकेजिंग, परिवहन, सुरक्षित भंडारण और वितरण तक अनेक चरण होते हैं। इनमें किसी भी स्तर पर यदि कोई व्यक्ति धन, प्रभाव या लालच के कारण गोपनीयता तोड़ देता है, तो पूरी सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अधिकांश पेपर लीक बाहरी हमला नहीं, बल्कि अंदरूनी विश्वासघात होते हैं। वास्तव में घर का भेदी लंका ढाए वाली स्थिति ही इस समस्या का मूल है।

साथियों, महाराष्ट्र मामले की जांच में सामने आए तथ्यों ने भी इसी ओर संकेत किया। पुलिस को गुप्त सूचना मिलने के बाद अंडरकवर ऑपरेशन चलाया गया। अधिकारियों ने स्वयं को पेपर खरीदने वाला ग्राहक बताकर आरोपियों से संपर्क किया और दो दिनों तक उनकी गतिविधियों पर निगरानी रखी। बड़ी धनराशि का लालच देकर सौदे के लिए बुलाया गया और जैसे ही प्रश्नपत्र सौंपा गया, तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। जांच में दिल्ली सहित कई राज्यों तक फैले अंतरराज्यीय नेटवर्क के संकेत मिले, जिसके बाद विशेष जांच दल ने विभिन्न राज्यों में जांच शुरू की। इससे स्पष्ट है कि पेपर लीक अब छोटे स्तर का अपराध नहीं रहा, बल्कि यह करोड़ों रुपये के संगठित आपराधिक नेटवर्क का रूप ले चुका है।आज डिजिटलतकनीक ने जहां सुविधाएं बढ़ाई हैं, वहीं अपराधियों को भी नए माध्यम उपलब्ध करा दिए हैं। व्हाट्सऐप, टेलीग्राम और अन्य एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म पर कुछ ही मिनटों में प्रश्नपत्र हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए केवल प्रिंटिंग प्रेस की सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। साइबर सुरक्षा, डिजिटल निगरानी और डेटा सुरक्षा को भी समान महत्व देना होगा। यदि डिजिटल चैनल सुरक्षित नहीं होंगे, तो कोई भी गोपनीय दस्तावेज सुरक्षित नहीं रह सकता।
साथियों, पेपर लीक का सबसे बड़ा नुकसान केवल परीक्षा स्थगित होना नहीं है। इसका सबसे गंभीर प्रभाव युवाओं के मनोविज्ञान पर पड़ता है। वर्षों की मेहनत करने वाला छात्र स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है। वह सोचने लगता है कि मेहनत से अधिक महत्व पैसे, पहुंच और भ्रष्ट नेटवर्क का है। यह भावना प्रतिभाशाली युवाओं में निराशा, अविश्वास और मानसिक तनाव को जन्म देती है। यदि यह स्थिति लगातार बनी रही,तोइसका प्रभाव केवल शिक्षा पर नहीं, बल्कि देश की प्रशासनिक गुणवत्ता,सामाजिक विश्वास और आर्थिक विकास पर भी पड़ेगा।भारत के लिए यह समय केवल अपराधियों की गिरफ्तारी तक सीमित रहने का नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली के पुनर्गठन का है। केवल पेपर लीक होने के बाद एसआईटी बनाना और कुछ गिरफ्तारियां करना पर्याप्त समाधान नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें पेपर लीक होना तकनीकी और प्रशासनिक रूप से लगभग सटीकता से असंभव हो जाए।
साथियों, इस संदर्भ में विश्व के अनेक देशों ने अत्यंत प्रभावी मॉडल विकसित किए हैं, जिनसे भारत महत्वपूर्ण सीख ले सकता है। चीन की राष्ट्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा “गाओकाओ” को दुनिया की सबसे सुरक्षित परीक्षाओं में माना जाता है। वहां प्रश्नपत्रों को राष्ट्रीय गोपनीय दस्तावेज का दर्जा प्राप्त है। प्रश्नपत्रों की छपाई अत्यधिक सुरक्षित परिसरों में होती है और उनका परिवहन बख्तरबंद वाहनों, जीपीएस ट्रैकिंग, वीडियो निगरानी तथा सशस्त्र सुरक्षा के बीच किया जाता है। परीक्षा केंद्रों पर बायोमेट्रिक सत्यापन, फेस रिकग्निशन, एआई कैमरे, रेडियो जैमर और इलेक्ट्रॉनिक डिटेक्शन सिस्टम का उपयोग किया जाता है। वहां पेपर लीक केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध गंभीर अपराध माना जाता है।अमेरिका ने एक अलग रास्ता अपनाया है। वहां विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षाओं में तेजी से डिजिटल प्रणाली लागू की गई है। प्रश्नपत्रों की लंबी अवधि तक भौतिक रूप में उपलब्धता समाप्त कर दी गई है। परीक्षा शुरू होने के ठीक पहले एन्क्रिप्टेड माध्यम से प्रश्न उपलब्ध कराए जाते हैं। विशेष लॉकडाउन सॉफ्टवेयर के कारण परीक्षार्थी अन्यवेबसाइट स्क्रीनशॉट या बाहरी एप्लिकेशन का उपयोग नहीं कर सकता।इससे पारंपरिक पेपर लीक की संभावना लगभग समाप्त हो जाती है।ऑस्ट्रेलिया ने भी ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली को वैज्ञानिक तरीके से विकसित किया है। वहां लॉकडाउन ब्राउज़र, प्रश्नों का अलग-अलग क्रम, एआई आधारित निगरानी तथा अधिकृत अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही सुनिश्चित की गई है। यदि कोई अधिकारी सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन करता है, तो उसके विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई होती है।दक्षिण कोरिया का मॉडल विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वहां राष्ट्रीय परीक्षा के प्रश्नपत्र तैयार करने वाले शिक्षकों और विशेषज्ञों को परीक्षा समाप्त होने तक बाहरी दुनिया से पूरी तरह अलग रखा जाता है। उनके मोबाइल, इंटरनेट और बाहरी संपर्क बंद कर दिए जाते हैं। यह व्यवस्था कठोर अवश्य है, किंतु प्रश्नपत्र की गोपनीयता सुनिश्चित करने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई है।

साथियों, यहीं पर भारत के लिए एक व्यावहारिक सुझाव भी सामने आता है। जिस प्रकार केंद्रीय बजट तैयार करने वाली टीम को बजट प्रस्तुत होने तक पूर्ण गोपनीय वातावरण में रखा जाता है, उसी प्रकार प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञों, मॉडरेटरों और संबंधित अधिकारियों के लिए भी सीमित अवधि का नियंत्रित एवं सुरक्षित वातावरण बनाया जा सकता है।यह व्यवस्था केवल उच्च जोखिम वाली राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए लागू की जा सकती है। इससे प्रश्नपत्र निर्माण के दौरान बाहरी संपर्क और संभावित लीक की संभावना काफी कम हो सकती है। हालांकि केवल मानव नियंत्रण पर्याप्त नहीं होगा। अब समय आ गया है कि प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा केंद्र तक प्रत्येक चरण का पूर्ण डिजिटलीकरण किया जाए। ब्लॉकचेन जैसी तकनीक दस्तावेजों की सुरक्षा और प्रत्येक गतिविधि का अपरिवर्तनीय रिकॉर्ड रखने में सहायक हो सकती है। यदि प्रत्येक एक्सेस, डाउनलोड, प्रिंट और ट्रांसफर का डिजिटल लॉग सुरक्षित रहेगा, तो किसी भी स्तर पर जिम्मेदारी तय करना आसान होगा।
साथियों, इसके साथ ही परीक्षा प्रक्रिया में जीरो ट्रस्ट सिक्योरिटी मॉडल अपनाने की आवश्यकता है।अर्थात कोई भी व्यक्ति केवल पद के आधार पर पूर्ण विश्वास का पात्र न माना जाए।प्रत्येक चरण में बहुस्तरीय प्रमाणीकरण डिजिटल ऑडिट और स्वतंत्र निगरानी अनिवार्य होनी चाहिए। संवेदनशील कार्यों में एकल व्यक्ति के बजाय बहु-अधिकारी प्रणाली अपनाई जानी चाहिए ताकि कोई अकेला व्यक्ति पूरीe प्रक्रिया से समझौता न कर सके।कानूनी स्तर पर भी व्यापक सुधार आवश्यक हैं। वर्तमान व्यवस्था में कई मामलों में जांच लंबी चलती है और दोषियों को वर्षों तक सजा नहीं मिलती। इससे अपराधियों में भय पूरी तरह से समाप्त हो जाता है।

साथियों, पेपर लीक को केवल सामान्य आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य और राष्ट्रीय संसाधनों के विरुद्ध संगठित आर्थिक अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके लिए विशेष कानून, अनिवार्य संपत्ति जब्ती आजीवन परीक्षा प्रतिबंध, सरकारी सेवा से स्थायी निष्कासन और फास्ट-ट्रैक न्यायालयों में समयबद्ध सुनवाई जैसी व्यवस्थाएं लागू की जानी चाहिए।परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए।यदिकिसी एजेंसी की लापरवाही सिद्ध होती है,तो केवल निचलेस्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों की भी व्यक्तिगत जवाबदेही तय करनी होगी।जब तक जवाबदेही ऊपर तक नहीं पहुंचेगी, तब तक सुधार केवल कागजों तक सीमित रहेगा।

साथियों, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश को अपने युवाओं का विश्वास वापस जीतना होगा।प्रत्येक पेपर लीक केवल एक परीक्षा रद्द नहीं करता, बल्कि यह संदेश देता है कि व्यवस्था अभी भी ईमानदार प्रतिभा की पूरी तरह रक्षा नहीं कर पा रही है। यदि यह विश्वास टूट गया, तो इसका प्रभाव आने वाले दशकों तक सटीकता से दिखाई देगा।आज आवश्यकता केवल नई घोषणाओं की नहीं, बल्कि कठोर क्रियान्वयन की है। भारत के पास तकनीक भी है, प्रशासनिक क्षमता भी और वैश्विक उदाहरण भी। अब आवश्यकता राजनीतिक इच्छाशक्ति,संस्थागत ईमानदारी और शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाने की है। यदि प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परिणाम घोषित होने तक प्रत्येक चरण को वैज्ञानिक, पारदर्शी, डिजिटल और जवाबदेह बनाया जाए, तो पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यह समझना होगा कि परीक्षा केवल अंक प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य का चयन तंत्र है। यदि यही व्यवस्था भ्रष्ट हो जाएगी, तो प्रशासन, शिक्षा, न्याय और विकास की पूरी नींव कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए पेपर लीक के विरुद्ध संघर्ष केवल परीक्षा बचाने का अभियान नहीं, बल्कि युवा प्रतिभा, सामाजिक न्याय और भारत के भविष्य की रक्षा का राष्ट्रीय संकल्प होना चाहिए। तभी प्रत्येक विद्यार्थी यह विश्वास कर सकेगा कि उसकी सफलता का आधार केवल उसकी मेहनत होगी, किसी लीक हुए प्रश्नपत्र या भ्रष्ट नेटवर्क का प्रभाव नहीं।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

भारत में अनेकों गाँव शहर बन गए,पर सरकारी रिकॉर्ड में गाँव ही हैँ, ऐसा क्यों?

भारत में अनेकों गाँव शहर बन गए,पर सरकारी रिकॉर्ड में गाँव ही हैँ, ऐसा क्यों?

ग्रामीण-शहरी वर्गीकरण की पुरानी व्यवस्था, मानकों पर पुनर्विचार कर संशोधन की तात्कालिक ज़रूरत -समग्र व्यापक विश्लेषण

गावों में बहुमंजिला इमारतें, औद्योगिक प्रतिष्ठान, निजी अस्पताल,शैक्षणिक संस्थान, बाजार, बैंकिंग सुविधाएँ,इंटरनेट कनेक्टिविटी, पक्की सड़कें और लाखों की आबादी मौजूद,इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में ग्राम के रूप में दर्ज?

