जगन्नाथपुर में भव्य श्रीकृष्ण मन्दिर निर्माण के लिए हुआ भूमिपूजन, शामिल हुए पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन।
सरायकेला
भक्ति में ही शक्ति निहित है,पूजा अर्चना से जनता के काम के लिए मिलती है ऊर्जा: चंपाई सोरेन
श्री कृष्ण के तीन गुम्बद वाला बनेगा भव्य मंदिर,58 फिट लम्बाई,37 फिट चौड़ाई व 60 फिट ऊंचाई का होगा मन्दिर
सरायकेला प्रखंड के जगन्नाथपुर स्थित रांगाटांड मैदान में गुरुवार को भगवान श्री कृष्ण के भव्य मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन कार्यक्रम संपन्न हुआ. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व मुख्यमंत्री सह सरायकेला के स्थानीय विधायक चम्पाई सोरेन ने कहा बहुत खुशी की बात है कि आज अन्नपूर्णा पूजा के शुभ मुहूर्त पर जगन्नाथपुर में श्रीकृष्ण मन्दिर का भूमि पूजन हुआ. यह मंदिर पूरे जिले में भव्य मंदिर होगा और जल्द बनकर तैयार होगा इसके लिए हरसंभव सहयोग करेंगे. उन्होंने कहा भक्ति में ही शक्ति है और पूजा अर्चना से क्षेत्र के लोगो के लिए काम करने की नई ऊर्जा मिलती है. उन्होंने कहा मन्दिर निर्माण समेत अन्य सभी आपकी आशा आकांक्षाओं को पूर्ण किया जाएगा.
इससे पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन ने पंडित रामनाथ होता के मंत्रोच्चार के बीच नारियल फोड़ कर विधिवत मन्दिर निर्माण का भूमिपूजन किया. कार्यक्रम में समिति द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री समेत सभी अतिथियों का भव्य स्वागत किया गया. जानकारी हो वर्ष 2007 से क्षेत्रीय गौड़ समाज द्वारा जगन्नाथपुर के रांगाटांड में भव्य रूप से जन्माष्टमी मेला का आयोजन किया जा रहा है. कार्यक्रम में पहुंचे सभी भक्त श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद के रूप में खीर, खिचड़ी,सब्जी का वितरण किया.
पूरे क्षेत्र के लिए आस्था का केंद्र होगा श्रीकृष्ण मन्दिर: सोनाराम
विशिष्ट अतिथि जिला परिषद अध्यक्ष सोनाराम बोदरा ने कहा यह श्री कृष्ण मंदिर पूरे क्षेत्र के लिए भक्ति व आस्था का केंद्र है और जल्द मन्दिर निर्माण का कार्य पूरा किया जाएगा ताकि लोग भक्तिभाव से पूजा अर्चना कर सके.
श्री कृष्ण मंदिर निर्माण क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक होगा: पितोवास प्रधान
सम्मानीय अतिथि गौड़ सेवा संघ के केंद्रीय अध्यक्ष पितोवास प्रधान ने कहा सोलह कलाओं से परिपूर्ण सरायकेला के जगन्नाथपुर में श्रीकृष्ण मन्दिर का निर्माण ऐतिहासिक होगा. समारोह का संचालन उमाकांत प्रधान ने किया जबकि स्वागत भाषण देवीदत्त प्रधान ने दिया व धन्यवाद ज्ञापन हेमसागर प्रधान ने दिया।
दो वर्षों में तैयार होगा भव्य श्री कृष्ण मंदिर
मन्दिर निर्माण समिति के संकल्प के अनुसार जगन्नाथपुर में भव्य श्री कृष्ण मंदिर अगले दो वर्षों में पूरा होगा. श्री कृष्ण के तीन गुम्बद वाला भव्य मंदिर 58 फिट लम्बाई,37 फिट चौड़ाई व 60 फिट ऊंचाई का होगा. मन्दिर का पहला गुम्बद 58 फिट ऊंची,दूसरा गुम्बद 35 फिट व तीसरा गुम्बद 25 फिट का होगा.
ये सम्मानीय अतिथि थे उपस्थित
जिप सदस्य लक्ष्मी सरदार,पंस सदस्य अनिता प्रधान,वकील सोरेन,सनद आचार्य,लिपू मोहंती,बबलू सोरेन,गौड़ सेवा संघ के अध्यक्ष पितोवास प्रधान,महासचिव भास्कर महाकुड़,मनोज सिंहदेव,मायाधर बेहरा,काशीनाथ प्रधान,अशोक गोप,हरेकृष्ण प्रधान,मुरली प्रधान,सुधांशु प्रधान,परमेश्वर प्रधान व असीम प्रधान समेत अन्य अतिथि उपस्थित थे.
कार्यक्रम के सफल आयोजन में इनका योगदान रहा सराहनीय
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव सह मन्दिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नागेश्वर प्रधान,सचिव हेमसागर प्रधान,कोषाध्यक्ष जगन्नाथ प्रधान,विष्णु प्रधान,उमाकांत प्रधान,तीर्थो प्रधान, पंचु महतो,सीताराम मंडल,देवीदत्त प्रधान, प्रधान,शम्भूनाथ प्रधान,ओमप्रकाश प्रधान,सागर प्रधान व टिंकू प्रधान समेत अन्य का कार्यक्रम के सफल आयोजन में सराहनीय योगदान रहा.
