आकाशवाणी चौक पर हंगामा: वार्ड पार्षद पर ऑटो ड्राइवर ने किया जानलेवा हमला।
सरायकेला/आदित्यपुर
आदित्यपुर नगर निगम इलाके के आकाशवाणी चौक के पास शुक्रवार को दिनदहाड़े एक जनप्रतिनिधि के साथ बदसलूकी का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। वार्ड-13 के पार्षद शांतनु घोष पर एक ऑटो चालक ने हमला कर दिया।
मिली जानकारी के अनुसार, पार्षद शांतनु घोष बिष्टुपुर से लौटते समय आकाशवाणी चौक के पास रुके थे। उन्होंने अपनी बाइक सड़क किनारे खड़ी की थी, तभी तेज गति से आ रहे एक ऑटो ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि दोपहिया वाहन वहीं गिर पड़ा।
पार्षद ने जब चालक से वाहन थोड़ा पीछे हटाने को कहा, तो वह भड़क गया। आरोप है कि चालक ने ऑटो में रखी लोहे की रॉड निकाली और बाइक की हेडलाइट पर वार कर उसे तोड़ दिया। जब पार्षद ने इसका विरोध किया तो आरोपी ने उनसे हाथापाई शुरू कर दी।
पीड़ित का आरोप है कि मारपीट के दौरान हमलावर ने उनके कपड़े फाड़ दिए और उनकी जेब में रखा महंगा मोबाइल फोन छीनकर सड़क पर दे मारा, जिससे फोन के टुकड़े-टुकड़े हो गए। जाते-जाते आरोपी ने पार्षद को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी।
इस घटना को लेकर पार्षद ने आदित्यपुर थाने में लिखित शिकायत देकर आरोपी चालक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। सरेआम हुई इस वारदात के बाद इलाके के लोगों में काफी नाराजगी देखी जा रही है।
सरायकेला-खरसावां: चांडिल थाना क्षेत्र में नशा और अवैध कारोबार चरम पर, थाना प्रभारी पर फोन न उठाने का आरोप – जनता परेशान।
सरायकेला/चांडिल
सरायकेला-खरसावां जिला के चांडिल अनुमंडल अंतर्गत चांडिल थाना क्षेत्र में इन दिनों *नशा, अवैध शराब, जुआ और अन्य अवैध कारोबार* के बढ़ने से स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि खुलेआम नशे का कारोबार युवाओं की जिंदगी बर्बाद कर रहा है। शाम होते ही कई इलाकों में असामाजिक तत्व सक्रिय हो जाते हैं, जिससे आम लोगों में भय का माहौल है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब जनता अपनी शिकायत लेकर *चांडिल थाना प्रभारी* को फोन करती है तो *फोन रिसीव नहीं होता* है, ऐसा स्थानीय लोगों का आरोप है। कई बार फोन करने के बाद भी कोई जवाब नहीं मिलने से लोगों को थाने के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
जनता की मांग – 1. चांडिल थाना क्षेत्र में चल रहे नशा और अवैध कारोबार पर तत्काल रोक लगाई जाए। 2. पुलिस अधीक्षक, सरायकेला-खरसावां मामले का संज्ञान लें और निष्पक्ष जांच कराएं। 3. थाना में जनता की शिकायत सुनने के लिए एक वैकल्पिक हेल्पलाइन नंबर जारी किया जाए। 4. दोषी कारोबारियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो स्थानीय सामाजिक संगठनों ने आंदोलन की चेतावनी दी है।
यह समाचार जनहित में जारी किया गया है ताकि प्रशासन नींद से जागे और युवाओं का भविष्य बचाया जा सके।
निवेदक – भारत सिंह राष्ट्रीय सह प्रभारी (संपूर्ण भारत) विश्व हिंदू रक्षा परिषद जनहित में
विश्व हिंदू रक्षा परिषद का द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदू प्रतिनिधि महासम्मेलन एवं भारतीय सनातन गौरव सम्मान समारोह 04 अक्टूबर को लखनऊ में।
लखनऊ
विश्व हिंदू रक्षा परिषद के तत्वावधान में द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदू प्रतिनिधि महासम्मेलन एवं भारतीय सनातन गौरव सम्मान समारोह का भव्य आयोजन 04 अक्टूबर 2026, रविवार को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान, गोमती नगर, लखनऊ में किया जा रहा है।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 9:00 बजे ब्रेकफास्ट के साथ होगा। दोपहर 2 बजे के पश्चात अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधियों का सम्मेलन प्रारंभ होगा।
आमंत्रित अतिथियों में – मा. राजनाथ सिंह जी, रक्षा मंत्री, भारत सरकार, मा. योगी आदित्यनाथ जी, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश, डॉ. दिनेश शर्मा, पूर्व उपराज्यपाल, अंडमान एवं निकोबार, मा. बृजेश पाठक, उप-मुख्यमंत्री, उ.प्र., मा. केशव प्रसाद मौर्य, उप-मुख्यमंत्री, उ.प्र. व औषधीय शिक्षक, डॉ. राजेश्वर सिंह, विधायक, एवं 21 देशों के प्रतिनिधि, संत-महात्मा, विद्वतजन, सामाजिक कार्यकर्ता एवं विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रहेगी।
इस महासम्मेलन का उद्देश्य विश्व भर के हिंदू समाज को एक मंच पर लाकर सनातन संस्कृति, राष्ट्र रक्षा और हिंदू एकता को सुदृढ़ करना है। इस अवसर पर भारतीय सनातन गौरव सम्मान से विशिष्ट विभूतियों को सम्मानित भी किया जाएगा।
आयोजक – गोपाल राय – अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व हिंदू रक्षा परिषद मनीष राय – अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, विश्व हिंदू रक्षा परिषद
यह जानकारी देते हुए परिषद के राष्ट्रीय सह प्रभारी (संपूर्ण भारत) भरत सिंह ने बताया कि इस ऐतिहासिक सम्मेलन में देश-विदेश से हजारों प्रतिनिधियों के पहुंचने की संभावना है। सभी सनातन प्रेमियों से सादर उपस्थिति की अपील की गई है।
जुड़ने के लिए संपर्क करें – 9670876666, 8887832744, 9388999996, 9956016175, 9219395138 8210048890
निवेदक – भारत सिंह राष्ट्रीय सह प्रभारी (संपूर्ण भारत) विश्व हिंदू रक्षा परिषद
आदित्यपुर में गंदगी का अंबार, अतिक्रमण बना मुख्य कारण।
सरायकेला/आदित्यपुर
प्रशासन मौन, दुर्गा पूजा-दीपावली-छठ से पहले स्वास्थ्य संकट का खतरा
आदित्यपुर नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कई इलाकों में इन दिनों गंदगी का अंबार लगा हुआ है। जगह-जगह कचरे के ढेर और नालियों में जाम से लोगों का जीना मुहाल हो गया है।
इस संबंध में नगर निगम आयुक्त का कहना है कि अतिक्रमण (Encroachment) के कारण साफ-सफाई में बाधा आ रही है। उन्होंने बताया कि इस मामले की सूचना बैठक में एसडीओ और सीओ को मौखिक और लिखित रूप से भी दी जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
आयुक्त ने कहा, _”हमारे स्तर से जितना संभव हो रहा है, हम सफाई का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अतिक्रमण हटे बिना स्थिति में सुधार मुश्किल है।”_
इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा समस्या:
स्थानीय लोगों के अनुसार सबसे ज्यादा गंदगी इन जगहों पर देखी जा रही है: – आदित्यपुर थाना रोड – आदित्यपुर दीनदली बस्ती / हरिओम बस्ती – गम्हरिया बाजार – मांझी टोला के सामने मुख्य सड़क
सड़क किनारे दुकानों और ठेलों द्वारा किए गए अतिक्रमण के कारण कचरा उठाव वाहन अंदर तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे कचरा सड़कों पर ही सड़ रहा है।
बीमारियों का खतरा, त्योहारों से पहले चिंता:
गंदगी के कारण बदबू और मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है। इससे डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड जैसी बीमारियों के फैलने की आशंका है।
सामने दुर्गा पूजा, दीपावली और छठ जैसे बड़े पर्व हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि प्रशासन अतिक्रमण हटाने में खामोश क्यों है? क्या जनता के स्वास्थ्य का कोई ख्याल नहीं है?
