देव स्नान पूर्णिमा पर 108 घड़ों के जल से हुआ महाप्रभु जगन्नाथ का शाही स्नान, 15 दिनों तक रहेंगे अणसर गृह में।

देव स्नान पूर्णिमा पर 108 घड़ों के जल से हुआ महाप्रभु जगन्नाथ का शाही स्नान, 15 दिनों तक रहेंगे अणसर गृह में।

सरायकेला/खरसावां

देव स्नान पूर्णिमा के पावन अवसर पर खरसावां के राजमहल परिसर स्थित जगन्नाथ मंदिर एवं हरिभंजा स्थित जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ 108 घड़ों के पवित्र जल से शाही स्नान कराया गया।

सोमवार सुबह वैदिक मंत्रोच्चारण, शंखनाद, मृदंग और अन्य वाद्य यंत्रों की मंगलध्वनि के बीच महाप्रभु के विग्रहों को रत्न सिंहासन से स्नान मंडप तक लाया गया। यहां राजपुरोहित अमुजाख्यो आचार्य एवं राजाराम शतपथी ने विधि-विधान से 108 घड़ों के जल से महाप्रभु का अभिषेक किया।

स्नान के उपरांत भगवान को सादे वस्त्र पहनाए गए तथा नित्य भोग अर्पित किया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार देव स्नान पूर्णिमा पर अत्यधिक स्नान के कारण भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें 15 दिनों के लिए अणसर गृह में विश्राम एवं उपचार हेतु रखा जाता है। इस अवधि में श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन नहीं होते।

रथयात्रा से पूर्व नेत्र उत्सव के दिन भगवान स्वस्थ होकर भक्तों को नवयौवन दर्शन देंगे। इसके बाद खरसावां नगर एवं हरिभंजा क्षेत्र में पारंपरिक उल्लास के साथ भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाएगी। इस अवसर पर रानी विजया देवी, राजकुमार गोपाल नारायण सिंहदेव, अमुजाख्यो आचार्य, विमला प्रसाद सांड़गी, राकेश दास, सुशील सांड़गी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

आसनबनी में जाताल पूजा संपन्न, अच्छी फसल और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना।

आसनबनी में जाताल पूजा संपन्न, अच्छी फसल और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना।

सरायकेला/चांडिल

चांडिल प्रखंड अंतर्गत आसनबनी गांव में आदिवासी परंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक जाताल पूजा श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। गांव के धार्मिक स्थल पर आयोजित इस पूजा में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भाग लिया तथा क्षेत्र की सुख-समृद्धि, अच्छी वर्षा और बेहतर फसल उत्पादन की कामना की।

इस अवसर पर गांव के पारंपरिक पुजारी उच्छप पहाड़िया एवं भूषण पहाड़िया ने संयुक्त रूप से पूजा-अर्चना कर प्रकृति, ग्राम देवता तथा पूर्वजों का स्मरण किया। पूजा के दौरान क्षेत्र की खुशहाली, किसानों की उन्नति, परिवारों की सुख-शांति तथा समाज में आपसी भाईचारे की भावना बनाए रखने की प्रार्थना की गई।

ग्रामीणों ने भी पूजा स्थल पर पहुंचकर माथा टेका और अपने परिवार की मंगलकामना की। जाताल पूजा आदिवासी मूलवासी समाज की एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा मानी जाती है। इस पूजा का उद्देश्य प्रकृति और देव शक्तियों के प्रति आभार व्यक्त करना तथा अच्छी खेती-बाड़ी और भरपूर उपज की कामना करना होता है।

ग्रामीण मान्यता के अनुसार इस पूजा से गांव में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है तथा प्राकृतिक आपदाओं और बीमारियों से भी सुरक्षा मिलती है। दलमा टाइगर सुकलाल पहाड़िया ने कहा कि आदिवासी समाज की परंपराएं प्रकृति संरक्षण और सामुदायिक एकता का संदेश देती हैं। ऐसी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित रखना समाज की जिम्मेदारी है।

मौके पर वार्ड सदस्य मलिंद्र उरांव,गुरुचरण कर्मकार, कर्णराज प्रमाणिक,सोनू पहाड़िया,भमर पहाड़िया, जितू पहाड़िया, बैद्यनाथ सिंह सरदार सहित कई गणमान्य ग्रामीण उपस्थित थे।

डाक्टर भूषण चन्द्र मुर्मू को भाजपा जिला महामंत्री बनाए जाने से ईचागढ़ के भाजपाइयों में खुशी का लहर।

डाक्टर भूषण चन्द्र मुर्मू को भाजपा जिला महामंत्री बनाए जाने से ईचागढ़ के भाजपाइयों में खुशी का लहर।