संविधान के 73वें और 74वें संशोधन, अनुच्छेद 243-क्यू राज्य नगर पालिका अधिनियमों तथा जनगणना मानकों क़े ग्रामीण -शहरी प्रशासन क़े इन पारंपरिक मानकों को तात्कालिक संशोधन की जरूरत -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनी

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर भारत आज दुनियाँ के सबसे तेजी से शहरीकरण करने वाले देशों में शामिल है। देश के हजारों गाँव ऐसे हैं जो वास्तविकता में छोटे-बड़े शहरों का स्वरूप ग्रहण कर चुके हैं, वहाँ बहुमंजिला इमारतें, औद्योगिक प्रतिष्ठान, निजी अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, बाजार, बैंकिंग सुविधाएँ, इंटरनेट कनेक्टिविटी, पक्की सड़कें और लाखों की आबादी मौजूद है। इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में वे आज भी ग्राम के रूप में दर्ज हैं। इसके विपरीत कुछ क्षेत्रों में एक ही भौगोलिक क्षेत्र का एक भाग नगर परिषद अथवा नगर निगम में शामिल है जबकि दूसरा भाग ग्राम पंचायत के अधीन है। ऐसी स्थिति में एक ही क्षेत्र के नागरिकों को विकास योजनाओं बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के मामले में अलग-अलग व्यवहार का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति विकास नियोजन की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है और अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि गाँव और शहर निर्धारित करने के मानकों की व्यापक समीक्षा की जाए। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता के तौर पर गंभीरता से सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहूंगा क़ि मैंने कई शहरों में कई ऐसे स्थान देखें जहां पर रोड, नदी, नाले के इस तरफ शहर व उस तरफ गांव, जिससे वहां बिजली बिल, मकान टैक्स से लेकर जीवन शैली के हर स्टेज पर भेदभाव हो जाता है, वास्तव में किसी क्षेत्र को गाँव अथवा शहर घोषित करना केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है,बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव होते हैं। किसी क्षेत्र का दर्जा यह तय करता है कि वहाँ विकास योजनाएँ किस प्रकार लागू होंगी, किस प्रकार का स्थानीय प्रशासन कार्य करेगा, नागरिकों को कौन-कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध होंगीकिस प्रकार के कर लगाए जाएंगे,भूमि उपयोग की नीति क्या होगी तथा आधारभूत संरचना का विकास किस दिशा में होगा। यदि कोई क्षेत्र ग्राम पंचायत के अंतर्गत है तो उस पर ग्रामीण विकास कार्यक्रमों का प्रभाव अधिक रहता है, जबकि नगर परिषद, नगरपालिका अथवा नगर निगम क्षेत्र में शामिल होने पर शहरी विकास योजनाएँ, सीवरेज व्यवस्था,नगर परिवहन, स्मार्ट अवसंरचना औरनियोजित विकास जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होने लगती हैं। इसलिए यदि किसी क्षेत्र की वास्तविक स्थिति और सरकारी वर्गीकरण में अंतर हो तो उसका सीधा प्रभाव नागरिकों के जीवन स्तर और विकास के अवसरों पर पड़ता है।

साथियों, भारत में गाँव की कोई एक समान राष्ट्रीय कानूनी परिभाषा नहीं है। सामान्यतः गाँवों की पहचान राज्यों के राजस्व अभिलेखों और पंचायत कानूनों के आधार पर की जाती है। संविधान के भाग-IX तथा पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम पंचायतों का गठन किया जाता है और राज्य सरकारें अपने-अपने पंचायत अधिनियमों के अनुसार गाँवों का प्रशासन संचालित करती हैं।किसी क्षेत्र को सामान्यतः तब ग्रामीण क्षेत्र माना जाता है जब वह राजस्व अभिलेखों में गाँव के रूप में दर्ज हो, ग्राम पंचायत के प्रशासनिक क्षेत्र में आता हो तथा नगर निकाय की सीमा से बाहर स्थित हो। परंतु पिछले कुछ दशकों में अनेक ऐसे गाँव विकसित हुए हैं जहाँ कृषि गतिविधियों की जगह उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्र ने ले ली है, फिर भी उनका प्रशासनिक दर्जा नहीं बदला है।

साथियों, भारत में शहरों का वर्गीकरण मुख्यतःदोश्रेणियों में किया जाता है,वैधानिक शहर (स्टेटुटरी टाउन) और जनगणना शहर (सेंसस टाउन)। वैधानिक शहर वे होते हैं जिन्हें राज्य सरकार किसी कानून के अंतर्गत नगर निगम, नगर परिषद, नगरपालिका अथवा नगर पंचायत के रूप में अधिसूचित करती है। इनकी स्थापना राज्य के नगर पालिका अधिनियमों केee अंतर्गत होती है और इनके गठन का अंतिम अधिकार राज्य सरकार के पास होता है। नगर निगम,नगर परिषद, नगरपालिका तथा नगर पंचायत इसी श्रेणी में आते हैं। किसी क्षेत्र की जनसंख्या, आर्थिक गतिविधियों, राजस्व क्षमता और नगरीय स्वरूप को देखते हुए राज्य सरकारें ऐसे निकायों की स्थापना करती हैं।दूसरी ओर जनगणना शहर की अवधारणा भारत की जनगणना द्वारा विकसित की गई है। जनगणना के अनुसार यदि कोई क्षेत्र तीन निर्धारित मानकों को पूरा करता है तो उसे जनगणना शहर माना जाता है। पहला, उस क्षेत्र की आबादी कम से कम 5000 होनी चाहिए। दूसरा, वहाँ जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर होना चाहिए।तीसरा पुरुष मुख्य कार्यबल का कम से कम 75 प्रतिशत भाग कृषि के बजाय गैर-कृषि गतिविधियों में संलग्न होना चाहिए। इन मानकों को 1961 कीजनगणना के दौरान प्रमुख रूप से अपनाया गया था और आज भी काफी हद तक इन्हीं का उपयोग किया जाता है।

साथियों,यहीं से समस्या प्रारंभ होती है।1961 का भारत और 2026 का भारत पूरी तरह भिन्न हैं।छह दशक पहले देश की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि आधारित थी, औद्योगिकीकरण सीमित था,शहर अपेक्षाकृत छोटे थे और ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या का अनुपात बहुत अधिक था।आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। महानगरों का विस्तार कई किलोमीटर दूर तक हो चुका है। अनेक गाँव महानगरों के उपनगर बन चुके हैं। लाखों लोग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हुए प्रतिदिन शहरों में जाकर रोजगार करते हैं। सेवा क्षेत्र,सूचना प्रौद्योगिकी डिजिटल अर्थव्यवस्था और आधुनिक परिवहन ने ग्रामीण एवं शहरीe जीवन के बीच की पारंपरिक दूरी को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। ऐसे में केवल जनसंख्या, घनत्व और गैर-कृषि रोजगार के आधार पर किसी क्षेत्र की वास्तविक प्रकृति का निर्धारण करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

साथियों, भारत के संविधान में ग्रामीण और शहरीस्थानीय निकायों के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था की गई है। वर्ष 1992 में लागू 73वें संविधान संशोधन ने पंचायत राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। इसके माध्यम से ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद जैसी संस्थाओं को सशक्त बनाया गया। इसी प्रकार 74वें संविधान संशोधन द्वारा शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई, जिसके अंतर्गत नगर पंचायत, नगरपालिका और नगर निगम जैसी संस्थाओं को संवैधानिक आधार मिला। संविधान का अनुच्छेद 243-क्यू नगर पंचायतों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों के गठन से संबंधित है। इस अनुच्छेद के अनुसार राज्य सरकारें स्थानीय परिस्थितियों, जनसंख्या, आर्थिक गतिविधियों, राजस्व क्षमता और नगरीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किसी क्षेत्र को शहरी निकाय के रूप में अधिसूचित कर सकती हैं। यद्यपि संविधान ने व्यापक ढाँचा उपलब्ध कराया है, फिर भी शहर घोषित करने का अंतिम अधिकार राज्यों के पास है। प्रत्येक राज्य के नगर पालिका अधिनियम में नगर पंचायत, नगरपालिका अथवा नगर निगम के गठन के लिए अलग-अलग मानदंड निर्धारित हो सकते हैं।सामान्यतः जनसंख्या जनसंख्या घनत्व, स्थानीय राजस्व, औद्योगिक एवं व्यावसायिक गतिविधियाँ, नगरीय अवसंरचना तथा प्रशासनिक आवश्यकता जैसे तत्वों को ध्यान में रखा जाता है। इसी कारण विभिन्न राज्यों में समान जनसंख्या वाले क्षेत्रों का दर्जा सटीक रूप से अलग- अलग हो सकता है।
साथियों, जब किसी क्षेत्र का प्रशासनिक वर्गीकरण उसकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता तो अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। सबसे पहली समस्या विकास निधि के आवंटन की होती है। शहर जैसी आबादी और आवश्यकताओं वाले क्षेत्रों को भी शहरी विकास योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप वहाँ सड़क, जल निकासी, सीवरेज, सार्वजनिक परिवहन और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन जैसी सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता। दूसरी ओर ग्राम पंचायतों की वित्तीय और प्रशासनिक क्षमता इतनी नहीं होती कि वे तेजी से बढ़ते नगरीय क्षेत्रों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। इसके अतिरिक्त अनियोजित निर्माण, अवैध कॉलोनियों का विकास और भूमि उपयोग संबंधी अव्यवस्था भी बढ़ जाती है।ऐसे क्षेत्रों में प्रशासनिक भ्रम भी देखने को मिलता है। कई बार एक ही सड़क के दोनों ओर अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाएँ लागू होती हैं। एक ओर नगर परिषद की सीमा होती है तो दूसरी ओर ग्राम पंचायत का क्षेत्र। परिणाम स्वरूप नागरिकों को कर व्यवस्था, भवन निर्माण अनुमति, जलापूर्ति, संपत्ति पंजीकरण और अन्य सेवाओं में असमानता का सामना करना पड़ता है। निवेशकों के लिए भी ऐसी स्थिति अनिश्चितता पैदा करती है, क्योंकि भूमि उपयोग और विकास नियम स्पष्ट नहीं होते।

साथियों, इस संदर्भ में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या यह स्थिति विकासात्मक भेदभाव का उदाहरण है। कानूनी दृष्टि से इसे प्रत्यक्ष भेदभाव नहीं कहा जा सकता क्योंकि सरकारें वर्तमान कानूनों और अधिसूचनाओं के आधार पर कार्य करती हैं। फिर भी नीति निर्माण की दृष्टि से यह अवश्य कहा जा सकता है कि यदि कोई क्षेत्र वास्तविक रूप से शहरी बन चुका है और फिर भी उसे शहरी विकास योजनाओं तथा अवसंरचना निवेश से वंचित रखा जाता है तो वहाँ के नागरिक विकास के समान अवसरों से वंचित रह जाते हैं। इसलिए यह स्थिति विकासात्मक असमानता का रूप सटीकता से अवश्य धारण कर लेती है।
साथियों, विशेषज्ञों का मानना है कि अब गाँव और शहर के निर्धारण के लिए नए और आधुनिक मानकों की आवश्यकता है। केवल जनसंख्या और रोजगार आधारित मानक आज की जटिल सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाते। भविष्य में निर्मित क्षेत्र (बिल्ट- अप एरिया), भूमि उपयोग का स्वरूप, आर्थिक एकीकरण, प्रतिदिन शहरों में आने-जाने वाले लोगों की संख्या, परिवहन संपर्क, डिजिटल कनेक्टिविटी, जल एवं सीवरेज सुविधाओं की उपलब्धता तथा पर्यावरणीय वहन क्षमता जैसे मानकों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इससे किसी क्षेत्र की वास्तविक प्रकृति का अधिक वैज्ञानिक आकलन संभव होगा।डिजिटल युग में उपग्रह चित्रों, ड्रोन सर्वेक्षण और भू-स्थानिक सूचना प्रणाली के उपयोग से यह कार्य और अधिक सरल हो सकता है। उपग्रह आधारित विश्लेषण से यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि किसी क्षेत्र में निर्माण गतिविधि कितनी बढ़ चुकी है, कृषि भूमि का कितना हिस्सा शहरी उपयोग में परिवर्तित हो चुका है तथा वहाँ की जनसंख्या का घनत्व और आर्थिक गतिविधियाँ किस स्तर तक पहुँच चुकी हैं। यदि प्रत्येक पाँच वर्ष में ऐसे वैज्ञानिक सर्वेक्षण किए जाएँ तो ग्रामीण और शहरी वर्गीकरण को अधिक यथार्थवादी बनाया जा सकता है। विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह सुधार अत्यंत आवश्यक है। आज भारत के अनेक तथाकथित गाँव आर्थिक दृष्टि से शहर बन चुके हैं,जबकि कई छोटे शहर अब महानगरीय क्षेत्रों का हिस्सा बन गए हैं। ऐसी स्थिति में 1961 के मानकों पर आधारित वर्गीकरण व्यवस्था भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं दिखाई देती। विकास संसाधनों का न्यायसंगत वितरण, नियोजित शहरीकरण, बेहतर स्थानीय प्रशासन और संतुलित क्षेत्रीय विकास तभी संभव होगा जब ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की परिभाषाओं को आधुनिक वास्तविकताओं के अनुरूप पुनर्परिभाषित किया जाए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यह कहा जा सकता है कि भारत में गाँव और शहर के निर्धारण की वर्तमान प्रणाली ने दशकों तक प्रशासनिक स्थिरता प्रदान की है, किंतु बदलते समय में इसकी व्यापक समीक्षा अपरिहार्य हो गई है। संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन, अनुच्छेद 243-क्यू , राज्य नगर पालिका अधिनियमों तथा जनगणना मानकों ने अब तक ग्रामीण- शहरी प्रशासन की आधारशिला रखी है, लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि इन पारंपरिक मानकों के साथ आधुनिक तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक संकेतकों को भी जोड़ा जाए। तभी भारत के वास्तविक शहरीकरण को सही पहचान मिल सकेगी और विकास का लाभ प्रत्येक नागरिक तक समान रूप से पहुँच सकेगा।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