स्थानीय जनता ने जिला प्रशासन से मांग की है कि त्योहारों से पहले अतिक्रमण हटाकर युद्धस्तर पर सफाई अभियान चलाया जाए, ताकि लोग स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण में त्योहार मना सकें।
ओल्ड एज होम में स्वास्थ्य शिविर का आयोजन, 28 बुजुर्गों की हुई स्वास्थ्य जांच।
सरायकेला-खरसावां
जिला संयुक्त औषधालय, सरायकेला द्वारा 21 सितम्बर 2026 को ओल्ड एज होम में स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया। शिविर का संचालन डॉ. मोनालिशा पंडित दास के मार्गदर्शन में किया गया।
शिविर के दौरान कुल 28 बुजुर्गों के स्वास्थ्य की जांच की गई। आवश्यकता के अनुसार उन्हें आयुर्वेदिक एवं होम्योपैथिक औषधियों का निःशुल्क वितरण किया गया। साथ ही बुजुर्गों के ब्लड प्रेशर एवं ब्लड शुगर की जांच भी की गई।
स्वास्थ्य जांच के साथ बुजुर्गों को स्वस्थ एवं सक्रिय जीवनशैली अपनाने के लिए योगाभ्यास कराया गया तथा योग के महत्व एवं इससे होने वाले लाभों की जानकारी दी गई। शिविर के सफल संचालन में 3 सहियाओं एवं 3 योग प्रशिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
शिविर में चिकित्सक के रूप में डॉ. मोनालिशा पंडित दास, योग प्रशिक्षक दिनेश कुमार अग्रवाल, सुषमा महतो एवं सुषमा कुमारी तथा सहिया बैजंती होनगा, सावित्री खंडायत एवं सुकुरमुनी हेम्ब्रम उपस्थित रहे।
जिला संयुक्त औषधालय द्वारा आयोजित इस पहल का उद्देश्य बुजुर्गों को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच, योग एवं स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूक करना रहा।
भारत ने खोला वैश्विक बाजारों का नया अध्याय! एफटीए से भारत की वैश्विक आर्थिक छलांग! -न्यूजीलैंड 20 अक्टूबर 2026 से नए बाजारों तक वैश्विक व्यापार में बजा भारत का डंका! -समग्र व्यापक विश्लेषण
भारत का एफटीए महाअभियान :न्यूजीलैंड से नए बाजारों तक वैश्विक व्यापार में बजा भारत का डंक़ा! निर्यात,निवेश,रोजगार और अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा असर?
एफ़टीए का भारतीय महासंकल्प :न्यूजीलैंड से 100 प्रतिशत शुल्क-मुक्त बाजार तक -निर्यात बढ़ेगा या आयात का दबाव? भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अवसर और चुनौतियाँ निर्णायक मोड़ – किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर पूरी दुनियाँ के व्यापार व्यवस्था में बढ़ते शुल्क,बदलती आपूर्ति शृंखलाओं और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण नया अध्याय 20 अक्टूबर 2026 से ख़ुलने जा रहा है।20 सितंबर 2026 तक भारत नेअपने विभिन्न व्यापारिक साझेदारों के साथ अनेक मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।इनमें श्रीलंका,दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र के सदस्य देश,सिंगापुर, आसियान के दस देश,दक्षिण कोरिया, जापान,मलेशिया, मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया तथा यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के चार देश शामिल हैं;वहीं ब्रिटेन, ओमान,न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ जैसे हालिया समझौते हस्ताक्षर अथवा अंतिम क्रियान्वयन प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा क़ि इन समझौतों का सकारात्मक प्रभाव भारतीय निर्यातकों को बड़े विदेशी बाजारों में कम शुल्क के साथ प्रवेश, निवेश के नए अवसर,आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता, रोजगार तथा भारतीय विनिर्माण और सेवाओं की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ने के रूप में सामने आया है।भारत -ऑस्ट्रेलिया समझौते के बाद वस्त्र, औषधि रसायन और कृषि सहित कई क्षेत्रों में लाभ दर्ज हुआ है।वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में जब संरक्षणवाद, शुल्क वृद्धि,आपूर्ति शृंखला का पुनर्गठन और भू- राजनीतिक तनाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं, तब एफटीए भारत को अनेक बाजारों से जोड़कर जोखिमों को फैलाने और निर्यात के लिए वैकल्पिक रास्ते बनाने में मदद कर सकते हैं।लेकिन इन्हें स्वतः लाभ का सौदा मानना भी उचित नहीं होगा,क्योंकि आयात बढ़ने, घरेलू उद्योग पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव, सीमा शुल्क राजस्व में कमी और व्यापार घाटे जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।इसलिए भारत के लिए एफटीए की सफ़लता इस बात पर निर्भर करेगी कि बाजार पहुंच का लाभ वास्तविक निर्यात, निवेश, उत्पादन, रोजगार और तकनीकी क्षमता में कितना बदलता है।
साथियों बात अगर हम भारत -न्यूजीलैंड 20 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला समझौते एफ़टीए की करें तो 27 अप्रैल 2026 को हस्ताक्षरित यह समझौता 20 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होने वाला है।न्यूजीलैंड की संसद ने 16 सितंबर को इसे लागू करने के लिए आवश्यक विधायी प्रक्रिया पूरी करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया,जिसके बाद समझौते के प्रभावी होने का रास्ता और स्पष्ट हुआ।मुक्त व्यापार समझौता मूलतः ऐसा व्यापारिक प्रबंध है,जिसके अंतर्गत दो देश एक-दूसरे के उत्पादों पर लगने वाले सीमा शुल्क को कम या समाप्त करते हैं और वस्तुओं, सेवाओं, निवेश तथा पेशेवरों की आवाजाही के लिए बाजार तक पहुंच आसान बनाते हैं।भारत के लिए इसका महत्व केवल निर्यात बढ़ाने तक सीमित नहीं है,बल्कि यह भारतीय उद्योग, छोटे कारोबार, किसानों, रोजगार, निवेश, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिष्ठा को प्रभावित करने वाला व्यापक समझौता है। भारत सरकार के अनुसार, न्यूजीलैंड भारत से आने वाले सभी उत्पादों को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच देगा, जबकि भारत न्यूजीलैंड के लगभग 95 प्रतिशत द्विपक्षीय व्यापार मूल्य को समेटने वाले उत्पादों पर शुल्क में कमी अथवा समाप्ति की व्यवस्था कर रहा है।
साथियों, इस समझौते की सबसे बड़ी विशेषता भारतीय निर्यातकों के लिए न्यूजीलैंड के बाजार का लगभग पूरी तरह खुलना है कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते, इंजीनिरी सामान,औषधि,रसायन,प्रसंस्कृत खाद्य और श्रम-प्रधान उद्योगों को इससे नए अवसर मिल सकते हैं।सीमा शुल्क समाप्त होने से भारतीय उत्पादों की न्यूजीलैंड के बाजार में पहुंच लागत कम हो सकती है और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ सकती है।विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि बड़े उद्योगों की तुलना में छोटे निर्यातकों के लिए शुल्क और परिवहन लागत का प्रभाव अधिक होता है। सरकार ने भी इस समझौते में छोटे और मध्यम उद्यमों तथा महिला उद्यमियों को विशेष महत्व दिए जाने की बात कही है। यदि भारतीय कंपनियां गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने में सफल रहती हैं, तो न्यूजीलैंड का बाजार उनके लिए केवल वर्तमान निर्यात बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि आगे दूसरे विकसित बाजारों में प्रवेश की प्रतिष्ठा और अनुभव हासिल करने का मंच भी बन सकता है।