सरायकेला/ईचागढ़

सरायकेला-खरसावां जिला के ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र के भाजपा नेता डॉ भूषण चन्द्र मुर्मू को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने जिला महामंत्री नियुक्त किया है, जिससे ईचागढ़ के भाजपा कार्यकर्ताओं में काफी उत्साह है। भाजपा नेता अनिल सिंह, पूर्व मंडल अध्यक्ष फटीक चन्द्र गोराई, नकुल घोष, खगेन महतो सहित कई भाजपा नेता व कार्यकर्ताओं ने डाक्टर भूषण चन्द्र मुर्मू को महामंत्री बनाए जाने से बधाई दिया है।

वहीं श्री मुर्मू ने बताया कि पार्टी जिस विश्वास के साथ महामंत्री का दायित्व सौंपा है उसमें क्या उतरने का कोशिश किया जाएगा। उन्होंने कहा कि संगठन का विस्तार एवं सभी छोटे से बड़े कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने का कोशिश किया जाएगा। उन्होंने महामंत्री बनाए जाने पर प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू,प्रतिपक्ष के नेता बाबु लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा सहित तमाम पार्टी के सिर्ष नेतृत्व को धन्यवाद दिया है। उन्होंने कहा कि जिला में भाजपा संगठन को और अधिक मजबूत करना पहली प्राथमिकता होगी।

लेपाटॉंड़ में कलश स्थापना के साथ राम चरित मानस पाठ सह व्याख्या का शुभारम्भ।

लेपाटॉंड़ में कलश स्थापना के साथ राम चरित मानस पाठ सह व्याख्या का शुभारम्भ।

सरायकेला/ईचागढ़

प्रखण्ड क्षेत्र के लेपाटॉंड़ में तीन दिवसीय रामचरित मानस पाठ महायज्ञ हेतु शुक्रवार को भव्य कलश यात्रा निकाली गई। जिसमें गांव के 105 महिला श्रद्धालु कलश यात्रा में शामिल हुए और विधिवत पूजा अर्चना कर तीन दिवसीय रामचरित मानस पाठ महायज्ञ के लिए कलश स्थापित किया गया। पवित्र नदी से कलश में जल भरकर महिलाएं एवं कुंवारी लड़कियों ने कलश यात्रा के साथ यज्ञ स्थल पर पहुंचे और कलश स्थापना के साथ मानस महायज्ञ का शुभारंभ किया गया। ग्रामीण सह आयोजक समिति के सदस्य पशुपति बागची ने बताया कि प्रतिदिन संध्या 05 बजे से रामायण पाठ सह व्याख्या किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि राम चरित मानस पाठ सह महायज्ञ में व्यास आसन पर पशुपति पाण्डेय रहेंगे एवं साथ ही पंडित कालीपद महतो,मोहित गोप,बिष्णुपद चाटर्जी,दुर्गाचरण साहु और संजय पाण्डेय के द्वारा लगातार तीन दिन तक श्री श्री राम चरित मानस पाठ सह व्याख्या करेंगे। पुरे गांव में भक्ति भाव से तीन दिनों तक ग्रामीण सात्विकता का पालन करेंगे और गांव का वातावरण भक्तिमय रहेगा।

कलश विसर्जन यात्रा में उमड़ा जनसैलाब, महिलाओं ने भक्ति में झूमकर किया नृत्य।

कलश विसर्जन यात्रा में उमड़ा जनसैलाब, महिलाओं ने भक्ति में झूमकर किया नृत्य।

सरायकेला/चांडिल

चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के तिरुलडीह में आज श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब कलश विसर्जन यात्रा धूमधाम से निकाली गई। व्रतियों ने पूजन स्थल से कलश लेकर तिरुलडीह स्थित स्वर्णरेखा नदी की ओर प्रस्थान किया, जहां विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर कलश का विसर्जन किया गया।

इस दौरान भंडारे का भी आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। विसर्जन यात्रा में पुरुष, महिलाएं, वृद्ध और बच्चे सभी बढ़-चढ़कर शामिल हुए।

यात्रा के दौरान भक्तों ने भक्ति गीतों पर जमकर नृत्य किया और “जय श्री राम” के जयकारों से पूरा क्षेत्र गुंजायमान हो उठा। खासकर महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला, जो भक्ति में लीन होकर झूमते-गाते हुए नदी से अपने घरों की ओर रवाना हुईं। पूरा माहौल भक्तिमय और उल्लासपूर्ण बना रहा, जिसने क्षेत्र में धार्मिक आस्था और एकता की मिसाल पेश की।

