नीट पेपर लीक और लाठीचार्ज के विरोध में कांग्रेस ने फूंका पीएम व शिक्षा मंत्री का पुतला।
सरायकेला/आदित्यपुर
सोनू कुमार सिंह
भारत के कोने-कोने में नीट पेपर लीक मामला चर्चाओं में बना हुआ है जगह-जगह पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है और इसका जीता जागता सबूत जंतर मंतर पर देखा जा रहा है।
वहीं इस नीट पेपर लीक मामले तथा नई दिल्ली में छात्रों और विपक्षी नेताओं पर कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध में जिला कांग्रेस कमेटी ने जिलाध्यक्ष राज बागची के नेतृत्व में बुधवार शाम आदित्यपुर के आकाशवाणी चौक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का पुतला दहन किया। इस कार्यक्रम को पूर्व विधायक अरविंद सिंह ने नैतिक समर्थन दिया।
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि नीट परीक्षा में हुई अनियमितताओं से लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है। साथ ही दिल्ली में विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों और नेताओं पर पुलिस की कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया। कांग्रेस ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, परीक्षा अनियमितताओं पर संसद में चर्चा तथा प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग की।
उक्त कार्यक्रम में कांग्रेसियों ने कहा कि नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुए लाठीचार्ज की जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा में पेपर लीक जैसी घटनाएं शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। इससे लाखों अभ्यर्थियों की वर्षों की मेहनत और भविष्य प्रभावित होता है। ऐसी घटनाओं की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों को कठोर दंड दिया जाना चाहिए।
उक्त कार्यक्रम में देबु चटर्जी, राणा सिंह, अवधेश सिंह, समरेंद्र नाथ तिवारी, राहुल यादव, रमेश बालमुचू,रुईदास चाकी, केपी तिवारी, फुलकांत झा, उर्मिला, पूर्वी देवी, रानी शर्मा, प्रिंस सिंह, उपेंद्र शर्मा, प्रिंस सिंह, सुरेश धारी, उपेंद्र शर्मा, जगदीश नारायण चौबे, राणा सिंह, वैद्य संजय कुमार, रिजवान खान, संतोष सिंह, अनिल ठाकुर, खिरोड़ सरदार, कमल नयन, सहित बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता मौजूद रहे।
लोकतंत्र में धरना-प्रदर्शन: जनहित का संवैधानिक अधिकार या दलगत टकराव का अखाड़ा? -सड़क से संसद तक बढ़ते राजनीतिक संघर्ष के बीच भारतीय लोकतंत्र के सामने नई चुनौती -समग्र व्यापक विश्लेषण।
क़्या आज आंदोलन जनहित और नीति- सुधार से अधिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और दलगत हितों के इर्द-गिर्द केंद्रित होते जा रहे हैं?
धरना-प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा हैं, किंतु उनका उद्देश्य लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करना होना चाहिए, नकि संस्थाओं को कमजोर करना -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर भारत का लोकतंत्र अपनी सबसे बड़ी शक्ति जनता की भागीदारी, असहमति के सम्मान और शांतिपूर्ण विरोध की परंपरा से प्राप्त करता है।किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में धरना,प्रदर्शन, सत्याग्रह और जनआंदोलन केवल विरोध के साधन नहीं होते,बल्कि वे शासन और जनता के बीच संवाद स्थापित करने के संवैधानिक माध्यम भी माने जाते हैं। भारत की सभ्यता में भी अहिंसक प्रतिरोध की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है,जिसे आधुनिक युग में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसक आंदोलन के रूप में विश्व के सामने स्थापित किया। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और सामाजिक संगठनों तक,शांतिपूर्ण आंदोलनों ने समय-समय पर सरकारों को जनभावनाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।यही लोकतंत्र की आत्मा है कि सरकार और विपक्ष दोनों जनता के प्रति जवाबदेह रहें तथा मतभेदों का समाधान संविधान और संवाद के माध्यम से खोजें। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि समय के साथ-साथ आंदोलन की प्रकृति में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देने लगा है। आज अनेक अवसरों पर यह धारणा बनती जा रही है कि कई आंदोलन जनहित और नीति-सुधार से अधिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और दलगत हितों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गए हैं। जनता के एक वर्ग में यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या धरना-प्रदर्शन अब लोकतांत्रिक विमर्श का माध्यम रह गए हैं,अथवा वे राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का उपकरण बनते जा रहे हैं? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच के समानांतर सड़क पर संघर्ष की राजनीति बढ़ती दिखाई दे रही है।इसी परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2026 का मानसून संसद सत्र विशेष चर्चा का विषय बन गया है। 20 जुलाई से प्रारंभ हुए संसद सत्र के साथ ही विभिन्न विपक्षी दलों ने कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति अपनाई। यूजीसी-नेट, शिक्षा व्यवस्था,छात्रों के मुद्दे,कथित पुलिस कार्रवाई तथा शिक्षामंत्री से इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष ने संसद के भीतर और बाहर दोनों स्थानों पर आक्रामक रुख अपनाया, दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिलने लगा,जिसमें विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं की भागीदारी ने इसे केवल एक छात्र या सामाजिक आंदोलन न रहने देकर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना दिया।अब धरना स्थल पर भगदड़, पीएम के आवास पर धरना, फिर 22 जुलाई 2026 को सत्ताधारी पार्टी द्वारा भी आंदोलन धरना व तेलंगाना में दोनों पार्टियों क़े कार्यकर्ताओं की झड़प यह सब मीडिया में आ रहा है जिसे जनता, मतदाता व पूरा विश्व देख रहे हैं।
साथियों इसी क्रम में पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन को भी विपक्ष ने समर्थन दिया। उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त की गई और न्यायालय के सुझाव के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। इससे आंदोलन को मानवीय और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से व्यापक चर्चा मिली। लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है,किंतु जब ऐसे आंदोलनों के साथ राजनीतिक दल खुलकर जुड़ते हैं तो आंदोलन का स्वरूप स्वतः व्यापक राजनीतिक बहस का विषय बन जाता है। सरकार इसे राजनीतिकरण कहती है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक समर्थन बताता है। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं, किंतु अंतिम निर्णय जनता की लोकतांत्रिक समझ पर ही सटीकता से निर्भर करता है। साथियों, इन घटनाओं के समानांतर संसद के भीतर भी लगातार हंगामा, नारेबाजी, स्थगन और बहिर्गमन जैसी स्थितियां देखने को मिलीं।संसद का प्रत्येक मिनट राष्ट्रीय संसाधनों,करदाताओं के धन और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से जुड़ा होता है। जब 25 दिन के निर्धारित संसदीय सत्र का बड़ा हिस्सा व्यवधानों में व्यतीत होता है,तबस्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या जनहित से जुड़े विधेयक, आर्थिक सुधार, सामाजिक कल्याण और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर्याप्त चर्चा प्राप्त कर पाएंगे?लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व सरकार से कठोर प्रश्न पूछना है, वहीं सरकार का दायित्व उत्तर देना और संसद चलाना है। यदि दोनों पक्ष संवाद के स्थान पर केवल टकराव का मार्ग अपनाते हैं तो अंततः नुकसान सटीकता से जनता का होता है।