साथियों, कृषि क्षेत्र में भी समझौते का स्वरूप संतुलित रखने की कोशिश दिखाई देती है।भारत ने न्यूजीलैंड के बाजार को व्यापक रूप से खोलने के बदले अपने संवेदनशील क्षेत्रों को संरक्षण दिया है।दूध,क्रीम,पनीर, दही और अन्य प्रमुख दुग्ध उत्पादों के साथ कई संवेदनशील कृषि वस्तुओं को शुल्क रियायतों से बाहर रखा गया है।प्याज, चीनी मसाले,खाद्य तेल और कुछ अन्य संवेदनशील वस्तुओं पर भी संरक्षण बनाए रखा गया है।दूसरी ओर, लकड़ी ऊन,भेड़ के मांस और कच्ची खाल जैसे उत्पादों पर शुल्क समाप्त करने अथवा घटाने की व्यवस्था की गई है, जिससे भारतीय उद्योगों को कुछ आवश्यक कच्चे माल अधिक प्रतिस्पर्धी लागत पर मिल सकते हैं। इस प्रकार समझौते में एक ओर निर्यात के लिए अवसर बढ़ाए गए हैं तो दूसरी ओर घरेलू किसान और संवेदनशील उद्योगों के लिए सुरक्षा कवच भी रखा गया है।
साथियों, इस समझौते का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ निवेश है। न्यूजीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में 20 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। यदि यह निवेश वास्तविक परियोज नाओं में परिवर्तित होता है तो विनिर्माण,आधारभूत ढांचे, नवाचार,कृषि उत्पादकता, आधुनिक तकनीक और रोजगार के क्षेत्र में इसके प्रभाव दिखाई दे सकते हैं।समझौते में कौशल और पेशेवरों की आवाजाही को भी महत्व दिया गया है।पांच हजार तक कुशल भारतीयों के लिए अस्थायी रोजगार मार्ग, युवाओं के लिए कार्य-अवकाश व्यवस्था तथा विद्यार्थियों और कुशल स्नातकों के लिए अध्ययन के बाद काम के अवसर भारतीय प्रतिभाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय अनुभव के नए रास्ते खोल सकते हैं।स्वास्थ्य, पारंपरिक चिकित्सा, योग, शिक्षा, पर्यटन और खेल जैसे क्षेत्रों में सहयोग भी भारत की सेवाक्षेत्रीय क्षमता को बढ़ाने में सटिका से सहायक हो सकता है।
साथियों, इसका प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई स्तरों पर पड़ सकता है।निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा आय बढ़ सकती है,उत्पादन का विस्तार हो सकता है और श्रम-प्रधान उद्योगों में रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।यदि न्यूजीलैंड से आने वाला निवेश उत्पादन क्षमता और आधारभूत ढांचे में लगता है तो घरेलू आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिल सकती है। छोटे और मध्यम उद्यमों को विदेशी खरीदारों तक सीधी पहुंच मिलने से उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को अपनाने की प्रेरणा मिल सकती है। साथ ही भारतीय किसानों के लिए सेब, कीवी और मनुका शहद जैसे क्षेत्रों में उत्पादकता सहयोग तथा तकनीकी ज्ञान के अवसर भी सटिका से समझौते का हिस्सा हैं।
साथियों शेयर बाजार पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष से अधिक क्षेत्र-विशेष के माध्यम से दिखाई दे सकता है।जिन भारतीय कंपनियों का न्यूजीलैंड में निर्यात बढ़ सकता है, उनके लिए लागत घटने और बाजार विस्तार की संभावना सकारात्मक मानी जा सकती है। कपड़ा, चमड़ा, जूते,इंजीनियरी,औषधि, प्रसंस्कृत खाद्य और कुछ सेवा क्षेत्रों की कंपनियां नए अवसरों की तलाश कर सकती हैं। हालांकि शेयर बाजार केवल किसी एक समझौते से संचालित नहीं होता। ब्याज दरें,वैश्विक मांग, कच्चे तेल की कीमत, मुद्रा विनिमय दर,विदेशी निवेश और व्यापक भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी बाजार को प्रभावित करती हैं। इसलिए इस समझौते को बाजार में तत्काल और सार्वभौमिक तेजी की गारंटी मानना उचित नहीं होगा। इसका वास्तविक प्रभाव कंपनियों के निर्यात आंकड़ों, लाभ, नए आदेशों और सटीकता से निवेश के वास्तविक प्रवाह में दिखाई देगा। साथियों भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के दृष्टिकोण से भी यह समझौता महत्वपूर्ण है।भारत अब केवल बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि विश्वसनीय उत्पादन और निर्यात साझेदार के रूप में अपनी पहचान मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। न्यूजीलैंड जैसे विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश के साथ व्यापक व्यापारिक समझौता भारत की आर्थिक कूटनीति की बढ़ती सक्रियता को दर्शाता है। भारत हाल के वर्षों में अनेक व्यापारिक साझेदारों के साथ समझौतों को आगे बढ़ा रहा है। सरकारी अभिलेखों के अनुसार भारत ने 16 मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं; हालांकि नए समझौतों में से कुछ 20 सितंबर 2026 तक अभी लागू होने की अंतिम कानूनी प्रक्रिया में थे। इसलिए केवल संख्या बताकर सभी को सक्रिय समझौते कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।इसी व्यापक व्यापार कूटनीति में कनाडा के साथ प्रस्तावित समझौते की बातचीत भी महत्वपूर्ण है। भारत और कनाडा के बीच अगले दौर की व्यापार वार्ता 5 अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाली है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया को गति मिलने की संभावना है। इसका अर्थ है कि भारत एक साथ अनेक विकसित और उभरते बाजारों में अपनी व्यापारिक पहुंच बढ़ाने की सटीकता से कोशिश कर रहा है।
साथियों फिर भी मुक्त व्यापार समझौते को केवल लाभ का दस्तावेज मानना उचित नहीं होगा। सीमा शुल्क कम होने से सरकारी राजस्व पर प्रभाव पड़ सकता है, आयात बढ़ने पर कुछ घरेलू उद्योगों पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव आ सकता है और यदि निर्यात की तुलना में आयात अधिक तेजी से बढ़े तो व्यापार घाटे की चुनौती सामने आ सकती है। इसके अलावा निर्यातकों को मूल-स्थान संबंधी नियम, गुणवत्ता मानक, प्रमाणन और विदेशी बाजार की नियामकीय आवश्यकताओं का पालन करना होगा। केवल शुल्क समाप्त हो जाने से निर्यात अपने आप नहीं बढ़ता; उत्पादन की गुणवत्ता, कीमत, आपूर्ति की विश्वसनीयता और वैश्विक मांग भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे के भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते की असली परीक्षा 20 अक्टूबर 2026 को इसके लागू होने के बाद शुरू होगी। समझौते ने भारतीय उत्पादों के लिए न्यूजीलैंड का बाजार खोला है, निवेश के नए रास्ते बनाए हैं और पेशेवरों तथाविद्यार्थियों के लिए अवसर बढ़ाए हैं।साथ ही भारत ने डेयरी और संवेदनशील कृषि क्षेत्रों में सुरक्षा बनाएरखकर घरेलू हितों को भी महत्व दिया है। अगले चार-पांच वर्षों में यदि निर्यात, निवेश और रोजगार में वास्तविक वृद्धि होती है तथा द्विपक्षीय व्यापार लगभग 35 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचता है,तो यह समझौता भारत की बदलती व्यापार रणनीति की ठोस सफलता के रूप में सामने आ सकता है। अंततः भारत की चुनौती केवल अधिक समझौते करना नहीं, बल्कि उनका लाभ भारतीय किसान, श्रमिक, छोटे उद्यमी, निर्यातक और निवेशक तक पहुंचाना है। यही वह कसौटी होगी जिस पर भारत की नई व्यापारिक कूटनीति और वैश्विक आर्थिक प्रतिष्ठा का वास्तविक मूल्यांकन होगा।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
आदित्यपुर थाना भवन पर ‘श्याम स्टील’ की ब्रांडिंग से बवाल, भाजपा नेत्री ने पूछा- सरकारी दीवार पर निजी कंपनी का नाम क्यों?