फिर सुलग़ रही खाड़ी: होर्मुज जलडमरूमध्य बंद,दुनियाँ में हड़कंप-भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर मंडराता संकट? -व्यापक समग्र विश्लेषण

फिर सुलग़ रही खाड़ी: होर्मुज जलडमरूमध्य बंद,दुनियाँ में हड़कंप-भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर मंडराता संकट? -व्यापक समग्र विश्लेषण

गोंदिया/महाराष्ट्र

होर्मुज जलडमरूमध्य बंद से केवल क्षेत्रीय नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका की संभावना?, इस जलमार्ग में व्यवधान का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर दिखाई देता है

ईरान नें होर्मुज जलडमरूमध्य बंद से ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार मुद्रास्फीति और आर्थिक स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं

वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बन गया है। 11 जून 2026 को स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ईरान ने अमेरिका के साथ बढ़ते सैन्य टकराव के बीच दुनियाँ के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य, को सभी वाणिज्यिक जहाजों और तेल टैंकरों के लिए बंद करने की घोषणा कर दी। ईरानी सैन्य नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश करने वाले किसी भी जहाज को निशाना बनाया जाएगा। यह कदम कथित रूप से अमेरिका और ईरान के बीच समुद्री टकराव तथा अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों के बाद उठाया गया है। इसके साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी बेचैनी फैल गई है। ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 95.40 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई लगभग 92.6 डॉलर प्रतिबैरल तक पहुंच गया है। दुनियाँ की लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति इसी मार्ग से गुजरती है, इसलिए इस घटनाक्रम ने ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, मुद्रास्फीति और आर्थिक स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत ने भी खाड़ी क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर बढ़ते हमलों और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताव्यक्त की है।

वर्तमान घटनाक्रम केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह बिल्कुल सही है क़ि होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा व्यवस्था की धुरी माना जाता है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, इराक और ईरान जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों के निर्यात का मुख्य रास्ता है। सामान्य परिस्थितियों में प्रतिदिन करोड़ों बैरल तेल और विशाल मात्रा में एलएनजी इसी मार्ग से दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचती है। यही कारण है कि जब भी इस जलमार्ग में व्यवधान आता है, उसका असर सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर दिखाई देता है। वर्तमान संकट में भी निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों ने आपूर्ति बाधित होने की आशंका को देखते हुए तेल खरीदना शुरू कर दिया,जिसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में तत्काल उछाल देखने को मिला।

साथियों, अंतरराष्ट्रीय बाजारों की पहली प्रतिक्रिया तेल कीमतों में तेजी के रूप में सामने आई है। ब्रेंट क्रूड लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है जबकि डब्ल्यूटीआई भी 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि जलडमरूमध्य लंबे समय तक बंद रहता है या सैन्य संघर्ष और बढ़ता है तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर भी जा सकती हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी अस्थिरता बढ़ने की आशंका है क्योंकि ऊर्जा लागत लगभग हर आर्थिक गतिविधि को प्रभावित करती है।

साथियों, भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी आवश्यकता का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से पूरा होता है और उसका एक बड़ा भाग होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। इसलिए इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट का सीधा असर भारतीय ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। यदि तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा,चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है। ऊर्जा आयात पर बढ़ती लागत अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचती है और महंगाई को बढ़ावा देती है।सबसे पहला प्रभाव पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने से भारतीय तेल विपणन कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। यदि मौजूदा तनाव कुछ और दिनों या सप्ताहों तक बना रहता है तो पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का अनुमान है कि लंबी अवधि तक ऊंचे तेल मूल्य बने रहने पर ईंधन की कीमतों में कई रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका सीधा असर आम नागरिकों, किसानों, उद्योगों और परिवहन क्षेत्र पर पड़ेगा।पेट्रोल और डीजल केवल वाहन चलाने का साधन नहीं हैं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं। डीजल की कीमत बढ़ने का अर्थ है कि ट्रकों, बसों और मालवाहक वाहनों की परिचालन लागत बढ़ जाएगी। जब परिवहन महंगा होता है तो फल, सब्जियां, दूध, अनाज, दवाइयां और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। यही कारण है कि तेल कीमतों में वृद्धि को अक्सर ‘महंगाई की जननी’ कहा जाता है। एक बार यदि ईंधन लागत बढ़ती है तो उसका असर अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र में सटीकता से दिखाई देता है।

साथियों, 7 जून 2026 से मृग लग गया है व खेती के कार्य शुरू हो चुके हैं,कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहेगा। भारत में सिंचाई, कृषि मशीनरी और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला का बड़ा हिस्सा डीजल पर निर्भर है। डीजल महंगा होने से किसानों की लागत बढ़ेगी और इसका असर खाद्यान्न कीमतों पर पड़ सकता है। इसके अलावा उर्वरक उद्योग प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर निर्भर है। यदि ऊर्जा लागत बढ़ती है तो उर्वरकों का उत्पादन भी महंगा हो सकता है।विमानन क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ सकता है। विमान ईंधन की लागत एयरलाइंस के कुल खर्च का बड़ा हिस्सा होती है। यदि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई किराए में वृद्धि संभव है। इससे पर्यटन उद्योग, व्यापारिक यात्राओं और विमानन क्षेत्र की मांग पर असर पड़ सकता है।

साथियों, भारत के लिए चिंता का एक और बड़ा विषय एलएनजी यानी तरल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति है। भारत कतर सहित खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में एलएनजी आयात करता है और उसका महत्वपूर्ण हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। यदि इस मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान रहता है तो सीएनजी और पीएनजी की उपलब्धता तथा कीमतों पर असर पड़ सकता है। इससे घरेलू उपभोक्ताओं के साथ- साथ बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण और औद्योगिक इकाइयों की लागत भी बढ़ सकती है।हालांकि स्थिति गंभीर है, लेकिन भारत पूरी तरह असहाय नहीं है। पिछले वर्षों में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद हैं जिनका उपयोग आपातकालीन परिस्थितियों में किया जा सकता है।विशाखापट्टनम मैंगलोर और पादुर जैसेस्थानों पर स्थापित भूमिगत भंडारण सुविधाएं सीमित अवधि के लिए देश को राहत प्रदान कर सकती हैं। ये भंडार किसी भी अचानक आपूर्ति संकट के दौरान महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित हो सकते हैं।इसके अतिरिक्त भारत नेऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। रूस से बढ़ते तेल आयात ने भारत को एक वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत उपलब्ध कराया है। रूस से आने वाला तेल सामान्यतः अन्य समुद्री मार्गों से आता है, इसलिए होर्मुज संकट की स्थिति में यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। यदि आवश्यकता हुई तो भारत रूस तथा अन्य गैर-खाड़ी आपूर्ति कर्ताओं से आयात बढ़ाने की दिशा में सटिका से कदम उठा सकता है।

साथियों, सऊदी अरब,यूएई और अन्य खाड़ी देशों के पास भी कुछ वैकल्पिक पाइपलाइन मार्ग उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से सीमित मात्रा में तेल निर्यात किया जा सकता है। हालांकि ये मार्ग होर्मुज के पूर्ण विकल्प नहीं हैं, फिर भी वे वैश्विक बाजार में आपूर्ति के पूर्ण ठहराव को रोकने में मदद कर सकते हैं। इसी कारण ऊर्जा बाजारों में अभी भी आशा बनी हुई है कि राजनयिक प्रयासों के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकेगा।भू-राजनीतिक दृष्टि से यह संकट केवल तेल या गैस तक सीमित नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व समुद्री व्यापार के सबसे संवेदनशील मार्गों में से एक है। इसके बंद होने से बीमा लागत, माल ढुलाई शुल्क और शिपिंग समय में वृद्धि होती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक कंपनियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। कोविड-19 महामारी और यूक्रेन संकट के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही आपूर्ति व्यवधानों का अनुभव कर चुकी है; ऐसे में होर्मुज संकट नई चुनौतियां पैदा कर सकता है।

साथियों, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि क्षेत्र में बढ़ते हमले और समुद्री असुरक्षा वैश्विक व्यापार तथा भारतीय नागरिकों दोनों के लिए चिंता का विषय हैं। भारत की प्राथमिकता अपने नागरिकों, व्यापारिक जहाजों और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसलिए नई दिल्ली स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक समाधान का समर्थन कर रही है।वर्तमान परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह संकट कितने समय तक चलता है। यदि राजनयिक प्रयास सफल होते हैं और जलडमरूमध्य जल्द खुल जाता है तो तेल बाजारों में स्थिरता लौट सकती है। लेकिन यदि सैन्य टकराव बढ़ता है या मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका लग सकता है। तेल की कीमतें तीन अंकों तक पहुंच सकती हैं, महंगाई बढ़ सकती है और कई आयात- निर्भर देशों को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना केवल पश्चिम एशिया का संकट नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, महंगाई, समुद्री सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता,सभी इस एक समुद्री मार्ग से जुड़े हुए हैं। भारत के लिए यह समय ऊर्जा स्रोतों में विविधता, रणनीतिक भंडारों के विस्तार और दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयासों को और तेज करने का है।आने वाले दिनों में दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया पर टिकी रहेंगी, क्योंकि होर्मुज की स्थिति केवल तेल की कीमतों का नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता का भी निर्धारण करेगी।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

अखबार में खाना परोसने वालों की अब खैर नहीं।

अखबार में खाना परोसने वालों की अब खैर नहीं।

फूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड्स (पैकेजिंग) रेगुलेशन 2018 (सुरक्षा मानक खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम,2006) – अखबार में भोजन या खाद्य सामग्री परोसी तो कार्रवाई होगी -एफएसएसएआई की चेतावनी का समग्र व्यापक विश्लेषण

अखबार में भोजन या खाद्य सामग्री परोसने का खतरा: एफएसएसएआई की चेतावनी, सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती और सुरक्षित खाद्य संस्कृति की आवश्यकता

खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) नियम, 2018 के अंतर्गत अखबारों अथवा अन्य अनधिकृत सामग्रियों का उपयोग भोजन रखने,लपेटने या परोसने के लिए नहीं किया जा सकता