साथियों, स्थिति तब और अधिक गंभीर दिखाई दी जब संसद के बाहर पीएम के आधिकारिक आवास के निकट प्रमुख विपक्षी पार्टी द्वारा धरना-प्रदर्शन किया गया।प्रदर्शन का मुख्य आधार नीट पेपर लीक,छात्रों के साथ कथित पुलिस कार्रवाई तथा शिक्षा संबंधी मुद्दे बताए गए।विपक्ष का कहना था कि वह छात्रों की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाना चाहता है, जबकि सत्तापक्ष ने इसे सुरक्षा व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं के विरुद्ध राजनीतिक प्रदर्शन बताया। पीएम आवास जैसे अति- संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन ने स्वाभाविक रूप से सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ाई और राजनीतिक वातावरण और अधिक गर्म हो गया। इसके तुरंत बाद प्रमुख सत्ताधारी पार्टी ने भी प्रमुख विपक्षी पार्टी के विरोध में देशव्यापी प्रदर्शन प्रारंभ कर दिए। अनेक राज्यों में प्रमुख सत्ताधारी पार्टी क़े कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे और विपक्ष के आरोपों का प्रतिवाद किया। यह घटनाक्रम लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का स्वाभाविक हिस्सा माना जा सकता है, किंतु जब जवाबी प्रदर्शन भी समान तीव्रता से शुरू होते हैं तो राजनीतिक तनाव कई गुना बढ़ जाता है। तेलंगाना सहित कुछ स्थानों पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच झड़पों की मीडिया में आई खबरों ने चिंता और बढ़ा दी। लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष स्वीकार्य है,परंतु यदि वह शारीरिक टकराव का रूप लेने लगे तो लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर पड़ने लगती है। साथियों,आज सूचना प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया के युग में भारत की प्रत्येक राजनीतिक गतिविधि केवल देश की जनता ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व भी देखता है। भारत स्वयं को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। ऐसे में संसद के भीतर लगातार व्यवधान, सड़क पर राजनीतिक संघर्ष, आरोप-प्रत्यारोप और कार्यकर्ताओं के बीच टकराव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकतांत्रिक परिपक्वता के संदर्भ में चर्चा का विषय बनते हैं। लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनावों में नहीं, बल्कि असहमति को गरिमा के साथ संभालने की क्षमता में भी निहित होती है।
साथियों, राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि जनता अब केवल भाषणों और नारों के आधार पर निर्णय नहीं करती। मतदाता शिक्षा,रोजगार,महंगाई,कृषि स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, कानून-व्यवस्था और आर्थिक अवसरों जैसे ठोस मुद्दों पर सरकार और विपक्ष दोनों का मूल्यांकन करता है। यदि संसद का समय बार-बार हंगामे में व्यतीत होता है और जनहित के प्रश्न पीछे छूट जाते हैं, तो मतदाता दोनों पक्षों के आचरण का आकलन अपने अनुभव और अपेक्षाओं के आधार पर करता है।इसलिए कई विश्लेषक यह संभावना व्यक्त करते हैं कि अंततः जनता अपने मताधिकार के माध्यम से राजनीतिक दलों के व्यवहार पर प्रतिक्रिया देती है। यह प्रतिक्रिया किसके पक्ष में जाएगी, इसका निर्णय केवल चुनाव परिणाम ही करते हैं; इसलिए किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं होगा।
साथियों, लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। एक सशक्त विपक्ष सरकार को जवाबदेह बनाता है, नीतियों की समीक्षा करता है और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह आलोचना को लोकतांत्रिक भावना से सुने, संवाद के अवसर बनाए और आवश्यक होने पर सुधारात्मक कदम उठाए। यदि दोनों पक्ष संवाद छोड़कर केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण को प्राथमिकता देंगे, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होगी।जनता पर इन घटनाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव भी कम नहीं पड़ता। संसद का कामकाज बाधित होने से अनेक विधेयकों, नीतिगत चर्चाओं और जनहित से जुड़े निर्णयों में विलंब हो सकता है। दूसरी ओर,संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धरना- प्रदर्शन होने से आम नागरिकों को यातायात, सुरक्षा जांच और दैनिक जीवन में कठिनाइयों का सामना करनापड़ता है। तीसरा प्रभाव लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास पर पड़ता है। यदि नागरिकों को यह महसूस होने लगे कि समस्याओं का समाधान संसद के बजाय केवल सड़क पर संघर्ष से ही संभव है, तो संस्थागत लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। भारतीय संविधान ने नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार दिया है। साथ ही यह भी अपेक्षा की गई है कि इन अधिकारों का प्रयोग सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप हो। इसी प्रकार निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा रहती है कि वे संसद और विधानसभाओं को संवाद, बहस और नीति- निर्माण का सर्वोच्च मंच बनाए रखें। यदि सड़क और संसद दोनों स्थानों पर केवल टकराव ही दिखाई देगा,तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे। साथियों, विश्व के अनेक परिपक्व लोकतंत्रों में भी विरोध प्रदर्शन होते हैं, किंतु अंततः अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय संसदीय समितियों, विधायी बहसों, न्यायिक समीक्षा और संस्थागत संवाद के माध्यम से आगे बढ़ते हैं। भारत के लिए भी यही मार्ग अधिक टिकाऊ और लोकतांत्रिक माना जाता है। आंदोलन लोकतंत्र की शक्ति हैं, परंतु आंदोलन का उद्देश्य समाधान होना चाहिए, स्थायी टकराव नहीं।आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार विपक्ष की चिंताओं को गंभीरता से सुने, विपक्ष संसद की कार्यवाही को प्रभावी ढंग से चलने दे और दोनों पक्ष राष्ट्रीय हित को दलगत हितों से ऊपर रखें। जनता ने जनप्रतिनिधियों को संघर्ष करने के लिए नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान खोजने के लिए चुना है। संसद में बहस जितनी मजबूत होगी, लोकतंत्र उतना ही सशक्त होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे क़ि भारत का लोकतंत्र आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ संवैधानिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और जनअपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। धरना-प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा हैं, किंतु उनका उद्देश्य लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करना होना चाहिए, न कि संस्थाओं को कमजोर करना। संसद का प्रत्येक दिन देश के भविष्य से जुड़ा है; इसलिए उसका अधिकतम उपयोग होना चाहिए। अंततः लोकतंत्र का अंतिम निर्णायक न सरकार होती है,न विपक्ष बल्कि भारत का जागरूक मतदाता होता है, जो समय आने पर अपने मताधिकार के माध्यम से सभी राजनीतिक दलों के आचरण, जवाबदेही और प्राथमिकताओं का मूल्यांकन करता है। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
22 जुलाई: भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास का गौरवशाली दिन।
देश का तिरंगा जब शान से लहराता है, तो प्रत्येक भारतीय का हृदय गर्व और देशभक्ति से भर उठता है। 22 जुलाई 1947 का दिन भारतीय इतिहास में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के वर्तमान स्वरूप को आधिकारिक रूप से अपनाया था।
📜 भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की ऐतिहासिक यात्रा
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का विकास स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न चरणों से होकर गुजरा।
🔸 1906 में कोलकाता के पारसी बागान स्क्वायर में भारत का एक प्रारंभिक अनौपचारिक ध्वज फहराया गया।
🔸 1907 में मैडम भीकाजी कामा ने विदेश में भारत का एक ध्वज फहराकर स्वतंत्रता की आवाज को विश्व मंच तक पहुंचाया।
🔸 ध्वज के विकास में स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उनके प्रस्तुत प्रारूपों में समय-समय पर परिवर्तन किए गए।
🔸 अंततः 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने केसरिया, सफेद और हरे रंग वाले तिरंगे को स्वीकार किया, जिसके मध्य में गहरे नीले रंग का अशोक चक्र है।
🎨 तिरंगे के रंगों का महत्व
🟧 केसरिया रंग—साहस, त्याग और बलिदान का प्रतीक है।
⬜ सफेद रंग—शांति, सत्य और पवित्रता का संदेश देता है।
🟩 हरा रंग—समृद्धि, विकास और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है।
🔵 अशोक चक्र—निरंतर गति, प्रगति और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसमें कुल 24 तीलियां हैं।
🇮🇳 1923 का झंडा सत्याग्रह
वर्ष 1923 में नागपुर के झंडा सत्याग्रह के दौरान हजारों देशवासियों ने राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान और उसे फहराने के अधिकार के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन किया। इस आंदोलन ने तिरंगे को स्वतंत्रता, एकता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के शक्तिशाली प्रतीक के रूप में स्थापित किया।
आजाद हिंद फौज और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के स्वतंत्रता अभियान में भी राष्ट्रीय ध्वज प्रेरणा और संघर्ष का प्रतीक बना।
📘 भारतीय ध्वज संहिता में बदलाव
पहले आम नागरिकों के लिए राष्ट्रीय पर्वों के अतिरिक्त अन्य दिनों में तिरंगा फहराने पर कई प्रतिबंध थे। बाद में भारतीय ध्वज संहिता, 2002 लागू होने के बाद नागरिकों को निर्धारित नियमों और पूर्ण सम्मान के साथ अपने घर, कार्यालय, दुकान तथा संस्थान पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अनुमति मिली।
आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर चलाए गए “हर घर तिरंगा” अभियान ने राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान और जनभागीदारी को नई ऊंचाई प्रदान की।
🌟 22 जुलाई का संदेश
यह दिन हमें राष्ट्रीय ध्वज के गौरव, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान तथा भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करने की प्रेरणा देता है।