सरायकेला/आदित्यपुर
सरायकेला-खरसावां जिले के आदित्यपुर थाना भवन पर लगी एक नेम प्लेट ने अब बड़ा सियासी और प्रशासनिक सवाल खड़ा कर दिया है। थाना भवन के मुख्य बोर्ड पर ‘श्याम स्टील आदित्यपुर थाना’ लिखा हुआ है, जिसमें एक निजी स्टील कंपनी का नाम सरकारी थाने के नाम के साथ प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है।
इस बोर्ड की तस्वीर सामने आने के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश है। लोगों का सीधा सवाल है कि क्या अब झारखंड पुलिस थाने भी निजी कंपनियों के विज्ञापन का माध्यम बन गए हैं?
अनुमति पर उठे गंभीर सवाल स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए पुलिस प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा है।
लोगों के मन में तीन बड़े सवाल हैं: 1. क्या श्याम स्टील कंपनी द्वारा थाना को किसी प्रकार की आर्थिक सहायता, भवन निर्माण या सुविधा दी गई है?
2. यदि हां, तो क्या इसके लिए वरीय पुलिस अधीक्षक या गृह विभाग से कोई लिखित अनुमति, सरकारी आदेश या एमओयू किया गया है?
3. क्या सरकारी भवनों पर निजी ब्रांडिंग की कोई नीति है, और यदि है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? अब तक न तो जिला पुलिस और न ही कंपनी की ओर से इस पर कोई आधिकारिक बयान आया है, जिससे संदेह और गहरा गया है।
भाजपा नेत्री रश्मि भेंगरा ने घेरा इस मामले को अब राजनीतिक तूल भी मिल गया है। भाजपा नेत्री रश्मि भेंगरा ने इस ब्रांडिंग पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा, “सरकारी कार्यालय और थाना जनता की सेवा के लिए हैं, किसी कंपनी के प्रचार के लिए नहीं। पुलिस प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि किस नियम के तहत निजी कंपनी को थाने के नाम के साथ अपना नाम जोड़ने की इजाजत दी गई। यह सरकारी गरिमा के खिलाफ है।”
‘जमशेदपुर’ लिखे होने पर भी विवाद एक और दिलचस्प पहलू ने लोगों का ध्यान खींचा है। बोर्ड पर ‘आदित्यपुर थाना’ के साथ ‘जमशेदपुर’ भी लिखा हुआ है, जबकि आदित्यपुर थाना सरायकेला-खरसावां जिले के अंतर्गत आता है, न कि पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) के। इस भौगोलिक गलती पर भी लोग चुटकी ले रहे हैं और प्रशासन की लापरवाही पर सवाल उठा रहे हैं।
फिलहाल, पूरे आदित्यपुर में चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या यह सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के नाम पर सरकारी तंत्र का निजीकरण है? लोग मांग कर रहे हैं कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले की जांच कर बोर्ड लगाने की अनुमति से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करे।
सऊदी बनाम हूती :छोटी ताकत ने कैसे हिला दी दुनियाँ की तेल व्यवस्था? -मिसाइलों से तेल तक मचा महासंकट ट्रंप, चीन और भारत के सामने चुनौतीपूर्ण अग्निपरीक्षा ? -समग्र व्यापक विश्लेषण।
सऊदी बनाम हूती की जंग ने दुनिया को तेल संकट के मुहाने पर पहुंचाया! -तेल बाजार में तूफान -अमेरिका, चीन और भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती?
सऊदी-हूती युद्ध से तेल बाजार में तूफान -अमेरिक़ा, चीन भारत और पूरी विश्व अर्थव्यवस्था को क्यों चिंता में डाला? -क्या पूरे विश्व की अग्निपरीक्षा? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और यमन के हूती संघर्ष ने अब केवल दो पक्षों की सैन्य लड़ाई का रूप नहीं रखा है, बल्कि इसका असर तेल, समुद्री व्यापार, वैश्विक महंगाई और भारत की ऊर्जा सुरक्षा तक पहुंच गया है।सऊदी अरब दुनियाँ के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में है और ऐसे समय में जब पहले से ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान ने ऊर्जा बाजार को दबाव में रखा हुआ है,हूतियों की लाल सागर के तट और बाब-अल- मंदेब के आसपास बढ़त ने दूसरा बड़ा जोखिम खड़ा कर दिया है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सऊदी अरब का तेल उत्पादन फरवरी के लगभग 10.9मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटकर अगस्त में 6.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया था,यानी करीब 4.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन की गिरावट और तीन दशक से अधिक समय का न्यूनतम स्तर।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यही कारण है कि अब सवाल केवल यह नहीं है कि सऊदी बनाम हूती में कौन सैन्य रूप से मजबूत है,बल्कि यह है कि यदि तेल उत्पादन, निर्यात और समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित रहे तो विश्व अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी ऊर्जा चुनौती का सामना करेगी। इस पूरे संकट में 15 सितंबर 2026 को मक्का के निकट ड्रोन इंटरसेप्शन ने राजनीतिक और धार्मिक संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया। सऊदी नेतृत्व के अनुसार उसकी वायु रक्षा ने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को उस समय नष्ट किया जब वह पवित्र शहर के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पाया था। सऊदी पक्ष ने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए मक्का और दोनों पवित्र मस्जिदों की सुरक्षा को रेड लाइन बताया। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट रखना जरूरी है।।हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने से साफ इनकार किया और कहा कि उनके हमलों का लक्ष्य सऊदी तेल प्रतिष्ठान और सैन्य ठिकाने हैं। इसलिए मक्का को जानबूझकर निशाना बनाया गया था या नहीं, यह दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी दावों के बीच विवादित है। भारत ने भी बाद में सऊदी क्षेत्र और मक्का के निकट कथित हमले की निंदा की।
