आर्थिक संकट से जूझ रहे राशन डीलर, लंबित कमीशन के भुगतान में हो रही आनाकानी : फूलकांत झा।
सरायकेला/गम्हरिया
झारखंड पीडीएस (PDS) संघ के प्रदेश सचिव, कोल्हान संयोजक एवं सरायकेला-खरसावां जिला अध्यक्ष फूलकांत झा ने जनवितरण प्रणाली (PDS) से जुड़े राशन डीलरों की गंभीर समस्याओं की ओर राज्य सरकार एवं खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग का ध्यान आकृष्ट कराया है।
फूलकांत झा ने कहा कि राज्य के अनेक राशन डीलरों का कमीशन पिछले लगभग एक वर्ष से लंबित पड़ा हुआ है, जिसके कारण वे गहरे आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। परिवार का भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा का खर्च तथा जनवितरण दुकान का संचालन करना उनके लिए दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि एक ओर विभाग द्वारा ई-केवाईसी शत-प्रतिशत पूरा कराने का लगातार दबाव बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर डीलरों के लंबित कमीशन के भुगतान को लेकर कोई स्पष्ट समय-सीमा या आश्वासन नहीं दिया जा रहा है। इसके बावजूद राशन डीलर कोल्हू के बैल की तरह लगातार मेहनत करते हुए समय पर लाभुकों तक राशन पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं और पूरी निष्ठा से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं।
फूलकांत झा ने आरोप लगाया कि विभागीय अधिकारियों का ध्यान केवल निरीक्षण, शिकायतों की समीक्षा एवं कार्रवाई तक सीमित होकर रह गया है, जबकि डीलरों की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए अपेक्षित पहल दिखाई नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि यदि झारखंड सरकार जनवितरण प्रणाली को पारदर्शी, सुदृढ़ और प्रभावी बनाना चाहती है, तो उसे राशन डीलरों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील होना होगा तथा लंबित कमीशन का शीघ्र भुगतान सुनिश्चित करना होगा।
उन्होंने अंत में कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में जनवितरण प्रणाली के डीलरों की स्थिति “पानी में मीन प्यासी” जैसी हो गई है। जो डीलर दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह मेहनत कर आम लोगों तक खाद्यान्न पहुंचा रहे हैं, वही आज अपने मेहनताने और अधिकार के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं।
गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर योग साधकों का सम्मान।
सरायकेला/आदित्यपुर
दिनांक 28 जुलाई 2026 को गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या के अवसर पर पतंजलि योग समिति एवं पतंजलि महिला योग समिति के संयुक्त तत्वावधान में सरायकेला-खरसावाँ जिले के आदित्यपुर स्थित विवेक विहार कॉलोनी कम्युनिटी हॉल में सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया।
इस अवसर पर योग के क्षेत्र में उत्कृष्ट एवं निःस्वार्थ सेवा देने वाले अनेक कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया तथा इंजीनियर विपेंद्र कुमार राय, देवेश चौहान सहित महिला एवं पुरुष सहयोग शिक्षकों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से पतंजलि महिला योग समिति की राज्य प्रभारी सुधा झा, जिला प्रभारी बीना बर्नवाल, सरायकेला जिला की कोषाध्यक्ष माधुरी सिंह, भारत स्वाभिमान के पूर्व जिला प्रभारी नंदकिशोर झा, रीता झा एवं निशी बर्नवाल सहित अनेक योग साधकों एवं कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही। सरायकेला-खरसावाँ जिले में पतंजलि योग समिति एवं पतंजलि महिला योग समिति के माध्यम से लगभग 100 से अधिक नियमित निःशुल्क योग कक्षाएँ संचालित की जा रही हैं।
भारत में बड़ी संख्या में इंजीनियर, प्रोफेशनल और ग्रेजुएट तैयार होने व रोजगार उपलब्धि में भारी गैप- रोजगार, शिक्षा और प्रशासन क़ी बड़ी नई चुनौती -समग्र व्यापक विश्लेषण।
भारत@2047 के लक्ष्य के लिए युवाओं के लिए शासन से आगे बढ़कर युवाओं के साथ शासन की अवधारणा अपनानी होगी
परीक्षा-पेपर लीक आंदोलन से कौशल-अंतर, उद्योग- अनुकूल शिक्षा और युवा, गतिशील शासन व्यवस्था तक -क्या भारत में प्रशासन की नई पीढ़ी का आरंभ हो रहा है? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर वर्ष 2026 में भारत एक ऐसे ऐतिहासिक परिवर्तनकाल से गुजर रहा है,जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन, रोबोटिक्स, डिजिटल अर्थव्यवस्था,साइबर सुरक्षा,हरित प्रौद्योगिकी और डेटा- आधारित शासन ने शिक्षा,रोजगार, उद्योग तथा प्रशासन की पारंपरिक संरचनाओं को तेजी से बदलना शुरू कर दिया है।आज देश और विश्व में बड़ी संख्या में इंजीनियर, वकील, डॉक्टर,प्रबंधन विशेषज्ञ, तकनीकी पेशेवर तथा विभिन्न विषयों के स्नातक तैयार हो रहे हैं,लेकिन मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि डिग्री प्राप्त करने और रोजगार के लिए वास्तव में सक्षम बनने के बीच एक गंभीर अंतर दिखाई देता है। अनेक युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद उद्योग की अपेक्षाओं के अनुरूप व्यावहारिक कौशल,तकनीकी दक्षता, समस्या- समाधान क्षमता,संवाद- कौशल टीमवर्क, डिजिटल समझ तथा बदलती तकनीक के साथ स्वयं को निरंतर अद्यतन करने की क्षमता में पीछे रह जाते हैं। दूसरी ओर उद्योग जगत को प्रशिक्षित और कार्य के लिए तैयार युवा नहीं मिलते। यही स्थिति शिक्षा और रोजगार के बीच नहीं, बल्कि डिग्री और दक्षता, ज्ञान और प्रयोग, युवा आकांक्षा और संस्थागत क्षमता तथा सरकारी नीति और जमीनी परिणाम के बीच मौजूद व्यापक अंतर को दर्शाती है। इसी पृष्ठभूमि में 28 जुलाई 2026 को भारतीय पीएम द्वारा केंद्र सरकार के सचिवों के साथ दूसरी उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता विशेष महत्व रखती है। बैठक में वित्त एवं अर्थव्यवस्था, वाणिज्य एवं उद्योग तथा प्रौद्योगिकी से जुड़े मंत्रालयों और विभागों की भविष्य की कार्ययोजना पर विचार किया गया। प्रधानमंत्री ने सरकारी व्यवस्था में विभागीय स्तर पर मौजूद क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर बाधाओं को कम करने, बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा शासन को अधिक युवा, गतिशील नवाचारी और भविष्य के अनुरूप बनाने पर बल दिया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकार को बदलती चुनौतियों और नए अवसरों के अनुसार निरंतर स्वयं को विकसित करना चाहिए।यह संदेश केवल प्रशासनिक सुधार का सामान्य विचार नहीं है, बल्कि तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था और युवा अपेक्षाओं के बीच शासन की नई भूमिका का संकेत है।