तिरंगा केवल हमारा राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आशाओं, संघर्षों, कर्तव्यों और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है।
आइए, तिरंगे की आन-बान-शान को सदैव बनाए रखने और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का संकल्प लें।
🇮🇳 विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। 🇮🇳
वंदे मातरम विधेयक 2026 -राष्ट्रीय सम्मान या अनिवार्य देशभक्ति? -संसद में घमासान ज़ारी, विपक्ष का विरोध और संविधान पर छिड़ी बड़ी बहस -सरकार-विपक्ष आमने-सामने -समग्र व्यापक विश्लेषण।
वंदे मातरम विधेयक 2026- भारतीय बहुलतावादी लोकतंत्र में चुनौती- राष्ट्रीय गौरव की रक्षा भी हो, संविधान की आत्मा भी सुरक्षित रहे और नागरिक की अंतरात्मा की स्वतंत्रता भी अक्षुण्ण बनी रहे।
राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 केवल एक दंडात्मक कानून का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों राष्ट्रीय सम्मान, संवैधानिक स्वतंत्रता और नागरिक कर्तव्य के बीच संतुलन स्थापित करने की परीक्षा भी है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में जुलाई 2026 का मानसून सत्र केवल राजनीतिक टकराव के लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों की संवैधानिक स्थिति को लेकर शुरू हुई एक नई बहस के कारण भी लंबे समय तक याद किया जा सकता है।20 जुलाई 2026 को जब यह विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया,उसी समय विपक्ष ने इसके विरोध में तीखी आपत्ति दर्ज कराई।विभिन्न विपक्षी दलों ने इसे असंवैधानिक बताते हुए अन्य तात्कालिक मुद्दों पर चर्चा की मांग की।सदन में लगातार हंगामा होता रहा और विधेयक पर विस्तृत चर्चा प्रारंभ नहीं हो सकी।21 जुलाई 2026 तक की संसदीय स्थिति के अनुसार यह विधेयक प्रस्तुत तो हो चुका था, किंतु उस पर विचार- विमर्श और आगे की विधायी प्रक्रिया गतिरोध के कारण आगे नहीं बढ़ सकी। अर्थात विधेयक अभी कानून नहीं बना है और उसे संसद के दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त करना शेष है।केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा में प्रस्तुत राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 ने संसद से लेकर न्यायपालिका,संविधान विशेषज्ञों,राजनीतिक दलों, शिक्षाविदों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक व्यापक चर्चा को जन्म दिया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि प्रस्तावित संशोधन का मूल उद्देश्य राष्ट्रगीत वंदे मातरम को वही वैधानिक संरक्षण प्रदान करना है जो अब तक राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान जन गण मन को प्राप्त है।यदि यह विधेयक वर्तमान स्वरूप में कानून बनता है तो किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर वंदे मातरम का अपमान करना, उसके गायन में बाधा डालना अथवा सार्वजनिक कार्यक्रम में उसका अनादर करना तीन वर्ष तक के कारावास जुर्माने या दोनों से दंडनीय अपराध बन सकता है। यहीं से वह संवैधानिक प्रश्न प्रारंभ होता है जिसने पूरे देश में चर्चा को जन्म दिया है,क्या यह राष्ट्रीय सम्मान को मजबूत करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है?,या फिर यह देशभक्ति को कानून के माध्यम से अनिवार्य बनाने का प्रयास माना जाएगा?
साथियों, मीडिया में आई जानकारी के अनुसार सरकार का पक्ष अत्यंत स्पष्ट है। केंद्र का कहना है कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा रहा है। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष के दौरान लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी गीत को प्रेरणा का स्रोत बनाया। अनेक क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर चढ़ते समय वंदे मातरम का उद्घोष करते थे। संविधान सभा के अंतिम चरण में 24 जनवरी 1950 को तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया था कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा जबकि वंदे मातरम को समान सम्मान प्राप्त रहेगा। सरकार का तर्क है कि स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी ऐतिहासिक भूमिका को देखते हुए अब समय आ गया है कि इसे भी वैधानिक सुरक्षा प्रदान की जाए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति जानबूझकर इसका अपमान न कर सके। सरकार यह भी कह रही है कि यह संशोधन किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि सटीकता से राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए लाया गया है।
साथियों, यह विधेयक वास्तव में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में संशोधन का प्रस्ताव है। वर्तमान अधिनियम मुख्य रूप से राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान के अपमान को दंडनीय बनाता है। प्रस्तावित संशोधन के बाद पहली बार राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को भी इसी श्रेणी में शामिल किया जाएगा। इसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगीत का अपमान करता है, उसके गायन में व्यवधान उत्पन्न करता है, किसी सार्वजनिक समारोह में उसे रोकने का प्रयास करता है या उसके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली गतिविधि करता है, तो उसके विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की जा सकेगी। सरकार का कहना है कि यह संशोधन केवल जानबूझकर किए गए अपमान पर लागू होगा, यह सटीकता से सामान्य परिस्थितियों अथवा व्यक्तिगत विवेक पर नहीं।
साथियों, लेकिन यही वह बिंदु है जहां से संवैधानिक विवाद प्रारंभ होता है। विपक्ष का कहना है कि संविधान सभा ने जानबूझकर राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के बीच कानूनी अंतर बनाए रखा था। यदि संविधान निर्माताओं की मंशा दोनों को समान कानूनी दर्जा देने की होती तो संविधान में उसी समय इसका स्पष्ट उल्लेख किया जाता। विपक्षी दलों, विशेषकर सीपीआई (एम), का आरोप है कि सरकार संविधान सभा की मूल भावना को बदलने का प्रयास कर रही है। उनके अनुसार देशभक्ति एक भावनात्मक और नैतिक मूल्य है, जिसे कानून के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यदि किसी नागरिक के व्यक्तिगत या धार्मिक विश्वास के कारण वह राष्ट्रगीत नहीं गाना चाहता, तो उसे अपराधी नहीं बनाया जा सकता।
साथियों, सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस विधेयक को वापस लेने की मांग की। पत्र में कहा गया कि संविधान सभा ने बहुत सोच-समझकर राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत की अलग- अलग संवैधानिक स्थिति निर्धारित की थी। पत्र में यह भी कहा गया कि भारत का संविधान नागरिकों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। ऐसे में किसी गीत को कानून के माध्यम से अनिवार्य सम्मान दिलाने का प्रयास भविष्य में संवैधानिक विवादों को जन्म दे सकता है। विपक्ष का तर्क है कि राष्ट्रीय सम्मान और राष्ट्रीय अनिवार्यता के बीच सटीकता से संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है। साथियों, इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ है। वंदे मातरम मूलतः बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा है। गीत के प्रारंभिक दो अंतरे व्यापक रूप से स्वीकार किए जाते हैं, जबकि बाद के अंशों में मां दुर्गा सहित कुछ धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख मिलता है। इतिहास में कई मुस्लिम संगठनों तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों ने इन्हीं धार्मिक संदर्भों के आधार पर इसके पूर्ण गायन पर आपत्ति व्यक्त की थी। संविधान सभा ने भी इन ऐतिहासिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए केवल प्रारंभिक अंशों को सार्वजनिक उपयोग के लिए स्वीकार किया था। आलोचकों का कहना है कि यदि इस विधेयक के बाद किसी नागरिक की धार्मिक मान्यता और कानून के बीच टकराव उत्पन्न होता है, तो न्यायपालिका को अत्यंत जटिल संवैधानिक प्रश्नों का सटीकता से सामना करना पड़ सकता है।
साथियों, इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय का 1986 का ऐतिहासिक निर्णय बिजोए इमैनुएल बनाम केरल राज्य बार-बार चर्चा में आ रहा है। इस मामले में यहोवा विटनेस समुदाय के तीन छात्रों ने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, हालांकि वे सम्मानपूर्वक खड़े रहे। विद्यालय ने उन्हें निष्कासित कर दिया,लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि किसी नागरिक को उसकी अंतरात्मा के विरुद्ध राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि वह सम्मानपूर्वक खड़ा है और राष्ट्रगान का अपमान नहीं कर रहा, तो केवल गीत न गाने के आधार पर उसे दंडित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय भारतीय संवैधानिक कानून में अंतरात्मा की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। यही कारण है कि कई संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नया संशोधन कानून बनता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा लगभग निश्चित है। मार्च 2026 में भी इस विषय पर न्यायिक चर्चा हुई थी। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि किसी सरकारी कार्यक्रम में वंदे मातरम बजाया जाता है तो केवल उसके बजने मात्र से प्रत्येक नागरिक पर उसे गाना अनिवार्य नहीं हो जाता। सम्मान प्रदर्शित करना और अनिवार्य रूप से गाना दो अलग-अलग बातें हैं। यह दृष्टिकोण भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है क्योंकि नया संशोधन और न्यायालय की पूर्व व्याख्याएं भविष्य में एक-दूसरे के साथ किस प्रकार संतुलित होंगी, यह अभी सटीकता से स्पष्ट नहीं है।