पिलीद में त्रिदिवसीय हरिनाम संकीर्तन का हुआ आयोजन।

पिलीद में त्रिदिवसीय हरिनाम संकीर्तन का हुआ आयोजन।

सरायकेला/ईचागढ़

( मालखान महतो )

प्रखंड क्षेत्र के पिलीद गांव में त्रिदिवसीय हरिनाम संकीर्तन का आयोजन किया गया। जिसका जागरण रात्रि मंगलवार को हुआ।वही आयोजक समिति के सदस्य दिलीप कुमार दास ने बताया कि प्रति वर्ष कि भांति इस वर्ष भी पिलीद गांव में हरिनाम संकीर्तन महायज्ञ का आयोजन किया गया। जिसमें बंगाल,झारखण्ड के विभिन्न संकीर्तन मंडली भाग लिया।

उन्होंने बताया कि संकीर्तन मंडली में पंचानन पातर (पिलिद), गोपाल दास( चुनीडीह), ब्रजकिशोर दास( कालीमाटी), समीर मंडल( बानकुड़ा),वीणा रानी( पुरुलिया) और कुंजविहारी गोप( चिमटिया) ने तीन दिन तक लगातार हरी मंदिर में हरिनाम यज्ञ कर गांव के लोगों को भक्ति से मंत्रभक्त किया।

वहीं आजसू पार्टी के केंद्रीय महासचिव हरेलाल महतो मंदिर पहुँच कर माथा टेक कर क्षेत्र की खुशहाली के लिए मनोकामना किए। मौके पर आजसू प्रखंड अध्यक्ष गोपेश कुमार महतो, दिलीप दास, अजित प्रमाणिक,हाकीम चंद्र महतो, महेश्वर गोप सहित आयोजक समिति के सदस्य उपस्थित थे।

जगन्नाथपुर में भव्य श्रीकृष्ण मन्दिर निर्माण के लिए हुआ भूमिपूजन, शामिल हुए पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन।

जगन्नाथपुर में भव्य श्रीकृष्ण मन्दिर निर्माण के लिए हुआ भूमिपूजन, शामिल हुए पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन।

सरायकेला

भक्ति में ही शक्ति निहित है,पूजा अर्चना से जनता के काम के लिए मिलती है ऊर्जा: चंपाई सोरेन

श्री कृष्ण के तीन गुम्बद वाला बनेगा भव्य मंदिर,58 फिट लम्बाई,37 फिट चौड़ाई व 60 फिट ऊंचाई का होगा मन्दिर

सरायकेला प्रखंड के जगन्नाथपुर स्थित रांगाटांड मैदान में गुरुवार को भगवान श्री कृष्ण के भव्य मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन कार्यक्रम संपन्न हुआ. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व मुख्यमंत्री सह सरायकेला के स्थानीय विधायक चम्पाई सोरेन ने कहा बहुत खुशी की बात है कि आज अन्नपूर्णा पूजा के शुभ मुहूर्त पर जगन्नाथपुर में श्रीकृष्ण मन्दिर का भूमि पूजन हुआ. यह मंदिर पूरे जिले में भव्य मंदिर होगा और जल्द बनकर तैयार होगा इसके लिए हरसंभव सहयोग करेंगे. उन्होंने कहा भक्ति में ही शक्ति है और पूजा अर्चना से क्षेत्र के लोगो के लिए काम करने की नई ऊर्जा मिलती है. उन्होंने कहा मन्दिर निर्माण समेत अन्य सभी आपकी आशा आकांक्षाओं को पूर्ण किया जाएगा.

इससे पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन ने पंडित रामनाथ होता के मंत्रोच्चार के बीच नारियल फोड़ कर विधिवत मन्दिर निर्माण का भूमिपूजन किया. कार्यक्रम में समिति द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री समेत सभी अतिथियों का भव्य स्वागत किया गया. जानकारी हो वर्ष 2007 से क्षेत्रीय गौड़ समाज द्वारा जगन्नाथपुर के रांगाटांड में भव्य रूप से जन्माष्टमी मेला का आयोजन किया जा रहा है. कार्यक्रम में पहुंचे सभी भक्त श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद के रूप में खीर, खिचड़ी,सब्जी का वितरण किया.

पूरे क्षेत्र के लिए आस्था का केंद्र होगा श्रीकृष्ण मन्दिर: सोनाराम

विशिष्ट अतिथि जिला परिषद अध्यक्ष सोनाराम बोदरा ने कहा यह श्री कृष्ण मंदिर पूरे क्षेत्र के लिए भक्ति व आस्था का केंद्र है और जल्द मन्दिर निर्माण का कार्य पूरा किया जाएगा ताकि लोग भक्तिभाव से पूजा अर्चना कर सके.