साथियों, 28 जुलाई 2026 की उच्चस्तरीय बैठक,उद्योग और शिक्षा के बीच कौशल- अंतर इंटर्नशिप की आवश्यकता एआई युग की नई रोजगार चुनौतियां, परीक्षा- पेपर लीक के विरुद्ध युवा आंदोलन, डिजिटल लोकतंत्र का विस्तार और प्रशासन को युवा, गतिशील तथा अनुकूलनशील बनाने की आवश्यकता ये सभी अलग- अलग विषय नहीं हैं। ये भारत के भविष्य के एक ही बड़े प्रश्न के विभिन्न आयाम हैं क्या देश की शिक्षा, अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था युवा पीढ़ी की बदलती आकांक्षाओं के अनुरूप स्वयं को समय पर बदल पाएगी? भारत के युवाओं ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वे केवल रोजगार नहीं, बल्कि निष्पक्ष अवसर चाहते हैं; केवल डिग्री नहीं, बल्कि उपयोगी कौशल चाहते हैं; केवल डिजिटल सुविधा नहीं, बल्कि डिजिटल अधिकार और पारदर्शिता चाहते हैं; केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समयबद्ध परिणाम चाहते हैं। सरकार के सामने चुनौती केवल अधिक योजनाएं बनाने की नहीं, बल्कि योजनाओं को परिणामों से जोड़ने की है। यदि शिक्षा उद्योग से जुड़े, इंटर्नशिप वास्तविक अनुभव दे, कौशल भविष्य की अर्थव्यवस्था के अनुरूप हों, परीक्षा प्रणाली विश्वसनीय बने, प्रशासन संवादशील हो और युवाओं को नीति-निर्माण में भागीदारी मिले, तो भारत की युवा शक्ति विश्व की सबसे बड़ी विकास-शक्ति बन सकती है। साथियों,आज विश्व की अर्थव्यवस्था केवल श्रम- आधारित नहीं,बल्कि ज्ञान,डेटा,नवाचार और कौशल- आधारित अर्थव्यवस्था बन रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कई कार्यों को तेज, स्वचालित और अधिक सटीक बना रही है।इंजीनियरिंग में डिजाइन, कोडिंग,परीक्षण और उत्पादन की प्रक्रियाएं बदल रही हैं; कानून के क्षेत्र में कानूनी शोध, दस्तावेजों का विश्लेषण और न्यायिक डेटा का उपयोग तकनीक से प्रभावित हो रहा है; चिकित्सा में निदान- सहायता डिजिटल स्वास्थ्य और व्यक्तिगत उपचार के नए मॉडल विकसित हो रहे हैं; बैंकिंग में एल्गोरिदम,फिनटेक और साइबर सुरक्षा का महत्व बढ़ रहा है। इसलिए भविष्य में केवल किसी विषय की डिग्री पर्याप्त नहीं होगी। युवा को अपने मूल विषय के साथ डिजिटल साक्षरता, एआई की समझ, डेटा विश्लेषण, नैतिक निर्णय क्षमता, रचनात्मकता और मानव-केंद्रित समस्या- समाधान की दक्षता भी सटीकता से विकसित करनी होगी।
साथियों, भारत में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में इंजीनियर तैयार होने के बावजूद रोजगार की उपलब्धता और कौशल की मांग के बीच अंतर पर लगातार चर्चा होती रही है। एक अध्ययन में भारत में प्रतिवर्ष लगभग नौ लाख इंजीनियर तैयार होने और तकनीकी क्षेत्र में रोजगार- वृद्धि की तुलना में स्नातकों की संख्या अधिक होने का प्रश्न उठाया गया है। अध्ययन ने यह भी संकेत दिया कि केवल पारंपरिक नौकरी- आधारित मॉडल पर्याप्त नहीं हो सकता और तकनीकी शिक्षा को उद्यमिता स्थानीय नवाचार तथा नए प्रकार के सूक्ष्म उद्यमों से जोड़ने की आवश्यकता है।हालांकि ऐसे आंकड़ों को विभिन्न संस्थानों और क्षेत्रों की अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार समझना चाहिए, लेकिन मूल चुनौती स्पष्ट है उच्च शिक्षा की संख्या बढ़ना अपने आप में रोजगार- योग्यता की गारंटी नहीं है।यही कारण है कि पीएम द्वारा उद्योग जगत के सहयोग से नए और कौशल- आधारित पाठ्यक्रम विकसित करने की आवश्यकता पर दिया गया जोर अत्यंत प्रासंगिक है। शिक्षा संस्थानों में पाठ्यक्रम कई बार उद्योग की बदलती आवश्यकताओं की तुलना में धीमी गति से बदलते हैं। जब तक विश्वविद्यालय किसी नई तकनीक को पाठ्यक्रम में शामिल करते हैं, तब तक उद्योग अगले स्तर की तकनीक अपनाना शुरू कर देता है। इसलिए पाठ्यक्रम निर्माण केवल विश्वविद्यालयों या नियामक संस्थाओं का विषय नहीं रह सकता। उद्योग, शिक्षा संस्थान, शोध संगठन, स्टार्टअप, स्थानीय प्रशासन और युवाओं को मिलकर भविष्य के कौशल की रूपरेखा तैयार करनी होगी। 2025 की सरकारी समीक्षा के अनुसार कौशल विकास कार्यक्रमों में एआई, इंडस्ट्री 4.0, हरित रोजगार और डिजिटल सेवाओं जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए विशेष पाठ्यक्रम तथा नई भूमिका- आधारित प्रशिक्षण संरचनाएं विकसित की गई हैं। अब आवश्यकता इन पहलों को व्यापक, गुणवत्तापूर्ण और परिणाम-आधारित बनाने की है। साथियों, कौशल विकास का अर्थ केवल कुछ सप्ताह या महीनों का प्रमाणपत्र प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। वास्तविक कौशल वह है जिसे युवा कार्यस्थल पर प्रयोग कर सके, समस्या का समाधान कर सके और बदलती परिस्थितियों में विकसित कर सके। उदाहरण के लिए, एक इंजीनियर को केवल तकनीकी सिद्धांत नहीं, बल्कि वास्तविक परियोजना,टीम में कार्य, उत्पादन प्रक्रिया, गुणवत्ता नियंत्रण और ग्राहक की आवश्यकता को समझना चाहिए। एक विधि स्नातक को केवल कानून की धाराएं नहीं, बल्कि डिजिटल कानूनी शोध, दस्तावेज निर्माण, मध्यस्थता, साइबर कानून, डेटा संरक्षण तथा न्याय तक पहुंच की व्यावहारिक समझ भी होनी चाहिए। इसी प्रकार प्रबंधन स्नातक को केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि डेटा, बाजार, उद्यमिता और संगठनात्मक निर्णय की क्षमता विकसित करनी होगी। इसलिए शिक्षा को परीक्षा में उत्तर देने से आगे बढ़ाकर वास्तविक जीवन की समस्या हल करने की दिशा में ले जाना आवश्यक है। इंटर्नशिप इस अंतर को कम करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना का उद्देश्य युवाओं को वास्तविक व्यावसायिक वातावरण का अनुभव प्रदान करना और शिक्षा तथा उद्योग की आवश्यकताओं के बीच सेतु बनाना है। योजना के अंतर्गत युवाओं को 12 महीने तक कार्यस्थल अनुभव उपलब्ध कराने की संरचना बनाई गई है। लेकिन इंटर्नशिप की सफलता केवल अवसरों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। यह देखना होगा कि कितने युवा वास्तव में प्रशिक्षण पूरा करते हैं, उन्हें कितना व्यावहारिक ज्ञान मिलता है, कितनों को रोजगार या उद्यमिता का अवसर मिलता है और क्या इंटर्नशिप के बाद उनकी आय तथा रोजगार-क्षमता में सुधार होता है। इंटर्नशिप को केवल औपचारिक प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि प्रशिक्षक, वास्तविक परियोजना, कौशल मूल्यांकन और करियर मार्गदर्शन से जोड़ना होगा।
साथियों, हाल के छात्र आंदोलनों और उनसे उत्पन्न राजनीतिक तथा प्रशासनिक प्रभावों को कुछ विशेषज्ञ युवा शक्ति की बढ़ती लोकतांत्रिक भूमिका के रूप में देख रहे हैं। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, परीक्षा -सुधार की मांगों तथा संसद और सार्वजनिक विमर्श पर आंदोलन के प्रभाव को यह संकेत माना जा सकता है कि युवा अब केवल नीतियों के निष्क्रिय लाभार्थी नहीं रहना चाहते। वे पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध समाधान की मांग कर रहे हैं। हालांकि किसी भी आंदोलन के राजनीतिक परिणाम का अंतिम मूल्यांकन तथ्यों, संस्थागत निर्णयों और दीर्घकालिक सुधारों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। किसी एक घटना को सीधे किसी सरकार की राजनीतिक सुरक्षा या राजनीतिक असुरक्षा का निश्चित प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। फिर भी यह कहा जा सकता है कि सरकारों के लिए युवाओं की शिकायतों को समय पर सुनना, संवाद स्थापित करना और सुधारों के परिणाम दिखाना लोकतांत्रिक स्थिरता तथा जनविश्वास के लिए महत्वपूर्ण है।