साथियों,संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, जबकि अनुच्छेद 25 अंतरात्मा तथा धर्म की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है। दूसरी ओर अनुच्छेद 51ए (क) प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य बताता है कि वह संविधान,राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे। उल्लेखनीय है कि इस अनुच्छेद में वंदे मातरम’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। यही कारण है कि कई विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संसद राष्ट्रगीत को वैधानिक संरक्षण देना चाहती है तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि यह संरक्षण मौलिक अधिकारों के साथ किस प्रकार संतुलित रहेगा।समर्थकों का तर्क है कि विश्व के अनेक देशों में राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर कठोर दंड का प्रावधान है। उनका कहना है कि यदि राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान की कानूनी सुरक्षा उचित मानी जाती है तो स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रेरणादायक गीत को भी समान सुरक्षा मिलनी चाहिए। उनके अनुसार राष्ट्रीय एकता केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि नागरिक कर्तव्यों से भी मजबूत होती है। दूसरी ओर आलोचक कहते हैं कि भारत का लोकतांत्रिक मॉडल विविधता, सहमति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधारित है, इसलिए राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करते समय संवैधानिक स्वतंत्रताओं का भी समान महत्व होना चाहिए।
साथियों, इस पूरे घटनाक्रम ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा है क्या देशभक्ति कानून से उत्पन्न होती है या सामाजिक चेतना से? भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास बताता है कि वंदे मातरम और जन गण मन दोनों ने अलग-अलग समय में राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया। किंतु संविधान निर्माताओं ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी समान महत्व दिया। इसलिए भविष्य की किसी भी कानूनी व्यवस्था को इन दोनों मूल्यों के बीच सटिकता से संतुलन स्थापित करना होगा।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से भी यह बहस महत्वपूर्ण है। विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन लगातार न्यायालयों के सामने चुनौती बना रहता है। भारत का यह प्रस्तावित संशोधन भी संभवतः इसी व्यापक वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनेगा कि राष्ट्रीय पहचान की रक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच सर्वोत्तम संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 केवल एक दंडात्मक कानून का प्रस्ताव नहीं है,बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों राष्ट्रीय सम्मान,संवैधानिक स्वतंत्रता और नागरिक कर्तव्य के बीच संतुलन स्थापित करने की परीक्षा भी है। यदि विधेयक कानून बनता है तो उसके प्रावधानों की न्यायिक समीक्षा लगभग निश्चित मानी जा रही है। वहीं यदि संसद में व्यापक सहमति बनती है तो यह राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है। परंतु यदि सहमति नहीं बनती, तो यह बहस आने वाले वर्षों तक संविधान,न्यायपालिका संसद और समाज के बीच चलने वाले सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक विमर्शों में से एक बनी रह सकती है। भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में यही चुनौती है कि राष्ट्रीय गौरव की रक्षा भी हो, संविधान की आत्मा भी सुरक्षित रहे और नागरिक की अंतरात्मा की स्वतंत्रता भी अक्षुण्ण बनी रहे।
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
जिला आयुष समिति के मार्गदर्शन में एनपीएस महाबुरू एवं आर्चरी अकादमी, दुगनी में आयुर्विद्या स्वास्थ्य शिविर आयोजित।
सरायकेला-खरसावां
जिला आयुष समिति, सरायकेला-खरसावाँ के मार्गदर्शन एवं आयुष चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. पूनम कुमारी के नेतृत्व में मंगलवार, 21 जुलाई 2026 को आयुष्मान आरोग्य मंदिर, कुचाई की टीम द्वारा एनपीएस महाबुरू एवं आर्चरी अकादमी, दुगनी में आयुर्विद्या स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया।
एनपीएस महाबुरू में आयोजित स्वास्थ्य शिविर के दौरान 42 मरीजों का स्वास्थ्य परीक्षण कर आवश्यक परामर्श एवं उपचार उपलब्ध कराया गया। इस अवसर पर स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, दैनिक जीवन में स्वास्थ्य का समुचित प्रबंधन करने तथा रोगों की रोकथाम के संबंध में जागरूक किया गया। साथ ही विद्यार्थियों के बीच आवश्यक होम्योपैथिक औषधियों का वितरण किया गया।
वहीं आर्चरी अकादमी, दुगनी में आयुष सामुदायिक स्वास्थ्य पदाधिकारी (सीएचओ) डॉ. प्रीति कुमारी द्वारा प्रशिक्षुओं का स्वास्थ्य परीक्षण कर आवश्यक परामर्श एवं आयुष औषधियों का वितरण किया गया। शिविर के दौरान प्रशिक्षुओं को नियमित व्यायाम, संतुलित आहार एवं स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
जिला आयुष समिति द्वारा बताया गया कि इस प्रकार के स्वास्थ्य शिविरों का उद्देश्य आयुष चिकित्सा पद्धति के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना, विद्यार्थियों एवं आमजन को निःशुल्क स्वास्थ्य परामर्श उपलब्ध कराना तथा स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना है।
बेरासी सिरूम में लर्नर लाइसेंस शिविर आयोजित, 108 अभ्यर्थी हुए सफल।
सरायकेला/ईचागढ़
कुकड़ू प्रखंड क्षेत्र के अंतर्गत पंचायत भवन, बेरासी सिरूम में लर्नर लाइसेंस शिविर का आयोजन किया गया।शिविर में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार लेटेमदा, जानुम, बेरासी सिरूम, परगामा एवं ओडिया पंचायतों के उन अभ्यर्थियों को शामिल किया गया, जिन्होंने पूर्व से ऑनलाइन स्लॉट बुक कराया था। शिविर के दौरान अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन, ऑनलाइन आवेदन की जांच तथा निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप लर्नर लाइसेंस परीक्षा संपन्न कराई गई।जिला परिवहन कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार शिविर के लिए कुल 165 अभ्यर्थियों का स्लॉट निर्धारित था। इनमें से 108 अभ्यर्थी लर्नर लाइसेंस परीक्षा में सफल हुए, 15 अभ्यर्थी असफल रहे तथा 42 अभ्यर्थी अनुपस्थित रहे। परीक्षा में सफल सभी अभ्यर्थियों को लर्नर लाइसेंस उपलब्ध कराया गया।
शिविर के दौरान मोटर वाहन निरीक्षक के साथ प्रखंड प्रशासन के पदाधिकारी एवं कर्मी उपस्थित रहे। जिला परिवहन पदाधिकारी ने बताया कि प्रखंडवार आयोजित किए जा रहे इन शिविरों का उद्देश्य आम नागरिकों को उनके निकट ही लर्नर लाइसेंस से संबंधित सेवाएं उपलब्ध कराना तथा आवेदन प्रक्रिया को सरल एवं सुगम बनाना है। उन्होंने अभ्यर्थियों से परिवहन विभाग की ऑनलाइन सेवाओं का अधिकाधिक उपयोग करने तथा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप आवेदन एवं स्लॉट बुकिंग सुनिश्चित करने की अपील की।
साथ ही सभी वाहन चालकों से वैध ड्राइविंग लाइसेंस के साथ ही वाहन का परिचालन करने, यातायात नियमों का पालन करने, दोपहिया वाहन चलाते समय हेलमेट तथा चारपहिया वाहन चलाते समय सीट बेल्ट का अनिवार्य रूप से उपयोग करने एवं सड़क सुरक्षा के प्रति सदैव सजग रहने की अपील की गई।
नहीं थम रहा चापड़ से हमला, आर.आइ.टी मोड़ के समीप युवक पर जानलेवा हमला।
सरायकेला/आदित्यपुर
नहीं थम रहा चापड़ से हमला आए दिन चापड़ की घटनाएं निकल कर सामने आ रही है ताजा मामला सरायकेला खरसावां जिले के आदित्यपुर थाना क्षेत्र का है जहां पर आरआइटी मोड़ के पास रविवार शाम बेखौफ अपराधियों ने एक युवक पर धारदार हथियार से ताबड़तोड़ हमला कर दिया. जिसमें युवक गंभीर रूप से घायल हो गया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आरआइटी मोड़ के समीप दो युवकों के बीच किसी बात को लेकर कहासुनी हुई, जो देखते ही देखते हिंसक रूप ले लिया। इसी दौरान एक युवक ने धारदार हथियार निकालकर दूसरे पर हमला कर दिया।
वहीं घटना के बाद स्थानीय लोगों ने तत्परता दिखाते हुए गंभीर रूप से घायल युवक को गंगोत्री अस्पताल पहुंचाया. वहां प्राथमिक उपचार के बाद उसकी हालत नाजुक होने पर चिकित्सकों ने उसे बेहतर इलाज के लिए टाटा मुख्य अस्पताल (TMH) रेफर कर दिया.