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर खाद्य सुरक्षा आज केवल एक स्वास्थ्य संबंधी विषय नहीं रह गई है,बल्कि यह मानव जीवन, आर्थिक विकास,सामाजिक स्थिरता और सतत विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुकी है। जिस प्रकार स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु और सुरक्षित आवास मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक हैं, उसी प्रकार सुरक्षित भोजन भी स्वस्थ जीवन की आधारशिला है। यदि भोजन ही दूषित हो जाए तो वह पोषण का स्रोत बनने के बजाय बीमारी का कारण बन जाता है। हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा जारी की गई चेतावनी ने खाद्य सुरक्षा के एक ऐसे पहलू को उजागर किया है जिसे आमतौर पर लोग सामान्य और हानिरहित मान लेते हैं। एफएसएसएआई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अखबार में भोजन पैक करना या परोसना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।

मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया सिटी सहित भारत के हर शहर में यह देखते आ रहा हूं क़ि दशकों से भारत के अनेक हिस्सों में समोसा,पकौड़े, वड़ा- पाव, जलेबी, पराठा और अन्य खाद्य पदार्थों को अखबार में लपेटकर देने की परंपरा रही है। कई लोगों को यह सामान्य और सुविधाजनक लग सकता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है। एफएसएसएआई की चेतावनी केवल एकप्रशासनिक निर्देश नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।यह सलाह उस समय जारी की गई जब मुंबई में एक वड़ा-पाव विक्रेता द्वारा भोजन को अखबार में पैक और परोसने का मामला सामने आया। घटना के बाद एफएसएसएआई के पश्चिमी क्षेत्रीय कार्यालय और ग्रेटर मुंबई नगर निगम ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए खाद्य विक्रेताओं को निर्देश जारी किए। यह घटना केवल मुंबई तक सीमित नहीं है। भारत के लगभग सभी राज्यों में छोटी- बड़ी खाद्य दुकानों पर आज भी अखबारों का उपयोग भोजन लपेटने के लिए किया जाता है। कई बार ग्राहक भी इसे सामान्य मानकर स्वीकार कर लेते हैं, जबकि इसके पीछे छिपे स्वास्थ्य जोखिमों से अनजान रहते हैं।यही कारण है कि हर वर्ष विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाकर सरकारों, नियामक संस्थाओं, उद्योगों और नागरिकों को खाद्य सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दूषित भोजन के कारण दुनिया भर में करोड़ों लोग बीमार पड़ते हैं और लाखों लोगों की मृत्यु तक हो जाती है।बैक्टीरिया, वायरस,परजीवी,रसायन और भारी धातुएं खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करके गंभीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न कर सकती हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां सड़क किनारे खाद्य विक्रेताओं से लेकर बड़े रेस्तरां और खाद्य उद्योग तक करोड़ों लोगों को प्रतिदिन भोजन उपलब्ध कराते हैं।

साथियों, वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो अखबारों में उपयोग की जाने वाली मुद्रण स्याही भोजन के संपर्क में आने के लिए नहीं बनाई जाती। समाचार पत्रों को छापने में विभिन्न प्रकार के रसायनों, पिगमेंट, सॉल्वेंट, बाइंडर और भारी धातुओं का उपयोग किया जाता है। इनमें सीसा (लेड), कैडमियम और अन्य रासायनिक तत्व शामिल हो सकते हैं। जब गर्म, तेलीय या नमी युक्त खाद्य पदार्थ सीधे अखबार के संपर्क में आते हैं, तो इन रसायनों के भोजन में स्थानांतरित होने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि खाद्य वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से अखबार में भोजन परोसने का विरोध करते रहे हैं।सीसा जैसे भारी धातु मानव शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक माने जाते हैं। इनके लंबे समय तक सेवन से तंत्रिका तंत्र, मस्तिष्क, यकृत, गुर्दे और रक्त निर्माण प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। बच्चों में सीसा विषाक्तता का प्रभाव और भी गंभीर होता है क्योंकि इससे उनकी मानसिक एवं शारीरिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है।गर्भवती महिलाओं में भी ऐसे रसायनों का प्रभाव भ्रूण के विकास पर पड़ सकता है। इसलिए खाद्य सुरक्षा केवल तत्काल बीमारी से बचाव का विषय नहीं है बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य संरक्षण का भी मुद्दा है।

साथियों, अखबार से जुड़ा दूसरा बड़ा खतरा स्वच्छता का है। अखबार छपाई के बाद विभिन्न स्थानों से होकर गुजरते हैं। उन्हें गोदामों में रखा जाता है, परिवहन के दौरान अनेक लोगों द्वारा छुआ जाता है और वितरण के दौरान विभिन्न प्रकार की धूल, गंदगी तथा रोगाणुओं के संपर्क में आते हैं। कई बार अखबार जमीन पर रखे जाते हैं या अस्वच्छ वातावरण में संग्रहित होते हैं। ऐसे में उन पर बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्मजीव मौजूद हो सकते हैं। यदि इन्हीं अखबारों में भोजन लपेटा जाता है तो रोगाणु भोजन तक पहुंच सकते हैं और उपभोक्ताओं को बीमार कर सकते हैं।

साथियों, विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि खाद्य जनित रोग विश्व स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं।साल्मोनेला, ई- कोलाई, लिस्टेरिया और नोरोवायरस जैसे रोगजनक सूक्ष्मजीव दूषित भोजन के माध्यम से फैल सकते हैं। इनके कारण दस्त, उल्टी, पेट दर्द, बुखार और गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती होने तक की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों, बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह खतरा और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए भोजन की तैयारी, भंडारण, परिवहन और परोसने की प्रत्येक प्रक्रिया में सुरक्षा मानकों का पालन आवश्यक है।एफएसएसएआई ने अपनी चेतावनी में यह भी स्पष्ट किया है कि खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) नियम, 2018 के अंतर्गत अखबार या अन्य गैर- अनुमोदित सामग्री में भोजन रखने,लपेटने या परोसने की अनुमति नहीं है। यह नियम केवल औपचारिकता नहीं बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान और स्वास्थ्य सुरक्षा के सिद्धांतों पर आधारित है। पैकेजिंग सामग्री को खाद्य-ग्रेड होना चाहिए ताकि वह भोजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया न करे और उसमें कोई हानिकारक तत्व न छोड़े। यही कारण है कि विकसित देशों में खाद्य पैकेजिंग के लिए अत्यंत कठोर मानक लागू किए जाते हैं।

साथियों, भारत में खाद्य व्यवसायों का दायरा अत्यंत व्यापक है। इसमें सड़क किनारे के विक्रेता, छोटे रेस्तरां, होटल, कैटरिंग सेवाएं, क्लाउड किचन, क्विक सर्विस रेस्तरां, हॉकर और मोबाइल फूड वेंडर शामिल हैं। एफएसएसएआई की सलाह इन सभी पर समान रूप से लागू होती है। यह संदेश स्पष्ट है कि चाहे व्यवसाय छोटा हो या बड़ा, उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराना उसकी जिम्मेदारी है। आर्थिक सुविधा या पारंपरिक आदतों के नाम पर स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जा सकता।खाद्य सुरक्षा का विषय केवल नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है उपभोक्ताओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि ग्राहक स्वयं अखबार में पैक भोजन लेने से इंकार करें और सुरक्षित पैकेजिंग की मांग करें, तो बाजार में सकारात्मक परिवर्तन तेजी से आ सकता है। उपभोक्ता जागरूकता अक्सर कानूनों से अधिक प्रभावी साबित होती है क्योंकि बाजार अंततः उपभोक्ता की मांग के अनुसार स्वयं को ढालता है।बता दें,आज विश्व भर में टिकाऊ और सुरक्षित पैकेजिंगसमाधानों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या को देखते हुए जैव-अवक्रमणीय पर्यावरण-अनुकूल और खाद्य- ग्रेड पैकेजिंग सामग्री विकसित की जा रही है। भारत भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। बायो-बेस्ड पैकेजिंग, खाद्य- ग्रेड पेपर,बांस आधारित सामग्री और अन्य नवीन विकल्प खाद्य उद्योग में लोकप्रिय हो रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण ही नहीं बल्कि उपभोक्ताओं की स्वास्थ्य सुरक्षा भी है।

साथियों, हाल के वर्षों में खाद्य सुरक्षा के प्रति भारत का दृष्टिकोण अधिक सख्त और वैज्ञानिक हुआ है।एफएसएसएआई नियमित रूप से निरीक्षण, परीक्षण और जागरूकता कार्यक्रम संचालित कर रहा है। मई महीने में एक वायरल वीडियो के बाद ट्रेन संख्या 12223 लोकमान्य तिलक टर्मिनस-एर्नाकुलम दुरंतो एक्सप्रेस में बर्तनों की अस्वच्छ हैंडलिंग के आरोपों पर आईआरसीटीसी को कानूनी नोटिस जारी किया जाना इसी दिशा में उठाया गया कदम था। यह दर्शाता है कि नियामक संस्थाएं अब खाद्य सुरक्षा संबंधी शिकायतों को गंभीरता से ले रही हैं और जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही हैं।रेलवे, हवाई अड्डों, स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक आयोजनों में भोजन की सुरक्षा विशेष महत्व रखती है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में लोगों को भोजन परोसा जाता है। यदि किसी एक स्थान पर स्वच्छता मानकों की अनदेखी होती है तो उसका प्रभाव हजारों लोगों पर पड़ सकता है। इसलिए खाद्य सुरक्षा का सिद्धांत फार्म टू फोर्क अर्थात खेत से थाली तक प्रत्येक चरण में लागू होना चाहिए।
साथियों, वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में भी सुरक्षित और पौष्टिक भोजन को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। खाद्य सुरक्षा का संबंध केवल बीमारी रोकने से नहीं बल्कि गरीबी उन्मूलन, बेहतर स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण जीवन और आर्थिक उत्पादकता से भी है। बीमारियों के कारण स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है, कार्य क्षमता घटती है और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसलिए सुरक्षित भोजन में निवेश वास्तव में मानव पूंजी में निवेश है।भारत जैसे देश में जहां स्ट्रीट फूड संस्कृति अत्यंत लोकप्रिय है, वहां संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। स्ट्रीट फूड भारतीय खानपान की पहचान है और लाखों लोगों की आजीविका का स्रोत भी है। उद्देश्य इसे समाप्त करना नहीं बल्कि इसे अधिक सुरक्षित और स्वच्छ बनाना है। प्रशिक्षण, जागरूकता, सस्ती खाद्य-ग्रेड पैकेजिंग की उपलब्धता और नियमित निगरानी के माध्यम से इस क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि एफएसएसएआई की अखबार में भोजन न परोसने संबंधी चेतावनी हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि खाद्य सुरक्षा छोटे-छोटे व्यवहारों से शुरू होती है। जो चीजें वर्षों से सामान्य लगती रही हों, वे वैज्ञानिक परीक्षणों में असुरक्षित सिद्ध हो सकती हैं। इसलिए परंपरा से अधिक महत्व विज्ञान और स्वास्थ्य को दिया जाना चाहिए। सुरक्षित भोजन प्रत्येक नागरिक का अधिकार और प्रत्येक खाद्य व्यवसाय की जिम्मेदारी है। यदि सरकार, उद्योग, विक्रेता और उपभोक्ता मिलकर खाद्य सुरक्षा के सिद्धांतों का पालन करें, तो न केवल बीमारियों को रोका जा सकता है बल्कि एक स्वस्थ, उत्पादक और सुरक्षित समाज का निर्माण भी किया जा सकता है। विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस का वास्तविक उद्देश्य भी यही है कि भोजन केवल पेट भरने का माध्यम न रहे, बल्कि स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानव गरिमा का आधार बने।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026- एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड का रास्ता बंद करने की कवायद, भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए नई चुनौती?

अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026- एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड का रास्ता बंद करने की कवायद, भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए नई चुनौती?

अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 और भारत की वैश्विक रणनीति: क्या भारत पहले से कर रहा है संभावित झटके की तैयारी?