साथियों, युवा आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश संभवतः यह है कि शासन को प्रतिक्रियात्मक नहीं बल्कि पूर्वानुमान -आधारित होना चाहिए। यदि परीक्षा प्रणाली में तकनीकी कमजोरी है, तो समस्या उत्पन्न होने के बाद जांच करने के बजाय पहले से सुरक्षा परीक्षण, स्वतंत्र ऑडिट, एन्क्रिप्शन, नियंत्रित पहुंच, साइबर निगरानी और जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। यदि रोजगार के लिए कौशल की कमी है, तो युवाओं के स्नातक बनने के बाद प्रशिक्षण देने के बजाय विद्यालय और महाविद्यालय स्तर से ही उद्योग-अनुकूल कौशल विकसित किए जाने चाहिए। यदि युवाओं में किसी नीति को लेकर भ्रम है, तो विवाद बढ़ने के बाद स्पष्टीकरण देने के बजाय नीति निर्माण के समय से ही सार्वजनिक संवाद होना चाहिए। यही आधुनिक, संवेदनशील और दूरदर्शी प्रशासन की पहचान है।आज की समस्याएं एक मंत्रालय या एक विभाग तक सीमित नहीं रहतीं। उदाहरण के लिए, युवा रोजगार का प्रश्न शिक्षा कौशल उद्योग वित्त प्रौद्योगिकी सामाजिक सुरक्षा और राज्य सरकारों से जुड़ा है। इसलिए संपूर्ण सरकार दृष्टिकोण आवश्यक है।
साथियों, भारत के सामने सबसे बड़ी संभावना उसकी युवा आबादी है, लेकिन जनसांख्यिकीय लाभांश तभी वास्तविक लाभ बनेगा जब शिक्षा गुणवत्तापूर्ण हो, कौशल बाजार की आवश्यकता से जुड़े हों, रोजगार के अवसर बढ़ें और उद्यमिता को प्रोत्साहन मिले। हर युवा को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है; इसलिए रोजगार की अवधारणा को व्यापक बनाना होगा। स्टार्टअप, सूक्ष्म उद्यम, स्थानीय डिजिटल सेवाएं, हरित उद्योग, कृषि- प्रौद्योगिकी स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और सामाजिक उद्यमिता भविष्य के अवसर बन सकते हैं। युवाओं को नौकरी खोजने वाले के साथ-साथ रोजगार सृजक बनने के लिए भी तैयार करना होगा।भारत @ 2047 के लक्ष्य के लिए युवाओं के लिए शासन से आगे बढ़कर युवाओं के साथ शासन की अवधारणा अपनानी होगी। युवा नीति-निर्माण में केवल प्रतीकात्मक रूप से नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से शामिल हों। विश्वविद्यालयों, स्थानीय निकायों, सरकारी विभागों, नीति मंचों और डिजिटल परामर्श प्रणालियों में युवाओं के सुझाव लिए जाएं। उनकी राय पर क्या निर्णय हुआ, इसका सार्वजनिक उत्तर भी दिया जाए। इससे युवाओं को केवल विरोध करने का नहीं, बल्कि समाधान निर्माण का अवसर मिलेगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका सटीक विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि एआई युग में भारत की सफलता इस बात से निर्धारित नहीं होगी कि देश कितने इंजीनियर, वकील, प्रोफेशनल या स्नातक तैयार करता है, बल्कि इस बात से होगी कि उनमें से कितने युवा नवाचार कर सकते हैं, समस्याओं का समाधान कर सकते हैं, नई तकनीक के साथ स्वयं को बदल सकते हैं, रोजगार और उद्यमिता के अवसर उत्पन्न कर सकते हैं तथा लोकतांत्रिक शासन में रचनात्मक भागीदारी कर सकते हैं। यदि सरकार, उद्योग, शिक्षा संस्थान और युवा मिलकर इस कौशल- अंतर को समाप्त करने की दिशा में कार्य करें, तो भारत में केवल डिजिटल इंडिया नहीं, बल्कि कौशल-संपन्न, रोजगार -सक्षम, नवाचारी और जवाबदेह भारत की नई पीढ़ी का निर्माण संभव होगा। यही विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला और युवा शक्ति की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक उपलब्धि हो सकती है।
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
डिजिटल संप्रभुता,लोकतंत्र और सोशल मीडिया जवाबदेही :मेटा विवाद, नीट आंदोलन और उभरती वैश्विक नीति चुनौती -28 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणियां -समग्र व्यापक विश्लेषण
भारतीय पीएम द्वारा जेन- ज़ेड, को संबोधित एक फेसबुक पोस्ट, वीडियो प्लेटफ़ॉर्म से हट जाने की घटना ने अनेक प्रश्न खड़े किए -मेटा ने तकनीकी त्रुटि बताते सामग्री पुनःबहाल क़ी
फेसबुक (मेटा) से पीएम का पोस्ट हटना व 28 जुलाई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ और अंतरिम निर्देश, एक आंदोलन तक सीमित नहीं हैं, अत्यंत गंभीर संकेत -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर भारत में वर्ष 2026 का नीट पेपर लीक विवाद केवल एक परीक्षा की विश्वसनीयता का प्रश्न नहीं रहा,बल्कि यह युवाओं के विश्वास, लोकतांत्रिक अधिकारों, न्यायपालिका की भूमिका, सरकार की जवाबदेही तथा वैश्विक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की शक्ति से जुड़ा बहुआयामी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषय बन गया।जंतर-मंतर पर हुआ व्यापक छात्र आंदोलन, उसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, न्यायपालिका की सक्रियता तथा भारतीय प्रधानमंत्री की फेसबुक पोस्ट हटाए जाने को लेकर मेटा और भारत सरकार के बीच उत्पन्न विवाद,मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इन सभी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि इक्कीसवीं सदी का लोकतंत्र केवल संसद न्यायालय और चुनाव तक सीमित नहीं रह गया है।अब सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म भी लोकतांत्रिक विमर्श के निर्णायक मंच बन चुके हैं। जंतर-मंतर पर हजारों छात्रों और युवाओं द्वारा किया गया आंदोलन भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जा सकता है। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य केवल नीट परीक्षा की निष्पक्षता सुनिश्चित करना नहीं था, बल्कि यह संदेश देना भी था कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और समान अवसर लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला हैं। इस आंदोलन ने भारत के भीतर व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तथा वैश्विक शिक्षा जगत का भी ध्यान आकर्षित किया।इससे यह संदेश गया कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपने युवाओं की आवाज़ को गंभीरता से सुनने की क्षमता रखता है।आंदोलन के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को कई विश्लेषकों ने राजनीतिक जवाबदेही का उदाहरण माना। लोकतांत्रिक शासन में मंत्री केवल प्रशासनिक प्रमुख नहीं होते, बल्कि वे नैतिक उत्तरदायित्व का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।यद्यपि किसी भी इस्तीफे के पीछे अनेक राजनीतिक और प्रशासनिक कारण हो सकते हैं,फिर भी जनता के बीच यह धारणा बनी कि लोकतांत्रिक दबाव और जनआंदोलन शासन को उत्तरदायी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दावों,घटनाक्रमों और लोकतांत्रिक विमर्श के आधार पर विश्लेषण प्रस्तुत करता है।जिन मामलों का संबंध न्यायालय, सरकारी जांच अथवा आधिकारिक पुष्टि से है,उन्हें अंतिम तथ्य नहीं बल्कि उपलब्ध सूचनाओं के संदर्भ में सटीकता से देखा जाना चाहिए।