श्रीश्री मां शीतला मंदिर तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का हुआ समापन
पूर्वी सिंहभूम/मुसाबनी
मुसाबनी स्थित श्री श्री मां शीतला के मंदिर में शुक्रवार को तीन दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का समापन विधि विधान पूर्वक पूजा अर्चना के साथ संपन्न हो गया। पूजा अर्चना एवं हवन धार्मिक अनुष्ठान का सफल आयोजन चेन्नई से आए हैं पंडितों द्वारा कराया गया। इस मौके पर भक्तों ने पूरे मंदिर परिषर की परिक्रमा की। पूजा अर्चना करने को लेकर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मंदिर में जुटने लगी थी। पूजा अर्चना के बाद भक्तों के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। इस मौके पर काफी संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।मन्दिर परिसर दक्षिण भारतीय वाद्य यंत्रों से गुंजायमान रहा।
बंदना व सोहराई पर्व का रहा धुन, बैल खुंटान व अहीरा गीत पर झुमे ग्रामीण
सरायकेला/ईचागढ़
(मालखान महतो)
ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र में बंदना व सोहराई पर्व की गुंज चारों ओर गुंजायमान है। दिपावली के बाद से ही अलग अलग दिनों में लगातार क्षेत्र में बंदना व सोहराई पर्व मनाया जा रहा है। बंदना पर्व के उपलक्ष्य में बिस्टाटांड़ गांव में ग्रामीण अहीरा गीत गाकर ढोल नगाड़े के जाप पर पुरे गांव का भ्रमण किया एवं बेल खुंटान का रस्म को भी किया गया। बैल को खुंटी में बांधकर ढोल नगाड़े बजाकर नचाया गया। हांलांकि बदलते परिवेश के साथ बैल खुंटान और अहीरा गीत का प्रचलन विलुप्त होने के कगार पर है। गाजे-बाजे और अहीरा गीत के साथ दीपावली के अमावस्या के रात से घर घर जाकर बैलों और पशुधनों को जगाया जाता था और खेती कार्य समाप्ति पर अपने पशुधनों को खुश करने के लिए सामुहिक रूप से अहीरा गीत गाकर रात जगा करते हैं। गाय बैलों व भैंसा का सिंग में तेल सिन्दूर लगाने का रिवाज आज भी किसान बखुबी निभाते हैं और बंदना और सोहराई पर्व को पारम्परिक रूप से मनाते हैं।
छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी 19 अक्टूबर 2025 -अंधकार से प्रकाश, अहंकार से विनम्रता और नरक से मुक्ति का आध्यात्मिक पर्व
नरक चतुर्दशी क़ो हम अपने भीतर की अंधकारमय प्रवृत्तियों, क्रोध, लोभ, द्वेष, असत्य, आलस्य और नकारात्मक विचारों का वध करने का संकल्प लेते हैं।
आज का नरकासुर,पर्यावरण प्रदूषण, लालच आधारित अर्थव्यवस्था, असमानता, और मानसिक तनाव के रूप में हमारे जीवन को घेर रहा है। अब हमें पहले से भी अधिक प्रासंगिक होना है-एडवोकेट किशन सनमुखदासभावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया/महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर भारत की सांस्कृतिक औरधार्मिक परंपराएँ विश्वभर में अपनी गहराई, आध्यात्मिकता और मानवता के संदेश के लिए जानी जाती हैं। दीपावली का पंचदिवसीय महापर्व केवल एक उत्सव नहीं बल्कि मानव जीवन के आत्मिक उत्थान का प्रतीक माना जाता है।इस पंचदिवसीय श्रृंखला का दूसरा दिन“छोटी दिवाली” या “नरक चतुर्दशी”कहलाता है।वर्ष 2025 में यह पावन दिवस 19 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन का महत्व केवल दीप प्रज्ज्वलन तक सीमित नहीं, बल्कि यह मानव जीवन के भीतर बसे अंधकार,नकारात्मकता और अहंकार को मिटाने का प्रतीकात्मक संदेश देता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह पर्व भारत ही नहीं,बल्कि विश्वभर में बसे भारतवंशियों के बीच भी समान श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। छोटी दिवाली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि यह मानवता के भीतर छिपे अंधकार,जैसे अहंकार, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध और मोह,पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।चूँकि हमें अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से जानना कि आखिर छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी क्यों कहा जाता है, इस दिन किसकी पूजा की जाती है और यह पर्व क्यों मनाया जाता है?
एडवोकेट किशन सनमुखदासभावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
साथियों बात अगर हम छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी क्यों कहा जाता है,इसको जानने की करें तो अधर्म,अहंकार और अंधकार पर धर्म,नम्रता और प्रकाश की विजय का प्रतीक हैँ,छोटी दिवाली का नाम“नरक चतुर्दशी”इसलिए पड़ा क्योंकि यह दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध से जुड़ा हुआ है।हिंदूधर्मग्रंथों के अनुसार, नरकासुर नामक असुर ने अत्याचार और अधर्म का साम्राज्य स्थापित कर रखा था। उसने पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों को आतंकित कर रखा था। नारी की अस्मिता का अपमान, साधुओं का अपमान और दैवीय शक्तियों को चुनौती देना उसका स्वभाव बन गया था। अंततः भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार में,अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर उसका अंत किया।कहा जाता है कि जब नरकासुर का वध हुआ, तो उसने अंतिम समय में श्रीकृष्ण से वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु के दिन जो लोग स्नान और दीपदान करें, उन्हें नरक का भय न रहे। भगवान श्रीकृष्ण ने यह वरदान स्वीकार किया।तभी से यह दिन “नरक चतुर्दशी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसका अर्थ है, वह चतुर्दशी जो नरक से मुक्ति का मार्ग दिखाए।