भारतीय मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, सेमीकंडक्टर मिशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण तथा वैश्विक सप्लाई चेन से भारतीय प्रतिभा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास।

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक प्रतिभा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आर्थिक राष्ट्रवाद के बीच अमेरिका की आव्रजन नीति एक नए निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। राष्ट्रपति ट्रम्प के सत्ता में लौटने के बाद अमेरिकी प्रशासन ने कानूनी आव्रजन कार्यक्रमों, विशेषकर एच-1बी वीजा प्रणाली, पर लगातार सख्ती का रुख अपनाया है। उच्च वेतन आधारित चयन प्रणाली की वकालत, वीजाआवेदनों की कड़ी जांच, रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में बाधाएं, विदेशी श्रमिकों की भर्ती पर बढ़ती निगरानी, अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता देने वाली नीतियां तथा विदेशी छात्रों के लिए उपलब्ध अवसरों को सीमित करने जैसे अनेक कदम इस व्यापक नीति परिवर्तन का हिस्सा माने जा रहे हैं। इसी क्रम में टेक्सास से रिपब्लिकन सांसद द्वारा अमेरिकी संसद में प्रस्तुत अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 ने वैश्विक स्तर पर बहस छेड़ दी है। यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है तो एच-1बी वीजा धारकों के लिए ग्रीन कार्ड प्राप्त करने का मार्ग अत्यंत कठिन हो जाएगा, वीजा अवधि घट सकती है, ओपीटी कार्यक्रम समाप्त हो सकता है और अमेरिका में कार्यरत लगभग 12 लाख भारतीय मूल के पेशेवरों तथा उनके परिवारों के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यह केवल एक आव्रजन सुधार प्रस्ताव नहीं, बल्कि अमेरिका की बदलती आर्थिक, राजनीतिक और श्रम नीति का प्रतीक माना जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि एच-1बी वीजा पिछले कई दशकों से अमेरिका की तकनीकी और नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। इस कार्यक्रम के माध्यम से अमेरिकी कंपनियां विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे क्षेत्रों में उच्च कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं। विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों ने इस कार्यक्रम का सबसे अधिक लाभ उठाया है।विश्व की प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों में कार्यरत हजारों भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, डेटा वैज्ञानिक और अनुसंधान विशेषज्ञ एच-1बी वीजा के माध्यम से अमेरिका पहुंचे हैं। यही कारण है कि एच-1बी वीजा में किसी भी प्रकार का परिवर्तन भारत के तकनीकी समुदाय और छात्रों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।

साथियों वैश्विक भू-राजनीति, आर्थिक राष्ट्रवाद और प्रतिभा आधारित प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अमेरिका द्वारा प्रस्तावित अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 केवल एक आव्रजन सुधार विधेयक नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैश्विक प्रतिभा प्रवाह, तकनीकी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार के पुनर्गठन के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेष रूप से भारत के संदर्भ में यह विधेयक अत्यंत महत्वपूर्ण है,क्योंकि एच- 1बी वीजा प्रणाली के सबसे बड़े लाभार्थियों में भारतीय पेशेवर शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपनाई गई अमेरिका फर्स्ट नीति, कानूनी और अवैध दोनों प्रकार के आव्रजन पर सख्ती,एच-1बी वीजानियमों की समीक्षा तथा अमेरिकी नौकरियों को प्राथमिकता देने की रणनीति ने भारत को यह संकेत पहले ही दे दिया था कि भविष्य में अमेरिकी श्रम बाजार भारतीय पेशेवरों के लिए पहले जैसा खुला नहीं रह सकता। यही कारण है कि भारत समानांतर रूप से अपने आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक विकल्पों को मजबूत करने में जुटा हुआ दिखाई देता है।
साथियों, रिपब्लिकन सांसद का तर्क है कि लगभग चार दशकों के इतिहास में एच-1बी कार्यक्रम का व्यापक दुरुपयोग हुआ है। उनके अनुसार अमेरिकी नियोक्ताओं ने कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर अमेरिकी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्र के कर्मचारियों के अवसरों को सीमित किया है। उनका दावा है कि कंपनियों ने कर्मचारियों की कथित कमी का हवाला देकर सस्ते विदेशी श्रमिकों को प्राथमिकता दी जबकि अनेक अमेरिकी नागरिक रोजगार और वेतन संबंधी चुनौतियों का सामना करते रहे। इसी सोच के आधार पर उन्होंने अमेरिकन व्हाइट- कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट प्रस्तुत किया है, जिसका घोषित उद्देश्य अमेरिकी व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है।इस विधेयक का सबसे विवादास्पद प्रावधान एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड तक पहुंचने के रास्ते को समाप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम है। वर्तमान व्यवस्था में एच-1बी धारक अमेरिका में कार्य करते हुए रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं। यही कारण है कि लाखों विदेशी पेशेवर अमेरिका में दीर्घकालिक करियर और पारिवारिक भविष्य की योजना बनाते हैं। प्रस्तावित कानून इस अवधारणा को बदलना चाहता है। इसके अनुसार एच-1बी वीजा केवल अस्थायी कार्य वीजा रहेगा और इसे स्थायी निवास प्राप्त करने के साधन के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इससे अमेरिका में बसने की आकांक्षा रखने वाले लाखों लोगों की योजनाओं पर सटीकता से गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
साथियों, विधेयक का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ड्यूल इंटेंट सिद्धांत को कमजोर करना है।वर्तमान प्रणाली में एच -1बी धारक अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करते हुए भविष्य में स्थायी निवास के लिए आवेदन कर सकते हैं। लेकिन प्रस्तावित व्यवस्था में आवेदक को यह साबित करना होगा कि उसका स्थायी निवास अमेरिका के बाहर है और वह अंततः अपने देश लौटने का इरादा रखता है। यह परिवर्तन अमेरिकी आव्रजन दर्शन में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि इससे एच-1बी वीजा का स्वरूप मूलतः अस्थायी रोजगार कार्यक्रम तकसीमित हो जाएगा।विधेयक में एच-1बी वीजा की अधिकतम अवधि छह वर्ष से घटाकर केवल दो वर्ष करने काप्रस्ताव भी शामिल है। वर्तमान में अधिकांश पेशेवर छह वर्षों तक अमेरिका में रहकर कार्य कर सकते हैं और ग्रीनकार्ड प्रक्रिया लंबित होने की स्थिति में अतिरिक्त विस्तार भी प्राप्त कर सकते हैं। यदि नई व्यवस्था लागू होती है तो कंपनियों के लिए दीर्घकालिक प्रतिभा प्रबंधन कठिन हो सकता है। कर्मचारियों को भी अपने करियर और पारिवारिक निर्णयों को लेकर अधिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।

साथियों, एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव ग्रीन कार्ड प्रक्रिया लंबित रहने की स्थिति में मिलने वाले वीजा विस्तार को समाप्त करना है। आज अनेक भारतीय पेशेवर वर्षों तक ग्रीन कार्ड की प्रतीक्षा सूची में रहते हैं और इस दौरान एच-1बी विस्तार के माध्यम से अमेरिका में कार्य करते रहते हैं। प्रस्तावित कानून इस सुविधा को समाप्त कर सकता है। परिणामस्वरूप हजारों लोग ग्रीन कार्डस्वीकृत होने से पहले ही अमेरिका छोड़ने के लिए बाध्य हो सकते हैं। इस विधेयक का एक और महत्वपूर्ण आयामवैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण अर्थात ओपीटी कार्यक्रम को समाप्त करने का प्रस्ताव है। ओपीटी अमेरिकी विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करने वाले विदेशी छात्रों को डिग्री पूर्ण करने के बाद सीमित अवधि तक अमेरिका में कार्य करने का अवसर देता है। भारतीय छात्र इस कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल हैं। ओपीटी समाप्त होने की स्थिति में अमेरिकी शिक्षा प्राप्त करने वाले विदेशी छात्रों के लिए रोजगार के अवसर काफी सीमित हो सकते हैं। इससे अमेरिका की उच्च शिक्षा प्रणाली की वैश्विक आकर्षण क्षमता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।संसद और उनके समर्थकों का कहना है कि वर्तमान लॉटरी आधारित एच-1बी प्रणाली योग्यता और आर्थिक मूल्य के बजाय भाग्य पर आधारित है। इसलिए विधेयक में लॉटरी समाप्त कर उच्च वेतन वाली नौकरियों को प्राथमिकता देने का प्रस्ताव रखा गया है। इस मॉडल के समर्थकों का मानना है कि इससे केवल अत्यधिक कुशल और उच्च मूल्य वाले पेशेवरों को अवसर मिलेगा। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि इससे छोटे और मध्यम आकार के नियोक्ताओं के लिए प्रतिभाशाली विदेशी कर्मचारियों की भर्ती कठिन हो सकती है।ट्रंप प्रशासन के दौरान एच-1बी नीति को लेकर पहले भी अनेक सख्त कदम देखे गए थे और अब पुनः ऐसी चर्चाएं तेज हो गई हैं। अमेरिकी श्रम बाजार में घरेलू कर्मचारियों को प्राथमिकता देने,विदेशी श्रमिकों के वेतन मानकों को बढ़ाने, आवेदनों की जांच को कठोर बनाने तथा रोजगार-आधारित आव्रजन को सीमित करने जैसे विचार रिपब्लिकन राजनीति के एक प्रभावशाली वर्ग में लंबे समय से मौजूद रहे हैं। अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट इन्हीं विचारों का विधायी विस्तार माना जा रहा है।

साथियों, इस पूरे विवाद का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय समुदाय पर पड़ सकता है। भारत एच-1बी वीजा प्राप्त करने वाले देशों में लंबे समय से अग्रणी रहा है। अमेरिकी तकनीकी उद्योग में भारतीय इंजीनियरों और पेशेवरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बड़ी संख्या में भारतीय परिवारों ने अमेरिका में स्थायी भविष्य की योजना एच-1बी से ग्रीन कार्ड की पारंपरिक यात्रा के आधार पर बनाई है। यदि यह मार्ग सीमित या बंद हो जाता है तो लाखों लोगों की दीर्घकालिक योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।भारतीय छात्रों के लिए भी यह प्रस्ताव चिंता का विषय है। हर वर्ष हजारों छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं और ओपीटी तथा बाद में एच-1बी वीजा के माध्यम से अपने करियर की शुरुआत करते हैं। यदि ओपीटी समाप्त हो जाता है और एच-1बी प्राप्त करना अधिक कठिन हो जाता है, तो अमेरिका की तुलना में अन्य देशों जैसे कनाडा , ऑस्ट्रेलिया , यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी अधिक आकर्षक विकल्प बन सकते हैं।हालांकि यह समझना आवश्यक है कि यह अभी केवल एक प्रस्तावित विधेयक है। अमेरिकी विधायी प्रक्रिया में किसी भी बिल को कानून बनने के लिए प्रतिनिधि सभा, सीनेट और राष्ट्रपति की स्वीकृति सहित अनेक चरणों से गुजरना पड़ता है। इसलिए इसका अंतिम रूप वर्तमान प्रस्ताव से भिन्न भी हो सकता है। फिर भी इसने अमेरिकी आव्रजन नीति की दिशा को लेकर गंभीर बहस शुरू कर दी है। समर्थकों का मानना है कि यह कानून अमेरिकी श्रमिकों की रक्षा करेगा, वेतन स्तर बढ़ाएगा और घरेलू प्रतिभा को प्राथमिकता देगा। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि अमेरिका की तकनीकी श्रेष्ठता का एक बड़ा कारण दुनिया भर से प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करने की क्षमता रही है। यदि विदेशी पेशेवरों और छात्रों के लिए अवसर सीमित किए जाते हैं तो दीर्घकाल में अमेरिकी नवाचार क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अमेरिकन व्हाइट -कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 केवल एच-1बी वीजा सुधार का प्रस्ताव नहीं है,बल्कि यह अमेरिका में रोजगार, आव्रजन, राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और आर्थिक राष्ट्रवाद के बीच चल रही व्यापक बहस का प्रतिनिधित्व करता है। यदि यह विधेयक पारित होता है तो एच-1बी वीजा का स्वरूप मूल रूप से बदल सकता है और विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों, छात्रों तथा उनके परिवारों के लिएअमेरिका में अवसरों की संरचना नई चुनौतियों से भर सकती है। आने वाले महीनों में अमेरिकी कांग्रेस में इस विधेयक पर होने वाली चर्चा न केवल अमेरिका बल्कि वैश्विक प्रतिभा प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

तंबाकू,नशे का बदलता स्वरूप और आधुनिक दौर की चुनौती।

तंबाकू,नशे का बदलता स्वरूप और आधुनिक दौर की चुनौती।

आजतक राजनीतिक सामाजिक या व्यक्तिगत संगठनों द्वारा तंबाकू व नशीली चीजों के विरुद्ध उग्र आंदोलन क्यों नहीं चलाया यह विचारणीय प्रश्न ? क्या हम एक मूक सामूहिक हत्या के मूकदर्शक बने हुए हैं?