श्री कृष्ण मंदिर निर्माण क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक होगा: पितोवास प्रधान

सम्मानीय अतिथि गौड़ सेवा संघ के केंद्रीय अध्यक्ष पितोवास प्रधान ने कहा सोलह कलाओं से परिपूर्ण सरायकेला के जगन्नाथपुर में श्रीकृष्ण मन्दिर का निर्माण ऐतिहासिक होगा. समारोह का संचालन उमाकांत प्रधान ने किया जबकि स्वागत भाषण देवीदत्त प्रधान ने दिया व धन्यवाद ज्ञापन हेमसागर प्रधान ने दिया।

दो वर्षों में तैयार होगा भव्य श्री कृष्ण मंदिर

मन्दिर निर्माण समिति के संकल्प के अनुसार जगन्नाथपुर में भव्य श्री कृष्ण मंदिर अगले दो वर्षों में पूरा होगा. श्री कृष्ण के तीन गुम्बद वाला भव्य मंदिर 58 फिट लम्बाई,37 फिट चौड़ाई व 60 फिट ऊंचाई का होगा. मन्दिर का पहला गुम्बद 58 फिट ऊंची,दूसरा गुम्बद 35 फिट व तीसरा गुम्बद 25 फिट का होगा.

ये सम्मानीय अतिथि थे उपस्थित

जिप सदस्य लक्ष्मी सरदार,पंस सदस्य अनिता प्रधान,वकील सोरेन,सनद आचार्य,लिपू मोहंती,बबलू सोरेन,गौड़ सेवा संघ के अध्यक्ष पितोवास प्रधान,महासचिव भास्कर महाकुड़,मनोज सिंहदेव,मायाधर बेहरा,काशीनाथ प्रधान,अशोक गोप,हरेकृष्ण प्रधान,मुरली प्रधान,सुधांशु प्रधान,परमेश्वर प्रधान व असीम प्रधान समेत अन्य अतिथि उपस्थित थे.

कार्यक्रम के सफल आयोजन में इनका योगदान रहा सराहनीय

श्रीकृष्ण जन्मोत्सव सह मन्दिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नागेश्वर प्रधान,सचिव हेमसागर प्रधान,कोषाध्यक्ष जगन्नाथ प्रधान,विष्णु प्रधान,उमाकांत प्रधान,तीर्थो प्रधान, पंचु महतो,सीताराम मंडल,देवीदत्त प्रधान, प्रधान,शम्भूनाथ प्रधान,ओमप्रकाश प्रधान,सागर प्रधान व टिंकू प्रधान समेत अन्य का कार्यक्रम के सफल आयोजन में सराहनीय योगदान रहा.

श्रीश्री मां शीतला मंदिर तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का हुआ समापन

श्रीश्री मां शीतला मंदिर तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का हुआ समापन

पूर्वी सिंहभूम/मुसाबनी

    मुसाबनी स्थित श्री श्री मां शीतला के मंदिर में शुक्रवार को तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का समापन विधि विधान पूर्वक पूजा अर्चना के साथ संपन्न हो गया। पूजा अर्चना एवं हवन धार्मिक अनुष्ठान का सफल आयोजन चेन्नई से आए हैं पंडितों द्वारा कराया गया। इस मौके पर भक्तों ने पूरे मंदिर परिषर की परिक्रमा की। पूजा अर्चना करने को लेकर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मंदिर में जुटने लगी थी। पूजा अर्चना के बाद भक्तों के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। इस मौके पर काफी संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।मन्दिर परिसर दक्षिण भारतीय वाद्य यंत्रों से गुंजायमान रहा।

    बंदना व सोहराई पर्व का रहा धुन, बैल खुंटान व अहीरा गीत पर झुमे ग्रामीण

    बंदना व सोहराई पर्व का रहा धुन, बैल खुंटान व अहीरा गीत पर झुमे ग्रामीण

    सरायकेला/ईचागढ़

    (मालखान महतो)

    ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र में बंदना व सोहराई पर्व की गुंज चारों ओर गुंजायमान है। दिपावली के बाद से ही अलग अलग दिनों में लगातार क्षेत्र में बंदना व सोहराई पर्व मनाया जा रहा है। बंदना पर्व के उपलक्ष्य में बिस्टाटांड़ गांव में ग्रामीण अहीरा गीत गाकर ढोल नगाड़े के जाप पर पुरे गांव का भ्रमण किया एवं बेल खुंटान का रस्म को भी किया गया। बैल को खुंटी में बांधकर ढोल नगाड़े बजाकर नचाया गया। हांलांकि बदलते परिवेश के साथ बैल खुंटान और अहीरा‌ गीत का प्रचलन विलुप्त होने के कगार‌ पर है। गाजे-बाजे और अहीरा गीत के साथ दीपावली के अमावस्या के रात से घर घर जाकर बैलों और पशुधनों को जगाया जाता था और खेती कार्य समाप्ति पर अपने पशुधनों को खुश करने के लिए सामुहिक रूप से अहीरा गीत गाकर रात जगा करते हैं। गाय बैलों व भैंसा का सिंग में तेल सिन्दूर लगाने का रिवाज आज भी किसान बखुबी निभाते हैं और बंदना और सोहराई पर्व को पारम्परिक रूप से मनाते हैं।

    छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी 19 अक्टूबर 2025 -अंधकार से प्रकाश, अहंकार से विनम्रता और नरक से मुक्ति का आध्यात्मिक पर्व

    छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी 19 अक्टूबर 2025 -अंधकार से प्रकाश, अहंकार से विनम्रता और नरक से मुक्ति का आध्यात्मिक पर्व

    नरक चतुर्दशी क़ो हम अपने भीतर की अंधकारमय प्रवृत्तियों, क्रोध, लोभ, द्वेष, असत्य, आलस्य और नकारात्मक विचारों का वध करने का संकल्प लेते हैं।

    आज का नरकासुर,पर्यावरण प्रदूषण, लालच आधारित अर्थव्यवस्था, असमानता, और मानसिक तनाव के रूप में हमारे जीवन को घेर रहा है। अब हमें पहले से भी अधिक प्रासंगिक होना है-एडवोकेट किशन सनमुखदासभावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

    गोंदिया/महाराष्ट्र

    वैश्विक स्तरपर भारत की सांस्कृतिक औरधार्मिक परंपराएँ विश्वभर में अपनी गहराई, आध्यात्मिकता और मानवता के संदेश के लिए जानी जाती हैं। दीपावली का पंचदिवसीय महापर्व केवल एक उत्सव नहीं बल्कि मानव जीवन के आत्मिक उत्थान का प्रतीक माना जाता है।इस पंचदिवसीय श्रृंखला का दूसरा दिन“छोटी दिवाली” या “नरक चतुर्दशी”कहलाता है।वर्ष 2025 में यह पावन दिवस 19 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन का महत्व केवल दीप प्रज्ज्वलन तक सीमित नहीं, बल्कि यह मानव जीवन के भीतर बसे अंधकार,नकारात्मकता और अहंकार को मिटाने का प्रतीकात्मक संदेश देता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह पर्व भारत ही नहीं,बल्कि विश्वभर में बसे भारतवंशियों के बीच भी समान श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। छोटी दिवाली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि यह मानवता के भीतर छिपे अंधकार,जैसे अहंकार, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध और मोह,पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।चूँकि हमें अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से जानना कि आखिर छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी क्यों कहा जाता है, इस दिन किसकी पूजा की जाती है और यह पर्व क्यों मनाया जाता है?

    एडवोकेट किशन सनमुखदासभावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र


    साथियों बात अगर हम छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी क्यों कहा जाता है,इसको जानने की करें तो अधर्म,अहंकार और अंधकार पर धर्म,नम्रता और प्रकाश की विजय का प्रतीक हैँ,छोटी दिवाली का नाम“नरक चतुर्दशी”इसलिए पड़ा क्योंकि यह दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध से जुड़ा हुआ है।हिंदूधर्मग्रंथों के अनुसार, नरकासुर नामक असुर ने अत्याचार और अधर्म का साम्राज्य स्थापित कर रखा था। उसने पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों को आतंकित कर रखा था। नारी की अस्मिता का अपमान, साधुओं का अपमान और दैवीय शक्तियों को चुनौती देना उसका स्वभाव बन गया था। अंततः भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार में,अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर उसका अंत किया।कहा जाता है कि जब नरकासुर का वध हुआ, तो उसने अंतिम समय में श्रीकृष्ण से वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु के दिन जो लोग स्नान और दीपदान करें, उन्हें नरक का भय न रहे। भगवान श्रीकृष्ण ने यह वरदान स्वीकार किया।तभी से यह दिन “नरक चतुर्दशी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसका अर्थ है, वह चतुर्दशी जो नरक से मुक्ति का मार्ग दिखाए।छोटी दिवाली इसीलिए कही जाती है क्योंकि यह मुख्य दिवाली के एक दिन पहले आती है, और इसमें दीप जलाने की परंपरा आरंभ हो जाती है। परंतु इसके पीछे का भाव कहीं अधिक गहरा है,यह दिन हमें सिखाता है कि असली नरक बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और असत्य के रूप में है। जब हम इनसे मुक्त होते हैं, तब सच्ची “छोटी दिवाली” हमारे जीवन में आती है-जब हम अपने भीतर के अंधकार को सटीक दूर कर आत्मिक प्रकाश जलाते हैं आधुनिक वैश्विक संदर्भ में यदि देखें तो “नरक चतुर्दशी” एक सार्वभौमिक संदेश देती है कि प्रत्येक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के भीतर जो अंधकार,अन्याय, हिंसा, लालच और भेदभाव,फैला हुआ है,उसे सत्य, सद्भाव और प्रकाश से मिटाना ही सच्चा उत्सव है। यह दिन हर व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि नरकासुर जैसी प्रवृत्तियाँ हर युग में मौजूद रहती हैं,बस उनके रूप बदलते रहते हैं। आज का नरकासुर पर्यावरण प्रदूषण,लालच आधारित अर्थव्यवस्था, असमानता, और मानसिक तनाव के रूप में हमारे जीवन को घेर रहा है। इसलिए छोटी दिवाली का संदेश आधुनिक समय में पहले से भी अधिक प्रासंगिक है।