छोटी दिवाली इसीलिए कही जाती है क्योंकि यह मुख्य दिवाली के एक दिन पहले आती है, और इसमें दीप जलाने की परंपरा आरंभ हो जाती है। परंतु इसके पीछे का भाव कहीं अधिक गहरा है,यह दिन हमें सिखाता है कि असली नरक बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और असत्य के रूप में है। जब हम इनसे मुक्त होते हैं, तब सच्ची “छोटी दिवाली” हमारे जीवन में आती है-जब हम अपने भीतर के अंधकार को सटीक दूर कर आत्मिक प्रकाश जलाते हैं आधुनिक वैश्विक संदर्भ में यदि देखें तो “नरक चतुर्दशी” एक सार्वभौमिक संदेश देती है कि प्रत्येक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के भीतर जो अंधकार,अन्याय, हिंसा, लालच और भेदभाव,फैला हुआ है,उसे सत्य, सद्भाव और प्रकाश से मिटाना ही सच्चा उत्सव है। यह दिन हर व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि नरकासुर जैसी प्रवृत्तियाँ हर युग में मौजूद रहती हैं,बस उनके रूप बदलते रहते हैं। आज का नरकासुर पर्यावरण प्रदूषण,लालच आधारित अर्थव्यवस्था, असमानता, और मानसिक तनाव के रूप में हमारे जीवन को घेर रहा है। इसलिए छोटी दिवाली का संदेश आधुनिक समय में पहले से भी अधिक प्रासंगिक है।
साथियों बात अगर हम नरक चतुर्दशी के दिन किसकी पूजा की जाती है, इसको समझने की करें तो,नरक चतुर्दशी के दिन तीन प्रमुख देवताओं की पूजा की परंपरा है,यमराज,भगवान श्रीकृष्ण,और देवी लक्ष्मी।(क)यमराज पूजा-इस दिन यमराज की पूजा का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर यमराज को दीपदान करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं सताता और उसे यमलोक का दर्शन नहीं करना पड़ता। इसे “यम दीपदान” कहा जाता है।घर के बाहरदक्षिण दिशा में एक दीप जलाकर कहा जाता है,”मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालिना श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥” इसका अर्थ है कि इस दीप के माध्यम से मैं यमराज को प्रसन्न कर उनसे दीर्घायु और सुखमय जीवन की प्रार्थना करता हूँ।(ख) श्रीकृष्ण पूजा-भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन अधर्म पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए उन्हें विजयी और धर्म के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। भक्त उनके चरणों में पुष्प, फल और दीप अर्पित करते हैं। उनके साथ देवी सत्यभामा की भी पूजा की जाती है, क्योंकि नरकासुर के वध में देवी का योगदान महत्वपूर्ण रहा था। (ग) लक्ष्मी पूजा और रूप चौदस-इस दिन “रूप चौदस” भी कहा जाता है। प्रातःकाल तेल स्नान, उबटन, और शुद्धिकरण के बाद सौंदर्य और स्वास्थ्य की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन स्नान और शुद्ध आचरण करता है, उसके शरीर और मन में दीर्घकालिक सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।रूप चौदस के दिन स्त्रियाँ और पुरुष दोनों अपने रूप, स्वास्थ्य और आभा की रक्षा के लिए स्नान, तेल, चंदन और सुगंधित वस्तुओं का उपयोग करते हैं। यह न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि यह शरीर से विषाक्त तत्वों को निकालने और त्वचा को स्वस्थ रखने का उपाय माना गया है।आधुनिक वैश्विक समाज में जहां “वेलनेस” और “मेंटल हेल्थ” की चर्चा प्रमुख हो गई है, नरक चतुर्दशी की यह परंपरा हमें यह बताती है कि आत्मिक और शारीरिक शुद्धता दोनों का संगम ही सच्चा स्वास्थ्य है।
साथियों बात अगर हम नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है इसको समझने की करें तो,आत्मशुद्धि, पाप मुक्ति और प्रकाश की ओर मानव यात्रा का उत्सव हैँ,नरक चतुर्दशी का मुख्य उद्देश्य केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और पापमुक्ति का मार्ग है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन में हर मनुष्य से भूलें होती हैं, और उन भूलों से ऊपर उठने के लिए आत्मचिंतन, स्नान और दीपदान के माध्यम से हम भीतर का “नरक” साफ कर सकते हैं।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करता है, वह पापों से मुक्त होता है। इस स्नान को “अभ्यंग स्नान” कहा जाता है। यह केवल शारीरिक शुद्धि नहीं,बल्कि मानसिक और भावनात्मक शुद्धि का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि तेल से स्नान करने से शरीर से नकारात्मक ऊर्जा निकलती है, और मन में प्रकाश का प्रवेश होता है।नरक चतुर्दशी हमें यह सिखाती है कि हर व्यक्ति के भीतर दो शक्तियाँ होती हैं,एक अंधकारमय (नरकासुर जैसी) और दूसरी प्रकाशमय (कृष्ण जैसी)। इस दिन हम अपने भीतर की अंधकारमय प्रवृत्तियों,जैसे क्रोध, लोभ, द्वेष, असत्य, आलस्य और नकारात्मक विचारों का वध करने का संकल्प लेते हैं। जब व्यक्ति इस अंतर्द्वंद से ऊपर उठता है, तभी वह सच्चा “प्रकाश” प्राप्त करता है।आज जब पूरी दुनिया तनाव, असमानता,युद्ध औरआत्मकेंद्रित जीवनशैली से जूझ रही है, तब नरक चतुर्दशी जैसे पर्व वैश्विक समाज को यह प्रेरणा देते हैं कि आत्मशुद्धि, विनम्रता और प्रकाश की ओर बढ़ना ही मानवता का मार्ग है। यह केवल धार्मिक दिन नहीं बल्कि “स्पिरिचुअल रीसेट डे” कहा जा सकता है,जब हम अपने भीतर के अंधकार को पहचानते हैं और उसे मिटाने का संकल्प लेते हैं।
