
सरायकेला/ईचागढ़
(मालखान महतो)
पारम्परिक मीट्टी के दीए और दीवाली पर सजने वाले मीट्टी के साजो सामान पर चीनी वस्तुओं से ग्रहण लग रहा है। जहां दीपावली में लोग मीट्टी के दीए से अपने घर और आंगन को सजाते थे, मीट्टी के बर्तनों का जमकर उपयोग किया जाता था,आज चीनी लाइटों, दीया और प्लास्टिक उत्पादों ने जगह बना ली, जिससे पारम्परिक स्वदेशी मीट्टी के वस्तुओं के निर्माता खास कर कुम्हारों की स्थिति दयनीय होते जा रहा है।
ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र के नदीसाईं एवं बोड़ा गांव में आज भी पारम्परिक रूप से प्राचीन काल की तरह कुम्हार अपने चक्की को घुमाकर मीट्टी के दीए , वर्तन,हंडी आदि का निर्माण कर रहे हैं। आधुनिक तकनीकी के इस युग में भी कुम्हार आज भी पारम्परिक चक्की को लाठी के सहारे चलाकर जी तोड़ मेहनत कर मीट्टी का समानों का निर्माण कर अपने पारम्परिक कारीगरी को जिंदा रखे हुए हैं। ऐसे समय में चीनी लाइट, दीया व अन्य सामान मीट्टी के समानों का स्थान ले रहा है, जिससे पारम्परिक और मीट्टी का समान निर्माण करने वाले कारीगरों के सामने बड़ा चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इस दिवाली के लिए कुम्हार अपने पारम्परिक रूप से दीया व वर्तन आदि का निर्माण में लगे हुए हैं। रंजीत कुम्हार बताते हैं कि सरकारी सहायता के अभाव में आज के युग में भी पारम्परिक चक्की से मीट्टी का दीया व वर्तन का निर्माण किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पुरे परिवार एक महीने से इस काम में लगे हुए हैं। दिवाली में बिकने वाले दीया पहले जैसा नहीं बिक रहा है। उन्होंने कहा कि अगर सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी और आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराई जाएगी तो कम समय में अधिक निर्माण होगा और आमदनी भी बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि ऐसा ही स्थिति रहा तो आने वाले समय में पारम्परिक मिट्टी का निर्माण बंद हो जाएगा, चुंकि आधुनिकता इस दौड़ में युवा वर्ग पुराने जमाने का निर्माण विधि को अपनाना नहीं चाहते हैं।