    साथियों बात अगर हम नरक चतुर्दशी के दिन किसकी पूजा की जाती है, इसको समझने की करें तो,नरक चतुर्दशी के दिन तीन प्रमुख देवताओं की पूजा की परंपरा है,यमराज,भगवान श्रीकृष्ण,और देवी लक्ष्मी।(क)यमराज पूजा-इस दिन यमराज की पूजा का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर यमराज को दीपदान करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं सताता और उसे यमलोक का दर्शन नहीं करना पड़ता। इसे “यम दीपदान” कहा जाता है।घर के बाहरदक्षिण दिशा में एक दीप जलाकर कहा जाता है,”मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालिना श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥” इसका अर्थ है कि इस दीप के माध्यम से मैं यमराज को प्रसन्न कर उनसे दीर्घायु और सुखमय जीवन की प्रार्थना करता हूँ।(ख) श्रीकृष्ण पूजा-भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन अधर्म पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए उन्हें विजयी और धर्म के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। भक्त उनके चरणों में पुष्प, फल और दीप अर्पित करते हैं। उनके साथ देवी सत्यभामा की भी पूजा की जाती है, क्योंकि नरकासुर के वध में देवी का योगदान महत्वपूर्ण रहा था। (ग) लक्ष्मी पूजा और रूप चौदस-इस दिन “रूप चौदस” भी कहा जाता है। प्रातःकाल तेल स्नान, उबटन, और शुद्धिकरण के बाद सौंदर्य और स्वास्थ्य की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन स्नान और शुद्ध आचरण करता है, उसके शरीर और मन में दीर्घकालिक सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।रूप चौदस के दिन स्त्रियाँ और पुरुष दोनों अपने रूप, स्वास्थ्य और आभा की रक्षा के लिए स्नान, तेल, चंदन और सुगंधित वस्तुओं का उपयोग करते हैं। यह न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि यह शरीर से विषाक्त तत्वों को निकालने और त्वचा को स्वस्थ रखने का उपाय माना गया है।आधुनिक वैश्विक समाज में जहां “वेलनेस” और “मेंटल हेल्थ” की चर्चा प्रमुख हो गई है, नरक चतुर्दशी की यह परंपरा हमें यह बताती है कि आत्मिक और शारीरिक शुद्धता दोनों का संगम ही सच्चा स्वास्थ्य है।


    साथियों बात अगर हम नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है इसको समझने की करें तो,आत्मशुद्धि, पाप मुक्ति और प्रकाश की ओर मानव यात्रा का उत्सव हैँ,नरक चतुर्दशी का मुख्य उद्देश्य केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और पापमुक्ति का मार्ग है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन में हर मनुष्य से भूलें होती हैं, और उन भूलों से ऊपर उठने के लिए आत्मचिंतन, स्नान और दीपदान के माध्यम से हम भीतर का “नरक” साफ कर सकते हैं।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करता है, वह पापों से मुक्त होता है। इस स्नान को “अभ्यंग स्नान” कहा जाता है। यह केवल शारीरिक शुद्धि नहीं,बल्कि मानसिक और भावनात्मक शुद्धि का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि तेल से स्नान करने से शरीर से नकारात्मक ऊर्जा निकलती है, और मन में प्रकाश का प्रवेश होता है।नरक चतुर्दशी हमें यह सिखाती है कि हर व्यक्ति के भीतर दो शक्तियाँ होती हैं,एक अंधकारमय (नरकासुर जैसी) और दूसरी प्रकाशमय (कृष्ण जैसी)। इस दिन हम अपने भीतर की अंधकारमय प्रवृत्तियों,जैसे क्रोध, लोभ, द्वेष, असत्य, आलस्य और नकारात्मक विचारों का वध करने का संकल्प लेते हैं। जब व्यक्ति इस अंतर्द्वंद से ऊपर उठता है, तभी वह सच्चा “प्रकाश” प्राप्त करता है।आज जब पूरी दुनिया तनाव, असमानता,युद्ध औरआत्मकेंद्रित जीवनशैली से जूझ रही है, तब नरक चतुर्दशी जैसे पर्व वैश्विक समाज को यह प्रेरणा देते हैं कि आत्मशुद्धि, विनम्रता और प्रकाश की ओर बढ़ना ही मानवता का मार्ग है। यह केवल धार्मिक दिन नहीं बल्कि “स्पिरिचुअल रीसेट डे” कहा जा सकता है,जब हम अपने भीतर के अंधकार को पहचानते हैं और उसे मिटाने का संकल्प लेते हैं।


