सरायकेला-खरसावां

राजकीय प्लस टू उच्च विद्यालय खरसावां के कुड़मालि विभाग द्वारा स्वतंत्रता सेनानी व हुल क्रांति के महानायक वीर शहीद चानकु महतो की 170 वीं शहादत दिवस श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर विभाग के छात्र-छात्राओं ने कुड़मालि शिक्षक सुनील कुमार जुरुआर के मार्गदर्शन एवं तत्वावधान में विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत वीर शहीद चानकु महतो के चित्र पर पुष्प अर्पित कर एवं श्रद्धांजलि देकर किया गया। इसके पश्चात विद्यार्थियों ने उनके जीवन, संघर्ष, वीरता एवं क्रांतिकारी योगदान पर विशेष चर्चा की गई।
इस अवसर पर अपने संबोधन में शिक्षक सुनील कुमार जुरुआर ने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी और हुल क्रांति के महानायक चानकु महतो क्या आंदोलन के कारण गोड्डा क्षेत्र में कई वर्षों तक ब्रिटिश सरकार को मालगुजारी लेना मुश्किल हो गया था। वहीं ब्रिटिश सरकार द्वारा बताए गए संथालों को ब्रिटिशों के खिलाफ लड़वाने और हौसला देने का काम इन्होंने ही प्रारंभ किया था।
क्रांति के महानायक चानकु महतो ने ही सबसे पहले “महतो-माझी भाई-भाई” जैसे नारा देकर हुल विद्रोह को मानते हुए अपने आंदोलन को पूरे साथियों के साथ संथाल विद्रोह में शामिल हो गए। सिद्धू कान्हु 30 जून 1855 को संथाल परगना के हजारों लोगों के साथ मिलकर एक जनसभा का आयोजन किए थे, जिसमें मुख्य रूप से क्रांति के महानायक चानकु महतो भी शामिल थे।
इस जनसभा में ब्रिटिशों के खिलाफ विद्रोह की ज्वाला धधक उठीं। कहा जाता है विद्रोह में हजारों आदिवासी मूलवासी मारे गए थे। परंतु नेतृत्वकर्ता चानकु महतो पुलिस के हथियार और पकड़ से बच निकले थे। इसके बाद 1855 के अक्टूबर महीने में सोनार चौक में जनसभा बुलाई गई। इसके मुख्यवक्ता चानकु महतो थे। इस कार्यक्रम की सूचना अंग्रेजों के चाटुकार नायब प्रताप नारायण ने उन तक पहुंचाने का काम किया था।
इस बार अंग्रेजी सेना बड़ी तैयारी के साथ चानकु महतो को पकड़ने के लिए जनसभा के चारों घेर लिया था। जनसभा को संबोधित करते हुए क्रांति के महानायक चानकु महतो ने युद्ध की घोषणा कर दिया। इस युद्ध में चानकु महतो घायल हो गए। परंतु साहस और पराक्रम के वीर चानकु महतो को उनके साथियों ने उन्हें ननिहाल बाड़ेडीह गांव में ले गए। जब अंग्रेजों को पता चला कि चानकु महतो अपने मामा घर में इलाजरत हैं।
उन्हें गिरफ्तार कर अंग्रेजी सिपाहियों ने कई दिनों तक क्रूरतापूर्वक यातनाएं दी। उसके बाद 15 में 1856 को गोड्डा के राज कचहरी स्थित कझिया नदी के किनारे उन्हें फांसी दे दी गई। इसके ऊपर अंग्रेजी सी इतने अधिक गुस्सा में थी कि फांसी देने का पश्चात बाड़ेडीह गांव को पूरी तरह से तहस-नहस कर जला दिया गया । इनकी शौर्यगाथा आज भी संथाल परगना के गांवों में सुनने को मिलता है। उनकी शहादत की स्मृति में आज भी कई घरों में उस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों ने वीर शहीद चानकु महतो के संघर्ष, बलिदान और देशभक्ति से प्रेरणा लेने तथा उनके आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
इस अवसर पर मुख्य रूप से राखी महतो, दीपा महतो, पुष्पा महतो, रंजना महतो, सिद्धि महतो, प्रियंका महतो, गोविंद महतो, खुशबू महतो, सावित्री महतो, रोमा महतो, आशा महतो, चांदनी महतो, सीमा महतो, पिंकी महतो, संदीप, सुदेश, प्रद्युम्न, परशुराम, रोहित, मनोज, जयराम आदि मुख्य रूप से उपस्थित थे।