साथियों, 28 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुईसुनवाई ने इस पूरे घटनाक्रम को नया आयाम दिया। विभिन्न समाचार रिपोर्टों के अनुसार न्यायालय ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार,कानून के समक्ष समानता तथा अनावश्यक कठोर कार्रवाई से बचने की आवश्यकता पर गंभीर टिप्पणियाँ कीं। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि अदालत ने 18 वर्ष से कम आयु के आंदोलनकारियों तथा ऐसे प्रदर्शनकारियों के संबंध में, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था,तत्काल मानवीय और विधिसम्मत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। न्यायालय की कार्यवाही का व्यापक संदेश यही माना गया कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और राज्य की शक्ति का प्रयोग संविधान की सीमाओं के भीतर होना चाहिए। अंतिम और बाध्यकारी स्थिति न्यायालय के आधिकारिक आदेश से ही निर्धारित होती है।
साथियों, इस पूरे घटनाक्रम के समानांतर एक दूसरा विवाद सामने आया जिसने राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर डिजिटल शासन और तकनीकी कंपनियों की जवाबदेही पर वैश्विक बहस छेड़ दी।भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा युवाओं,विशेषकर जेन- ज़ेड, को संबोधित एक फेसबुक पोस्ट और वीडियो प्लेटफ़ॉर्म से हट जाने की घटना ने अनेक प्रश्न खड़े कर दिए। बाद में मेटा ने इसे तकनीकी त्रुटि बताते हुए सामग्री पुनःबहाल कर दी,किंतु विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ।भारत सरकार ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना और विस्तृत जानकारी मांगी कि इतनी महत्वपूर्ण आधिकारिक सामग्री आखिर किस प्रक्रिया और किस कारण से हटाई गई।यहीं से यह विवाद केवल एक पोस्ट हटने का नहीं रहा, बल्कि डिजिटल संप्रभुता का विषय बन गया। किसी भी संप्रभु राष्ट्र का यह स्वाभाविक अधिकार है कि उसके निर्वाचित नेतृत्व और सरकारी संचार से संबंधित डिजिटल सामग्री के प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्पष्ट प्रक्रिया हो। यदि किसी वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म पर करोड़ों नागरिक सूचना प्राप्त करते हैं, तो उस प्लेटफ़ॉर्म की नीतियाँ भी सार्वजनिक विश्वास की कसौटी पर सटीकता से परखी जाएँगी।
साथियों, मेटा,जो फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे विश्व के सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म संचालित करती है,लंबे समय से विभिन्न देशों में सामग्री मॉडरेशन, गोपनीयता, डेटा सुरक्षा और स्थानीय कानूनों के अनुपालन को लेकर चर्चा और विवाद का विषय रही है। भारत में भी समय-समय पर उस पर भड़काऊ सामग्री हटाने में देरी, फर्जी समाचारों के प्रसार और नियामकीय अनुपालन जैसे मुद्दों पर प्रश्न उठते रहे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री की पोस्ट हटने की घटना ने इन पुराने विवादों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया।सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार का दृष्टिकोण यह है कि तकनीकी गलती जैसे सामान्य स्पष्टीकरण से इतने महत्वपूर्ण मामले का समाधान नहीं हो सकता।यदि किसी एल्गोरिद्म, स्वचालित प्रणाली या आंतरिक मॉडरेशन प्रक्रिया के कारण ऐसी घटना हुई, तो उसकी पूरी पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। यही कारण है कि संबंधित अधिकारियों से विस्तृत स्पष्टीकरण और जवाबदेही की अपेक्षा की गई।
साथियों,दूसरी ओर, तकनीकी कंपनियों का पक्ष भी समझना आवश्यक है। मेटा का कहना रहा कि सामग्री गलती से हट गई थी और जैसे ही त्रुटि का पता चला, उसे तुरंत बहाल कर दिया गया। बड़े डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म प्रतिदिन अरबों पोस्ट, वीडियो और संदेशों का प्रबंधन करते हैं। ऐसे में स्वचालित एल्गोरिद्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियाँ कभी-कभी गलत निर्णय भी ले सकती हैं। किंतु प्रश्न केवल त्रुटि का नहीं, बल्कि उसके निवारण की पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और संस्थागत प्रक्रिया का है।यहीं से एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता और डिजिटल जवाबदेही जैसे सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यदि कोई एल्गोरिद्म यह तय करता है कि कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, कौन-सी सीमित होगी और कौन-सी हटाई जाएगी, तो लोकतांत्रिक समाज यह जानना चाहेगा कि वह निर्णय किन मानकों पर आधारित था।आधुनिक लोकतंत्र में तकनीकी निर्णय भी सार्वजनिक उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकते।
साथियों, इस विवाद ने भारत में स्वदेशी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म विकसित करने की मांग को भी बल दिया। अनेक विशेषज्ञों का मत है कि जिस प्रकार भारत ने डिजिटल भुगतान, आधार, यूपीआई और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में वैश्विक मॉडल प्रस्तुत किया है,उसी प्रकार भविष्य में सुरक्षित, पारदर्शी और भारतीय कानूनों के अनुरूप सोशल मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की दिशा में भी गंभीर प्रयास किए जा सकते हैं। हालांकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि कोई भी नया प्लेटफ़ॉर्म अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गोपनीयता और प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों का सम्मान करे।यह विवाद केवल भारत तक सीमित नहीं है। यूरोपीय संघ ने डिजिटल सर्विसेज़ एक्ट, डिजिटल मार्केट्स एक्ट और एआई एक्ट जैसे व्यापक कानूनों के माध्यम से बड़ी तकनीकी कंपनियों पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास किया है। अमेरिका में भी सामग्री मॉडरेशन, प्रतिस्पर्धा, डेटा सुरक्षा और प्लेटफ़ॉर्म की शक्ति को लेकर लगातार बहस जारी है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्राज़ील तथा अनेक अन्य लोकतांत्रिक देशों ने भी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों की भूमिका पर नए नियामकीय ढाँचे सटीकता से विकसित किए हैं।
साथियों, भारत भी डिजिटल इंडिया, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन व्यवस्था,आईटी नियमों और साइबर सुरक्षा ढाँचों के माध्यम से संतुलित डिजिटल शासन स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। चुनौती यह है कि तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहन भी मिले और नागरिक अधिकारों, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी सुनिश्चित हो।कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इस पूरी बहस को और अधिक जटिल बना दिया है। अब केवल पोस्ट हटाने या दिखाने का प्रश्न नहीं है। एआई यह भी निर्धारित करता है कि कौन- सी सामग्री किस उपयोगकर्ता तक पहुँचेगी,कौन-सा वीडियो वायरल होगा और किस समाचार को प्राथमिकता मिलेगी। यदि इन प्रणालियों में पारदर्शिता नहीं होगी, तो लोकतांत्रिक विमर्श पर उनका प्रभाव अत्यधिक व्यापक हो सकता है। डेटा आज केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति बन चुका है।नागरिकों का डिजिटल व्यवहार, सामाजिक संबंध, वित्तीय गतिविधियाँ और सूचना उपभोग इन सबका विशाल डेटा भविष्य की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों को प्रभावित करता है। इसलिए डिजिटल संप्रभुता केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि शासन, सुरक्षा और नागरिक अधिकारों का मूल प्रश्न बन चुकी है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन स्थापित करना है।एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का मूल अधिकार है, वहीं दूसरी ओर फर्जी समाचार,डीपफेक, साइबर अपराध औरडिजिटल दुष्प्रचार जैसी चुनौतियाँ भी वास्तविक हैं। यदि नियमन अत्यधिक कठोर होगा तो स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है,और यदि नियमन अत्यधिक शिथिल होगा तो डिजिटल अराजकता बढ़ सकती है। इसलिए पारदर्शी, न्यायसंगत और न्यायिक समीक्षा के अधीन नियामकीय व्यवस्था ही दीर्घकालिक समाधान हो सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि नीट आंदोलन, सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता, राजनीतिक जवाबदेही और मेटा विवाद, इन सभी घटनाओं ने एक साझा संदेश दिया है कि लोकतंत्र का भविष्य केवल संस्थागत शक्ति पर नहीं, बल्कि नागरिक विश्वास,पारदर्शिता और डिजिटल उत्तरदायित्व पर भी निर्भर करेगा।आज आवश्यकता सरकार और तकनीकी कंपनियों के बीच टकराव की नहीं,बल्कि नियम-आधारित सहयोग,स्पष्ट जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों के सम्मान की है।यदि लोकतंत्र नागरिकों की आवाज़ है,तो डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म उस आवाज़ का आधुनिक माध्यम हैं। यदि संप्रभुता किसी राष्ट्र की आत्मा है, तो डिजिटल संप्रभुता उसकी डिजिटल पहचान, सुरक्षा और भविष्य की दिशा है। इसलिए मेटा से जुड़ा यह विवाद केवल एक पोस्ट या वीडियो हटने का मामला नहीं माना जा सकता;यह उस व्यापक वैश्विक प्रश्न का प्रतीक है कि डिजिटल युग में लोकतंत्र, तकनीक और कॉर्पोरेट शक्ति के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। आने वाले वर्षों में यही प्रश्न अंतरराष्ट्रीय कानून, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
विजय श्री ऑटो में झामुमो का प्रदर्शन, त्रिपक्षीय वार्ता के बाद न्यूनतम मजदूरी पर बनी सहमति।
सरायकेला/गम्हरिया
पूरा भारत या फिर यूं कहें की पूरी दुनिया बगैर मजदूर के कार्यविहीन हैं। मजदूर चाहे निचले स्तर के हो या ऊंचे स्तर के हो हर कोई इस दुनिया में अलग-अलग रूप में अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग संस्थानों में मजदूरी करता ही है। लेकिन ज्यादातर निचले स्तर के मजदूरों का शोषण होने की खबर आए दिन हमें और आपको मिलते रहती है।
ऐसा ही एक मामला गम्हरिया औद्योगिक क्षेत्र स्थित विजय श्री ऑटोकम लिमिटेड कंपनी में देखने को मिला है जहां पर कई वर्षों से मेहनत कर रहे हैं मजदूरों को उनके न्यूनतम दर न देने का मामला चर्चाओं में बना हुआ है जिस पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं ने अपनी आवाज बुलंद की और मजदूरों का हक दिलाने के लिए डटे रहे।
सोमवार को मजदूरों ने पूरे दिन प्रबंधन के खिलाफ आंदोलन किया और शाम करीब 5:00 बजे आयोजित तृतीय वार्ता में प्रबंधन को झुकना पड़ा। भारी दबाव के बाद कंपनी ने मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी, ईएसआई, पीएफ और बोनस सहित अन्य बकाया राशि देने के लिए हस्ताक्षरित अनुमति दी। इधर, मजदूरों और नेताओं के माने तो यहां लगभग 400 कामगार काम करते हैं, जिन्हें पिछले कई वर्षों से न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल रही है।
वार्ता में झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रखंड अध्यक्ष भोमरा मांझी और वरिष्ठ नेता के अलावा इसरो के अध्यक्ष रूपेश कटिहार, उपाध्यक्ष विकास गर्ग,सचिव गौतम महायत्रा ,राजीव कुमार, लेबर इंस्पेक्टर रूबी कुमारी, झामुमो के नेता गणेश महाली और कंपनी प्रबंधन के उच्च पदाधिकारियों ने समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर मुख्य रूप से झामुमो के नेता गणेश चौधरी, जिला अध्यक्ष डॉ. सुवेंदु महतो, प्रखंड अध्यक्ष भोमरा मांझी, नगर अध्यक्ष वीरेंद्र प्रधान, अमृत महतो , कृष्ण बास्के, बबलू प्रधान, शंकर मुखी, जगदीश महतो सहित सैकङों की संख्या में कार्यकर्ता और पदाधिकारी उपस्थित थे।
समझौते के अनुसार, कंपनी ने स्किल्ड और अनस्किल्ड वर्करों को श्रेणीवार विभाजित कर श्रम अधिनियम के तहत न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने पर सहमति व्यक्त की। इसके साथ ही जिन मजदूरों को अब तक न्यूनतम मजदूरी से भी कम वेतन दिया जा रहा था, उनके बकाया भुगतान, ईएसआई, पीएफ और बोनस की भी व्यवस्था पर प्रबंधन ने हामी भरी।
हालाँकि वार्ता सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न हुई, पर सरायकेला–खरसावाँ के जिला लेबर कमिश्नर (डीएलसी) अविनाश ठाकुर ने स्पष्ट किया कि जिन मजदूरों को अब तक न्यूनतम मजदूरी से कम मिलती रही, वे अपने बकाया के लिए डीएलसी कार्यालय में शिकायत दर्ज करा सकते हैं या आवश्यक होने पर न्यायालयीन डिका में अपना दावा दाखिल कर सकते हैं। डीएलसी ने बताया कि समझौते के बावजूद जिस किसी मजदूर को भुगतान में गड़बड़ी महसूस हो, उसके पास विधिक विकल्प मौजूद हैं। डीएलसी कार्यालय पर दावा दर्ज कराने या श्रम अदालत में अपील कर सकते है।
मजदूरों ने प्रारंभिक रूप से समझौते का स्वागत किया और आंदोलन समाप्त कर दिया, पर स्थानीय नेता और मजदूर समुदाय अभी भी प्रबंधन के वादों पर नजर रखे हुए हैं। वे जल्द ही बकाया भुगतान और नियमित वेतन सुनिश्चित होने तक सतर्क रहने का संकेत दे रहे हैं।
इसरो के अध्यक्ष रूपेश कटिहार ने बताया कि मजदूर की समस्याओं का समाधान करते हुए आज सौहार्दपूर्ण वातावरण में समझौता संपन्न हो गया। उन्होंने बताया कि प्रबंधन की जो कुछ कमी थी, उसे दूर कर दिया गया है। अब मजदूरों का जो हक बनता है उसे प्रबंधन देने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि प्रबंधन और मजदूर दोनों एक दूसरे का पूरक हैं इसलिए औद्योगिक शांति और क्षेत्र के विकास के लिए आपसी तालमेल बनाकर औद्योगिक विकास के लिए काम करेंगे।
राधाकृष्ण किशोर की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा विवाद समाप्त होने पर कांग्रेस नेता ने जताई प्रसन्नता।
सरायकेला/आदित्यपुर
कांग्रेस के वरीय नेता जगदीश नारायण चौबे ने राज्य के वित्त मंत्री एवं सरायकेला-खरसावाँ जिला के प्रभारी मंत्री राधाकृष्ण किशोर की सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित विवाद समाप्त होने पर प्रसन्नता व्यक्त की है।
उन्होंने कहा कि राधाकृष्ण किशोर का राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन संघर्षों से भरा रहा है। उन्होंने लंबे समय तक पलामू जैसे उग्रवाद एवं संगठित अपराध से प्रभावित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है और ऐसे असामाजिक तत्वों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष किया है। अपनी कार्यकुशलता, ईमानदार छवि और जनहित के प्रति समर्पण के कारण उन्हें सर्वश्रेष्ठ विधायक के सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है।