तंबाकू निषेध दिवस 31 मई 2026 मनाने क़े साथ शासन प्रशासन विद्यालयों, महाविद्यालयों, पंचायतों,नगर निकायों,सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, चिकित्सक समुदाय,मीडिया और राजनीतिक दलों को साथ मिलकर सशक्त राष्ट्रव्यापी उग्र तंबाकू निषेध आंदोलन चलाने की जरूरत?

तंबाकू निषेध नशा मुक्त भारत- अगर भ्रष्टाचार,आरक्षण, नागरिकता, कृषि कानून, क्षेत्रीय पहचान या सामाजिक न्याय के प्रश्न राष्ट्रीय बहस और जनआंदोलन का विषय बन सकते हैं, तो नशा मुक्त संपूर्ण क्रांति आंदोलन क्यों नहीं बना?

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर हर वर्ष 31 मई को पूरी दुनियाँ में वर्ल्ड नों टोबैक्को अर्थात विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। हर वर्ष इस अवसर पर भाषण होते हैं, शपथ ली जाती है, पोस्टर लगाए जाते हैं और तंबाकू के दुष्परिणामों पर चर्चा होती है।लेकिन एक कड़वा प्रश्न आज हमारे सामने खड़ा है,क्या केवल एक दिन का यह प्रतीकात्मक आयोजन उस भयावह महामारी को रोक सकता है जो प्रतिदिन लाखों लोगों के शरीर में कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों की घातक बीमारियों का जहर घोल रही है? भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में नागरिकता कानून,आरक्षण,भ्रष्टाचार,किसानों की समस्याएं,भाषा विवाद, जल-जंगल-जमीन के प्रश्न, मंडल -कमंडल की राजनीति, जनलोकपाल आंदोलन, महिला सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, महंगाई, बेरोजगारी और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे बड़े जनांदोलनों का रूप ले चुके हैं।सड़कों पर लाखों लोग उतरते हैं,संसद और विधान सभाओं में बहस होती है, सरकारें झुकती हैं और नीतियां बदलती हैं।परंतु मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र इस आर्टिकल का माध्यम से शासन प्रशासन व समाज से पूछना चाहता हूं कि तंबाकू, जो हर वर्ष लाखों परिवारों को उजाड़ देता है, आज भी उतना बड़ा राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन क्यों नहीं बन पाया? जब किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य तंबाकूजनित कैंसर से मरता है, जब किसी बच्चे का पिता गुटखा या सिगरेट के कारण असमय दुनियाँ छोड़ देता है, जब किसी मां की आंखों के सामने उसका जवान बेटा निकोटीन की लत का शिकार होकर जीवन हार जाता है, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती,बल्कि यह राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती है। मेरे अपने एक निकट संबंधी की मृत्यु भी तंबाकूजनित कैंसर के कारण हुई। ऐसे हजारों-लाखों परिवारों का दर्द यह संकेत देता है कि अब तंबाकू निषेध को केवल स्वास्थ्य अभियान नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलन का रूप देने की आवश्यकता है।

साथियों बात अगर हम तंबाकू व नशीली चीजों के खिलाफ़ बहुत बड़े आंदोलन की करें तो तंबाकू निषेध आंदोलन को इस तरह के आंदोलन समक़क्ष बनाने की जरूरत है जैसे भारतीय लोकतंत्र का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जब किसी मुद्दे को जनआंदोलन का रूप मिला, तब उसने सरकारों की नीतियों,कानूनों और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित किया। वर्ष 1974 का जेपी आंदोलन (संपूर्ण क्रांति आंदोलन), वर्ष 1990 का मंडल आयोग आरक्षण आंदोलन 1980 और 1990 के दशक का राम जन्मभूमि आंदोलन,वर्ष 2011 का अन्ना हजारे के नेतृत्व वाला भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आंदोलन, वर्ष 2019- 20 का नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी आंदोलन, वर्ष 2020-21 का कृषि कानूनों के विरुद्ध किसान आंदोलन, वर्ष 2015 और उसके बाद विभिन्न राज्यों में हुए पटीदार आरक्षण आंदोलन,जाट आरक्षण आंदोलन, मराठा आरक्षण आंदोलन, गुर्जर आरक्षण आंदोलन तथा हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों में जातीय, सामाजिक और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े आंदोलनों ने यह सिद्ध किया है कि संगठित जनदबाव लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।इन आंदोलनों ने न केवल राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया बल्कि सरकारों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए भी बाध्य किया। आज 30 मई 2026 से महाराष्ट्र में शुरू हुआ मनोहर जराँगे का मराठा आरक्षण आंदोलन सहित देश के अनेक हिस्सों में सामाजिक, जातीय और आरक्षण से जुड़े आंदोलन लगातार सुर्खियों में हैं, जो यह दर्शाते हैं कि जनता जब किसी विषय को अपने अस्तित्व, अधिकार या भविष्य से जोड़ लेती है तो वह एक विशाल जनशक्ति का रूप धारण कर लेता है। तो फिर तंबाकू व नशीली चीजों के विरुद्ध ऐसा आंदोलन किसी राजनीतिक सामाजिक या व्यक्तिगत संगठन में क्यों नहीं उठाया है यह विचारणीय प्रश्न है?

साथियों, पिछले एक दशक में नशे का स्वरूप तेजी से बदला है। कभी बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू की पुड़िया तक सीमित रहने वाला यह कारोबार अब अत्याधुनिक तकनीक के आवरण में युवाओं के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। ई- सिगरेट, वेप्स, निकोटीन पॉड्स, फ्लेवर्ड हुक्के, निकोटीन पाउच और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक धूम्रपान उपकरण आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक के रूप में प्रचारित किए जा रहे हैं। तंबाकू उद्योग ने समझ लिया है कि यदि उसे नई पीढ़ी को अपने जाल में फंसाना है तो उत्पाद का स्वरूप बदलना होगा। इसलिए आज कई वेपिंग उपकरण पेन ड्राइव, स्मार्ट गैजेट, इलेक्ट्रॉनिक पेन या स्टाइलिश एक्सेसरी जैसे दिखाई देते हैं। किशोर और युवा इन्हें आधुनिकता, स्वतंत्रता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक समझने लगते हैं। चॉकलेट, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, वनीला, मिंट और अन्य आकर्षक फ्लेवर के माध्यम से निकोटीन को मीठे जहर के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।यह रणनीति केवल व्यापारिकनहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है,क्योंकि स्वाद और आकर्षण के माध्यम से लत को आसान बनाया जाता है।

साथियों, सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन आधुनिक उत्पादों को अक्सर पारंपरिक सिगरेट से कम हानिकारक बताने का भ्रम फैलाया जाता है।अनेक युवा यह मान लेते हैं कि वेपिंग सुरक्षित है,जबकि वैज्ञानिक अध्ययनों ने संकेत दिया है कि ई-सिगरेट से निकलने वाला एयरोसोल निकोटीन सहित अनेक हानिकारक रसायनों से भरा होता है। निकोटीन स्वयं अत्यधिक नशे की लत पैदा करने वाला पदार्थ है। इसके अतिरिक्त कई उपकरणों में प्रयुक्त धातुओं, रसायनों और अन्य तत्वों के दीर्घकालिक प्रभाव अभी भी शोध का विषय हैं। इसलिए यह कहना कि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक धूम्रपान पूरी तरह सुरक्षित है, वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।वास्तव में यह नशे का नया मुखौटा है,जिसका उद्देश्य युवाओं को आकर्षित करना और बाजार का विस्तार करना है।तंबाकू और निकोटीन की इस महामारी का सबसे भयावह पक्ष यह है कि इसका शिकार केवल सेवन करने वाला व्यक्ति ही नहीं होता।पैसिव स्मोकिंग या अप्रत्यक्ष धूम्रपान उन लाखों निर्दोष लोगों की जान ले रहा है जिन्होंने कभी सिगरेट या तंबाकू को हाथ तक नहीं लगाया। घरों, कार्यालयों, रेस्तरां, सार्वजनिक स्थलों और वाहनों में छोड़ा गया धुआं आसपास मौजूद लोगों के शरीर में प्रवेश करता है।बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर स्वास्थ्य वाले व्यक्तियों पर इसका प्रभाव और भी गंभीर होता है। जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान करता है तो वह केवल अपने स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि दूसरों के स्वास्थ्य अधिकारों का भी उल्लंघन करता है। यही कारण है कि पैसिव स्मोकिंग को केवल व्यक्तिगत व्यवहार का प्रश्न नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक उत्तरदायित्व का विषय माना जाता है।

साथियों, कई विशेषज्ञों का मानना है कि पैसिव स्मोकिंग के कारण होने वाली मौतों को केवल दुर्घटना याव्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं कहा जा सकता। यह ऐसी स्थिति है जिसमें निर्दोष लोग दूसरों की आदतों के कारण बीमारी औरमृत्यु का शिकार बनते हैं। धुएं में हजारों प्रकार के रसायन पाए जाते हैं, जिनमें अनेक कैंसरकारी तत्व भी शामिल हैं। यही कारण है कि विश्वभर में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंध संबंधी कानून बनाए गए हैं। लेकिन कानून तभी प्रभावी होते हैं जब उनका कठोर और ईमानदार क्रियान्वयन हो। भारत में भी कई स्थानों पर धूम्रपान निषेध के नियम हैं, परंतु उनका पालन अभी भी चुनौती बना हुआ है।

साथियों, यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि तंबाकू विरोधी संघर्ष आज तक एक बड़े जनांदोलन का रूप क्यों नहीं ले पाया। इसका पहला कारण यह है कि तंबाकू तत्काल मृत्यु नहीं देता। सड़क दुर्घटना,हिंसा या प्राकृतिक आपदा की तरह इसका प्रभाव अचानक दिखाई नहीं देता। यह धीरे-धीरे शरीर को भीतर से नष्ट करता है। कैंसर, हृदय रोग और फेफड़ों की बीमारियां वर्षों में विकसित होती हैं। इसलिए जनता का आक्रोश कभी एक साथ विस्फोटक रूप में सामने नहीं आता। दूसरा कारण तंबाकू उद्योग का विशाल आर्थिक ढांचा है। खेती, उत्पादन, वितरण और कर राजस्व से जुड़े अनेक हित इसमें शामिल रहते हैं। तीसरा कारण सामाजिक स्वीकृति है। कई लोग तंबाकू सेवन को व्यक्तिगत पसंद का विषय मानते हैं, जबकि इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। चौथा कारण जागरूकता और क्रियान्वयन के बीच की दूरी है। कानून मौजूद हैं, चेतावनियां मौजूद हैं, लेकिन व्यवहार परिवर्तन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया है।
साथियों, भारत में तंबाकू और अन्य नशे के नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल स्वास्थ्य विभाग की नहीं है।इसमेंपुलिस विभाग, राज्य आबकारी विभाग,स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग,शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, नारकोटिक्स नियंत्रण एजेंसियां, स्थानीय निकाय, जिला प्रशासन और विभिन्न नियामक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। जिस प्रकार अवैध शराब से मौतों के मामलों में कई राज्यों में संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाती रही है, उसी प्रकार तंबाकू नियंत्रण कानूनों के प्रभावी पालन को लेकर भी जवाबदेही तय करने की आवश्यकता महसूस की जाती है। जब किसी क्षेत्र में खुलेआम प्रतिबंधित उत्पाद बिकते हैं,जब स्कूलों के आसपास तंबाकू की बिक्री होती है या जब सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान रोकने के नियम लागू नहीं होते, तब केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रभावी निगरानी, नियमित निरीक्षण, जनभागीदारी और उत्तरदायित्व की स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक है।