साथियों, अब सवाल है कि सऊदी अरब जैसी विशाल सैन्य क्षमता वाला देश हूतियों से परेशान क्यों है? इसका उत्तर पारंपरिक सेना की संख्या में नहीं,बल्कि युद्ध की प्रकृति में छिपा है।सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान,मिसाइल डिफेंस और विशाल रक्षा बजट है, लेकिन हूती कम लागत वाले ड्रोन,मिसाइल, मोबाइल लॉन्चर,असममित युद्ध रणनीति और कठिन यमनी भूगोल का इस्तेमाल करते हैं।यानें एक महंगे इंटरसेप्टर से एक अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन या मिसाइल को रोकना आर्थिक रूप से भी भारी पड़ सकता है। इसके अलावा हूती विरोधी यमनी गुटों में विभाजन और हाल के वर्षों में क्षेत्रीय समर्थन के कमजोर पड़ने ने जमीन पर उनकी चुनौती बढ़ाई है। मीडिया के अनुसार वर्षों की अमेरिकी, सऊदी और अन्य सहयोगी सैन्य कार्रवाई के बावजूद हूतियों ने अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमता तथा संगठनात्मक ताकत बनाए रखी है।इसीलिए सऊदी बनाम हूती, कौन कितना ताकतवर? का सीधा उत्तर देना भ्रामक होगा। पारंपरिक वायुसेना,रक्षा प्रणालियों और आर्थिक संसाधनों में सऊदी अरब और हूती बराबर नहीं हैं; लेकिन हूतियों की ताकत उनकी कम लागत वाली असममित युद्ध क्षमता,मिसाइल-द्रोण भंडार, स्थानीय नेटवर्क, कठिन भूगोल और समुद्री चेकपॉइंट तक पहुंच में है। हाल के दिनों में हूतियों ने लाल सागर के यमनी तट पर तेजी से बढ़त बनाई और बाब-अल-मंदेब के आसपास रणनीतिक स्थिति मजबूत की है। इसी कारण एक अपेक्षाकृत छोटा गैर-राज्य सैन्य संगठन दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता हासिल कर रहा है।
साथियों, सबसे बड़ा आर्थिक खतरा तेल है।सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन प्रतिदिन लगभग 4 मिलियन बैरल, यानी वैश्विक आपूर्ति के करीब 4 प्रतिशत, को लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक पहुंचाने की क्षमता रखती है। सितंबर में इस पाइपलाइन के बंद होने से यानबू में उपलब्ध निर्यात योग्य स्टॉक केवल करीब पांच से सात दिनों के लिए होने की रिपोर्ट आई थी। रिटर्स ने यह भी बताया कि यदि पाइपलाइन शीघ्र चालू नहीं हुई तो वैश्विक बाजार से लगभग 4 प्रतिशत तेल आपूर्ति अस्थायी रूप से हट सकती है। हालांकि बाद में सऊदी अरब ने कुछ तेल को अपने पूर्वी तट के रास्ते भेजकर आपूर्ति संकट का दबाव कम किया, जिसके कारण तेल की कीमतों में कुछ नरमी आई। इसलिए दुनिया में तुरंत तेल खत्म हो जाएगा कहना सही नहीं होगा,लेकिन लंबे व्यवधान की स्थिति में तेल बाजार में भारी सप्लाई शॉक पैदा होने का जोखिम वास्तविक है।
साथियों, 20 सितंबर को रविवार होने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में नया सामान्य कारोबारी सेटलमेंट नहीं हुआ। उपलब्ध अंतिम शुक्रवार के आंकड़े के अनुसार ब्रेन्ट क्रूड करीब $104.87 प्रति बैरल और डब्लूटीआई करीब $100.30 प्रति बैरल पर बंद हुआ। सप्ताह के दौरान ब्रेन्ट $108- सऊदी बनाम हूती :छोटी ताकत ने कैसे हिला दी दुनियाँ की तेल व्यवस्था? -मिसाइलों से तेल तक मचा महासंकट ट्रंप,चीन और भारत के सामने चुनौतीपूर्ण अग्निपरीक्षा ? -समग्र व्यापक विश्लेषण 109 के आसपास भी पहुंचा था। इसलिए फिलहाल कीमत $100 के ऊपर बनी हुई है और आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि सऊदी पाइपलाइन कितनी तेजी से बहाल होती है, लाल सागर में हमले कितने बढ़ते हैं और होर्मुज की स्थिति क्या रहती है।इसका भारत पर सीधा असर पड़ सकता है क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। महंगा ब्रेन्ट मतलब भारतीय रिफाइनरों के लिए महंगा कच्चा माल;लंबे समय तक कीमतें ऊंची रहने पर रुपये पर दबाव, आयात बिल में वृद्धि, चालू खाते पर असर, परिवहन लागत और अंततः पेट्रोल- डीजल से लेकर माल ढुलाई तथा कई वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि इसका असर तुरंत पेट्रोल पंप पर समान अनुपात में दिखाई देना जरूरी नहीं है, क्योंकि घरेलू ईंधन कीमतों में कर, विपणन मार्जिन, विनिमय दर और सरकारी नीतियां भी महत्वपूर्ण होती हैं। 20 सितंबर को भारत में खुदरा पेट्रोल-डीजल दरें अधिकांश प्रमुख शहरों में स्थिर थीं, जबकि ब्रेन्ट $104 के नीचे सटीकता से कारोबार कर रहा था।
साथियों, अब आता है अमेरिका का सवाल,सऊदी का दोस्त होने के बावजूद सीधे युद्ध में क्यों नहीं उतर रहा? रिपोर्टों के अनुसार सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हूतियों के खिलाफ प्रत्यक्ष अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की मांग की थी। लेकिन वॉशिंगटन ने सीधे हमले की अनुमति नहीं दी और इसके बजाय सऊदी को खुफिया जानकारी तथा टार्गेटिंग असिस्टेंस देने पर सहमति जताई। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि अमेरिका पहले से ईरान के साथ बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में उलझा है; हूतियों के खिलाफ नया प्रत्यक्ष मोर्चा खोलना संघर्ष को और फैलाने का जोखिम बढ़ा सकता है।यानें अमेरिका ने सऊदी सुरक्षा संबंध समाप्त नहीं किए हैं, बल्कि प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप और सहयोग के दूसरे स्तर के बीच अंतर रखा है।दिलचस्प बात यह है कि इसी बीच अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए 48 एफ़ -35 लड़ाकू विमानों और 49 इंजनों समेत लगभग $24.3 अरब की संभावित बिक्री को मंजूरी दी है। लेकिन यह अंतिम डिलीवरी नहीं है,प्रस्ताव को अमेरिकी कांग्रेस की प्रक्रिया से गुजरना होगा और विमानों की वास्तविक आपूर्ति में वर्षों लग सकते हैं। इसलिए इसे वर्तमान हूती हमलों का तत्काल सैन्य समाधान समझना सही नहीं होगा; यह दीर्घकालीन सऊदी-अमेरिकी रक्षा संबंध और सऊदी सैन्य आधुनिकीकरण से जुड़ा कदम है। साथियों, जब अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध से दूरी रख रहा है तो सऊदी को चीन की जरूरत क्यों पड़ी? रिटर्स के अनुसार सऊदी अपील के बाद चीन ने निजी तौर पर ईरान से हूतियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उन्हें नियंत्रित करने में मदद करने को कहा। यह जानकारी तीन ईरानी सूत्रों के हवाले से सामने आई। चीन की चिंता केवल सऊदी नहीं है,उसका बड़ा आर्थिक हित लाल सागर, बाब-अल-मंदेब और मध्य-पूर्व की ऊर्जा आपूर्ति में है। चीन सार्वजनिक रूप से संयम और सुरक्षित नौवहन की अपील कर चुका है तथा 2023 में चीन ने ही सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध सुधारने में मध्यस्थ भूमिका निभाई थी। इसलिए बीजिंग की भूमिका इस संकट में सैन्य नहीं बल्कि राजनयिक और आर्थिक लेवरेज की है।