जगदीश नारायण चौबे ने कहा कि श्री किशोर की सुरक्षा व्यवस्था उनकी परिस्थितियों एवं निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप होनी चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन द्वारा राधाकृष्ण किशोर की सुरक्षा में अतिरिक्त स्कॉर्ट वाहन को पुनः शामिल किए जाने के निर्णय का स्वागत करते हुए उनका आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का यह निर्णय एक अनुभवी, कर्मठ और जनसेवा के प्रति समर्पित मंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में उचित एवं सराहनीय कदम है।
विधायक ने भू-अर्जन एवं पुनर्वास से संबंधित बैठक में 116 गांव के सम्पूर्ण पुनर्वास व नियोजन का किया मांग।
सरायकेला/ईचागढ़
ईचागढ़ के विधायक सविता महतो ने भू अर्जन व पुनर्वास को लेकर हुई बैठक में विस्थापीतों के सम्पूर्ण पुनर्वास व नियोजन का मांग उठाई।सुवर्णरेखा परियोजनाके कार्यालय कक्ष में शुक्रवार को प्रशासक स्वर्णरेखा परियोजना राजीव रंजन एवं विधायक सविता महतो की संयुक्त अध्यक्षता में सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना के अंतर्गत भू-अर्जन एवं पुनर्वास से संबंधित बैठक आयोजित किया गया।
बैठक में भू-अर्जन, पुनर्वास एवं विस्थापितों से जुड़े विभिन्न लंबित मामलों की समीक्षा कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए। बैठक में ईचागढ़ विधायक सविता महतो, संयुक्त सचिव-सह-अपर निदेशक (भू-अर्जन एवं पुनर्वास), अनुमंडल पदाधिकारी चांडिल, भू अर्जन पदाधिकारी, विशेष भू-अर्जन पदाधिकारी, पुनर्वास पदाधिकारी, केंद्रीय भंडार एवं शिविर प्रमंडल, बांध प्रमंडल, सुवर्णरेखा नहर प्रमंडल के कार्यपालक अभियंताओं सहित परियोजना से जुड़े अन्य अधिकारि शामिल हुए। बैठक में विधायक सविता महतो ने प्रशासन एवं विभाग के समक्ष 19 सूत्री मांग पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वर्षों से लंबित पुनर्वास, मुआवजा, भू-अर्जन, रोजगार एवं मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मामलों का शीघ्र समाधान किया जाए, ताकि विस्थापित परिवारों को न्याय मिल सके। विधायक ने मांग की कि 84 मौजा के 116 गांवों में विकास पुस्तिका एवं पुनर्वास अनुदान के लंबित मामलों का शीघ्र निष्पादन किया जाए।
परियोजना से प्रभावित शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रिक्त पदों पर प्राथमिकता के आधार पर नियुक्ति मिले तथा इंडो डेनिश टूल रूम से प्रशिक्षित लगभग 400 युवाओं को स्थानीय उद्योगों में रोजगार उपलब्ध कराया जाए। सभी 22 पुनर्वास स्थलों को आधुनिक सुविधाओं से विकसित करने, आरएल-171 से 192 मीटर तक प्रभावित परिवारों को चरणबद्ध तरीके से विकास पुस्तिका एवं अनुदान देने तथा पुनर्वास स्थलों से अवैध कब्जा हटाकर वास्तविक विस्थापितों को भू-खंड आवंटित करने की भी मांग की गई। इसके अलावा विधायक ने भू-खंड आवंटन समिति की नियमित बैठक कराने, पूर्ण पुनर्वास होने तक जलाशय का जलस्तर आरएल-180 मीटर से नीचे रखने, आंशिक रूप से प्रभावित गांवों में खेल मैदान विकसित करने तथा चांडिल डैम के आसपास पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मार्केट कॉम्प्लेक्स, रिसॉर्ट एवं ठहरने की सुविधाएं विकसित करने की मांग रखी। साथ ही उन्होंने पुनर्वास कार्यालय पर प्रशासक का संपूर्ण नियंत्रण एवं परियोजना में तृतीय एवं चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी का 5 वर्ष पर स्थानांतरण करने का मांग किया।
उन्होंने कहा कि विस्थापितों की समस्याओं का त्वरित एवं पारदर्शी समाधान सरकार और विभाग की प्राथमिकता होनी चाहिए। समीक्षा के दौरान प्रशासक राजीव रंजन ने सभी पुनर्वास स्थलों को व्यवस्थित रूप से विकसित करने तथा परियोजना प्रभावित विस्थापितों का आय, जाति एवं आवासीय प्रमाणपत्र शीघ्र निर्गत कराने के निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए। इस अवसर पर झामुमो केंद्रीय सदस्य काबलू महतो, मुखिया राखहरि सिंह मुंडा, मुखिया प्रतिनिधि सैनिक मांझी, अभय यादव, गुणाधर महतो, पशुपति बागची, सुकदेव महतो, विष्णु महतो, गोपाल महतो, कालाचांद धीवर आदि ग्रामीण उपस्थित थे।
जिला कृषि पदाधिकारी ने खाद-बीज भंडार का किया औचक निरीक्षण, स्टॉक व अभिलेखों की जांच।
सरायकेला/ईचागढ़
किसानों को गुणवत्तापूर्ण खाद एवं बीज उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जिला कृषि पदाधिकारी रौशन नीलकमल ने शुक्रवार को ईचागढ़ प्रखंड के मिलन चौक स्थित दिलीप बीज एवं खाद भंडार का औचक निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान जिला कृषि पदाधिकारी ने यूरिया, डीएपी, सुफला सहित विभिन्न उर्वरकों एवं कीटनाशकों के उपलब्ध स्टॉक की जांच की। साथ ही स्टॉक रजिस्टर, बिक्री (सेल) रजिस्टर और ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज अभिलेखों का मिलान कर उनकी सत्यता की जांच की।उन्होंने संचालक को निर्देश दिया कि किसानों को सरकार द्वारा निर्धारित उचित मूल्य पर ही खाद एवं बीज उपलब्ध कराया जाए।
साथ ही सभी अभिलेखों का नियमित संधारण करने और स्टॉक संबंधी जानकारी ऑनलाइन प्रणाली में समय पर अपडेट करने को कहा।जिला कृषि पदाधिकारी ने कहा कि किसानों के हितों से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। यदि कहीं कालाबाजारी, अधिक मूल्य वसूली या अनियमितता की शिकायत मिलती है तो संबंधित विक्रेता के विरुद्ध नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाएगी। मौके पर कृषि निरीक्षक , बीटीएम आदि उपस्थित थे।
चांडिल पुलिस ने गुम हुए 4 मोबाइल फोन बरामद कर असली मालिकों को सुपुर्द किया। थाना प्रभारी संतन तिवारी ने बताया कि पुलिस अधीक्षक सरायकेला खरसावां द्वारा चलाए जा रहे प्रोजेक्ट डिवाईस के तहत चांडिल थानांतर्गत CEIR सीईआईआर पोर्टल के माध्यम से गुम हुए 04 मोबाइल को बरामद कर उसके वास्तविक मालिकों को सुपुर्द कराया गया।
वहीं मोबाइल मालिकों को अपनी गुम हुए मोबाइल फोन मिलने से काफी खुश नजर आए एवं जिला पुलिस व चांडिल पुलिस की सराहना किया एवं आभार जताया।
वहीं थाना प्रभारी ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि अगर किसी का भी मोबाइल गुम हो तो नजदिक के थाने में सुचना दर्ज कराएं, सरायकेला पुलिस आपकी सेवा में हमेशा तत्पर होकर गुम हुए मोबाइल लौटाने का काम करेंगे।
आयकर (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026: स्पेसिफाइड फंड की नई परिभाषा- क्या भारत वैश्विक निवेश का नया केंद्र बनने की ओर? -समग्र व्यापक विश्लेषण।
कर सुधारों का नया अध्याय, निवेशकों को नई स्पष्टता और विकसित भारत -2047 की दिशा में एक निर्णायक कदम