साथियों, आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नई पीढ़ी नशे को आधुनिकता और स्टेटस सिंबल के रूप में देखने लगी है। सोशल मीडिया,फिल्मों, डिजिटल संस्कृति और समूह दबाव के कारण कई किशोर यह मान बैठते हैं कि वेपिंग या धूम्रपान उन्हें अधिक आकर्षक, परिपक्व या आधुनिक बनाता है।वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। चिकित्सा विज्ञान यह संकेत देता है कि निकोटीन की लत मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकती है, विशेषकर किशोरावस्था में। कुछ मामलों में ई-सिगरेट से जुड़ी गंभीर फेफड़ों की बीमारियों की भी रिपोर्ट सामने आई हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष चिकित्सीय श्रेणियों में अध्ययन किया गया है। यह स्पष्ट है कि आधुनिक नशे का आकर्षक आवरण उसके भीतर छिपे जोखिमों को समाप्त नहीं करता।इसलिए अब आवश्यकता केवल जागरूकता की नहीं बल्कि सामाजिक चेतना के व्यापक पुनर्जागरण की है। स्कूलों और कॉलेजों में नशा विरोधी शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए। अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ खुलकर संवाद करना होगा। मीडिया को तंबाकू उद्योग के भ्रामक प्रचार का पर्दाफाश करना होगा। चिकित्सकों, शिक्षकों, धार्मिक नेताओं, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें तंबाकू सेवन सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं बल्कि स्वास्थ्य जोखिम के रूप में देखा जाए। जिस प्रकार स्वच्छता, बेटी बचाओ, पोलियो उन्मूलन और सड़क सुरक्षा जैसे अभियानों को जनभागीदारी के माध्यम से व्यापक सफलता मिली, उसी प्रकार तंबाकू निषेध को भी राष्ट्रीय जनअभियान का रूप दिया जा सकता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि विश्व तंबाकू निषेध दिवस का वास्तविक उद्देश्य केवल एक दिन जागरूकता फैलाना नहीं बल्कि पूरे वर्ष चलने वाली सामाजिक प्रतिबद्धता को मजबूत करना है। यदि हम तंबाकू और निकोटीन की बदलती रणनीतियों को नहीं समझेंगे,यदि हम आधुनिक नशे के मुखौटों को नहीं पहचानेंगे और यदि हम युवाओं को इसके जाल से बचाने के लिएसामूहिक प्रयास नहीं करेंगे,तो आने वाली पीढ़ियां इसकी भारी कीमत चुकाएंगी। तंबाकू विरोधी संघर्ष केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव गरिमा, सामाजिक न्याय, आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के संरक्षण का प्रश्न है। समय आ गया है कि इसे केवल एक स्मृति दिवस या सरकारी कार्यक्रम तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे एक सशक्त राष्ट्रीय जनचेतना आंदोलन बनाया जाए। क्योंकि नशा कभी शान नहीं हो सकता; यह व्यक्ति, परिवार और समाज की चेतना का क्षरण है। तंबाकू को ना कहना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और जिम्मेदार समाज के निर्माण की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

संसद का रण:महिला आरक्षण- सरकार का मास्टरस्ट्रोक रूल 66 की सियासी शतरंज।

संसद का रण:महिला आरक्षण- सरकार का मास्टरस्ट्रोक रूल 66 की सियासी शतरंज।

महाराष्ट्र/गोंदिया

विपक्ष को धर्मसंकट में डालने की रणनीति-विपक्ष की दुविधा:आगे कुआं,पीछे खाई-भारतीय संसद पर टिकी वैश्विक निगाहें

विपक्ष क़ा शाब्दिक हमला: चैरिटी बिगन्स एट होम- सत्ताधारी पार्टी संगठन और सरकार में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दें- प्रधानमंत्री पद भी रोटेशन के आधार पर महिलाओं क़ो दें- सदन में तीखी बहस और हंगामा

रूल 66 का निलंबन,संयुक्त मतदान, अधिसूचना का समय ये सभी कदम एक जटिल राजनीतिक शतरंज के हिस्से, जहां हर चाल का दूरगामी प्रभाव- कानून निर्माण केवल नीति नहीं,रणनीति,संख्या बल और समय प्रबंधन का मिश्रण बन चुका है-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर भारत की संसद में चल रहा 16 से 18 अप्रैल 2026भारतीय संसद का विशेष सत्र केवल एक सामान्य विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति के गहरे रणनीतिक, संवैधानिक और वैचारिक संघर्ष का प्रतीक बन गया।वर्तमान घटनाक्रम केवल एक घरेलू राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं,संवैधानिक व्याख्याओं और राजनीतिक रणनीति का ऐसा संगम बन गया है, जिसपर पूरी दुनियाँ की निगाहें टिकी हुई हैं।विशेष सत्र के दौरान केंद्र सरकार द्वारा तीन महत्वपूर्ण विधेयकों महिला आरक्षण (नारी शक्ति वंदन अधिनियम), परिसीमन (डेलिमिटेशन) और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े संशोधन को एक साथ पेश करना और फिर 16 अप्रैल 2026 को देर रात्रि रूल 66 को निलंबित करने का कदम भारतीय संसदीय इतिहास में एक असाधारण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।इसपर विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया, संसदीय नियमों का प्रयोग और रूल 66 का निलंबन इन सभी ने इस पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया।यह घटनाक्रम केवल कानून बनाने की प्रक्रिया नहीं है,बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच रणनीतिक टकराव,राजनीतिक गणित, और संवैधानिक व्याख्याओं का एक जटिल खेल बन चुका है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि सरकार ने जिन तीन विधेयकों को एक साथ पेश किया है, वे अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण हैं। पहला, नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण कानून), जो संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान करता है।दूसरा, परिसीमन विधेयक, जो लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्निर्धारण से जुड़ा है। तीसरा, केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित संशोधन विधेयक, जो प्रशासनिक और प्रतिनिधित्व संरचना को प्रभावित करता है।इन तीनों विधेयकों का एक साथ प्रस्तुत होना संयोग नहीं,बल्कि एक सुविचारित रणनीति प्रतीत होता है। सरकार का दावा है कि यह व्यापक सुधार का हिस्सा है, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक पैकेजिंग कह रहा है।


साथियों बात अगर हम रूल 66 क्या है और क्यों बना विवाद का केंद्र? इसको समझने की करेंतो लोकसभा की कार्यप्रणाली में रूल 66 एक तकनीकी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह नियम उन परिस्थितियों में लागू होता है, जब एक विधेयक दूसरे विधेयक पर निर्भर होता है। यदि आश्रित विधेयक पारित नहीं होता, तो मूल विधेयक भी निष्प्रभावी हो सकता है।सरकार ने इसी नियम को निलंबित करने का प्रस्ताव लाकर पूरे खेल की दिशा बदल दी सामान्यतःप्रत्येक विधेयक पर अलग- अलग चर्चा और मतदान होता है, जिससे सांसद अपनी स्वतंत्र राय दे सकते हैं। लेकिन ‘रूल 66’ के निलंबन के बाद यह बाध्यता समाप्त हो जाती है।इसका सीधा अर्थ यह है कि अब तीनों विधेयकों को एक साथ, एक ही प्रस्ताव के रूप में पारित कराया जा सकता।

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र


साथियों बात अगर हम सरकार का मास्टरस्ट्रोक: संयुक्त मतदान की रणनीति को समझने की करें तो सरकार ने जिस रणनीति का उपयोग किया है,उसेराजनीतिक विश्लेषक मास्टरस्ट्रोक कह रहे हैं।तीनों विधेयकों को एक ही प्रस्ताव में जोड़कर सरकार ने विपक्ष के लिए विकल्पों को सीमित कर दिया है।अब विपक्ष के सामने केवल दो ही रास्ते हैं,या तो तीनों विधेयकों के पक्ष में वोटकरें या तीनों के खिलाफ।यह रणनीति विपक्ष को एक धर्मसंकट में डालती है।यदि विपक्ष परिसीमन का विरोध करता है,तो उसे महिला आरक्षण के खिलाफ भी वोट देना पड़ेगा। और यदि वह महिला आरक्षण का समर्थन करता है, तो परिसीमन भी सटीक रूप से ही स्वतःपारित हो जाएगा।


साथियों बात अगर हम विपक्ष की दुविधा: आगे कुआं, पीछे खाई इसको समझने की करें तो,विपक्ष,विशेष रूप से इंडिया गठबंधन,इस स्थिति में फंस गया है जहां हर विकल्प राजनीतिक नुकसान की ओर ले जाता है।विपक्ष का रुख स्पष्ट है कि वह महिला आरक्षण के पक्ष में है, लेकिन परिसीमन को लेकर गंभीर आपत्तियां हैं,खासकर दक्षिण भारत के राज्यों के संदर्भ में।विपक्ष का तर्क है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करने से दक्षिणभारत के राज्यों को नुकसान होगा, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।ऐसे में सीटों का पुनर्वितरण उन्हें कम प्रतिनिधित्व की ओर ले जा सकता है। अब रूल 66 कैंसिल करने से विपक्ष को तीनों विधायकों को एक साथ मतदान करना पड़ेगा अगर वह यस में बदनाम करते हैं तो परिसीमन बिल भी पास होगा ना में मतदान करते हैं तो महिला आरक्षण का अपने आप ही विरोध होगा।
साथियों बात अगर हम संख्या बल का गणित: सरकार के सामने चुनौती इसको समझने की करें तो, संविधान संशोधन विधेयकों को पारित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है यानी उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन। लोकसभा में कुल 540 सीटें हैं, जिनमें से 3 खाली हैं। ऐसे में 360 वोटों की जरूरत होती है।एनडीए के पास लगभग 293 सांसद हैं, जो आवश्यक संख्या से काफी कम है। इस स्थिति में सरकार को या तो विपक्ष के कुछ सांसदों का समर्थन चाहिए या फिर अनुपस्थित रहने वाले सांसदों की संख्या बढ़ानी होगी, ताकि आवश्यक बहुमत का आंकड़ा कम हो सके।


साथियों बात अगर हम अधिसूचना विवाद: कानून लागू या बचाने की कोशिश? इसको समझने की करें तो इस पूरे घटनाक्रम का सबसे विवादास्पद पहलू है 16 अप्रैल 2026 को जारी की गई अधिसूचना, जिसके तहत 2023 में पारित संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम को लागू करने की तारीख तय की गई।यह अधिसूचना ऐसे समय पर जारी की गई,जब संसद में उसी कानून में संशोधन पर बहस चल रही थी। विपक्ष ने इसे आधी रात का फैसला और हताशापूर्ण प्रयास करार दिया है।कांग्रेस नेता ने इस कदम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि कोई कानून संशोधन के अधीन है, तो उसे बिना नए विधायी समर्थन के लागू करना संवैधानिक रूप से संदिग्ध है।उन्होंने ‘रूल 66’ का हवाला देते हुए कहा कि यदि आश्रित विधेयक पारित नहीं होता, तो मूल कानून भी निष्प्रभावी हो सकता है। ऐसे में नियम को निलंबित कर अधिसूचना जारी करना कानून को “बचाने” का प्रयास प्रतीत होता है।
साथियों बात अगर हम टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी का 17 अप्रैल 2026 को संसद में अपने विचारों के दौरान शाब्दिक हमला:चैरिटी बिगन्स एट होम इसको समझने की करें तो तृणमूल कांग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि महिला आरक्षण की बात करने से पहले भाजपा को अपने संगठन और सरकार में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना चाहिए।उन्होंने 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग करते हुए यह भी कहा कि मंत्रिमंडल और यहां तक कि प्रधानमंत्री पद भी रोटेशन के आधार पर महिलाओं को दिया जाना चाहिए। उनके इस बयान ने सदन में तीखी बहस और हंगामा पैदा कर दिया।
साथियों बात अगर हम परिसीमन विवाद: उत्तर बनाम दक्षिण का नया विमर्श इसको समझने की करें तो परिसीमन का मुद्दा भारत में लंबे समय से संवेदनशील रहा है। 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का निर्धारण स्थगित किया गया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहन मिल सके।अब जब परिसीमन की बात फिर उठी है, तो दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि उनकी सीटें कम हो सकती हैं, जबकि उत्तर भारत के राज्यों को लाभ मिल सकता है। यह विवाद क्षेत्रीय असंतुलन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नए सवाल खड़े करता है।