संसद का मानसून सत्र 2026 शुरू – विपक्ष का हंगामा शुरू -क्या अगले 25 दिन भारत की अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार और विज़न- 2047 की दिशा तय करेंगे? -समग्र व्यापक विश्लेषण
विपक्ष क़ा सरकार को केवल विधेयकों पर नहीं, बल्कि महंगाई, बेरोजगारी,कृषि संकट,मणिपुर की स्थिति,नीट परीक्षा विवाद,छात्र आंदोलनों, अयोध्या मंदिर दान प्रकरण तथा परिसीमन जैसे विषयों पर घेरना शुरू
संसद में होने वाली प्रत्येक बहस,विधेयक, राजनीतिक टकराव का प्रभाव आम जनता, उद्योगपतियों,वैश्विक निवेशकों, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई देने की संभावना -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर 20 जुलाई 2026 से प्रारंभ हुआ 13 अगस्त तक चलने वाले इस संसद क़े मानसून सत्र पर पूरे विश्व की नज़रें लगी हुई है।कुल 19 बैठकें निर्धारित हैं।संसद में 28 विधेयक लंबित हैं।इनमें से 5 नए विधेयक पेश किए जाने हैं और 2 लंबित विधेयकों को पारित कराने के लिए सूचीबद्ध किया गया है। यह केवल एक नियमित संसदीय सत्र नहीं,बल्कि भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था निवेश वातावरण और वैश्विक छवि के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है। यह सत्र ऐसे समय शुरू हुआ है जब भारत दुनियाँ की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है,भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौता लागू हो चुका है,अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की निगाह भारत पर है और विकसित भारत -2047 का रोडमैप निर्णायक चरण में प्रवेश कर रहा है। मैं एडवोकेट किशन षणमुख दास भावना ने गोंदिया महाराष्ट्र अपने विचार इस आर्टिकल के माध्यम से प्रकट कर रहा हूं क़ि ऐसे समय संसद में होने वाली प्रत्येक बहस, प्रत्येक विधेयक और प्रत्येक राजनीतिक टकराव का प्रभाव केवल नई दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि वैश्विक निवेशकों,अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई देगा।सत्र प्रारंभ होने से पहले माननीय पीएम ने संसद परिसर में मीडिया को संबोधित करते हुए सभी दलों से रचनात्मक सहयोग की अपील की। उन्होंने कहा कि संसद का उत्पादक संचालन देशहित,जनकल्याण और विकास के लिए आवश्यक है तथा भारत की हाल की उपलब्धियों को आगे बढ़ाने के लिए सार्थक चर्चा होनी चाहिए। दूसरी ओर विपक्ष पहले से ही सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की रणनीति बनाकर आया था, जिससे पहले दिन से ही टकराव की स्थिति बन गई। साथियों, सरकार ने इस मानसून सत्र के लिए लगभग आठ प्रमुख विधेयकों का विधायी एजेंडा रखा है। इनमें इन्कम-टैक्स (अमेन्डमेंट ) बिल,2026,जिसमें विदेशी संस्थागत निवेशकों और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स को सरकारी प्रतिभूतियों से होने वाली आय पर कर छूट से संबंधित प्रावधान।माइक्रो , स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज डेवलपमेंट (अमेन्डमेंट ) बिल 2026 एमएसएमई को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की व्यवस्था मजबूत करना।मध्यस्थता (आरबिंस्ट्रेशन) के निर्णयों के प्रभावी क्रियान्वयन का प्रावधान।राज्यों को फेसिलिटेशन कौंसिल के गठन में अधिक अधिकार देना। रजिस्ट्रेशन ऑफ़ बर्थस एंड डेथस (अमेन्डमेंट) बिल ,2026जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण के नियमों को अधिक कठोर बनाना।
पंजीकरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना।सुप्रीम कोर्ट (नंबर ऑफ़ जजेस) अमेन्डमेंट बिल, 2026 सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव। प्रेवेंशन ऑफ़ इंसल्ट्स टू नेशनल हॉनर (अमेन्डमेंट ) बिल, 2026राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम, 1971 में संशोधन। रिपोर्टों के अनुसार इसमें ‘वंदे मातरम्’ को वैधानिक संरक्षण देने और उसके अपमान को दंडनीय बनाने का प्रावधान शामिल है। इसके अलावापहले से लंबित प्रमुख कई विधेयक शामिल हैं। इसके अतिरिक्त राजनीतिक गलियारों में परिसीमन (डेलिमिटेशन) से जुड़े संभावित विधेयक पर भी व्यापक चर्चा रही,क्योंकि इसका संबंध भविष्य में महिलाओं के आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन और लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण से जोड़ा जा रहा है। हालांकि सरकार ने परिसीमन पर अंतिम निर्णय सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया,फिर भी यह विषय पूरे सत्र का सटीकता से सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन गया।
साथियों,उधर विपक्ष ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह सरकार को केवल विधेयकों पर नहीं,बल्कि महंगाई, बेरोजगारी,कृषि संकट, मणिपुर की स्थिति,नीट परीक्षा विवाद,छात्र आंदोलनों अयोध्या मंदिर दान प्रकरण तथा परिसीमन जैसे विषयों पर घेरेगा। विपक्ष का तर्क था कि जनता से जुड़े इन प्रश्नों पर पहले चर्चा होनी चाहिए, जबकि सरकार का जोर विधायी कार्यों को आगे बढ़ाने पर था। यही टकराव पहले दिन काम काज़ शुरू होने के पहले घंटे से ही सदन के भीतर खुलकर दिखाई दिया।
20 जुलाई की सुबह जैसे ही लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही प्रारंभ हुई,विपक्षी सांसदों ने नारेबाजी शुरू कर दी। विपक्ष ने छात्र आंदोलनों और परीक्षा संबंधी मुद्दों पर तत्काल चर्चा की मांग की।अध्यक्ष द्वारा बार-बार व्यवस्था बनाए रखने की अपील की गई,किंतु शोर- शराबा जारी रहा। परिणामस्वरूप दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। समाचारों के अनुसार दोपहर तक लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही कम से कम पाँच बार स्थगित हुई और बाद में दोनों सदनों को पूरे दिन के लिए स्थगित कर दिया गया। पहले दिन कोई बड़ा विधायी कार्य नहीं हो सका। साथियों, पहले दिन की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि आगामी 25 दिन सरकार और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी।
सरकार का लक्ष्य आर्थिक सुधारों,कर प्रणाली, उद्योग,निवेश और प्रशासनिक सुधारों से जुड़े विधेयकों को पारित कराना है, जबकि विपक्ष जनहित से जुड़े मुद्दों पर सरकार को जवाबदेह बनाने की रणनीति अपनाए हुए है। यदि दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित नहीं होता, तो संसदीय उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।आर्थिक दृष्टि से यह सत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। विदेशी निवेशक केवल आर्थिक आंकड़े ही नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि किसी देश की संसद कितनी स्थिरता और दक्षता से निर्णय लेने में सक्षम है। यदि महत्वपूर्ण आर्थिक विधेयक समय पर पारित होते हैं, तो इससे भारत की निवेश क्षमता और वैश्विक विश्वसनीयता मजबूत होगी। इसके विपरीत लगातार गतिरोध से निवेशकों में अनिश्चितता का संदेश जा सकता है।
साथियों, भारतीय शेयर बाजार भी इस सत्र पर निकट दृष्टि रखे हुए है। बैंकिंग, कर सुधार, एमएसएमई विनिर्माण डिजिटल अर्थव्यवस्था और आधारभूत संरचना से जुड़े विधेयकों का सीधा प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों के शेयरों पर पड़ सकता है। यदि सरकार सुधारवादी एजेंडा आगे बढ़ाने में सफल रहती है, तो दीर्घकाल में निवेशकों का विश्वास और मजबूत हो सकता है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का यह सत्र महत्वपूर्ण माना जा रहा है।भारत आज भी ज़ी-20 ब्रिक्स क्वाड तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऐसे में संसद की कार्यक्षमता यह संदेश देती है कि भारत केवल तेज़ आर्थिक विकास ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती के साथ भी आगे बढ़ रहा है। इसलिए विदेशी सरकारें, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और वैश्विक रेटिंग एजेंसियाँ भी इस सत्र के परिणामों पर नज़र रख रही हैं।