साथियों बातें अगर हम छोटी दिवाली का सांस्कृतिक, सामाजिक और वैश्विक महत्व की करें तो,भारत में छोटी दिवाली का उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक एकता, पारिवारिक प्रेम और सामूहिक स्वच्छता का भी प्रतीक है। गाँवों और नगरों में लोग इस दिन अपने घरों की अंतिम सफाई करते हैं, मिट्टी के दीये जलाते हैं, और पड़ोसियों के साथ मिठाइयाँ बांटते हैं। यह पर्व समाज में “साझा प्रकाश” का संदेश देता है कि अंधकार केवल अपने घर से नहीं, पूरी बस्ती से मिटाना चाहिए।अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में छोटी दिवाली का संदेश सार्व भौमिक है,यह केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं। आज अमेरिका,ब्रिटेन,कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में बसे भारतीय समुदाय इस दिन न केवल दीप जलाते हैं बल्कि स्थानीय समाज को भी इसमें शामिल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपियन संसद और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ दीपावली को “ग्लोबल सेलिब्रेशन ऑफ़ लाइट ” के रूप में मान्यता दे चुकी हैं। ऐसी स्थिति में छोटी दिवाली का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह मुख्य दीपावली से एक दिन पहले मानवता के भीतर के नरक को मिटाने की तैयारी का दिन है।नरक चतुर्दशी का गूढ़ अर्थ केवल पौराणिक कथा तक सीमित नहीं है।“नरक”का अर्थ है,मानसिक पीड़ा,अवसाद,लालच,और वह अंधकार जो मनुष्य के भीतर उसे असत्य के मार्ग पर ले जाता है। “चतुर्दशी” का अर्थ है — पूर्णता के पूर्व की अवस्था, अर्थात् वह क्षण जब प्रकाश पूरी तरह प्रकट होने वाला है। इसलिए नरक चतुर्दशी का दिन आत्मिक परिवर्तन का समय है,जब मनुष्य अपने भीतर झाँककर कहता है:“अब मैं अंधकार से मुक्त होकर प्रकाश की ओर बढ़ूँगा।” यह आत्मसंवाद ही नरक चतुर्दशी का सार है। श्रीकृष्ण का नरकासुर वध केवल बाह्य घटना नहीं, बल्कि एक प्रतीक है,जब मनुष्य अपनी इच्छाओं और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करता है, तब वह “नरकासुर”का अंत करता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि इस प्रकार छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी केवल दीपों का पर्व नहीं,बल्कि आत्मज्ञान, शुद्धि और अहंकार मुक्ति का दिन है। यह हमें सिखाती है कि असली उत्सव बाहर नहीं, भीतर मन में होता है। जब हम अपने भीतर के अंधकार को दूर करते हैं, तो पूरी दुनिया रोशन होती है।इस दिन किया गया दीपदान केवल घर के द्वार को नहीं, बल्कि आत्मा के द्वार को भी प्रकाशित करता है। यमराज की आराधना हमें मृत्यु का भय नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सजगता सिखाती है। श्रीकृष्ण की पूजा हमें धर्म की रक्षा और अन्याय के अंत का संदेश देती है, जबकि लक्ष्मी पूजा हमें सिखाती है कि सौंदर्य केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक पवित्रता में निहित है।छोटी दिवाली 2025 इसीलिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि मानवता को यह स्मरण कराने का अवसर है कि जब तक भीतर का अंधकार मिटेगा नहीं, तब तक बाहर के दीप अधूरे रहेंगे। यह पर्व विश्व के हर कोने में रहने वाले व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है,“हम अपने भीतर का नरकासुर समाप्त करें, तभी सच्ची दिवाली आएगी।”
संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावानानी गोंदिया महाराष्ट्र
दीपावली व धनतेरस को लेकर कोल्हान का सबसे बड़ा सप्ताहिक बाजार में जमकर हुई खरीदारी
सरायकेला/ईचागढ़
(मालखान महतो)
सरायकेला-खरसावां जिला के कुकड़ु प्रखंड क्षेत्र के कोल्हान का सबसे बड़ा कुकड़ू सप्ताहिक बाजार में शुक्रवार को दीपावली व धनतेरस को लेकर लोगों ने जमकर खरीदारी किया। मिट्टी के दीया, वर्तन एवं बकरों का दुकानों में काफी भीड़-भाड़ रहा। लोग गोवर्धन पूजा व गौ माता की पूजा के लिए भी सिंदुर एवं रंग बिरंगी रंगों और साजो समानों का खरीदारी किया। काली पूजा को लेकर बकरों का बिक्री पांच हजार से लेकर 15 हजार रुपए तक हुई। सप्ताहिक पशु व कृषि बाजार में अन्य सप्ताह के तुलना में काफी भीड़-भाड़ रहा। बाइक और चार पहिया वाहन रखने का तक जगह कम पड़ रहा था।
वहीं ग्रामीणों ने बताया कि धनतेरस,काली पूजा एवं बांदना पर्व को लेकर मीट्टी का दीया, वर्तन,बांस के टोकरी ,झाड़ू ,सुप एवं पशु धनों के लिए साजो सामान का खरीदारी किया गया। मालूम हो कि कुकड़ू सप्ताहिक पशु व कृषि बाजार में झारखंड के अलावा बंगाल और बिहार के भी पशु व्यवसायिक , कपड़े व्यापारी आदि पहुंचते हैं। दीपावली को लेकर लोगों में खास उत्साह देखा गया।
चीनी लाइटों और चीनी दीया से पारम्परिक स्वदेशी मीट्टी कारीगरों पर आ रही
सरायकेला/ईचागढ़
(मालखान महतो)
पारम्परिक मीट्टी के दीए और दीवाली पर सजने वाले मीट्टी के साजो सामान पर चीनी वस्तुओं से ग्रहण लग रहा है। जहां दीपावली में लोग मीट्टी के दीए से अपने घर और आंगन को सजाते थे, मीट्टी के बर्तनों का जमकर उपयोग किया जाता था,आज चीनी लाइटों, दीया और प्लास्टिक उत्पादों ने जगह बना ली, जिससे पारम्परिक स्वदेशी मीट्टी के वस्तुओं के निर्माता खास कर कुम्हारों की स्थिति दयनीय होते जा रहा है।
ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र के नदीसाईं एवं बोड़ा गांव में आज भी पारम्परिक रूप से प्राचीन काल की तरह कुम्हार अपने चक्की को घुमाकर मीट्टी के दीए , वर्तन,हंडी आदि का निर्माण कर रहे हैं। आधुनिक तकनीकी के इस युग में भी कुम्हार आज भी पारम्परिक चक्की को लाठी के सहारे चलाकर जी तोड़ मेहनत कर मीट्टी का समानों का निर्माण कर अपने पारम्परिक कारीगरी को जिंदा रखे हुए हैं। ऐसे समय में चीनी लाइट, दीया व अन्य सामान मीट्टी के समानों का स्थान ले रहा है, जिससे पारम्परिक और मीट्टी का समान निर्माण करने वाले कारीगरों के सामने बड़ा चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इस दिवाली के लिए कुम्हार अपने पारम्परिक रूप से दीया व वर्तन आदि का निर्माण में लगे हुए हैं। रंजीत कुम्हार बताते हैं कि सरकारी सहायता के अभाव में आज के युग में भी पारम्परिक चक्की से मीट्टी का दीया व वर्तन का निर्माण किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पुरे परिवार एक महीने से इस काम में लगे हुए हैं। दिवाली में बिकने वाले दीया पहले जैसा नहीं बिक रहा है। उन्होंने कहा कि अगर सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी और आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराई जाएगी तो कम समय में अधिक निर्माण होगा और आमदनी भी बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि ऐसा ही स्थिति रहा तो आने वाले समय में पारम्परिक मिट्टी का निर्माण बंद हो जाएगा, चुंकि आधुनिकता इस दौड़ में युवा वर्ग पुराने जमाने का निर्माण विधि को अपनाना नहीं चाहते हैं।