इसी संदर्भ में पाकिस्तान और तुर्की का सवाल भी महत्वपूर्ण है। सितंबर में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की से जुड़ा एक त्रिपक्षीय मक्का जॉइंट डिफेन्स एग्रीमेंट सामने आया,जिसमें एक सदस्य पर हमला सभी के लिए गंभीर सुरक्षा मामला माना गया। तुर्की के विदेश मंत्री ने कहा कि अंकारा सऊदी की तकनीकी सैन्य जरूरतों में मदद के लिए तैयार है, जबकि पाकिस्तान ने अपनी प्रतिबद्धता जताई लेकिन तत्काल प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई नहीं की। इसलिए यह कहना कि पाकिस्तान या तुर्की मदद नहीं कर रह, पूरी तरह सटीक नहीं होगा; फिलहाल उपलब्ध जानकारी प्रत्यक्ष युद्ध में प्रवेश के बजाय रक्षा-सहयोग और संभावित सहायता की ओर संकेत करती है। साथियों अंत में बाब-अल- मंदेब को समझना इस पूरे संकट की चाबी है।यह लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ने वाला लगभग 20 मील चौड़ा रणनीतिक समुद्री मार्ग है। इसके उत्तर में स्वेज नहर है, जिससे एशिया और यूरोप के बीच व्यापार जुड़ता है। सीएफ़आऱ के अनुसार लाल सागर क्षेत्र से वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 15-17 प्रतिशत गुजरता है और स्वेज नहर अकेले विश्व व्यापार के करीब 10-12 प्रतिशत का मार्ग है।यदि हूती गतिविधियां लंबे समय तक इस रास्ते को असुरक्षित करती हैं तो जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते मोड़ना पड़ सकता है,जिससे यात्रा समय, ईंधन और बीमा लागत बढ़ती है तथा वैश्विक वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ता है।
अतः अगर हम अप्रोच पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 20 सितंबर 2026 की स्थिति को केवल सऊदी बनाम हूती युद्ध कहना अधूरा होगा।यह अब तेल उत्पादन, पाइपलाइन, लाल सागर, बाब-अल- मंदेब, होर्मुज, अमेरिका की सैन्य नीति, चीन की कूटनीति,ईरान के प्रभाव, पाकिस्तान- तुर्की की सुरक्षा भूमिका और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा बहुस्तरीय संकट है। भारत ने इस पर स्पष्ट रूप से कहा है कि सऊदी क्षेत्र में नागरिक और आर्थिक ठिकानों पर हमले तथा बाब-अल-मंदेब में नौवहन की स्वतंत्रता को खतरा अस्वीकार्य है और जल्द शांति व स्थिरता बहाल होनी चाहिए।अब असली परीक्षा यह होगी कि सऊदी की तेल आपूर्ति कितनी जल्दी सामान्य होती है, हूती लाल सागर में अपनी बढ़त को कितना आगे ले जाते हैं, ईरान चीन की अपील पर कितना प्रभाव डालता है और अमेरिका प्रत्यक्ष सैन्यहस्तक्षेप से दूरी कितने समय तक बनाए रखता है।फिलहाल सबसे बड़ा जोखिम यही है कि यदि लाल सागर और होर्मुज दोनों लंबे समय तक बाधित रहे, तो तेल की समस्या केवल कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक व्यापार, महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा की व्यापक चुनौती बन सकती है।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
ईचागढ़ के पूर्व विधायक अरविंद सिंह उर्फ मलखान सिंह के नेतृत्व में कोल्हान मजदूर यूनियन की श्रृंखला गूंजा मजदूर एकता का नारा।
सरायकेला/आदित्यपुर
भरत सिंह की रिपोर्ट
सरायकेला-खरसावां जिले के आदित्यपुर में आज कोल्हान मजदूर यूनियन की श्रृंखला का आयोजन पूर्व विधायक अरविंद सिंह के नेतृत्व में किया गया।
सुबह से ही सैकड़ों मजदूर लाल झंडा लेकर सड़कों पर उतर आए। परंपरा के अनुसार सजे हुए काले घोड़े की पूजा कर रैली की शुरुआत की गई। पूर्व विधायक अरविंद सिंह ने खुद हाथ उठाकर मजदूरों का अभिवादन किया और मिठाई बांटकर रैली को रवाना किया। इस दौरान उनके साथ यूनियन के कई पदाधिकारी और महिला मोर्चा की सदस्य भी मौजूद रहीं।
रैली के बाद आदित्यपुर में एक बड़ी सभा का आयोजन हुआ, जहां खुले आसमान के नीचे बैठकर मजदूरों ने अपनी समस्याएं रखीं। मंच से अरविंद सिंह ने कहा –
“मजदूर इस क्षेत्र की रीढ़ है। अगर मजदूर को उसका हक नहीं मिला, तो हम चुप नहीं बैठेंगे। कुरान की धरती से यह लड़ाई अब हर फैक्ट्री तक जाएगी।”
क्या हैं मांगें –
ठेका मजदूरों को स्थायी करना
न्यूनतम मजदूरी 500 रुपये प्रतिदिन लागू करना
ESI, PF और सुरक्षा उपकरण की व्यवस्था
स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता
सभा में मजदूरों ने एक सुर में कहा कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होती, हम सब मजदूर कोल्हान मजदूर यूनियन के साथ हमेशा रहेंगे।
मौके पर हजारों की संख्या में मजदूरों की उपस्थिति ने प्रशासन को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।
घरेलू गैस सिलेंडर का अवैध कारोबार जोरों पर, जनता परेशान – छोटे-छोटे गैस काटकर बेचने वालों की चांदी।
सरायकेला/आदित्यपुर
भरत सिंह की रिपोर्ट
आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में इन दिनों घरेलू गैस सिलेंडर का अवैध कारोबार जोर-शोर से चल रहा है। आरोप है कि घरेलू उपभोक्ताओं को समय पर गैस नहीं मिल पा रही है, वहीं घरेलू सिलेंडरों से गैस निकालकर छोटे-छोटे सिलेंडरों (कटिंग) में भरकर बेचने वाले लोगों तक गैस पहुंचाई जा रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि एचपी गैस एजेंसी, आदित्यपुर की लापरवाही/मिलीभगत से यह खेल चल रहा है।
घरेलू महिलाओं ने बताया कि बुकिंग के 8-10 दिन बाद भी सिलेंडर नहीं पहुंच रहा, जबकि चौक-चौराहों पर खुलेआम 200-300 रुपये में छोटे गैस सिलेंडर धड़ल्ले से बिक रहे हैं। इससे आम जनता परेशान है और अवैध गैस बेचने वाले मालामाल हो रहे हैं।
जनता की मांग- 1. जिला प्रशासन और खाद्य आपूर्ति विभाग तुरंत छापेमारी करे। 2. एचपी गैस एजेंसी आदित्यपुर की जांच हो। 3. घरेलू गैस से व्यावसायिक कटिंग करने वालों पर FIR हो।
*विश्व हिंदू रक्षा परिषद राष्ट्रीय सह प्रवक्ता ने भी इस मुद्दे पर आंदोलन की चेतावनी दी है।*
> “अगर 48 घंटे में कार्रवाई नहीं हुई तो गैस एजेंसी के सामने धरना देंगे” – स्थानीय लोगों।
ट्रंप की 100 प्रतिशत टैरिफ मिसाइल का भारत पर अगला वार? भारत के रुपया,बाजार, निर्यात,निवेशकों और महंगाई तक मचेगा कितना बड़ा तूफान?