साथियों बात अगर हम लोकतंत्र बनाम रणनीति: क्या यह उचित है? इसको समझने की करें तो,इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या संसदीय नियमों का इस तरह उपयोग (या दुरुपयोग) लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?सरकार का तर्क है कि वह सुधारों को तेज़ी से लागू करना चाहती है और तकनीकी बाधाओं को हटाना आवश्यक है। वहीं विपक्ष का कहना है कि यह संसदीय प्रक्रिया को कमजोर करने और बहस को सीमित करने का सटीक रूप से प्रयास है।
साथियों बात अगर हम इस पूरे प्रकरण को वैश्विक परिप्रेक्ष्य: भारत की लोकतांत्रिक छवि पर असर इसको समझने की करें तो,भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है। ऐसे में संसद में होने वाली हर बड़ी घटना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बनती है।
यदि यह घटनाक्रम पारदर्शिता, बहस और सहमति के बिना आगे बढ़ता है, तो यह भारत की लोकतांत्रिक छवि को प्रभावित कर सकता है। वहीं,यदि सरकार सफलतापूर्वक इन सुधारों को लागू कर देती है, तो यह निर्णायक नेतृत्व का उदाहरण भी बन सकता है।


अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि सियासी शतरंज का निर्णायक मोड़,संसद में चल रहा यह संघर्ष केवल तीन विधेयकों का नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली,संवैधानिकमर्यादाओं और राजनीतिक रणनीति का परीक्षण है। रूल 66 का निलंबन, संयुक्त मतदान, अधिसूचना का समय ये सभी कदम एक जटिल राजनीतिक शतरंज के हिस्से हैं,जहां हर चाल का दूरगामी प्रभाव है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह रणनीति सरकार के लिए जीत का रास्ता बनती है या विपक्ष इसे लोकतांत्रिक मुद्दा बनाकर राजनीतिक लाभ उठाता है। लेकिन इतना तय है कि यह घटनाक्रम भारतीय संसदीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगा।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

ईरान-अमेरिका युद्धविराम 8 अप्रैल 2026- युद्धविराम या केवल रणनीतिक विराम।

ईरान-अमेरिका युद्धविराम 8 अप्रैल 2026- युद्धविराम या केवल रणनीतिक विराम।

गोंदिया/महाराष्ट्र

ईरान-अमेरिका युद्धविराम 8 अप्रैल 2026- युद्धविराम या केवल रणनीतिक विराम अस्थायी राहत, गहरी अनिश्चितता और वैश्विक शक्ति- संतुलन का जटिल समीकरण -समग्र विश्लेषण

युद्धविराम क़ा वैश्विक प्रभाव ऊर्जा,अर्थव्यवस्था और कूटनीति पर असर होगा जो आम जनता के लिए राहत की बात

वैश्विक समुदाय के लिए यह एक चेतावनी है कि केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि संवाद, सहयोग और समझ से ही स्थायी शांति संभव है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर 8 अप्रैल 2026 को पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया,जब डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ईरान के साथ दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम की घोषणा की गई। यह घोषणा चेतावनी की समय सीमा समाप्त होने के 90 मिनटपूर्व उस समय आई जब सैन्य टकराव अपने चरम पर था और सभ्यता के अंत जैसी कठोर चेतावनियां दी जा चुकी थीं। यद्यपि इस कदम से वैश्विक स्तरपर राहत की सांस ली गई,परंतु युद्धविराम के कुछ ही घंटों बाद ईरान की ऑयल रिफाइनरी में धमाका और खाड़ी देशों यूएई व कुवैत पर मिसाइल एवं ड्रोन हमले इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि यह शांति स्थायी नहीं बल्कि अत्यंत नाजुक है।

मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इस पूरे घटनाक्रम को समझना आवश्यक है, क्योंकि यह केवल दो देशों के बीच संघर्ष नहीं,बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, कूटनीतिक संतुलन,और क्षेत्रीय शक्ति समीकरणों का व्यापक प्रतिबिंबहै।अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह युद्धविराम मूलतः एक टैक्टिकल पॉज है, न कि स्थायी समाधान। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने स्पष्ट किया है कि यह युद्ध का अंत नहीं बल्कि वार्ता की संभावनाओं को खोलने के लिए लिया गया कदम है। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी सैन्य गतिविधियां पूरी तरह बंद नहीं होंगी,बल्कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उस पर हमले रुकते हैं या नहीं।इस प्रकार, यह युद्धविराम शर्तों पर आधारित है,एक ऐसा संतुलन जहां दोनों पक्ष अपनी सैन्य तैयारियों को बनाए रखते हुए कूटनीतिक संवाद का रास्ता तलाश रहे हैं। यही कारण है कि ईरान ने साफ कहा कि हमारे हाथ ट्रिगर पर हैं, जो इस समझौते की अस्थिरता को उजागर करता है।

साथियों बात अगर हम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: वैश्विक ऊर्जा राजनीति का केंद्र इसको समझने की करें तो इस पूरे संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पहलू स्ट्रैट ऑफ़ होर्मूज़ है, जिससे होकर विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है। अमेरिका की प्रमुख मांग रही है कि इस जलमार्ग को तुरंत और सुरक्षित रूप से खोला जाए।ईरान ने इस पर सैद्धांतिक सहमति तो दी है,लेकिन अपनी शर्तों के साथ,जिसमें उसकी सैन्य निगरानी औरतकनीकी नियंत्रण शामिल है। यह दर्शाता है कि ईरान इस जलमार्ग को केवल व्यापारिक मार्ग नहीं बल्कि एक रणनीतिक हथियार के रूप में देखता है।यदि होर्मुज बंद होता है, तो वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल, सप्लाई चेन बाधित होना, और आर्थिक अस्थिरता निश्चित है। इसीलिए इस जलमार्ग का खुलना पूरी दुनिया के लिए राहत का संकेत माना जा रहा है।

साथियों बात अगर हम ईरान की 10 शर्तें: शांति यारणनीतिक दबाव? इसको समझने की करें तो ईरान ने युद्धविराम को स्थायी शांति में बदलने के लिए 10 सूत्रीय प्रस्ताव रखा है,जो केवल सैन्य संघर्ष समाप्त करने तक सीमित नहीं बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक पुनर्संतुलन की मांग करता है। इन शर्तों में अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाना, जब्त संपत्तियों की वापसी, पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय सहायता, और क्षेत्रीय संघर्षों जैसे यमन, लेबनान, इराक—का स्थायी समाधान शामिल है। साथ ही, ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता भी जताई है, लेकिन इसके साथ यूरेनियम संवर्धन के अधिकार की बात भी रखी है।यहीं सबसे बड़ा विवाद उत्पन्न होता है। अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करना चाहता है, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है। फारसी और अंग्रेजी दस्तावेजों में यूरेनियम संवर्धन को लेकर अंतर इस वार्ता को और जटिल बनाता है।

साथियों बात अगर हम जमीनी हकीकत: युद्धविराम के बावजूद जारी हमले इसको समझने की करें तोयुद्धविराम की घोषणा के बावजूद, खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें लगातार आ रही हैं। इजराइल द्वारा ईरान पर हमले जारी रखना और ईरान की ओर सेजवाबी कार्रवाई इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तरपर स्थिति अभी भी नियंत्रण में नहीं है।यह विरोधाभास राजनीतिक घोषणाएं बनाम वास्तविक घटनाएं इस संघर्ष की जटिलता को उजागर करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि युद्ध केवल दो देशों तक सीमित नहीं बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष बन चुका है, जिसमें कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खिलाड़ीसटीक रूप से शामिल हैं।

साथियों बात अगर हम इस संपूर्ण मामले पर भारत की प्रतिक्रिया: संतुलित कूटनीति और मानवीय चिंता को समझने की करें तो,भारत ने इस युद्धविराम का स्वागत करते हुए इसे शांति की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत हमेशा से संवाद और कूटनीति का समर्थक रहा है।हालांकि, भारत की प्राथमिक चिंता अपने नागरिकों की सुरक्षा है। 8 अप्रैल 2026 को एम्बेस्सी ऑफ़ इंडिया इन तेहरान ने एक आपातकालीन एडवाइजरी जारी कर ईरान में रह रहे लगभग 9,000 भारतीयों से देश छोड़ने की अपील की।यह कदम दर्शाता है कि भारत स्थिति की गंभीरता को समझ रहा है और किसी भी संभावित खतरे से पहले अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालना चाहता है। यह प्रोएक्टिव डिप्लोमेसी का उदाहरण है।

साथियों बात अगर हम सीज़फायर के मुद्दे पर भारत में राजनीतिक प्रतिक्रिया: कूटनीति बनाम राजनीति को समझने की करें तो इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का प्रभाव भारत की आंतरिक राजनीति पर भी पड़ा है। महाराष्ट्र क्षेत्रीय पार्टी के एक नेता ने केंद्र सरकार और पीएम पर तीखा हमला करते हुए कहा कि भारत इस वैश्विक संकट में प्रभावी भूमिका निभाने में असफल रहा।उन्होंने पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता का हवाला देते हुए सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए। इसके जवाब में सत्ताधारी दल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि स्थिति की गंभीरता को समझना आवश्यक है और भारत अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार कार्य कर रहा है।यह बहस दर्शाती है कि विदेश नीति भी अब घरेलू राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी है।

साथियों बात कर हम सीजफायर क़े इस मुद्दे पर पाकिस्तान की भूमिका: कूटनीतिक अवसर या अतिशयोक्ति? इसको समझने की करें तो इस युद्धविराम में पाकिस्तानी पीएम और सेवा प्रमुख की भूमिका को लेकर चर्चा हो रही है। ट्रंप ने स्वयं दावा किया कि पाकिस्तान के अनुरोध पर उन्होंने सैन्य कार्रवाई रोकी फ़िर भी हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, लेकिन यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान इस स्थिति को एक कूटनीतिक अवसर के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है। इससे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में भी नए समीकरण बन सकते हैं।इसी बीच, भारत द्वारा पाकिस्तान सीमा के पास नोटम जारी करना और बंगाल की खाड़ी में जीएनएसएस (जीपीएस ) जैमिंग ट्रायल की योजना इस बात का संकेत है कि आधुनिक युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं रहा। सैटेलाइट सिग्नल को बाधित करने की क्षमता भविष्य के युद्धों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। यह कदम भारत की तकनीकी और सामरिक तैयारी को दर्शाता है, जो बदलते वैश्विक सुरक्षा वातावरण के अनुरूप है।

साथियों बात अगर हम इस पूरे मामले और सीज़ फायर को अंतरराष्ट्रीय परिपेक्ष में समझने की करें तो वैश्विक प्रभाव: ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और कूटनीति पर असर होगा इस संघर्ष का प्रभाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक है। ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार मार्ग, और वित्तीय बाजार—आल इंटरकनेक्टेड हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने या बंद होने का सीधा असर तेल की कीमतों और वैश्विकअर्थव्यवस्था पर पड़ता है।इसके अलावा, यह संघर्ष अमेरिका, ईरान, इजरायल, खाड़ी देशों और अन्य शक्तियों के बीच शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करता है। यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसका असर वैश्विक मंदी तक पहुंच सकता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अनिश्चित शांति और लंबी कूटनीतिक यात्रा 8 अप्रैल 2026 का यह युद्धविराम एक राहत अवश्य प्रदान करता है, लेकिन यह स्थायी शांति का संकेत नहीं है। ईरान और अमेरिका के बीच अविश्वास, परमाणु कार्यक्रम पर मतभेद, और क्षेत्रीय संघर्षों की जटिलता इस समझौते को बेहद नाजुक बनाती है।भारत जैसे देशों के लिए यह समय संतुलित कूटनीति, नागरिक सुरक्षा, और रणनीतिक तैयारी का है। वहीं, वैश्विक समुदाय के लिए यह एक चेतावनी है कि केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि संवाद, सहयोग और समझ से ही स्थायी शांति संभव है।इस प्रकार, यह युद्धविराम एक अंत नहीं बल्कि एक अंतराल है एक ऐसा अंतराल, जिसमें दुनिया को यह तय करना है कि वह संघर्ष की ओर बढ़ेगी या सहयोग की ओर बढ़ेगी।


संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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