साथियों, विज़न-2047 के संदर्भ में भी यह मानसून सत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है।विकसित भारत का लक्ष्य केवलआर्थिक वृद्धि से प्राप्त नहीं होगा; इसके लिए कर सुधार, औद्योगिक विस्तार,रोजगार सृजन, शिक्षा,कृषि,डिजिटल प्रशासन और राजनीतिक सहमति जैसे अनेक क्षेत्रों में निरंतर सुधार आवश्यक हैं। संसद इन सभी सुधारों का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच है। इसलिए अगले कुछ सप्ताहों में लिए जाने वाले निर्णय दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं। 20 जुलाई 2026 को शाम लगभग 5 बजे तक की स्थिति यह रही कि सदन का पहला दिन राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया। दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार स्थगित हुई और अंततः पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। सरकार ने अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की इच्छा दोहराई, जबकि विपक्ष ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह जनहित और राजनीतिक मुद्दों पर व्यापक चर्चा के बिना सदन को सामान्य रूप से चलने नहीं देगा।
साथियों, यदि भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि विश्व की लगभग सभी प्रमुख लोकतांत्रिकव्यवस्थाओं में संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि आर्थिक विश्वास का भी सबसे महत्वपूर्ण आधार होती है। अमेरिका में कांग्रेस केगतिरोध ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स की राजनीतिक अस्थिरता, फ्रांस में संसद में बहुमत के संकट अथवा जापान में नीति निर्माण में देरी का सीधा प्रभाव वहां के शेयर बाजारों, विदेशी निवेश तथा मुद्रा बाजार पर पड़ता रहा है। भारत भी अब पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर एक वैश्विक शक्ति है, इसलिए भारतीय संसद की कार्यवाही पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, वैश्विक निवेश बैंक, अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियाँ, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ निरंतर निगाह रखती हैं। यदि संसद में महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों,कर प्रणालीऔद्योगिक विकास, डिजिटल गवर्नेंस, रोजगार सृजन, कृषि आधुनिकीकरण तथा न्यायिक सुधारों से जुड़े विधेयकों पर सार्थक चर्चा होती है और समयबद्ध निर्णय लिए जाते हैं, तो भारत की ईजी ऑफ़ डूइंग बिज़नेस,निवेश आकर्षण और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को नई गति मिल सकती है। इसके विपरीत यदि पूरा सत्र केवल राजनीतिक टकराव, नारेबाजी और बार-बार स्थगन तक सीमित रह जाता है, तो इससे सुधारों की गति प्रभावित हो सकती है। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था आज पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और विविधतापूर्ण है, फिर भी संसदीय उत्पादकता वैश्विक निवेशकों के लिए राजनीतिक स्थिरता का एक महत्वपूर्ण संकेतक बनी रहती है। यही कारण है कि 20 जुलाई 2026 से प्रारंभ हुआ यह मानसून सत्र केवल भारतीय राजनीति का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक समुदाय की दृष्टि से भी सटीकता से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
साथियों दूसरी ओर, यह मानसून सत्र भारत के लोकतांत्रिक परिपक्वता की भी एक बड़ी परीक्षा है।सरकार के सामने चुनौती है कि वह अपने विकास, आर्थिक सुधार और विकसित भारत 2047 के एजेंडे को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाए, जबकि विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है कि वह जनहित से जुड़े प्रश्नों,महंगाई, बेरोजगारी, कृषि, शिक्षा,मणिपुरपरिसीमन सामाजिक न्याय और संघीय ढाँचे पर सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करे। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति तब दिखाई देती है जब सत्ता और विपक्ष दोनों टकराव के बजाय तर्क, संवाद और समाधान को प्राथमिकता देते हैं। यदि आगामी 25 दिनों में संसद सार्थक बहस, उच्च स्तर की संसदीय मर्यादा और राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च रखते हुए महत्वपूर्ण विधेयकों पर सहमति बनाने में सफल रहती है, तो यह न केवल भारत की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा को विश्व स्तर पर और मजबूत करेगा, बल्कि निवेशकों का विश्वास बढ़ाकरअर्थव्यवस्था,उद्योग रोजगार, स्टार्टअप,विनिर्माण शेयर बाजार और ‘विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को भी नई गति देगा। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मानसून सत्र 2026 केवल एक संसदीय कैलेंडर का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह उन ऐतिहासिक निर्णयों का मंच बन सकता है जो आने वाले दो दशकों में भारत की आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक भूमिका की दिशा और दशा दोनों निर्धारित करेंगे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि इस प्रकार मानसून सत्र का पहला दिन यह संकेत देता है कि अगले 25 दिन केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि भारत की आर्थिक नीतियों, निवेश वातावरण, शेयर बाजार की दिशा और विकसित भारत-2047 के रोडमैप के लिए भी निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं। यदि सरकार और विपक्ष लोकतांत्रिक संवाद तथा रचनात्मक सहयोग का मार्ग अपनाते हैं, तो यह सत्र भारत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धियों का आधार बन सकता है; अन्यथा बार-बार का गतिरोध आर्थिक सुधारों की गति को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की निगाह आज भारतीय संसद पर टिकी हुई है।
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
नेशनल जंक फूड डे हर साल 21 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन उन लोगों के लिए खास मौका होता है जो फास्ट फूड और स्नैक्स के दीवाने हैं। पिज़्ज़ा, बर्गर, चिप्स, चॉकलेट, कोल्ड ड्रिंक्स जैसी चीजें आमतौर पर जंक फूड में गिनी जाती हैं।
🍟 इतिहास और महत्व
जंक फूड शब्द की शुरुआत: ‘जंक फूड’ शब्द को पहली बार 1970 के दशक में सूक्ष्मजीवविज्ञानी (microbiologist) माइकल जैकबसन ने लोकप्रिय बनाया था. उन्होंने लोगों को अत्यधिक चीनी, नमक और प्रिजर्वेटिव्स वाले खाद्य पदार्थों के प्रति सचेत करने के लिए यह नाम दिया था.
मनाने का उद्देश्य
हालांकि जंक फूड सेहत के लिए अच्छे नहीं होते, लेकिन यह दिन इस बात की याद दिलाता है कि यदि आप पूरे साल एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली अपनाते हैं, तो कभी-कभार अपनी पसंद का खाने में कोई बुराई नहीं है. यह अप्रत्यक्ष रूप से संतुलित आहार के महत्व को भी दर्शाता है.
🍕 जंक फूड की परिभाषा
कम पोषण, अधिक कैलोरी: परिभाषा के अनुसार, जंक फूड उन खाद्य पदार्थों को कहा जाता है जिनमें वसा (fat), चीनी, नमक और कैलोरी की मात्रा बहुत अधिक होती है, लेकिन विटामिन, मिनरल्स या फाइबर जैसे आवश्यक पोषण मूल्य (nutritional value) न के बराबर होते हैं.उदाहरण: पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज़, आलू के चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स, कैंडी और बेकरी उत्पाद इसके प्रमुख उदाहरण हैं.