    साथियों बातें अगर हम छोटी दिवाली का सांस्कृतिक, सामाजिक और वैश्विक महत्व की करें तो,भारत में छोटी दिवाली का उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक एकता, पारिवारिक प्रेम और सामूहिक स्वच्छता का भी प्रतीक है। गाँवों और नगरों में लोग इस दिन अपने घरों की अंतिम सफाई करते हैं, मिट्टी के दीये जलाते हैं, और पड़ोसियों के साथ मिठाइयाँ बांटते हैं। यह पर्व समाज में “साझा प्रकाश” का संदेश देता है कि अंधकार केवल अपने घर से नहीं, पूरी बस्ती से मिटाना चाहिए।अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में छोटी दिवाली का संदेश सार्व भौमिक है,यह केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं। आज अमेरिका,ब्रिटेन,कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में बसे भारतीय समुदाय इस दिन न केवल दीप जलाते हैं बल्कि स्थानीय समाज को भी इसमें शामिल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपियन संसद और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ दीपावली को “ग्लोबल सेलिब्रेशन ऑफ़ लाइट ” के रूप में मान्यता दे चुकी हैं। ऐसी स्थिति में छोटी दिवाली का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह मुख्य दीपावली से एक दिन पहले मानवता के भीतर के नरक को मिटाने की तैयारी का दिन है।नरक चतुर्दशी का गूढ़ अर्थ केवल पौराणिक कथा तक सीमित नहीं है।“नरक”का अर्थ है,मानसिक पीड़ा,अवसाद,लालच,और वह अंधकार जो मनुष्य के भीतर उसे असत्य के मार्ग पर ले जाता है। “चतुर्दशी” का अर्थ है — पूर्णता के पूर्व की अवस्था, अर्थात् वह क्षण जब प्रकाश पूरी तरह प्रकट होने वाला है। इसलिए नरक चतुर्दशी का दिन आत्मिक परिवर्तन का समय है,जब मनुष्य अपने भीतर झाँककर कहता है:“अब मैं अंधकार से मुक्त होकर प्रकाश की ओर बढ़ूँगा।” यह आत्मसंवाद ही नरक चतुर्दशी का सार है। श्रीकृष्ण का नरकासुर वध केवल बाह्य घटना नहीं, बल्कि एक प्रतीक है,जब मनुष्य अपनी इच्छाओं और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करता है, तब वह “नरकासुर”का अंत करता है।


    अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि इस प्रकार छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी केवल दीपों का पर्व नहीं,बल्कि आत्मज्ञान, शुद्धि और अहंकार मुक्ति का दिन है। यह हमें सिखाती है कि असली उत्सव बाहर नहीं, भीतर मन में होता है। जब हम अपने भीतर के अंधकार को दूर करते हैं, तो पूरी दुनिया रोशन होती है।इस दिन किया गया दीपदान केवल घर के द्वार को नहीं, बल्कि आत्मा के द्वार को भी प्रकाशित करता है। यमराज की आराधना हमें मृत्यु का भय नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सजगता सिखाती है। श्रीकृष्ण की पूजा हमें धर्म की रक्षा और अन्याय के अंत का संदेश देती है, जबकि लक्ष्मी पूजा हमें सिखाती है कि सौंदर्य केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक पवित्रता में निहित है।छोटी दिवाली 2025 इसीलिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि मानवता को यह स्मरण कराने का अवसर है कि जब तक भीतर का अंधकार मिटेगा नहीं, तब तक बाहर के दीप अधूरे रहेंगे। यह पर्व विश्व के हर कोने में रहने वाले व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है,“हम अपने भीतर का नरकासुर समाप्त करें, तभी सच्ची दिवाली आएगी।”

    संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावानानी गोंदिया महाराष्ट्र