ट्रंप नें लिंडसे ओ.ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम 2026 पर हस्ताक्षर किए – भारत की अर्थव्यवस्था पर अगली मार? -रूस के तेल से लेकर भारत के रुपया,शेयर बाजार, निर्यात और महंगाई तक नई आर्थिक चुनौती? -समग्र व्यापक विश्लेषण
भारत के सामने 100 प्रतिशत तक शुल्क की संभावित तलवार लटका? -भारत की ऊर्जा नीति, व्यापार नीति, रुपया और शेयर बाजार,चारों की दिशा इस बात से प्रभावित हो सकती है कि यह तलवार केवल चेतावनी बनकर रहती है या वास्तविक आर्थिक कार्रवाई में बदलती है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर 19 सितंबर 2026 का दिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए केवल एक और कारोबारी दिन नहीं है,बल्कि यह उस बदलती आर्थिक व्यवस्था का संकेत है जिसमें ऊर्जा,व्यापार प्रतिबंध,शुल्क,मुद्रा और शेयर बाजार एक-दूसरे से पहले से कहीं अधिक गहराई से जुड़ गए हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूस और ईरान से संबंधित नए प्रतिबंध कानून पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद भारत समेत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के सामने नई अनिश्चितता खड़ी हो गई है।इस कानून में रूस की ऊर्जा खरीद करने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने की शक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति को दी गई है।हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत पर आज से ही 100 प्रतिशत शुल्क लागू हो गया है,बल्कि यह अमेरिकी प्रशासन को भविष्य में ऐसा कदम उठाने का वैधानिक अधिकार देता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि,भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ओर अगस्त में भारतीय वस्तु निर्यात 43.81 अरब डॉलर तक पहुंचा और कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात 82.68 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया,वहीं दूसरी ओर रूस से ऊर्जा आयात और अमेरिकी बाजार के बीच संतुलन की चुनौती और जटिल हो सकती है।ऐसे समय में जब भारतीय रुपया लगभग 95.87 प्रति डॉलर पर है और भारतीय शेयर बाजार वैश्विक संकेतों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, अमेरिकी प्रतिबंधों का नया ढांचा केवल विदेश नीति का विषय नहीं रह जाता,बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मुद्रा, महंगाई, उद्योग और निवेशकों की मनोदशा से सीधे जुड़ जाता है।
साथियों, बात अगर हम अमेरिकी कानून ने बदला आर्थिक समीकरण, इसको समझने की करें तो 18 सितंबर 2026 को ट्रंप ने लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम 2026 पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दिया।अमेरिकी सरकार के अनुसार यह कानून रूस पर वैधानिक प्रतिबंधों,शुल्क और अन्य प्रतिबंधात्मक उपायों का विस्तार करता है तथा ईरान पर मौजूदा प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाता है।इसके अंतर्गत रूस के तेल या प्राकृतिक गैस के प्रमुख खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रावधान है।कानून में कुछ अपवाद और शर्तें भी हैं, इसलिए इसे भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत शुल्क लगाए जाने के रूप में देखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।लेकिन आर्थिक दृष्टि से असली चिंता इसी अधिकार के अस्तित्व में है। यदि भविष्य में अमेरिकी प्रशासन भारत के रूस से ऊर्जा आयात को लेकर अतिरिक्त शुल्क लागू करता है तोभारत के लिए चुनौती केवल अमेरिका को होने वाला निर्यात नहीं होगी, बल्कि रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते कच्चे तेल की उपलब्धता,भारतीय परिशोधन उद्योग की लागत, घरेलू ईंधन कीमतों, व्यापार संतुलन और मुद्रा बाजार पर भी असर पड़ सकता है। यही कारण है कि आज का घटनाक्रम एक संभावित शुल्क विवाद से आगे बढ़कर भारत की ऊर्जा और व्यापार नीति के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है।
साथियों बात अगर हम भारत के सामने दोहरी आर्थिक चुनौती को समझने की करें तो, भारत की वर्तमान स्थिति में सबसे दिलचस्प विरोधाभास यह है कि निर्यात क्षेत्र से अच्छी खबर आई है, लेकिन बाहरी आर्थिक जोखिम भी बढ़ा है। अगस्त 2026 में भारत का वस्तु निर्यात 43.81 अरब डॉलर रहा, जबकि पिछले वर्ष अगस्त में यह 34.74 अरब डॉलर था।इसी अवधि में कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात का अनुमान 82.68 अरब डॉलर रहा।इंजीनियरिंग वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं और पेट्रोलियम उत्पादों सहित कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।अप्रैल से अगस्त 2026-27 के दौरान वस्तु निर्यात 215.91 अरब डॉलर रहा।इस आंकड़े का एक महत्वपूर्ण अर्थ यह है कि भारत का निर्यात क्षेत्र वैश्विक मांग का लाभ उठाने की क्षमता दिखा रहा है। लेकिन यदि अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लागू करता है तो भारत के लिए एक तरफ अमेरिकी बाजार में निर्यात को बनाए रखना और दूसरी तरफ अपनी ऊर्जा आवश्यकता के लिए रूस से तेल खरीदना दोनों लक्ष्यों के बीच संतुलन कठिन हो सकता है। यही वह बिंदु है जहां व्यापार नीति और ऊर्जा नीति एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं। साथियों बात अगर हम रूस का तेल भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? इसको समझने की करें तो भारत अपनी विशाल ऊर्जा आवश्यकता के कारण दुनिया के प्रमुख कच्चे तेल आयातक देशों में है। ऐसे में तेल की कीमत में प्रत्येक बड़ी वृद्धि का असर केवल पेट्रोल और डीजल पर नहीं पड़ता। परिवहन लागत, विमानन रसायन प्लास्टिक, उर्वरक, विनिर्माण और वस्तुओं की ढुलाई तक इसकी श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया पहुंचती है। यदि रूस से मिलने वाले तेल पर प्रतिबंधों या अतिरिक्त शुल्क के कारण भारत को वैकल्पिक स्रोतों से अधिक महंगा तेल खरीदना पड़ता है, तो भारतीय आयात बिल बढ़ सकता है।दूसरी ओर यदि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है और अमेरिका उस पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का निर्णय करता है तो भारत के अमेरिकी बाजार में निर्यात पर दबाव पैदा हो सकता है। इसलिए भारत के सामने मूल प्रश्न यह है कि वह ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात बाजार और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन सटीकता से कैसे बनाए रखे।
साथियों बात अगर कर हम रुपये के लिए भी बढ़ सकता है दबाव इसको समझने की करें तो,19 सितंबर को उपलब्ध ताजा जानकारी के अनुसार शुक्रवार को भारतीय रुपया 95.87 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। उसे भारतीय रिजर्व बैंक की डॉलर बिक्री और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से कुछ सहारा मिला, लेकिन मजबूत अमेरिकी मुद्रा और आयातकों की डॉलर मांग ने उसकी मजबूती सीमित रखी। चालू वित्त वर्ष में रुपया अब तक लगभग 1.05 प्रतिशत कमजोर हो चुका है।यदि भविष्य में तेल का आयात महंगा होता है तो भारत को तेल खरीदने के लिए अधिक डॉलर की आवश्यकता होगी। इससे डॉलर की मांग बढ़ सकती है और रुपये पर दबाव आ सकता है। कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए कुछ परिस्थितियों में लाभकारी हो सकता है, लेकिन महंगे आयात के कारण कच्चे माल, ऊर्जा और मशीनरी की लागत बढ़ सकती है। इसलिए रुपये की कमजोरी को केवल निर्यातकों के लिए लाभ के रूप में देखना उचित नहीं होगा। साथियों बात अगर हम शेयर बाजार के लिए असली परीक्षा को समझने की करें तो 18 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार में मिश्रित तस्वीर देखने को मिली। सेंसेक्स 19.63 अंक की मामूली गिरावट के साथ 74,294.96 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 में 75.80 अंक अथवा 0.33 प्रतिशत की बढ़त रही और वह 23,346.40 पर बंद हुआ। व्यापक बाजार में मध्य और छोटे आकार की कंपनियों के सूचकांकों में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन हुआ।लेकिन बाजार की इस स्थिरता को जोखिम समाप्त होने का संकेत नहीं माना जा सकता। कच्चा तेल, अमेरिकी ब्याज दरें,वैश्विक बांड प्रतिफल विदेशी निवेश और भू-राजनीतिक तनाव भारतीय बाजार की दिशा को प्रभावित करते रहेंगे। यदि रूस के तेल को लेकर अमेरिका की ओर से वास्तविक अतिरिक्त शुल्क लागू होता है तो निर्यात आधारित कंपनियों, ऊर्जा- खपत वाले उद्योगों, रसायन, विमानन, परिवहन और अन्य क्षेत्रों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ सकता है।