धनतेरस 18 अक्टूबर 2025- समृद्धि, स्वास्थ्य, आस्था और वैश्विक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक पर्व
भारत में धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ, वाहन और गहने खरीदने की परंपरा है
आधुनिक युग में धनतेरस ने अपने धार्मिक स्वरूप से आगे बढ़कर वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों को भी अपने साथ जोड़ा है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया/महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर भारत की संस्कृति में दीपावली केवल एक दिन का उत्सव नहीं,बल्कि पाँच दिवसीय आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा है। इस यात्रा की शुरुआत जिस दिन से होती है,वह दिन है धनतेरस,समृद्धि, आरोग्य और शुभारंभ का पर्व। वर्ष 2025 में धनतेरस 18 अक्टूबर, शनिवार को मनाया जा रहा है। यह दिन न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में बसे करोड़ों भारतीयों के लिए दिवाली की शुरुआत का प्रतीक है। आधुनिक युग में धनतेरस ने अपने धार्मिक स्वरूप से आगे बढ़कर वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों को भी अपने साथ जोड़ा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि धनतेरस का उद्भव वैदिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। पुराणों में उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय, देवताओं और असुरों के बीच जब अमृत कलश प्राप्त हुआ,उसी समय धन्वंतरि भगवान,जो आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं,अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।यही दिन त्रयोदशी तिथि का था, जो कार्तिक कृष्ण पक्ष की होती है। इसी कारण इसे धन्वंतरि त्रयोदशी कहा गया,जो आगे चलकर“धनतेरस”के नाम से प्रसिद्ध हुआ।धन्वंतरि देव का आगमन जीवन में स्वास्थ्य, दीर्घायु और संतुलन का प्रतीक है। भारत में प्राचीन काल से ही स्वास्थ्य को धन के समान माना गया है “आरोग्यं परमं भाग्यं, स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्।” अर्थात् आरोग्य ही सबसे बड़ा धन है। इसीलिए धनतेरस पर लोग न केवल सोना-चांदी या बर्तन खरीदते हैं,बल्कि आरोग्य, स्वच्छता और संतुलित जीवन के संकल्प भी लेते हैं।
साथियों बात अगर हम धनतेरस: शुभ क्रय और आर्थिकप्रतीकवाद को समझने की करें तो, भारत में धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ, वाहन और गहने खरीदने की परंपरा है। इसे शुभ मुहूर्त का प्रतीक माना जाता है। यह दिन वर्ष का वह क्षण होता है जब अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता भावनाओं का चरमोत्कर्ष देखा जाता है। 2025 के लिए अनुमान है कि भारतीय बाजार में धनतेरस पर लगभग 65,000 करोड़ रूपए से अधिक का कारोबार होगा,जिसमें आभूषण उद्योग,वाहन,मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण,गृह सज्जा और स्टील-बर्तन उद्योग अग्रणी होंगे।इस दिन का आर्थिक महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुबई, लंदन, न्यूयॉर्क, सिंगापुर, मेलबर्न, टोरंटो और नैरोबी जैसे महानगरों में बसे प्रवासी भारतीय समुदाय भी इस दिन ‘धनतेरस शॉपिंग फेस्टिवल’आयोजित करते हैं। यह दर्शाता है कि भारतीय परंपरा अब एक वैश्विक ब्रांड पहचान में परिवर्तित हो चुकी है।
साथियों बात अगर हम आयुर्वेद और स्वास्थ्य का दिवस:धन्वंतरि पूजा का गूढ़ अर्थ, पर्यावरणीय दृष्टिकोण व सामाजिक एकजुट को समझने की करें तो धनतेरस केवल धन-संपदा का नहीं,बल्कि स्वास्थ्य-संपदा का पर्व हैभगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है। इस दिन चिकित्सक, वैद्य, फार्मासिस्ट, योग प्रशिक्षक और स्वास्थ्य संस्थान विशेष पूजन-अर्चन करते हैं।2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन और आयुष मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से “ग्लोबल आयुर्वेदा वैलनेस डे” के रूप में धनतेरस को मान्यता देने की पहल भी चल रही है। यह एक ऐसी ऐतिहासिक दिशा होगी जिसमें भारतीय चिकित्सा ज्ञान को वैश्विक आयुर्विज्ञान के मानचित्र पर स्थान मिलेगा।धनतेरस और पर्यावरणीय दृष्टिकोण-धनतेरस का एक गहरा संदेश“संपन्नता के साथ स्थिरता”का भी है। वर्तमान समय में जब उपभोक्तावाद चरम पर है, यह पर्व हमें याद दिलाता है कि वास्तविक समृद्धि वही है जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखे।मिट्टी के दीपक जलाना, तांबे- पीतल के बर्तन खरीदना, और स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देना पर्यावरणीय दृष्टि से भी सार्थक कदम हैं।
वर्ष 2025 में पर्यावरणविदों ने यह आह्वान किया है कि धनतेरस पर इको-फ्रेंडली खरीदारी की जाए,जैसे ऊर्जा-संवर्धन करने वाले उपकरण, सौर लैंप, या स्थायी धातु से बने उत्पाद। यह कदम “ग्रीन धनतेरस” की अवधारणा को आगे बढ़ा रहा है।धनतेरस और सामाजिक एकजुटता-धनतेरस का एक बड़ा पक्ष सामाजिक समरसता और सहानुभूति का है। परंपरागत रूप से इस दिन घर में दीप जलाए जाते हैं ताकि अंधकार, गरीबी और दुख को दूर किया जा सके। आधुनिक संदर्भ में इसका अर्थ है,समाज के वंचित वर्ग तक प्रकाश पहुँचाना।अनेक सामाजिक संगठन और एनजीओ धनतेरस के दिन गरीबों को वस्त्र, बर्तन और मिठाइयाँ वितरित करते हैं।कटनी, वाराणसी, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, दुबई और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में प्रवासी भारतीय संगठन इस दिन “शेयर द लाइट मूवमेंट”नामक कार्यक्रम चलाते हैं,जिसमें जरूरतमंद परिवारों के घर रोशनी और मुस्कान पहुँचाई जाती है।