आयकर (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026 हमें यह संदेश देता है कि आर्थिक महाशक्ति बनने की यात्रा केवल बड़े बजट और विशाल परियोजनाओं से नहीं, बल्कि समय पर किए गए सटीक कानूनी सुधारों से भी तय होती है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर भारत ने पिछले एक दशक में कर सुधारों को केवल राजस्व संग्रह का माध्यम नहीं, बल्कि आर्थिक विकास,वैश्विक निवेश आकर्षण और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस का महत्वपूर्ण आधार बनाया है। वस्तु एवं सेवा कर (ज़ीएसटी), फेसलेस असेसमेंट, डिजिटल टैक्स प्रशासन,नई आयकर व्यवस्था और गिफ्ट सिटी जैसे अनेक सुधारों के बाद अब आयकर (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026 के माध्यम से केंद्र सरकार ने स्पेसिफाइड फंड की परिभाषा में संशोधन कर एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पहली दृष्टि में यह परिवर्तन तकनीकी और सीमित प्रतीत हो सकता है, किंतु गहराई से देखने पर यह स्पष्ट होता है कि इसका प्रभाव भारत में विदेशी निवेश,पूंजी बाजार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवाओं और विकसित भारत-2047 की रणनीति पर व्यापक रूप से पड़ने वाला है। अभी भारत सेहत पूरी दुनिया देख रही है कि 20 जुलाई 2026 से यूजीसी नीट पेपर लेक्स सहित अन्य मुद्दों पर जोरदार तरीके से हंगामें के कारण संसद बाधित चल रही है कोई कामकाज नहीं हो रहा है। आज गुरुवार 23 जुलाई 2026 को भी पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा हुआ। लगातार हंगामे के कारण पहले सुबह 11 से 12 फिर 2 बजे और राज्यसभा की कार्यवाही पूरे दिन के लिए बिना कोई कामकाज किए शुक्रवार 24 जुलाई 2026 तक स्थगित कर दी गई।ठीक यही स्थिति उच्च सदन में भी रही। विपक्ष के हंगामे के बीच कार्यवाही बार-बार बाधित हुई। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े विपक्ष के विरोध के कारण कार्यवाही अंततः शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी गई।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र कर विशेष्य व अधिवक्ता होने के नाते बता दूं क़ि यह संशोधन केवल कर नियमों की भाषा बदलने तक सीमित नहीं है,बल्कि यह भारत की उस दीर्घकालिक आर्थिक सोच का हिस्सा है जिसके अंतर्गत देश स्वयं को एशिया के प्रमुख वित्तीय केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। वैश्विक पूंजी आज ऐसे देशों की तलाश में है जहाँ कानून स्पष्ट हों,कर व्यवस्था स्थिर हो और निवेशकों को अनिश्चितताओं से मुक्त वातावरण मिले। यही उद्देश्य इस संशोधन के मूल में दिखाई देता है।
साथियों स्पेसिफाइड फंड क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसको समझने की करें तो आयकर अधिनियम के अंतर्गत स्पेसिफाइड फंड ऐसी निवेश इकाइयों को कहा जाता है जिन्हें विशेष कर लाभ और नियामकीय सुविधा प्रदान की जाती है, विशेषकर उन फंडों को जो भारत में विदेशी निवेश को आकर्षित करते हैं। समय के साथ निवेश संरचनाएँ बदलती गईं, नए वित्तीय उत्पाद विकसित हुए और वैश्विक निवेशकों की आवश्यकताएँ भी परिवर्तित हुईं। ऐसे में पुरानी परिभाषा कई स्थानों पर अस्पष्टता उत्पन्न कर रही थी, जिसके कारण कर विवाद, व्याख्या संबंधी मतभेद और निवेश निर्णयों में अनिश्चितता पैदा हो रही थी।सरकार ने इन्हीं व्यावहारिक कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए स्पेसिफाइड फंड की परिभाषा को अधिक स्पष्ट, व्यापक और आधुनिक बनाया है ताकि पात्र संस्थाओं की पहचान में भ्रम समाप्त हो और निवेशकों को नियमों का पूर्वानुमानित लाभ सटिका से मिल सके।
साथियों बात अगर हम कर कानूनों में स्पष्टता ही सबसे बड़ी पारदर्शिता को समझने की करें तो अंतरराष्ट्रीय निवेशक किसी भी देश में निवेश करने से पहले केवल कर की दर नहीं देखते,बल्कि यह भी देखते हैं कि कर कानून कितने स्पष्ट, स्थिर और न्यायसंगत हैं।यदि नियमों की अलग-अलग व्याख्या संभव हो, तो भविष्य में विवाद की संभावना बढ़ जाती है और निवेशक ऐसे बाजारों से दूरी बनाने लगते हैं।भारत लंबे समय से टैक्स सर्टिआएंनिटी अर्थात कर संबंधी निश्चितता पर बल देता रहा है। आयकर (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह संदेश देता है कि भारत केवल निवेश आमंत्रित नहीं कर रहा, बल्कि निवेशकों के लिए पूर्वानुमेय और भरोसेमंद कर वातावरण भी तैयार कर रहा है।
साथियों बात अगर हम गिफ्ट सिटी को मिलेगा नया बल इसको समझने की करें तो गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (गिफ्ट सिटी) को भारत का वैश्विक वित्तीय सेवा केंद्र बनाने की महत्वाकांक्षी योजना वर्षों से चल रही है।इसके लिए सरकार ने अनेक कर रियायतें, नियामकीय छूट और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यवस्था विकसित की है।स्पेसिफाइड फंड की नई परिभाषा गिफ्ट सिटी में संचालित निवेश फंडों को अधिक स्पष्ट कानूनी आधार प्रदान करती है। इससे विदेशी फंड प्रबंधकों,निवेश सलाहकारों और वैश्विक पूंजी संस्थानों का विश्वास बढ़ेगा। यदि यह सुधार प्रभावी ढंग से लागू होता है,तो गिफ्ट सिटी भविष्य में दुबई,सिंगापुर और हांगकांग जैसे वित्तीय केंद्रों के साथ अधिक प्रतिस्पर्धी स्थिति में आ सकता है।
साथियों बात अगर हमविदेशी निवेशकों को क्या लाभ मिलेगा? इसको समझने की करें तो वैश्विक निवेशक सदैव ऐसे देशों को प्राथमिकता देते हैं जहाँ कर नीति स्थिर हो और कानून की व्याख्या स्पष्ट हो।संशोधित नियमों से पात्र फंडों की पहचान आसान होगी,कर लाभों की पात्रता स्पष्ट होगी और अनुपालन की जटिलता कम होगी।इसका परिणाम यह हो सकता है कि विदेशी संस्थागत निवेशक वैकल्पिक निवेश फंड,संप्रभु निधियाँ तथा वैश्विक निवेश कंपनियाँ भारत को दीर्घकालिक निवेश गंतव्य के रूप में और अधिक गंभीरता से देखें। पूंजी प्रवाह बढ़ने से भारतीय उद्योग,अवसंरचना, स्टार्टअप और पूंजी बाजार को नई ऊर्जा सटीकता से मिल सकती है।
साथियों बातें अगर हम भारतीय अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव को समझने की करें तो भारत पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने तथा विकसित भारत-2047 के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में घरेलू बचत के साथ-साथ वैश्विक पूंजी की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।यदि कर कानून सरल,पारदर्शी और निवेश- अनुकूल होंगे,तो भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पोर्टफोलियो निवेश तथा दीर्घकालिक संस्थागत निवेश में वृद्धि संभव है।इससे रोजगार,औद्योगिक उत्पादन, नवाचार और वित्तीय बाजारों की गहराई बढ़ेगी। आर्थिक दृष्टि से यह संशोधन केवल कर नियम नहीं, बल्कि विकास रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ सिद्ध हो सकता है।
साथियों बात अगर हम इस कानून से क्या चुनौतियाँ भी हैं? इसको समझने की करें तो हर कर सुधार के साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी जुड़ी होती हैं।नई परिभाषा लागू होने के बाद यह सुनिश्चित करना होगा कि आयकर विभाग,नियामक संस्थाएँ और निवेशक सभी इसकी एक समान व्याख्या करें। यदि विभिन्न प्राधिकरण अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो वही समस्या पुनः उत्पन्न हो सकती है जिसे समाप्त करने के लिए संशोधन किया गया है।इसके अतिरिक्त छोटे निवेश फंडों और कर सलाहकारों को नए नियमों के अनुरूप प्रशिक्षण और मार्गदर्शन उपलब्ध कराना भी आवश्यक होगा। प्रभावी कार्यान्वयन ही किसी भी कानूनी सुधार की वास्तविक सफलता तय करता है।