साथियों बात अगर हम निवेशकों के लिए सबसे बड़े संदेश को समझने की करें तो,निवेशकों के लिए वर्तमान परिस्थिति में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल एक दिन के शेयर बाजार की तेजी या गिरावट के आधार पर भविष्य का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। बाजार इस समय कई परस्पर विरोधी संकेतों को एक साथ समाहित कर रहा है। एक ओर कच्चे तेल में कुछ नरमी आती है तो बाजार को राहत मिलती है,दूसरी ओर अमेरिका के नए प्रतिबंधों से ऊर्जा और व्यापार संबंधी अनिश्चितता बढ़ती है।एक तरफ भारत के निर्यात में तेज वृद्धि हुई है, तो दूसरी तरफ विदेशी मुद्रा और रुपये पर बाहरी दबाव बना हुआ है।ऐसे वातावरण में भारतीय निवेशकों के लिए कंपनियों की आय,कर्ज,आयात पर निर्भरता, निर्यात में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी और ऊर्जा लागत जैसे मूलभूत तत्व पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वैश्विक निवेशकों के लिए भारत की कहानी केवल आर्थिक वृद्धि की नहीं बल्कि बाहरी झटकों को सहने की क्षमता की भी होगी।
साथियों बात अगर हम महंगाई की चिंता क्यों लौट सकती है इसको समझने की करें तो,यदि कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो भारत के लिए महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है और उसका प्रभाव अनेक वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंच सकता है।यदि उसी समय रुपया भी कमजोर होता है तो आयातित मुद्रास्फीति का दबाव और बढ़ सकता है। इसके विपरीत यदि तेल की कीमतों में पर्याप्त और स्थायी कमी आती है तो भारत के आयात बिल और महंगाई दोनों को राहत मिल सकती है।यही कारण है कि आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अमेरिकी प्रतिबंध कानून का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि उसका वास्तविक क्रियान्वयन किस रूप में होता है, तेल की वैश्विक कीमतें किस दिशा में जाती हैं और भारत वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों तथा व्यापारिक साझेदारियों का कितना प्रभावी उपयोग करता है।
साथियों बात अगर हम निर्यात की तेज रफ्तार के बीच नया प्रश्न इसको समझने की करें तो अगस्त के निर्यात आंकड़ों ने भारत की अर्थव्यवस्था को एक सकारात्मक आधार दिया है। वस्तु निर्यात में 26 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक वृद्धि दर्ज हुई और कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात 82.68 अरब डॉलर तक पहुंचने का सटीक अनुमान रहा।लेकिन अब प्रश्न यह है कि क्या यह निर्यात गति आगे भी कायम रह सकेगी। अमेरिका भारत के लिए एक महत्वपूर्ण निर्यात बाजार है। यदि रूस से तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त अमेरिकी शुल्क लागू होते हैं और उसके जवाब में व्यापारिक तनाव बढ़ता है,तो भारतीय निर्यातकों को नए बाजार खोजने, लागत घटाने और आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव करने की आवश्यकता पड़ सकती है। इससे अल्पकाल में अनिश्चितता बढ़ सकती है, जबकि दीर्घकाल में भारत के लिए बाजारों का विविधीकरण एक महत्वपूर्ण रणनीतिक आवश्यकता बन सकता है।भारत के लिए अवसर भी मौजूद हैँ,वर्तमान परिस्थितियों में केवल जोखिम देखना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता की आवश्यकता बढ़ रही है। यदि कंपनियां किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भरता घटाना चाहती हैं तो भारत विनिर्माण इलेक्ट्रॉनिक्स, औषधि, इंजीनियरिंग, रसायन और अन्य क्षेत्रों में अपनी क्षमता का विस्तार कर सकता है।अगस्त के निर्यात आंकड़ों में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं और इंजीनियरिंग वस्तुओं की मजबूत वृद्धि इसका संकेत देती है।इसलिए वर्तमान संकट भारत के लिए चुनौती के साथ-साथ व्यापारिक विविधीकरण का अवसर भी बन सकता है।यदि भारत अमेरिकी बाजार के साथ संबंध बनाए रखते हुए यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य उभरते बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाता है तो किसी एक बाजार पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सकती है।
साथियों बात अगर हम आने वाले सप्ताह में बाजार की नजर किन बातों पर होगी इसको समझने की करें तो अब बाजार की निगाह मुख्य रूप से पांच बातों पर रहेगी, अमेरिकी प्रशासन नए कानून का वास्तविक उपयोग किस प्रकार करता है, रूस से भारतीय तेल आयात को लेकर आगे क्या निर्णय सामने आता है, कच्चे तेल की कीमत किस स्तर पर टिकती है, रुपया 96 प्रति डॉलर के आसपास किस प्रकार व्यवहार करता है और विदेशी निवेशकों की भारतीय बाजार में वापसी कितनी मजबूत होती है। इन सभी कारकों का संयुक्त प्रभाव भारतीय शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था की दिशा को प्रभावित कर सकता है।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
बरडीहा प्रखंड परिसर में डालसा द्वारा विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन।
बरडीहा/झारखंड
बरडीहा प्रखंड परिसर में जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डालसा) के तत्वावधान में ‘जस्टिस ऑन व्हील्स’ कार्यक्रम के तहत एक विशेष विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम प्रखंड विकास पदाधिकारी प्रवीण कुमार सिंह की अध्यक्षता में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम की मुख्य बातें: • डालसा टीम की उपस्थिति: कार्यक्रम में डालसा की ओर से नित्यानंद दुबे, मनोज दुबे और श्रीमती तृप्ति ने विशेष रूप से भाग लिया। • कानूनी अधिकारों की जानकारी: उपस्थित वक्ताओं ने बहुत ही सरल और सहज शब्दों में आम जनता को उनके कानूनी अधिकारों और योजनाओं की जानकारी दी। • सुलह-समझौते से मामलों का निष्पादन: नित्यानंद दुबे ने बताया कि छोटे-मोटे झगड़े, जमीन के विवाद, आपसी मतभेद और लेन-देन जैसे मामलों को बिना किसी न्यायालयीय शुल्क और जटिल प्रक्रिया के आसानी से सुलझाया जा सकता है। इसके लिए केवल एक साधारण आवेदन पर दोनों पक्षों को नोटिस भेजकर सौहार्दपूर्ण समाधान का प्रयास किया जाता है।
महत्वपूर्ण हेल्पलाइन नंबरों की जानकारी: अध्यक्षीय संबोधन के दौरान प्रवीण कुमार सिंह ने नागरिकों को विभिन्न आपातकालीन और सहायता नंबरों के बारे में जागरूक किया: •112: आपातकालीन सहायता सेवा •1098: चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर •1950: निर्वाचन से संबंधित हेल्पलाइन •15100: विधिक जागरूकता हेल्पलाइन •1033: राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) आपातकालीन सहायता •104: झारखंड आपातकालीन चिकित्सा सेवा “जानकारी ही असली सशक्तिकरण है” बीडीओ प्रवीण कुमार सिंह ने अपने निजी अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे रास्ते में वाहन का ईंधन समाप्त होने पर उन्होंने 1033 नंबर पर कॉल कर त्वरित सहायता प्राप्त की थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि “जानकारी ही असली सशक्तिकरण और ताकत है”, इसलिए सभी नागरिकों को अपने अधिकारों और उपलब्ध हेल्पलाइन नंबरों की पूरी जानकारी रखनी चाहिए तथा जरूरत पड़ने पर उनका उपयोग करना चाहिए।
कार्यक्रम का समापन शिविर के अंत में श्रीमती तृप्ति द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया और कार्यक्रम के समापन की घोषणा की गई। इस आयोजन से स्थानीय लोगों में भारी उत्साह देखा गया। उपस्थित लोगों ने सराहना करते हुए कहा कि ऐसे शिविरों का आयोजन निरंतर होते रहना चाहिए, जिससे आम जनता को महत्वपूर्ण कानूनी जानकारियां मिलती रहें। साथ ही, सभी ने यह संकल्प लिया कि वे इन उपयोगी जानकारियों को अपने आस-पास के अन्य लोगों के साथ भी साझा करेंगे।