वैसे तो हेल्दी डाइट के लिए जंक फूड
वैसे तो हेल्दी डाइट के लिए जंक फूड से दूरी बनाए रखना अच्छा माना जाता है, लेकिन इस दिन लोग बिना किसी गिल्ट के अपनी पसंदीदा जंक फूड खाते हैं। इसका मकसद है थोड़ी मस्ती करना और यह याद दिलाना कि स्वाद और सेहत में संतुलन जरूरी है।
नेशनल जंक फूड डे हमें यह भी सिखाता है
नेशनल जंक फूड डे हमें यह भी सिखाता है कि कुछ भी जरूरत से ज्यादा हानिकारक हो सकता है। इस दिन लोग दोस्तों या परिवार के साथ अपनी फेवरेट जंक डिश का मजा लेते हैं। लेकिन साथ ही स्वस्थ जीवनशैली को भी महत्व देना जरूरी है।
मिलन चौक कांवरिया संघ बंगला सावन को जलाभिषेक के लिए कांशी विश्वनाथ रवाना।
सरायकेला/ईचागढ़
ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र के सितु मिलन चौक व्यवसायिक कांवरिया संघ ने हर साल की तरह इस साल भी अपने क्षेत्र के कुशल मंगल कामना पूर्ण हेतु जलाभिषेक के लिए बंगाल सावन के पहली सोमवारी को जलाभिषेक के लिए कांशी बाबा विश्वनाथ के लिए रवाना हुए।
कांवरिया संघ के संचालक दीलीप कुमार दास ने बताया कि काशी विश्वनाथ में जलाभिषेक करने के बाद जत्था सीधे प्रयागराज त्रिवेणी संगम पहुंचेंगे और वहां डुबकी लगा कर सीधे अयोध्या रवाना होंगे।वहां सरयू नदी में स्नान करने के बाद हनुमान गढ़ी एवं राम मंदिर राम लला दर्शन करेंगे। कांवरिया संघ के संचालक दिलीप कुमार दास ने कहा हम सभी कांवरिया हर साल अपने क्षेत्रों की किसान, व्यवसायी,समाज कल्याण, गांव घर की शांति सद्भावना की मनोकामनाएं क़ो लेकर बाबा के दरबार में जलाभिषेक करते हैं।
कांवरिया संघ के सदस्यों ने हर हर महादेव,जय मां गंगे,जय श्री राम के जयघोष के साथ रवाना हुए। कांवरिया संघ में दिलीप कुमार दास,महेश्वर गोप, उमाचरण दास, आषुतोष दास, कलेश्वर तिवारी,मनोज कुमार पाण्डेय,शशधर गोप, राधाकृष्ण साव,बलराम महतो, कृष्णा कुमार महतो,निर्मल महतो, दिनेश कुमार महतो,मनमोहन महतो,अमित कुमार महतो,राम रंजन महतो,बरुण महतो, दुर्गाचरण महतो आदि भक्त शामिल हैं।
अमेरिक़ी जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट सेंटर रिपोर्ट 2026 -क्या जलवायु परिवर्तन हमारी नींद चुरा रहा है? -बढ़ती गर्म रातें,घटती गहरी नींद और मानव स्वास्थ्य पर मंडराता वैश्विक संकट -अब जलवायु परिवर्तन का नया पैमाना होगी हमारी नींद? -समग्र व्यापक विश्लेषण।
जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उठाया गया प्रत्येक कदम अब हमारी आने वाली पीढ़ियों की स्वस्थ,गहरी और सुकूनभरी नींद की रक्षा का नया पैमाना भी संकल्प होगा।
वैश्विक और स्थानीय स्तरपर नींद का संकट भी जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती हो सकता है? -स्लीप हेल्थ को सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा तात्कालिक बनाने की ज़रूरत -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन पर अधिकांश चर्चा बाढ़,सूखा,समुद्र-स्तर वृद्धि और भीषण हीटवेव तक सीमित रही है।किंतु अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित किया है,जो प्रत्यक्ष रूप से हर व्यक्ति के जीवन,स्वास्थ्य, उत्पादकता और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। वह है नींद का नुकसान (स्लीप लॉस)। अमेरिका की जलवायु अनुसंधान संस्था क्लाइमेट सेंटर द्वारा 2020 से 2025 के बीच विश्व के 1,300 से अधिक शहरों (लगभग 1,338 शहरों) पर किए गए विश्लेषण में पाया गया कि बढ़ते रात्रिकालीन तापमान के कारण एक औसत व्यक्ति वैश्विक स्तरपर प्रति वर्ष लगभग 56 घंटे की नींद खो रहा है। भारत के कई बड़े शहरों में यह नुकसान 65 से 93 घंटे प्रति वर्ष तक पहुँच गया है।अध्ययन में यह भी बताया गया कि इस तापमान- जनित नींद हानि का कम से कम लगभग 10 प्रतिशत भाग सीधे मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते यह कहना चाहूंगा कि यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है क़ि यह मूल दावा काफी हद तक सही है,लेकिन इसमें एक छोटा-सा स्पष्टीकरण आवश्यक है। अध्ययन यह नहीं कहता कि पूरे भारत का प्रत्येक नागरिक 65-93 घंटे की नींद खो रहा है,बल्कि यह आँकड़ा भारत के कई बड़े शहरों के लिए है। उदाहरण के तौर पर चेन्नई में लगभग 93 घंटे, मुंबई में लगभग 84 घंटे और कोलकाता में लगभग 80 घंटे वार्षिक नींद हानि का अनुमान लगाया गया। वैश्विक औसत लगभग 56 घंटे प्रतिवर्ष बताया गया।
साथियों, भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय देश में समस्या इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यहाँ गर्मी अब केवल दिन तक सीमित नहीं रहती। पहले सूर्यास्त के बाद तापमान में पर्याप्त गिरावट आ जाती थी, जिससे शरीर को ठंडा होने और गहरी नींद (डीप स्लीप) में जाने का अवसर मिलता था। अब महानगरों में कंक्रीट, डामर, वाहनों की गर्मी और हरित क्षेत्र में कमी के कारण अर्बन हीट आइलैंड इफ़ेक्ट विकसित हो गया है।परिणाम स्वरूप रात का तापमान भी ऊँचा बना रहता है और शरीर अपनी प्राकृतिक ताप- नियंत्रण प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाता।यही कारण है कि भारत के अनेक शहरों में लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि रात में भी बेचैनी बनी रहती है और नींद सटीकता से बार-बार टूटती है। साथियों,चिकित्सकीय दृष्टि से देखा जाए तो गहरी नींद मानव शरीर की प्राकृतिक मरम्मत प्रक्रिया है। इसी अवस्था में मस्तिष्क दिनभर की सूचनाओं को व्यवस्थित करता है,स्मरण शक्ति मजबूत होती है,प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय होता है,हार्मोन संतुलित होते हैं तथा हृदय एवं रक्त वाहिनियों को विश्राम मिलता है। यदि लगातार गहरी नींद कम हो जाए तो सबसे पहले मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन निर्णय क्षमता में कमी और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई दिखाई देती है। इसके बाद धीरे-धीरे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग, स्ट्रोक, अवसाद, चिंता तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
साथियों, वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि शरीर को सोने के लिए अपने आंतरिक तापमान को थोड़ा कम करना पड़ता है। यदि रात का वातावरण अधिक गर्म हो, तो यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित होती है। व्यक्ति को नींद आने में अधिक समय लगता है,रात में कई बार जागना पड़ता है और सबसे महत्वपूर्ण,गहरी नींद का समय घट जाता है। यही कारण है कि सुबह उठने के बाद भी व्यक्ति स्वयं को थका हुआ महसूस करता है।इसका प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। नींद की कमी सीधे अर्थव्यवस्था पर भी असर डालती है। पर्याप्त नींद न मिलने से कर्मचारियों की कार्यक्षमता घटती है, औद्योगिक दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ता है, विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता प्रभावित होती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। जब किसी देश की बड़ी आबादी लगातार कम गुणवत्ता वाली नींद लेने लगे तो उसका प्रभाव राष्ट्रीय उत्पादकता और आर्थिक विकास पर भी दिखाई देता है।
साथियों, भारत में यह चुनौती इसलिए भी अधिक जटिल है क्योंकि यहाँ तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है। कंक्रीट के जंगल, कम होते पेड़, एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्म हवा, घनी आबादी और सीमित खुले स्थान शहरों को दिन और रात दोनों समय अधिक गर्म बनाए रखते हैं। गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवार, जिनके पास पर्याप्त शीतलन व्यवस्था नहीं होती, इस समस्या से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।हाल के वर्षों में भारत के अनेक क्षेत्रों में यह भी देखा गया है कि गर्म रातों के दौरान अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी मामलों में वृद्धि होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रात के समय शरीर को पर्याप्त ठंडक और आराम न मिले तो दिनभर की गर्मी से उत्पन्न तनाव समाप्त नहीं हो पाता, जिससे स्वास्थ्य जोखिम सटीकता से कई गुना बढ़ जाते हैं।