साथियों बात अगर हम विश्व पटल पर धनतेरस का विस्तार को समझने की करें तो, आज धनतेरस केवल भारतीयों का त्योहार नहीं रह गया है। यह एक ग्लोबल सांस्कृतिक इवेंट बन चुका है।लंदन में “दिवाली ऑन द स्क्वायर ” नाम से जो आयोजन होता है,वहाँ हर वर्ष लाखों लोग भाग लेते हैं। इस आयोजन की शुरुआत धनतेरस के दिन होती है।सिंगापुर, मलेशिया, फिजी, मॉरीशस, ट्रिनिडाड, और कनाडा जैसे देशों में धनतेरस के अवसर पर “फेस्टिवल ऑफ़ वेल्थ एंड हेल्थ”नाम से सार्वजनिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।2025 में अमेरिका के न्यू जर्सी, डलास, और कैलिफोर्निया के भारतीय संघों ने भी धनतेरस पर “ग्लोबल धन्वन्तरि कांफ्रेंस 2025” आयोजित करने की घोषणा की है। इस सम्मेलन में स्वास्थ्य, योग, आयुर्वेद और वित्तीय जागरूकता पर चर्चा होगी,जो दिखाता है कि यह पर्व कितनी बहुआयामी प्रासंगिकता रखता है। साथियों बात अगर हम धनतेरस और डिजिटल युग कीकांबिनेशन को समझने की करें तो ,वर्तमान डिजिटल युग में धनतेरस ने नई पहचान प्राप्त की है। ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म्स जैसे अमेज़ॉन, फ्लिपकार्ट टाटा क्लिक, और रिलायंस डिजिटल इस दिन विशेष “धनतेरस फेस्टिव सेल ” लॉन्च करते हैं।2025 में इन ऑनलाइन बिक्री से भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में लगभग 25,000 करोड़ रूपए का अतिरिक्त प्रवाह होने का अनुमान है।डिजिटल पेमेंट्स, यूपीआई और रुपे कार्ड जैसी तकनीकें इस दिन के आर्थिक व्यवहार को पारदर्शिता और गति देती हैं।
धनतेरस अब केवल बाजारों की चमक तक सीमित नहीं, बल्कि यह डिजिटल समृद्धि का प्रतीक भी बन चुका है,जो “नए भारत” की पहचान को दर्शाता है। साथियों बात अगर हम परिवार और परंपरा,घर की लक्ष्मी का स्वागत व धनतेरस और आधुनिक युवा पीढ़ी को समझने की करें तो,धनतेरस के दिन भारतीय घरों में सुबह से ही सजावट शुरू हो जाती है। लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करते हैं, नए वस्त्र पहनते हैं और द्वार पर स्वस्तिक और शुभ-लाभ के चिन्ह बनाते हैं। सायंकाल के समय दीपदान किया जाता है,विशेषकर तुलसी और मुख्य द्वार पर दीप जलाने का विधान है।गृहस्थ इस दिन “यम दीपदान” भी करते हैं,मान्यता है कि इस दीपक की ज्योति से मृत्यु और भय का निवारण होता है। यह प्रतीकात्मक रूप से “प्रकाश से अंधकार पर विजय” का संदेश देता है। घर की स्त्रियाँ इस दिन “लक्ष्मी आराधना” का प्रारंभ करती हैं, जिससे दीपावली की मुख्य पूजा का मंगल आरंभ माना जाता है।धनतेरस और आधुनिक युवा पीढ़ी-नई पीढ़ी के लिए धनतेरस केवल पूजा का दिन नहीं,बल्कि स्व-विकास और वित्तीय अनुशासन की प्रेरणा भी है।भारत के शहरी युवाओं में धनतेरस पर म्यूचुअल फंड, सोने के बॉन्ड, या डिजिटल गोल्ड में निवेश करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।2025 में वित्त विशेषज्ञों ने इसे “फाइनेंसियल वैलनेस फेस्टिवल” का नाम दिया है,जो दर्शाता है कि आज की पीढ़ी इस परंपरा को आर्थिक साक्षरता के माध्यम से पुनःपरिभाषित कर रही है।
साथियों बात अगर हम धनतेरस और भारतीय अर्थव्यवस्था का मनोवैज्ञानिक पहलू व धनतेरस और महिला सशक्तिकरण को समझने की करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था में त्योहारों का प्रभाव गहरा होता है।धनतेरस वह क्षण है जब करोड़ों उपभोक्ता नई खरीदारी के लिएसकारात्मक मानसिकता में होते हैं। इसउत्साह से मांग बढ़ती है,उत्पादन को गति मिलती है,और रोज़गार सृजन को बल मिलता है। अर्थशास्त्रियों का मत है कि भारत की जीडीपी में त्योहारों के सीज़न के दौरान लगभग 2पेर्सेंट तक का उछाल देखा जा सकता है।इस प्रकार धनतेरस केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि आर्थिक इंजन का उत्प्रेरक भी है।धनतेरस और महिला सशक्तिकरण -धनतेरस के दिन घर की “गृहलक्ष्मी” को केंद्र में रखा जाता है। यह सांस्कृतिक रूप से नारी शक्ति का सम्मान है।आज के युग में महिलाएँ न केवल परिवार की रक्षक हैं, बल्कि वित्तीय निर्णयों में समान भागीदारी निभा रही हैं। इस दिन कई बैंक और फिनटेक संस्थान महिलाओं के लिए “स्वर्ण निवेश योजना” या “धन लक्ष्मी सेविंग प्रोग्राम” जैसी योजनाएँ लॉन्च करते हैं।यह दिखाता है कि परंपरा और आधुनिकता का संगम किस प्रकार महिला सशक्तिकरण के माध्यम से सामाजिक समृद्धि में परिवर्तित हो रहा है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि धनतेरस समृद्धि का नया अर्थ, धनतेरस 2025 केवल तिथि नहीं, बल्कि एक विचार हैँ कि सच्चा धन वह है जो बाँटने से बढ़ता है, और सच्ची समृद्धि वह है जो सबके जीवन में प्रकाश लाए। चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक हो या आध्यात्मिक धनतेरस हमें यह सिखाता है कि हर उपलब्धि का अर्थ तभी है जब वह साझी खुशी में परिवर्तित हो। इसलिए जब 18 अक्टूबर 2025 की संध्या में दीपक जलें, तो वे केवल घरों में नहीं, मानवता के हृदयों में भी उजियारा करें।यह धनतेरस नई चेतना,नईजिम्मेदारी और नई वैश्विक संस्कृति का उद्घोष बने,जहाँ आरोग्य, समृद्धि और सद्भाव एक साथ दीपित हों।
संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावानानी गोंदिया महाराष्ट्र
छठ पर्व को लेकर क्षेत्र का मुसाबनी कम्पनी तालाब छठ घाट की साफ सफाई का कार्य प्रारंभ
मुसाबनी