साथियों बात अगर हम वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति को समझने की करें तोआज विश्व के अनेक देश विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए कर सुधारों की प्रतिस्पर्धा में लगे हैं। सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, आयरलैंड और लक्ज़मबर्ग जैसे देशों ने स्पष्ट और स्थिर कर नीतियों के कारण वैश्विक निवेशकों का विश्वास अर्जित किया है।भारत के पास विशाल उपभोक्ता बाजार, मजबूत डिजिटल अवसंरचना, कुशल मानव संसाधन और लोकतांत्रिक शासन प्रणाली जैसी बड़ी शक्तियाँ हैं। यदि इनके साथ कर कानूनों में निरंतर सुधार और नीति स्थिरता भी जुड़ती रही,तो भारत वैश्विक निवेश मानचित्र पर और अधिक मजबूत स्थान प्राप्त कर सकता है।आधुनिक कर कानूनों का उद्देश्य केवल सरकार के लिए राजस्व एकत्र करना नहीं है। उनका उद्देश्य ऐसा वातावरण बनाना भी है जिसमें उद्योग, निवेशक और नागरिक सभी विश्वास के साथ आर्थिक गतिविधियाँ कर सकें।आयकर (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026 इसी व्यापक सोच का प्रतीक है। यह दिखाता है कि सरकार कर प्रशासन को अधिक पारदर्शी, सरल और निवेश- अनुकूल बनाने के प्रयास में निरंतर आगे बढ़ रही है। यदि भविष्य में भी इसी प्रकार समय- समय पर स्पष्टता आधारित सुधार होते रहे, तो भारत का वित्तीय तंत्र अधिक मजबूत और प्रतिस्पर्धी बनेगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि विकसित भारत की दिशा में एक शांत लेकिन ऐतिहासिक कदम इतिहास गवाह है कि किसी भी विकसित राष्ट्र की आर्थिक शक्ति केवल उसके उद्योगों या प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित नहीं होती, बल्कि उसके कानूनों की स्पष्टता, संस्थागत विश्वसनीयता और नीति स्थिरता पर भी निर्भर करती है। आयकर (द्वितीय संशोधन) नियम,2026 में स्पेसिफाइड फंड की नई परिभाषा इसी सिद्धांत को व्यवहार में उतारने का प्रयास है।यद्यपि यह संशोधन सामान्य नागरिक की दृष्टि में तकनीकी प्रतीत हो सकता है, किंतु अंतरराष्ट्रीय निवेशकों, वित्तीय संस्थानों और नीति विशेषज्ञों के लिए इसका महत्व अत्यंत व्यापक है। यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन होता है और भविष्य में भी इसी प्रकार पारदर्शी एवं पूर्वानुमेय कर सुधार जारी रहते हैं, तो भारत न केवल वैश्विक निवेश का विश्वसनीय केंद्र बन सकता है, बल्कि विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में भी एक निर्णायक बढ़त हासिल कर सकता है।यह संशोधन हमें यह संदेश देता है कि आर्थिक महाशक्ति बनने की यात्रा केवल बड़े बजट और विशाल परियोजनाओं से नहीं, बल्कि समय पर किए गए सटीक कानूनी सुधारों से भी तय होती है।
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
नीमडीह प्रखंड अंतर्गत बामनी उच्च विद्यालय परिसर में लर्नर लाइसेंस शिविर आयोजित, 106 अभ्यर्थी हुए सफल।
सरायकेला-खरसावां
उपायुक्त-सह-जिला दण्डाधिकारी नितिश कुमार सिंह के निर्देशानुसार जिला परिवहन कार्यालय, सरायकेला-खरसावाँ द्वारा प्रखंडवार लर्नर लाइसेंस (Learner Licence) शिविरों का आयोजन किया जा रहा है। इसी क्रम में आज दिनांक 23 जुलाई, 2026 को नीमडीह प्रखंड अंतर्गत बामनी उच्च विद्यालय परिसर में लर्नर लाइसेंस शिविर का आयोजन किया गया।
शिविर में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार केतुंगा पंचायत के उन अभ्यर्थियों को शामिल किया गया, जिन्होंने पूर्व से ऑनलाइन स्लॉट बुक कराया था। शिविर के दौरान अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन, ऑनलाइन आवेदन की जांच तथा निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप लर्नर लाइसेंस परीक्षा संपन्न कराई गई।
जिला परिवहन कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार शिविर के लिए कुल 159 अभ्यर्थियों का स्लॉट निर्धारित था। इनमें से 106 अभ्यर्थी लर्नर लाइसेंस परीक्षा में सफल हुए, 22 अभ्यर्थी असफल रहे तथा 31 अभ्यर्थी अनुपस्थित रहे। परीक्षा में सफल सभी अभ्यर्थियों को लर्नर लाइसेंस उपलब्ध कराया गया।
शिविर के दौरान मोटर वाहन निरीक्षक (एमवीआई) के साथ प्रखंड प्रशासन के पदाधिकारी एवं कर्मी उपस्थित रहे।
जिला परिवहन पदाधिकारी ने बताया कि प्रखंडवार आयोजित किए जा रहे इन शिविरों का उद्देश्य आम नागरिकों को उनके निकट ही लर्नर लाइसेंस से संबंधित सेवाएं उपलब्ध कराना तथा आवेदन प्रक्रिया को सरल एवं सुगम बनाना है। उन्होंने अभ्यर्थियों से परिवहन विभाग की ऑनलाइन सेवाओं का अधिकाधिक उपयोग करने तथा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप आवेदन एवं स्लॉट बुकिंग सुनिश्चित करने की अपील की।
साथ ही सभी वाहन चालकों से वैध ड्राइविंग लाइसेंस के साथ ही वाहन का परिचालन करने, यातायात नियमों का पालन करने, दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट तथा चारपहिया वाहन चलाते समय सीट बेल्ट का अनिवार्य रूप से उपयोग करने एवं सड़क सुरक्षा के प्रति सदैव सजग रहने की अपील की गई।
शहीद चंद्रशेखर आजाद के भतीजे सुजीत आजाद ने चंद्रशेखर आजाद के 120वीं जयंती पर पूरे देशवासियों को भी बधाई।
लखनऊ
अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के भतीजे सुजीत आजाद ने चंद्रशेखर आजाद के 120वीं जयंती पर पूरे देशवासियों को बधाई दी एवं उनके बताए हुए मार्गों पर चलने का आवाहन किया उन्होंने कहा यह देश आजाद है यह देश चंद्रशेखर आजाद का है सुभाष चंद्र बोस का भगत सिंह का है हमें देश में एकता के साथ रहना चाहिए हमें देश को अखंड भारत बनाकर एकता का प्रतीक का संदेश सारे जहां में लहराना चाहिए।
उन्होंने जंतर मंतर पर छात्रों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शन पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि छात्रों को कभी हिंसक रूप नहीं लेना चाहिए छात्रों को अपनी मांगों को शांतिपूर्ण ढंग से रखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जंतर मंतर हो रहे प्रदर्शन में छात्रों को बहका कर प्रशासन नेताओं के विरुद्ध कदम उठाने पर विवश किया जा रहा है जो की काफी निंदनीय है उन्होंने यह भी कहा कि हमने भी प्रोटेस्ट किया है लेकिन इस तरह से नहीं हमें देश में शांति बनाए रखना चाहिए।
शहीद चंद्रशेखर आजाद के भतीजे एवं हमारे परम मित्र पंडित सुजीत आजाद के साथ एक कार्यक्रम में चंडीगढ़ पंचकूला में मुलाकात हुई थी:- भरत सिंह
वहीं शहीद चंद्रशेखर आजाद के 120वीं जयंती के अवसर पर विश्व हिंदू रक्षा परिषद के प्रभारी संपूर्ण भारत भरत सिंह ने भी पूरे देशवासियों को बधाई देते हुए एकजुट होकर भारत को अखंड भारत बनाने में नौजवानों को सहयोग करने की आवाहन किया।
साथ ही जंतर मंतर पर छात्रों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शन पर भी उन्होंने कहा कि छात्र, नौजवान भारत का भविष्य है और छात्रों को हिंसा का रूप नहीं अपनाना चाहिए शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बातों को रखें हिंसा हमारी पहचान नही। भारत देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान महात्मा गांधी का रहा है और महात्मा गांधी ने कभी भी हिंसा का मार्ग नहीं अपनाया उन्होंने हमेशा अहिंसा के साथ आजादी की लड़ाई लड़ी और हमें आजादी दिलाई है इसलिए छात्रों को भी शांतिपूर्ण ढंग से अपने अधिकारों की मांग करनी चाहिए