साथियों, मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव भी अत्यंत गंभीर है। लगातार नींद की कमी व्यक्ति में अवसाद, चिंता तनाव,भावनात्मक अस्थिरता तथा निर्णय क्षमता में गिरावट ला सकती है। कई अध्ययनों ने संकेत दिया है कि जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक गर्मी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ा सकती है जिसमें विशेषकर उन समुदायों में जो पहले से सामाजिक या आर्थिक दबावों का सामना कर रहे हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए केवल एयर कंडीशनर ही समाधान नहीं हैं। वैज्ञानिक शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने,छतों पर परावर्तक (कूलरूफ़) तकनीक अपनाने,वर्षा जल संरक्षण, बेहतर वेंटिलेशन वाले भवन, शहरी वृक्षारोपण, ऊर्जा- कुशल निर्माण सामग्री और हीट एक्शन प्लान को अधिक प्रभावी बनाने की सलाह दे रहे हैं। साथ ही नागरिकों को भी रात में कमरे का तापमान कम रखने, पर्याप्त पानी पीने, सोने से पहले भारी भोजन और कैफीन से बचने तथा नियमित नींद का समय बनाए रखने जैसी आदतें सटीकता से अपनानी चाहिए। साथियों, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न नींद का संकट सभी आयु वर्गों को समान रूप से प्रभावित नहीं करता। बच्चे, किशोर,गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग और पहले से हृदय मधुमेह या श्वसन संबंधी रोगों से पीड़ित लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं। बच्चों में गहरी नींद मस्तिष्क के विकास, सीखने की क्षमता, स्मरण शक्ति तथा शारीरिक वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक होती है। यदि लगातार गर्म रातों के कारण उनकी नींद बाधित होती है तो पढ़ाई, व्यवहार, एकाग्रता और मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। युवाओं में नींद की कमी अवसाद, चिंता,डिजिटल लत, कार्यक्षमता में गिरावट और सड़क दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ाती है।वहींबुजुर्गों में पहले से ही नींद हल्की होती है,इसलिए अत्यधिक गर्म रातें उनके लिए उच्च रक्तचाप, हृदयाघात और स्ट्रोक का खतरा और अधिक बढ़ा देती हैं। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन का यह प्रभाव केवल पर्यावरणीय नहीं बल्कि पीढ़ियों के भविष्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य से सटीकता से जुड़ा हुआ विषय बन गया है।
साथियों,भारत के महानगरों तथा तेजी से विकसित हो रहे मध्यम शहरों में कंक्रीट,डामर की सड़कों,ऊँची इमारतों वाहनों तथा एयर कंडीशनरों से निकलने वाली गर्म हवा के कारण ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। शहर दिनभर सूर्य की ऊष्मा को अपने भीतर संचित कर लेते हैं और रात के समय धीरे-धीरे उसे छोड़ते रहते हैं। परिणामस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरों का रात्रिकालीन तापमान कई डिग्री अधिक बना रहता है। यही कारण है कि लोगों को देर रात तक बेचैनी महसूस होती है, बार-बार नींद खुलती है और सुबह उठने पर भी थकान बनी रहती है। यदि शहरी नियोजन में हरित क्षेत्र, जलाशय, खुली भूमि, वृक्षारोपण तथा ‘कूल रूफ’ जैसी तकनीकों को प्राथमिकता नहीं दी गई तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। हमें ध्यान देना होगा जलवायु परिवर्तन और अर्थव्यवस्था का अदृश्य संबंध नींद की कमी केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। पर्याप्त नींद न मिलने से कर्मचारियों की उत्पादकता घटती है, निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है, औद्योगिक दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ती है तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है। विश्व स्तर पर यदि करोड़ों लोग हर वर्ष दर्जनों घंटे कीगुणवत्तापूर्ण नींद खो रहे हैं तो उसका प्रभाव सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), श्रम उत्पादकता, स्वास्थ्य बजट और सामाजिक कल्याण पर भी दिखाई देगा। इसलिए विशेषज्ञ अब जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि आर्थिक विकास, मानव पूंजी और राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता का भी मुद्दा मान रहे हैं। भारत के लिए समय की माँग सटीकता से राष्ट्रीय स्लीप हेल्थ मिशन हैँ।
साथियों, भारत ने हीट एक्शन प्लान, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम और जलवायु परिवर्तन से संबंधित अनेक योजनाएँ शुरू की हैं, किंतु अब आवश्यकता इस बात की है कि ‘स्लीप हेल्थ’ को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनाया जाए। राष्ट्रीय स्तर पर नींद संबंधी जागरूकता अभियान, स्कूलों और कॉलेजों में स्वस्थ नींद की शिक्षा, अस्पतालों में स्लीप क्लीनिकों का विस्तार, शहरों में रात्रिकालीन तापमान की निगरानी तथा वैज्ञानिक शहरी नियोजन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि आज इस दिशा में समन्वित प्रयास किए जाते हैं तो भविष्य में करोड़ों लोगों को मानसिक और शारीरिक बीमारियों से बचाया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध हरित विकास की नीति वास्तव में स्वस्थ और सुकूनभरी नींद की भी नीति है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करे इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अब जलवायु परिवर्तन का नया पैमाना होगी हमारी नींद अब यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण का विषय नहीं रहा। यह मानव स्वास्थ्य,मानसिक संतुलन, उत्पादकता शिक्षा, अर्थव्यवस्था और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा वैश्विक मुद्दा बन चुका है। यदि बढ़ती गर्म रातों को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक और स्थानीय स्तर पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में नींद का संकट भी जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हो सकता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उठाया गया प्रत्येक कदम केवल पृथ्वी को बचाने का प्रयास नहीं होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की स्वस्थ, गहरी और सुकूनभरी नींद की रक्षा का भी संकल्प होगा।
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
आदित्यपुर नगर निगम के मेयर संजय सरदार ने केंद्रीय नगर विकास मंत्री मनोहर लाल खट्टर से की मुलाकात।
सीतारामपुर डैम को ईको-टूरिज्म हब बनाने का रखा प्रस्ताव।
महत्वपूर्ण बैठक में संजय सरदार झारखंड से शामिल होने वाले एकमात्र मेयर रहे।
सरायकेला/आदित्यपुर
रविवार को हुए ऑल इंडिया मेयर काउंसिल की राष्ट्रीय बैठक में झारखंड का प्रतिनिधित्व करते हुए आदित्यपुर नगर निगम के मेयर संजय सरदार ने केंद्रीय नगर विकास मंत्री मनोहर लाल खट्टर से मुलाकात की।
वहीं इस शिष्टमंडलीय मुलाकात के दौरान मेयर ने केंद्रीय मंत्री को एक विस्तृत और ऐतिहासिक मांग पत्र सौंपा, जिसमें झारखंड के लिए केंद्र द्वारा प्रस्तावित 15वें वित्त आयोग की ₹2,500 करोड़ की विकास राशि को राज्य को पुनः वापस किए जाने के मुद्दे पर चर्चा हुई।
मेयर ने केंद्रीय मंत्री का ध्यान आकर्षित करते हुए स्पष्ट किया कि 15वें वित्त आयोग के तहत झारखंड के नगरीय निकायों को आवंटित होने वाली करीब ₹2,500 करोड़ की राशि तकनीकी कारणों से वापस हो गई है। उन्होंने जोर दिया कि इस राशि के अभाव में राज्य के विभिन्न नगर निकायों के बुनियादी ढांचे और जन-कल्याणकारी योजनाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। झारखंड के शहरी विकास को गति देने के लिए इस फंड की उपलब्धता बेहद जरूरी है। इस पर केंद्रीय मंत्री खट्टर ने पूरे विषय को गंभीरता से सुना और नियमानुसार उचित कार्रवाई करते हुए सकारात्मक सहयोग का आश्वासन दिया।
साथ ही मेयर ने आदित्यपुर को राष्ट्रीय स्तर पर इंडस्ट्रियल स्मार्ट अर्बन ग्रोथ मॉडल के रूप में स्थापित करने के लिए विशेष वित्तीय सहायता पैकेज की मांग की। उन्होंने आगामी 40 वर्षों की जरूरतों को देखते हुए कॉम्प्रिहेंसिव मास्टर प्लान तैयार करने, इंटरनेशनल कंसलटेंट की नियुक्ति, 4,000 की क्षमता वाले कन्वेंशन सेंटर के निर्माण और सीतारामपुर डैम को विश्वस्तरीय ईको-टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने के लिए केंद्रीय प्रशासनिक व तकनीकी स्वीकृति देने का भी आग्रह किया।
वहीं मयर कि इस पहल को आदित्यपुर के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है।