आस्था का पर्व छठ 24 अक्टूबर से प्रारंभ होना है। जहां नेता घाटशिला विधानसभा उपचुनाव की तैयारी में लगे हैं, वहीं छठ घाट कमिटी छठ की तैयारी में लग गई है। मुसाबनी नंबर तीन स्थित कंपनी तालाब छठ घाट की साफ सफाई का काम प्रारंभ हो गया है, इसको लेकर एक सप्ताह से तालाब में उग आई जलकुंभी एवं आसपास की झाड़ियां को साफ करने का कार्य मजदूरों द्वारा किया जा रहा है। इस बारे में छठ कमिटी के संस्थापक गणेश प्रसाद ने जानकारी देते हुए बताया कि छठ मैया की आराधना का पर्व पूरी आस्था के साथ हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी मनाया जाना है। छठ कमेटी इसको लेकर बृहद तैयारी कर रही है, जिसमें सबसे पहले घाट की साफ सफाई का काम रंग रोगन का काम प्रारंभ कर दिया गया है।
उसके साथ ही 25 एकड़ में फैले इस तालाब में उग आई जलकुंभी की सफाई का काम किया जा रहा है, जिसके लिए मजदूर लगाए गए हैं, समय से पूर्ण यह कार्य पूरा कर लिया जाएगा।।
इसके अलावा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए लाइट की व्यवस्था, आसपास की नालियों की साफ सफाई के साथ ही श्रद्धालुओं के घाट पर सुविधा के साथ बैठने की व्यवस्था की जा रही है। 24 अक्टूबर को नहाए खाए के साथ महिलाएं घरों में प्रसाद के लिए आटा तैयार करने हेतु गेहूं की साफ सफाई धुलाई का काम करेगी, घरों की सफाई करेंगे एवं शुद्ध मन से इस तैयारी में लगेगी। इस वर्ष भी हर वर्ष की भांति बृहद रूप से ठेकुआ के प्रसाद का निर्माण छठ घाट पर ही कराया जाएगा, जिसके लिए भी तैयारी की जा रही है।
नंबर वन बना प्रवीण सेवा संस्थान का पूजा पंडाल बना , ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया दुर्गे देवी नमस्तुते अवार्ड 2025’ से किए गए सम्मानित
सरायकेला/आदित्यपुर
जमशेदपुर : इस वर्ष की दुर्गा पूजा में प्रवीण सेवा संस्थान का पूजा पंडाल बना नंबर वन, ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया दुर्गे देवी नमस्तुते अवार्ड 2025’ से किया गया सम्मानित।
प्रवीण सेवा संस्थान, श्री श्री दुर्गा पूजा समिति आदित्यपुर ने अपने भव्य एवं अद्वितीय पंडाल से शहरवासियों का दिल जीत लिया। द टाइम्स ऑफ इंडिया की ओर से आयोजित ‘दुर्गे देवी नमस्तुते अवार्ड 2025’ में इस पूजा पंडाल को नंबर वन का स्थान प्राप्त हुआ।
पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन बिष्टूपुर स्थित श्रीलेदर्स में किया गया, जहां द टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक बप्पा मजूमदार ने पूजा समिति के प्रेस प्रभारी सह ईचागढ़ के पूर्व विधायक अरविंद कुमार सिंह के आप्त सचिव सुनील गुप्ता को प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिन्ह प्रदान किया। संस्थान को दो श्रेणियों में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ — ऑनलाइन पसंद श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ पूजा पंडाल, और जजों की थीम श्रेणी में प्रथम स्थान।
इस वर्ष प्रवीण सेवा संस्थान की ओर से तैयार पंडाल की थीम “राजस्थान के उदयपुर का महल” रही। यह पंडाल न केवल भव्यता में अद्वितीय था, बल्कि सांस्कृतिक सौंदर्य का उत्कृष्ट उदाहरण भी बना। पंडाल की थीम ने विशेष रूप से मारवाड़ी समाज को गौरवान्वित किया। इस अवसर पर समिति के संरक्षक एवं ईचागढ़ के पूर्व विधायक अरविंद सिंह उर्फ मलखान सिंह को विशेष रूप से प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। सिंहभूम चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष विजय आनंद मूनका ने भी समारोह में भाग लिया और समिति की इस रचनात्मक पहल की सराहना करते हुए कहा कि “इस तरह का प्रयास पहली बार देखा गया है, जिससे मारवाड़ी समाज को गौरव की अनुभूति हुई है।”
पंडाल चयन समिति में चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. जय भादुड़ी, केपीएस स्कूल के डायरेक्टर श्रीकांत नायक और प्रसिद्ध कलाकार सुमन प्रसाद शामिल थे, जिन्होंने विभिन्न मापदंडों पर पंडालों का मूल्यांकन किया।
द टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूज के माध्यम से जमशेदपुर में दुर्गा पूजा पंडालों को लेकर एक विशेष अभियान चलाया गया, जिसमें पंडालों के मैनेजमेंट, थीम, सजावट और जनसहभागिता के आधार पर चयन किया गया। इस प्रक्रिया में प्रवीण सेवा संस्थान, आदित्यपुर का पंडाल सभी मानदंडों पर खरा उतरा और सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया।
समिति के प्रमुख और टीम का सम्मान
पूजा कमेटी के प्रेस प्रभारी सह ईचागढ़ के पूर्व विधायक अरविंद कुमार सिंह के आप्त सचिव सुनील गुप्ता ने इस पूरी टीम को सफलता को आस्था और टीमवर्क का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि “यह सम्मान हमारी पूरी समिति और भक्तों के समर्पण का प्रतीक है।”
महालिमोरूप में लक्ष्मी पूजा के अवसर पर हुई संगीत संध्या, झूमे लोग
सरायकेला
(पारस कुमार होता)
प्रखण्ड सरायकेला अन्तर्गत महालिमोरूप गाँव के श्री श्री सार्वजनिक लक्ष्मी पूजा कमिटी की ओर से सोमवार को बड़े ही श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मां लक्ष्मी पूजा का आयोजन धूमधाम से किया गया. सुबह से ही श्रद्धालु मंदिर परिसर में पहुंचने लगे और पूरे वातावरण में मां लक्ष्मी के जयकारे एवं मंत्रोच्चार की गूंज सुनाई देने लगी. कमिटी के सदस्यों ने विधि-विधान के साथ मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर क्षेत्र में सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की का मना की।
पूजा के दौरान महिलाओं ने पारंपरिक परिधान धारण कर भक्ति भाव से पूजा में भाग लिया. कई श्रद्धालुओं ने परिवार सहित मां लक्ष्मी के समक्ष दीप जलाकर आशीर्वाद प्राप्त किया. इस अवसर पर भक्तों के बीच भोग एवं प्रसाद का वितरण किया गया. मंदिर परिसर को फूलों, झालरों और रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया था, जिससे पूरे वातावरण में आध्यात्मिक आभा छा गई थी.