    दीपावली व धनतेरस को लेकर कोल्हान का सबसे बड़ा सप्ताहिक बाजार में जमकर हुई खरीदारी

    दीपावली व धनतेरस को लेकर कोल्हान का सबसे बड़ा सप्ताहिक बाजार में जमकर हुई खरीदारी

    सरायकेला/ईचागढ़

    (मालखान महतो)

    सरायकेला-खरसावां जिला के कुकड़ु प्रखंड क्षेत्र के कोल्हान का सबसे बड़ा कुकड़ू सप्ताहिक बाजार में शुक्रवार को दीपावली व धनतेरस को लेकर लोगों ने जमकर खरीदारी किया। मिट्टी के दीया, वर्तन एवं बकरों का दुकानों में काफी भीड़-भाड़ रहा। लोग गोवर्धन पूजा व गौ माता की पूजा के लिए भी सिंदुर एवं रंग बिरंगी रंगों और साजो समानों का खरीदारी किया। काली पूजा को लेकर बकरों का बिक्री पांच हजार से लेकर 15 हजार रुपए तक हुई। सप्ताहिक पशु व कृषि बाजार में अन्य सप्ताह के तुलना में काफी भीड़-भाड़ रहा। बाइक और चार पहिया वाहन रखने का तक जगह कम पड़ रहा था।

    वहीं ग्रामीणों ने बताया कि धनतेरस,काली पूजा एवं बांदना पर्व को लेकर मीट्टी का दीया, वर्तन,बांस के टोकरी ,झाड़ू ,सुप एवं पशु धनों के लिए साजो सामान का खरीदारी किया गया। मालूम हो कि कुकड़ू सप्ताहिक पशु व कृषि बाजार में झारखंड के अलावा बंगाल और बिहार के भी पशु व्यवसायिक , कपड़े व्यापारी आदि पहुंचते हैं। दीपावली को लेकर लोगों में खास उत्साह देखा गया।

    चीनी लाइटों और चीनी दीया से पारम्परिक स्वदेशी मीट्टी कारीगरों पर आ रही

    चीनी लाइटों और चीनी दीया से पारम्परिक स्वदेशी मीट्टी कारीगरों पर आ रही

    सरायकेला/ईचागढ़

    (मालखान महतो)

    पारम्परिक मीट्टी के दीए और दीवाली पर सजने वाले मीट्टी‌ के साजो सामान पर चीनी वस्तुओं से ग्रहण लग रहा है। जहां दीपावली में लोग मीट्टी के दीए से अपने घर और आंगन को सजाते थे, मीट्टी के बर्तनों का जमकर उपयोग किया जाता था,आज चीनी लाइटों, दीया और प्लास्टिक उत्पादों ने जगह बना ली, जिससे पारम्परिक स्वदेशी मीट्टी के वस्तुओं के निर्माता खास कर कुम्हारों की स्थिति दयनीय होते जा रहा है।

    ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र के नदीसाईं एवं बोड़ा गांव में आज भी पारम्परिक रूप से प्राचीन काल की तरह कुम्हार अपने चक्की को घुमाकर मीट्टी के दीए , वर्तन,हंडी आदि का निर्माण कर रहे हैं। आधुनिक तकनीकी के इस युग में भी कुम्हार आज भी पारम्परिक चक्की को लाठी के सहारे चलाकर जी तोड़ मेहनत कर मीट्टी का समानों का निर्माण कर अपने पारम्परिक कारीगरी को जिंदा रखे हुए हैं। ऐसे समय में चीनी लाइट, दीया व अन्य सामान मीट्टी के समानों का स्थान ले रहा है, जिससे पारम्परिक और मीट्टी का समान निर्माण करने वाले कारीगरों के सामने बड़ा चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इस दिवाली के लिए कुम्हार अपने पारम्परिक रूप से दीया व वर्तन आदि का निर्माण में लगे हुए हैं। रंजीत कुम्हार बताते हैं कि सरकारी सहायता के अभाव में आज के युग में भी पारम्परिक चक्की से मीट्टी का दीया व वर्तन का निर्माण किया जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि पुरे परिवार एक महीने से इस काम में लगे हुए हैं। दिवाली में बिकने वाले दीया पहले जैसा नहीं बिक रहा है। उन्होंने कहा कि अगर सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी और आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराई जाएगी तो कम समय में अधिक निर्माण होगा और आमदनी भी बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि ऐसा ही स्थिति रहा तो आने वाले समय में पारम्परिक मिट्टी का निर्माण बंद हो जाएगा, चुंकि आधुनिकता इस दौड़ में युवा वर्ग पुराने जमाने का निर्माण विधि को अपनाना नहीं चाहते हैं।

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