वहीं पूजा आयोजन कमिटी द्वारा शाम को संगीत संध्या कार्यक्रम रखा गया था। इसका लुफ्त उठाने के लिए महालिमोरूप व आस पास गाँव के लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। जमशेदपुर के कलाकारों ने ऐसी मधुर नृत्य गीत संगीत की प्रस्तुति दी जिसे देखकर व सुनकर श्रोता मंत्र मुग्ध हो गए। यही नहीं बल्कि लोगों को झूमते हुए भी देखा गया।
मौके पर महालिमोरूप के ग्राम प्रधान श्यामसिंह मुंडरी, वार्ड सदस्य दुर्गा मुंडरी, शैलेंद्र हेम्ब्रम, शंभु महली, अनिरुद्ध प्रमाणिक, हेमसागर प्रधान साहिल मुंडरी, कृष्णा मुंडरी समेत पूजा कमेटी सदस्य व अन्य लोग उपस्थित थे।
प्रतिमा विसर्जन के साथ पांच दिवसीय मनसा पूजा का हुआ समापन
सरायकेला
(पारस कुमार होता)
प्रखंड सरायकेला के जगन्नाथपुर गावं में पांच दिवसीय माता मनसा पूजा का प्रतिमा विसर्जन के साथ समापन हो गया. इससे पूर्व माता मनसा की विधिपूर्वक पूजा अर्चना कर मंदिर परिसर से भव्य शोभा यात्रा निकाली गयी जो पूरे गावं का भ्रमण कर जलाशय तक पहुंची जहां माता का प्रतिमा का विधिवत विसर्जन किया गया. इस दौरान आसछे बोछोर आबार एशो मां… व माता मनसा के जयकारे से पूरा क्षेत्र गूंज उठा.
साथ ही कई भक्त माता की भक्ति में झूमते हुए माता के जयकारे लगाए. जानकारी हो वर्ष 1954 से जगन्नाथपुर में भव्य रुप से माता मनसा देवी की पूजा अर्चना हो रही है. यहां माता मनसा की ख्याति आसपास व दूरदराज क्षेत्र में विख्यात है जिसे लेकर विभिन्न क्षेत्रों से सैकड़ों श्रद्धालु प्रतिवर्ष पूजा अर्चना को पहुंचते हैं. यहां प्रतिवर्ष एकादशी से 5 दिनों तक भव्य रुप से माता मनसा की पूजा अर्चना की जाती है. मान्यता है कि यहां भक्त श्रद्धालुओं द्वारा माता की सच्चे मन से पूजा अर्चना कर मांगी गई हर मनोकामना पूरी होती है. इस वर्ष दो अक्तूबर को घटबारी कार्यक्रम के साथ माता का आह्वान करते हुए पूजा शुरु हुई थी.
दूसरे दिन तीन अक्टूबर को विधिपूर्वक माता की पूजा अर्चना करते हुए मन्नत अनुसार बलि पूजन किया गया जिसमे सैकड़ो भक्त श्रद्धालुओं ने माता मनसा का भक्ति भाव से पूजा की. सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत ओड़िशा के प्रसिद्ध नाट्य मंडली पंचशखा गणनाट्य द्वारा ओड़िया नाटक का रंगारंग मंचन किया गया. जिसमे कलाकारों ने मो कहाणी रे तोहरी ना एवं तो बिना मो सपनो ओधा नामक ओड़िया सामाजिक नाटक प्रस्तुत किया. कलाकारों ने समाज की वर्तमान स्थिति व आधुनिकता पर आधारित भावपूर्ण नाटक का मंचन कर दर्शकों को खूब हंसाया व रुलाया. कलाकारों ने नाटक के माध्यम से जीवंत प्रदर्शन कर दर्शकों को अंत तक बांधे रखा.
पूजा कार्यक्रम के सफल आयोजन में पूजा समिति के जहरलाल प्रधान,राजेन्द्र प्रधान,सत्यवान प्रधान,रघुनाथ प्रधान,विष्णु प्रधान,मुकेश प्रधान,ओमप्रकाश प्रधान,उमाकांत प्रधान,शेखर प्रधान,राजीव प्रधान,पंचम प्रधान,शत्रुघ्न प्रधान,तरुण प्रधान,राहुल प्रधान समेत समस्त ग्रामीणों का सराहनीय योगदान रहा.
दोला में ढोकर जमीन पर लेटकर नव पत्रिका को नम आंखों से किया विदा
सरायकेला/ईचागढ़
(मालखान महतो) ईचागढ़-सरायकेला-खरसावां जिला के ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र के दूर्गा मंदिर व पंडालों में गुरुवार को मां दुर्गा की नव पत्रिका व शाम को दर्जनों प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया।
डुमरा,सितु,पिलीद, टीकर,चीपड़ी ,लावा ,आदारडीह सहित सभी दुर्गा मंदिरों में स्थापित नव पत्रिका का विसर्जन किया गया। डुमरा गांव में मां दुर्गा की नव पत्रिका को डोली में ढोकर नदी में विसर्जित किया गया। डोली में ले जाते समय श्रद्धालुओं ने जमीन पर लेटकर नमः आंखों से नव पत्रिका को विदा किया। श्रद्धालु जमीन पर ऐसे लेटे थे कि डोली को कंधे देने वाले आदमीयों पर से चलकर विसर्जन करने जाना पड़ा। वहीं महिलाओं ने आपस में सिंदूर खेला और एक दुसरे को सिंदूर लगाकर सदा सुहागिन रहने का माता रानी से कामना किया। महिलाओं ने अश्रु नयन से आबार एसो मां कहकर विदा किया। वहीं शाम से देर रात तक दर्जनों प्रतिमाओं को विसर्जित भी किया गया। सितु सार्वजनिक दुर्गा पूजा समिति द्वारा 40 फीट ऊंचा रावण का दहन किया गया। रावण दहन में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा।