हाथियों के चपेट में आने से एक अधेड़ गंभीर रूप से हुआ जख्मी।

हाथियों के चपेट में आने से एक अधेड़ गंभीर रूप से हुआ जख्मी।

सरायकेला/ईचागढ़

सरायकेला खरसावां जिले के ईचागढ़ थाना क्षेत्र के तुता सालटांड़ गांव में रविवार की अहले सुबह करीब 5 बजे शौच के लिए मैदान की ओर जा रहे 65 वर्षीय गोलोक महतो उर्फ छुटु महतो हाथियों का चपेट में आने से वह गंभीर रूप से घायल हो गया। परिजनों ने तत्काल इलाज हेतु मिलन चौक के एक नर्सिंग होम में भर्ती कराया। सुचना मिलते ही वन पाल मुकेश महतो व वन रक्षी कैलाश महतो नर्सिंग होम पहुंचे और मामले का जानकारी लिया।

मिली जानकारी के अनुसार गोलोक महतो रोज की तरह ही अपने घर से सुबह शौच के लिए गया निकलते हैं। अचानक हाथियों का झुंड देखकर वह भागने का प्रयास भी करते हैं तभी एक हाथी से उनका सामना हो जाता है , जिससे वह घायल हो गया जाते हैं।

वन पाल मुकेश महतो ने बताया कि तुता दुलमीडीह के बीच जंगल में एक दर्जन हाथी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों को बार बार चेतावनी दिया जा रहा है कि, हाथी प्रभावित गांवों के ग्रामीण अहले सुबह एवं रात को घर से बाहर नहीं निकले । हाथियों को दिन में देखने से पत्थर बाजी व छेड़छाड़ नहीं करें।

उन्होंने कहा कि छेड़छाड़ करने से हाथी उग्र हो जाता है और उत्पात मचाने लगते है। उन्होंने कहा कि घायल गोलोक महतो को बेहतर इलाज हेतु एमजीएम अस्पताल भेजा जाएगा, ताकि वह जल्दी स्वस्थ हो सके। उन्होंने कहा कि क्षेत्र से हाथियों को वन क्षेत्र की ओर भगाने का लगातार प्रयास किया जा रहा है।

सात महीने बाद जेल से रिहा हुए जेएल केएम नेता तरूण महतो, क्षेत्र में जोरदार स्वागत

सात महीने बाद जेल से रिहा हुए जेएल केएम नेता तरूण महतो, क्षेत्र में जोरदार स्वागत

सरायकेला/ईचागढ़

(मालखान महतो)

झारखंड लोकतांत्रिक क्रान्तिकारी मोर्चा के केंद्रीय उपाध्यक्ष तरुण महतो के लगभग सात माह बाद जेल से रिहा होकर लौटने पर उनका भव्य स्वागत किया गया। इस अवसर पर चौका, टीकर,डुमटांड़ ,मिलन चौक, तिरूलडीह,सीरूम, रघुनाथपुर सहित चौक चौराहों पर भव्य स्वागत किया गया। तरूण महतो सैकड़ों समर्थकों के साथ बाइक, चार पहिया व ट्रैक्टर रैली कर पुरे ईचागढ़ क्षेत्र का भ्रमण कर अन्याय के खिलाफ जनसमर्थन का अपील किया।

उन्होंने कहा कि लोगों का अपार समर्थन मिला। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में अन्याय,शोषण व जुल्म के खिलाफ लड़ाई जारी रहेगी। विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने कहा कि तरुण महतो ने क्षेत्र में अवैध बालू एवं पत्थर खनन के खिलाफ लगातार संघर्ष किया है। जनहित एवं प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए उनकी लड़ाई सराहनीय है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के विभिन्न जनहित के मुद्दों पर एकजुट होकर संघर्ष जारी रखा जाएगा। मौके पर उच्च न्यायालय रांची के अधिवक्ता रितेश महतो,जेएलकेएम नेत्री बेबी महतो,भानुमति महतो, प्रखंड अध्यक्ष नंदकिशोर महतो,फूलचंद महतो,मुकेश महतो,बंशीधर महतो सहित सैकड़ों कार्यकर्ता उपस्थित थे।

अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026- एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड का रास्ता बंद करने की कवायद, भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए नई चुनौती?

अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026- एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड का रास्ता बंद करने की कवायद, भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए नई चुनौती?

अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 और भारत की वैश्विक रणनीति: क्या भारत पहले से कर रहा है संभावित झटके की तैयारी?

भारतीय मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, सेमीकंडक्टर मिशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण तथा वैश्विक सप्लाई चेन से भारतीय प्रतिभा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास।

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक प्रतिभा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आर्थिक राष्ट्रवाद के बीच अमेरिका की आव्रजन नीति एक नए निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। राष्ट्रपति ट्रम्प के सत्ता में लौटने के बाद अमेरिकी प्रशासन ने कानूनी आव्रजन कार्यक्रमों, विशेषकर एच-1बी वीजा प्रणाली, पर लगातार सख्ती का रुख अपनाया है। उच्च वेतन आधारित चयन प्रणाली की वकालत, वीजाआवेदनों की कड़ी जांच, रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में बाधाएं, विदेशी श्रमिकों की भर्ती पर बढ़ती निगरानी, अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता देने वाली नीतियां तथा विदेशी छात्रों के लिए उपलब्ध अवसरों को सीमित करने जैसे अनेक कदम इस व्यापक नीति परिवर्तन का हिस्सा माने जा रहे हैं। इसी क्रम में टेक्सास से रिपब्लिकन सांसद द्वारा अमेरिकी संसद में प्रस्तुत अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 ने वैश्विक स्तर पर बहस छेड़ दी है। यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है तो एच-1बी वीजा धारकों के लिए ग्रीन कार्ड प्राप्त करने का मार्ग अत्यंत कठिन हो जाएगा, वीजा अवधि घट सकती है, ओपीटी कार्यक्रम समाप्त हो सकता है और अमेरिका में कार्यरत लगभग 12 लाख भारतीय मूल के पेशेवरों तथा उनके परिवारों के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यह केवल एक आव्रजन सुधार प्रस्ताव नहीं, बल्कि अमेरिका की बदलती आर्थिक, राजनीतिक और श्रम नीति का प्रतीक माना जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि एच-1बी वीजा पिछले कई दशकों से अमेरिका की तकनीकी और नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। इस कार्यक्रम के माध्यम से अमेरिकी कंपनियां विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे क्षेत्रों में उच्च कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं। विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों ने इस कार्यक्रम का सबसे अधिक लाभ उठाया है।विश्व की प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों में कार्यरत हजारों भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, डेटा वैज्ञानिक और अनुसंधान विशेषज्ञ एच-1बी वीजा के माध्यम से अमेरिका पहुंचे हैं। यही कारण है कि एच-1बी वीजा में किसी भी प्रकार का परिवर्तन भारत के तकनीकी समुदाय और छात्रों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।

साथियों वैश्विक भू-राजनीति, आर्थिक राष्ट्रवाद और प्रतिभा आधारित प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अमेरिका द्वारा प्रस्तावित अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 केवल एक आव्रजन सुधार विधेयक नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैश्विक प्रतिभा प्रवाह, तकनीकी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार के पुनर्गठन के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेष रूप से भारत के संदर्भ में यह विधेयक अत्यंत महत्वपूर्ण है,क्योंकि एच- 1बी वीजा प्रणाली के सबसे बड़े लाभार्थियों में भारतीय पेशेवर शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपनाई गई अमेरिका फर्स्ट नीति, कानूनी और अवैध दोनों प्रकार के आव्रजन पर सख्ती,एच-1बी वीजानियमों की समीक्षा तथा अमेरिकी नौकरियों को प्राथमिकता देने की रणनीति ने भारत को यह संकेत पहले ही दे दिया था कि भविष्य में अमेरिकी श्रम बाजार भारतीय पेशेवरों के लिए पहले जैसा खुला नहीं रह सकता। यही कारण है कि भारत समानांतर रूप से अपने आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक विकल्पों को मजबूत करने में जुटा हुआ दिखाई देता है।
साथियों, रिपब्लिकन सांसद का तर्क है कि लगभग चार दशकों के इतिहास में एच-1बी कार्यक्रम का व्यापक दुरुपयोग हुआ है। उनके अनुसार अमेरिकी नियोक्ताओं ने कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर अमेरिकी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्र के कर्मचारियों के अवसरों को सीमित किया है। उनका दावा है कि कंपनियों ने कर्मचारियों की कथित कमी का हवाला देकर सस्ते विदेशी श्रमिकों को प्राथमिकता दी जबकि अनेक अमेरिकी नागरिक रोजगार और वेतन संबंधी चुनौतियों का सामना करते रहे। इसी सोच के आधार पर उन्होंने अमेरिकन व्हाइट- कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट प्रस्तुत किया है, जिसका घोषित उद्देश्य अमेरिकी व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है।इस विधेयक का सबसे विवादास्पद प्रावधान एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड तक पहुंचने के रास्ते को समाप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम है। वर्तमान व्यवस्था में एच-1बी धारक अमेरिका में कार्य करते हुए रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं। यही कारण है कि लाखों विदेशी पेशेवर अमेरिका में दीर्घकालिक करियर और पारिवारिक भविष्य की योजना बनाते हैं। प्रस्तावित कानून इस अवधारणा को बदलना चाहता है। इसके अनुसार एच-1बी वीजा केवल अस्थायी कार्य वीजा रहेगा और इसे स्थायी निवास प्राप्त करने के साधन के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इससे अमेरिका में बसने की आकांक्षा रखने वाले लाखों लोगों की योजनाओं पर सटीकता से गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
साथियों, विधेयक का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ड्यूल इंटेंट सिद्धांत को कमजोर करना है।वर्तमान प्रणाली में एच -1बी धारक अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करते हुए भविष्य में स्थायी निवास के लिए आवेदन कर सकते हैं। लेकिन प्रस्तावित व्यवस्था में आवेदक को यह साबित करना होगा कि उसका स्थायी निवास अमेरिका के बाहर है और वह अंततः अपने देश लौटने का इरादा रखता है। यह परिवर्तन अमेरिकी आव्रजन दर्शन में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि इससे एच-1बी वीजा का स्वरूप मूलतः अस्थायी रोजगार कार्यक्रम तकसीमित हो जाएगा।विधेयक में एच-1बी वीजा की अधिकतम अवधि छह वर्ष से घटाकर केवल दो वर्ष करने काप्रस्ताव भी शामिल है। वर्तमान में अधिकांश पेशेवर छह वर्षों तक अमेरिका में रहकर कार्य कर सकते हैं और ग्रीनकार्ड प्रक्रिया लंबित होने की स्थिति में अतिरिक्त विस्तार भी प्राप्त कर सकते हैं। यदि नई व्यवस्था लागू होती है तो कंपनियों के लिए दीर्घकालिक प्रतिभा प्रबंधन कठिन हो सकता है। कर्मचारियों को भी अपने करियर और पारिवारिक निर्णयों को लेकर अधिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।

साथियों, एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव ग्रीन कार्ड प्रक्रिया लंबित रहने की स्थिति में मिलने वाले वीजा विस्तार को समाप्त करना है। आज अनेक भारतीय पेशेवर वर्षों तक ग्रीन कार्ड की प्रतीक्षा सूची में रहते हैं और इस दौरान एच-1बी विस्तार के माध्यम से अमेरिका में कार्य करते रहते हैं। प्रस्तावित कानून इस सुविधा को समाप्त कर सकता है। परिणामस्वरूप हजारों लोग ग्रीन कार्डस्वीकृत होने से पहले ही अमेरिका छोड़ने के लिए बाध्य हो सकते हैं। इस विधेयक का एक और महत्वपूर्ण आयामवैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण अर्थात ओपीटी कार्यक्रम को समाप्त करने का प्रस्ताव है। ओपीटी अमेरिकी विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करने वाले विदेशी छात्रों को डिग्री पूर्ण करने के बाद सीमित अवधि तक अमेरिका में कार्य करने का अवसर देता है। भारतीय छात्र इस कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल हैं। ओपीटी समाप्त होने की स्थिति में अमेरिकी शिक्षा प्राप्त करने वाले विदेशी छात्रों के लिए रोजगार के अवसर काफी सीमित हो सकते हैं। इससे अमेरिका की उच्च शिक्षा प्रणाली की वैश्विक आकर्षण क्षमता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।संसद और उनके समर्थकों का कहना है कि वर्तमान लॉटरी आधारित एच-1बी प्रणाली योग्यता और आर्थिक मूल्य के बजाय भाग्य पर आधारित है। इसलिए विधेयक में लॉटरी समाप्त कर उच्च वेतन वाली नौकरियों को प्राथमिकता देने का प्रस्ताव रखा गया है। इस मॉडल के समर्थकों का मानना है कि इससे केवल अत्यधिक कुशल और उच्च मूल्य वाले पेशेवरों को अवसर मिलेगा। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि इससे छोटे और मध्यम आकार के नियोक्ताओं के लिए प्रतिभाशाली विदेशी कर्मचारियों की भर्ती कठिन हो सकती है।ट्रंप प्रशासन के दौरान एच-1बी नीति को लेकर पहले भी अनेक सख्त कदम देखे गए थे और अब पुनः ऐसी चर्चाएं तेज हो गई हैं। अमेरिकी श्रम बाजार में घरेलू कर्मचारियों को प्राथमिकता देने,विदेशी श्रमिकों के वेतन मानकों को बढ़ाने, आवेदनों की जांच को कठोर बनाने तथा रोजगार-आधारित आव्रजन को सीमित करने जैसे विचार रिपब्लिकन राजनीति के एक प्रभावशाली वर्ग में लंबे समय से मौजूद रहे हैं। अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट इन्हीं विचारों का विधायी विस्तार माना जा रहा है।

साथियों, इस पूरे विवाद का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय समुदाय पर पड़ सकता है। भारत एच-1बी वीजा प्राप्त करने वाले देशों में लंबे समय से अग्रणी रहा है। अमेरिकी तकनीकी उद्योग में भारतीय इंजीनियरों और पेशेवरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बड़ी संख्या में भारतीय परिवारों ने अमेरिका में स्थायी भविष्य की योजना एच-1बी से ग्रीन कार्ड की पारंपरिक यात्रा के आधार पर बनाई है। यदि यह मार्ग सीमित या बंद हो जाता है तो लाखों लोगों की दीर्घकालिक योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।भारतीय छात्रों के लिए भी यह प्रस्ताव चिंता का विषय है। हर वर्ष हजारों छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं और ओपीटी तथा बाद में एच-1बी वीजा के माध्यम से अपने करियर की शुरुआत करते हैं। यदि ओपीटी समाप्त हो जाता है और एच-1बी प्राप्त करना अधिक कठिन हो जाता है, तो अमेरिका की तुलना में अन्य देशों जैसे कनाडा , ऑस्ट्रेलिया , यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी अधिक आकर्षक विकल्प बन सकते हैं।हालांकि यह समझना आवश्यक है कि यह अभी केवल एक प्रस्तावित विधेयक है। अमेरिकी विधायी प्रक्रिया में किसी भी बिल को कानून बनने के लिए प्रतिनिधि सभा, सीनेट और राष्ट्रपति की स्वीकृति सहित अनेक चरणों से गुजरना पड़ता है। इसलिए इसका अंतिम रूप वर्तमान प्रस्ताव से भिन्न भी हो सकता है। फिर भी इसने अमेरिकी आव्रजन नीति की दिशा को लेकर गंभीर बहस शुरू कर दी है। समर्थकों का मानना है कि यह कानून अमेरिकी श्रमिकों की रक्षा करेगा, वेतन स्तर बढ़ाएगा और घरेलू प्रतिभा को प्राथमिकता देगा। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि अमेरिका की तकनीकी श्रेष्ठता का एक बड़ा कारण दुनिया भर से प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करने की क्षमता रही है। यदि विदेशी पेशेवरों और छात्रों के लिए अवसर सीमित किए जाते हैं तो दीर्घकाल में अमेरिकी नवाचार क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अमेरिकन व्हाइट -कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 केवल एच-1बी वीजा सुधार का प्रस्ताव नहीं है,बल्कि यह अमेरिका में रोजगार, आव्रजन, राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और आर्थिक राष्ट्रवाद के बीच चल रही व्यापक बहस का प्रतिनिधित्व करता है। यदि यह विधेयक पारित होता है तो एच-1बी वीजा का स्वरूप मूल रूप से बदल सकता है और विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों, छात्रों तथा उनके परिवारों के लिएअमेरिका में अवसरों की संरचना नई चुनौतियों से भर सकती है। आने वाले महीनों में अमेरिकी कांग्रेस में इस विधेयक पर होने वाली चर्चा न केवल अमेरिका बल्कि वैश्विक प्रतिभा प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

आयकर कर्मचारी महासंघ, राँची का चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न।

आयकर कर्मचारी महासंघ, राँची का चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न।

झारखंड/रांची

दिनांक 03 जून 2026 को आयकर कर्मचारी महासंघ, राँची का चुनाव शांतिपूर्ण, सौहार्दपूर्ण एवं लोकतांत्रिक वातावरण में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। चुनाव में कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग किया।

चुनाव परिणामों के अनुसार मनोज कुमार शुक्ला अध्यक्ष पद पर, आभाष नाथ सचिव पद पर तथा बबलू रजक कोषाध्यक्ष पद पर निर्वाचित घोषित किए गए। तीनों पदाधिकारियों ने अपने-अपने प्रतिद्वंद्वियों को भारी मतों के अंतर से पराजित कर उल्लेखनीय विजय प्राप्त की।

इसके अतिरिक्त डेलीगेट पद के लिए श अरविंद कुमार प्रसाद, राकेश सिंह, रवि कुमार, मनीष रंजन, आनंद कुमार, मिथलेश कुमार सुमन एवं रजनीश कुमार भी भारी मतों से विजयी घोषित हुए। इस प्रकार कर्मचारियों ने एक सशक्त एवं अनुभवी टीम पर अपना विश्वास व्यक्त किया है।

नवनिर्वाचित अध्यक्ष मनोज कुमार शुक्ला ने सभी कर्मचारियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह विजय व्यक्तिगत नहीं, बल्कि कर्मचारी एकता, विश्वास एवं संगठन की विजय है। उन्होंने कर्मचारियों के अधिकारों, सम्मान एवं कल्याण की रक्षा हेतु पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण के साथ कार्य करने का संकल्प व्यक्त किया।

नवनिर्वाचित सचिव आभाष नाथ ने कर्मचारियों द्वारा प्रदत्त जनादेश के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि संगठन सदैव कर्मचारियों के हितों को सर्वोपरि रखेगा तथा उनकी समस्याओं के समाधान एवं कल्याणकारी कार्यों के लिए निरंतर प्रयासरत रहेगा।

चुनाव प्रक्रिया मुख्य चुनाव अधिकारी सुजीत सिंह, संजय कुमार गुप्ता, अमन आनंद, चिंटू कुमार एवं अंतोष कुमार की निगरानी में निष्पक्ष, पारदर्शी एवं शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई। सभी प्रत्याशियों एवं कर्मचारियों ने चुनाव की गरिमा बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

आयकर कर्मचारी महासंघ, राँची के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों एवं प्रतिनिधियों ने कर्मचारियों के विश्वास पर खरा उतरने तथा संगठन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करने का संकल्प व्यक्त किया।

जारीकर्ता:
आयकर कर्मचारी महासंघ, राँची
(नवनिर्वाचित कार्यकारिणी की ओर से)

सूर्या प्रताप चौहान की निर्मम हत्या को लेकर विश्व हिंदू रक्षा परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय ने विरोध जताया।

सूर्या प्रताप चौहान की निर्मम हत्या को लेकर विश्व हिंदू रक्षा परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय ने विरोध जताया।

गाजियाबाद

विश्व हिंदू रक्षा परिषद के माननीय अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय के निर्देशानुसार गाजियाबाद के खोड़ा में सूर्या प्रताप चौहान की निर्मम हत्या को लेकर विरोध जताया व उनके परिवार से मिलकर उनके साथ रात दिन विश्व हिंदू रक्षा परिषद हर परिस्थिति मे खड़ा है यह विश्वास दिलाया आप सभी हिन्दू भाइयों बहनो को जागने की जरुरत है बटोगे तो कटोगे एक रहो सेफ रहो जय श्री राम 🙏🚩
ठा. सौरभ सिंह चौहान प्रदेश संगठन मंत्री विश्व हिंदू रक्षा परिषद उत्तर प्रदेश

जल्द किया जाएगा जागो हिंदू जागो कार्यक्रम का आयोजन।

जल्द किया जाएगा जागो हिंदू जागो कार्यक्रम का आयोजन।

झारखंड/सरायकेला

विश्व हिंदू रक्षा परिषद के राष्ट्रीय सह प्रभारी संपूर्ण भारत भरत सिंह की ओर से जल्द ही जागो हिंदू जागो कार्यक्रम का आयोजन सरायकेला खरसावां जिले के विभिन्न स्थानों पर किया जाएगा जिसमें की धर्म परिवर्तन हिंदू भाई बहनों के निर्माम हत्या विवाह के बाद जबरन धर्म परिवर्तन करवाना एवं हिंदू राष्ट्र के निर्माण में अहम योगदान देने के लिए भारत के संपूर्ण भाई बहनों को उक्त कार्यक्रम के माध्यम से आवाहन भी किया जाएगा

दिनांक.02.06.2026:- हाल ही के दिनों में विश्व हिंदू रक्षा परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय द्वारा झारखंड के प्रदेश प्रभारी भरत सिंह को उनके पद से प्रोन्नति देते हुए विश्व हिंदू रक्षा परिषद के राष्ट्रीय सह प्रभारी संपूर्ण भारत से मनोनीत किया गया। इसके बाद से ही प्रभारी भरत सिंह की जिम्मेदारियां संगठन के प्रति अथवा हिंदुत्व के प्रति और भी काफी बढ़ गई हैं।

राष्ट्रीय सह प्रभारी संपूर्ण भारत भरत सिंह ने प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि जल्द ही संगठन की ओर से झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले में शीघ्र ही एक जागो हिंदू जागो कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा जिसमें सदस्यता अभियान के साथ-साथ सदस्यों को उचित पद भी दिया जाएगा। साथ ही जिम्मेदार पदाधिकारी को विभिन्न जिम्मेदारियां भी दी जाएगी ताकि राष्ट्र के विकास में विश्व हिंदू रक्षा परिषद अपना जिम्मेदारियां निभाते हुए राष्ट्र की प्रति समर्पित रहेगी।

वहीं विश्व हिंदू रक्षा परिषद के राष्ट्रीय सह प्रभारी संपूर्ण भारत भरत सिंह ने निम्न विषयों पर राष्ट्र हित में
हिंदू राष्ट्र बनाने में अपनी अहम जिम्मेदारियां निभा सके। साथ ही राष्ट्र में कानून व्यवस्था की भी सराहनीय करते हुए उन्होंने हर नागरिक से कहा कि अपने अधिकार के साथ जिम्मेदारियां भी निभाने का प्रयास करें। साथ ही कानून गाइडलाइंस के साथ चलकर कानून का सम्मान करें।

  1. सभी राज्यों में ‘धर्म स्वतंत्रता अधिनियम’ का सख्ती से पालन हो
  2. अंतरधार्मिक विवाह में 30 दिन का कानूनी नोटिस अनिवार्य हो
  3. हर जिले में महिला काउंसलिंग हेल्पलाइन स्थापित हो
  4. ASI हर 100 साल पुराने मंदिर की सूची बनाकर सुरक्षा दे
  5. अतिक्रमण मुक्त: मंदिरों की जमीन से अवैध कब्जे कानूनी प्रक्रिया से हटें
  6. जीर्णोद्धार: स्थानीय समाज + सरकार मिलकर जर्जर मंदिरों का संरक्षण करें
  7. पर्यटन विकास: ऐतिहासिक मंदिरों को टूरिज्म सर्किट से जोड़कर रोजगार बढ़े।
    इन सभी बिंदुओं पर जागो हिंदू जागो कार्यक्रम के जरिए सरकार से मांग की जाएगी इसके साथ-साथ और भी कई मुद्दे हैं जिन पर गहनता से चर्चा करते हुए सरकार एवं प्रशासन से उचित कदम उठाने की मांग भी की जाएगी।
    इसके साथ-साथ कार्यक्रम में तमाम हिंदू भाई बहनों से संगठन से जुड़कर संगठन को और मजबूत एवं प्रतिभाशाली बनाने में अपना संपूर्ण योगदान देने का आवाहन भी किया जाएगा।

राष्ट्रीय सह प्रभारी
संपूर्ण भारत
भरत सिंह

तंबाकू,नशे का बदलता स्वरूप और आधुनिक दौर की चुनौती।

तंबाकू,नशे का बदलता स्वरूप और आधुनिक दौर की चुनौती।

आजतक राजनीतिक सामाजिक या व्यक्तिगत संगठनों द्वारा तंबाकू व नशीली चीजों के विरुद्ध उग्र आंदोलन क्यों नहीं चलाया यह विचारणीय प्रश्न ? क्या हम एक मूक सामूहिक हत्या के मूकदर्शक बने हुए हैं?

तंबाकू निषेध दिवस 31 मई 2026 मनाने क़े साथ शासन प्रशासन विद्यालयों, महाविद्यालयों, पंचायतों,नगर निकायों,सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, चिकित्सक समुदाय,मीडिया और राजनीतिक दलों को साथ मिलकर सशक्त राष्ट्रव्यापी उग्र तंबाकू निषेध आंदोलन चलाने की जरूरत?

तंबाकू निषेध नशा मुक्त भारत- अगर भ्रष्टाचार,आरक्षण, नागरिकता, कृषि कानून, क्षेत्रीय पहचान या सामाजिक न्याय के प्रश्न राष्ट्रीय बहस और जनआंदोलन का विषय बन सकते हैं, तो नशा मुक्त संपूर्ण क्रांति आंदोलन क्यों नहीं बना?

गोंदिया/महाराष्ट्र

वैश्विक स्तरपर हर वर्ष 31 मई को पूरी दुनियाँ में वर्ल्ड नों टोबैक्को अर्थात विश्व तंबाकू निषेध दिवस मनाया जाता है। हर वर्ष इस अवसर पर भाषण होते हैं, शपथ ली जाती है, पोस्टर लगाए जाते हैं और तंबाकू के दुष्परिणामों पर चर्चा होती है।लेकिन एक कड़वा प्रश्न आज हमारे सामने खड़ा है,क्या केवल एक दिन का यह प्रतीकात्मक आयोजन उस भयावह महामारी को रोक सकता है जो प्रतिदिन लाखों लोगों के शरीर में कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और फेफड़ों की घातक बीमारियों का जहर घोल रही है? भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में नागरिकता कानून,आरक्षण,भ्रष्टाचार,किसानों की समस्याएं,भाषा विवाद, जल-जंगल-जमीन के प्रश्न, मंडल -कमंडल की राजनीति, जनलोकपाल आंदोलन, महिला सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, महंगाई, बेरोजगारी और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दे बड़े जनांदोलनों का रूप ले चुके हैं।सड़कों पर लाखों लोग उतरते हैं,संसद और विधान सभाओं में बहस होती है, सरकारें झुकती हैं और नीतियां बदलती हैं।परंतु मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र इस आर्टिकल का माध्यम से शासन प्रशासन व समाज से पूछना चाहता हूं कि तंबाकू, जो हर वर्ष लाखों परिवारों को उजाड़ देता है, आज भी उतना बड़ा राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन क्यों नहीं बन पाया? जब किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य तंबाकूजनित कैंसर से मरता है, जब किसी बच्चे का पिता गुटखा या सिगरेट के कारण असमय दुनियाँ छोड़ देता है, जब किसी मां की आंखों के सामने उसका जवान बेटा निकोटीन की लत का शिकार होकर जीवन हार जाता है, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रह जाती,बल्कि यह राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती है। मेरे अपने एक निकट संबंधी की मृत्यु भी तंबाकूजनित कैंसर के कारण हुई। ऐसे हजारों-लाखों परिवारों का दर्द यह संकेत देता है कि अब तंबाकू निषेध को केवल स्वास्थ्य अभियान नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलन का रूप देने की आवश्यकता है।

साथियों बात अगर हम तंबाकू व नशीली चीजों के खिलाफ़ बहुत बड़े आंदोलन की करें तो तंबाकू निषेध आंदोलन को इस तरह के आंदोलन समक़क्ष बनाने की जरूरत है जैसे भारतीय लोकतंत्र का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जब किसी मुद्दे को जनआंदोलन का रूप मिला, तब उसने सरकारों की नीतियों,कानूनों और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित किया। वर्ष 1974 का जेपी आंदोलन (संपूर्ण क्रांति आंदोलन), वर्ष 1990 का मंडल आयोग आरक्षण आंदोलन 1980 और 1990 के दशक का राम जन्मभूमि आंदोलन,वर्ष 2011 का अन्ना हजारे के नेतृत्व वाला भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आंदोलन, वर्ष 2019- 20 का नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी आंदोलन, वर्ष 2020-21 का कृषि कानूनों के विरुद्ध किसान आंदोलन, वर्ष 2015 और उसके बाद विभिन्न राज्यों में हुए पटीदार आरक्षण आंदोलन,जाट आरक्षण आंदोलन, मराठा आरक्षण आंदोलन, गुर्जर आरक्षण आंदोलन तथा हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों में जातीय, सामाजिक और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े आंदोलनों ने यह सिद्ध किया है कि संगठित जनदबाव लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।इन आंदोलनों ने न केवल राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया बल्कि सरकारों को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए भी बाध्य किया। आज 30 मई 2026 से महाराष्ट्र में शुरू हुआ मनोहर जराँगे का मराठा आरक्षण आंदोलन सहित देश के अनेक हिस्सों में सामाजिक, जातीय और आरक्षण से जुड़े आंदोलन लगातार सुर्खियों में हैं, जो यह दर्शाते हैं कि जनता जब किसी विषय को अपने अस्तित्व, अधिकार या भविष्य से जोड़ लेती है तो वह एक विशाल जनशक्ति का रूप धारण कर लेता है। तो फिर तंबाकू व नशीली चीजों के विरुद्ध ऐसा आंदोलन किसी राजनीतिक सामाजिक या व्यक्तिगत संगठन में क्यों नहीं उठाया है यह विचारणीय प्रश्न है?

साथियों, पिछले एक दशक में नशे का स्वरूप तेजी से बदला है। कभी बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू की पुड़िया तक सीमित रहने वाला यह कारोबार अब अत्याधुनिक तकनीक के आवरण में युवाओं के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। ई- सिगरेट, वेप्स, निकोटीन पॉड्स, फ्लेवर्ड हुक्के, निकोटीन पाउच और विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक धूम्रपान उपकरण आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक के रूप में प्रचारित किए जा रहे हैं। तंबाकू उद्योग ने समझ लिया है कि यदि उसे नई पीढ़ी को अपने जाल में फंसाना है तो उत्पाद का स्वरूप बदलना होगा। इसलिए आज कई वेपिंग उपकरण पेन ड्राइव, स्मार्ट गैजेट, इलेक्ट्रॉनिक पेन या स्टाइलिश एक्सेसरी जैसे दिखाई देते हैं। किशोर और युवा इन्हें आधुनिकता, स्वतंत्रता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक समझने लगते हैं। चॉकलेट, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, वनीला, मिंट और अन्य आकर्षक फ्लेवर के माध्यम से निकोटीन को मीठे जहर के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।यह रणनीति केवल व्यापारिकनहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है,क्योंकि स्वाद और आकर्षण के माध्यम से लत को आसान बनाया जाता है।

साथियों, सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन आधुनिक उत्पादों को अक्सर पारंपरिक सिगरेट से कम हानिकारक बताने का भ्रम फैलाया जाता है।अनेक युवा यह मान लेते हैं कि वेपिंग सुरक्षित है,जबकि वैज्ञानिक अध्ययनों ने संकेत दिया है कि ई-सिगरेट से निकलने वाला एयरोसोल निकोटीन सहित अनेक हानिकारक रसायनों से भरा होता है। निकोटीन स्वयं अत्यधिक नशे की लत पैदा करने वाला पदार्थ है। इसके अतिरिक्त कई उपकरणों में प्रयुक्त धातुओं, रसायनों और अन्य तत्वों के दीर्घकालिक प्रभाव अभी भी शोध का विषय हैं। इसलिए यह कहना कि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक धूम्रपान पूरी तरह सुरक्षित है, वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।वास्तव में यह नशे का नया मुखौटा है,जिसका उद्देश्य युवाओं को आकर्षित करना और बाजार का विस्तार करना है।तंबाकू और निकोटीन की इस महामारी का सबसे भयावह पक्ष यह है कि इसका शिकार केवल सेवन करने वाला व्यक्ति ही नहीं होता।पैसिव स्मोकिंग या अप्रत्यक्ष धूम्रपान उन लाखों निर्दोष लोगों की जान ले रहा है जिन्होंने कभी सिगरेट या तंबाकू को हाथ तक नहीं लगाया। घरों, कार्यालयों, रेस्तरां, सार्वजनिक स्थलों और वाहनों में छोड़ा गया धुआं आसपास मौजूद लोगों के शरीर में प्रवेश करता है।बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर स्वास्थ्य वाले व्यक्तियों पर इसका प्रभाव और भी गंभीर होता है। जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान करता है तो वह केवल अपने स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि दूसरों के स्वास्थ्य अधिकारों का भी उल्लंघन करता है। यही कारण है कि पैसिव स्मोकिंग को केवल व्यक्तिगत व्यवहार का प्रश्न नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक उत्तरदायित्व का विषय माना जाता है।

साथियों, कई विशेषज्ञों का मानना है कि पैसिव स्मोकिंग के कारण होने वाली मौतों को केवल दुर्घटना याव्यक्तिगत दुर्भाग्य नहीं कहा जा सकता। यह ऐसी स्थिति है जिसमें निर्दोष लोग दूसरों की आदतों के कारण बीमारी औरमृत्यु का शिकार बनते हैं। धुएं में हजारों प्रकार के रसायन पाए जाते हैं, जिनमें अनेक कैंसरकारी तत्व भी शामिल हैं। यही कारण है कि विश्वभर में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंध संबंधी कानून बनाए गए हैं। लेकिन कानून तभी प्रभावी होते हैं जब उनका कठोर और ईमानदार क्रियान्वयन हो। भारत में भी कई स्थानों पर धूम्रपान निषेध के नियम हैं, परंतु उनका पालन अभी भी चुनौती बना हुआ है।

साथियों, यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि तंबाकू विरोधी संघर्ष आज तक एक बड़े जनांदोलन का रूप क्यों नहीं ले पाया। इसका पहला कारण यह है कि तंबाकू तत्काल मृत्यु नहीं देता। सड़क दुर्घटना,हिंसा या प्राकृतिक आपदा की तरह इसका प्रभाव अचानक दिखाई नहीं देता। यह धीरे-धीरे शरीर को भीतर से नष्ट करता है। कैंसर, हृदय रोग और फेफड़ों की बीमारियां वर्षों में विकसित होती हैं। इसलिए जनता का आक्रोश कभी एक साथ विस्फोटक रूप में सामने नहीं आता। दूसरा कारण तंबाकू उद्योग का विशाल आर्थिक ढांचा है। खेती, उत्पादन, वितरण और कर राजस्व से जुड़े अनेक हित इसमें शामिल रहते हैं। तीसरा कारण सामाजिक स्वीकृति है। कई लोग तंबाकू सेवन को व्यक्तिगत पसंद का विषय मानते हैं, जबकि इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। चौथा कारण जागरूकता और क्रियान्वयन के बीच की दूरी है। कानून मौजूद हैं, चेतावनियां मौजूद हैं, लेकिन व्यवहार परिवर्तन अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया है।
साथियों, भारत में तंबाकू और अन्य नशे के नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल स्वास्थ्य विभाग की नहीं है।इसमेंपुलिस विभाग, राज्य आबकारी विभाग,स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग,शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, नारकोटिक्स नियंत्रण एजेंसियां, स्थानीय निकाय, जिला प्रशासन और विभिन्न नियामक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। जिस प्रकार अवैध शराब से मौतों के मामलों में कई राज्यों में संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाती रही है, उसी प्रकार तंबाकू नियंत्रण कानूनों के प्रभावी पालन को लेकर भी जवाबदेही तय करने की आवश्यकता महसूस की जाती है। जब किसी क्षेत्र में खुलेआम प्रतिबंधित उत्पाद बिकते हैं,जब स्कूलों के आसपास तंबाकू की बिक्री होती है या जब सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान रोकने के नियम लागू नहीं होते, तब केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रभावी निगरानी, नियमित निरीक्षण, जनभागीदारी और उत्तरदायित्व की स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक है।

साथियों, आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि नई पीढ़ी नशे को आधुनिकता और स्टेटस सिंबल के रूप में देखने लगी है। सोशल मीडिया,फिल्मों, डिजिटल संस्कृति और समूह दबाव के कारण कई किशोर यह मान बैठते हैं कि वेपिंग या धूम्रपान उन्हें अधिक आकर्षक, परिपक्व या आधुनिक बनाता है।वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। चिकित्सा विज्ञान यह संकेत देता है कि निकोटीन की लत मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकती है, विशेषकर किशोरावस्था में। कुछ मामलों में ई-सिगरेट से जुड़ी गंभीर फेफड़ों की बीमारियों की भी रिपोर्ट सामने आई हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष चिकित्सीय श्रेणियों में अध्ययन किया गया है। यह स्पष्ट है कि आधुनिक नशे का आकर्षक आवरण उसके भीतर छिपे जोखिमों को समाप्त नहीं करता।इसलिए अब आवश्यकता केवल जागरूकता की नहीं बल्कि सामाजिक चेतना के व्यापक पुनर्जागरण की है। स्कूलों और कॉलेजों में नशा विरोधी शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए। अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ खुलकर संवाद करना होगा। मीडिया को तंबाकू उद्योग के भ्रामक प्रचार का पर्दाफाश करना होगा। चिकित्सकों, शिक्षकों, धार्मिक नेताओं, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें तंबाकू सेवन सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं बल्कि स्वास्थ्य जोखिम के रूप में देखा जाए। जिस प्रकार स्वच्छता, बेटी बचाओ, पोलियो उन्मूलन और सड़क सुरक्षा जैसे अभियानों को जनभागीदारी के माध्यम से व्यापक सफलता मिली, उसी प्रकार तंबाकू निषेध को भी राष्ट्रीय जनअभियान का रूप दिया जा सकता है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि विश्व तंबाकू निषेध दिवस का वास्तविक उद्देश्य केवल एक दिन जागरूकता फैलाना नहीं बल्कि पूरे वर्ष चलने वाली सामाजिक प्रतिबद्धता को मजबूत करना है। यदि हम तंबाकू और निकोटीन की बदलती रणनीतियों को नहीं समझेंगे,यदि हम आधुनिक नशे के मुखौटों को नहीं पहचानेंगे और यदि हम युवाओं को इसके जाल से बचाने के लिएसामूहिक प्रयास नहीं करेंगे,तो आने वाली पीढ़ियां इसकी भारी कीमत चुकाएंगी। तंबाकू विरोधी संघर्ष केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव गरिमा, सामाजिक न्याय, आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के संरक्षण का प्रश्न है। समय आ गया है कि इसे केवल एक स्मृति दिवस या सरकारी कार्यक्रम तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे एक सशक्त राष्ट्रीय जनचेतना आंदोलन बनाया जाए। क्योंकि नशा कभी शान नहीं हो सकता; यह व्यक्ति, परिवार और समाज की चेतना का क्षरण है। तंबाकू को ना कहना केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और जिम्मेदार समाज के निर्माण की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

जनगणना 2027 के प्रथम चरण के सफल संचालन हेतु जागरूकता वाहनों को DY- DRDA एवं ADC के द्वारा हरी झंडी दिखाकर किया गया रवाना

जनगणना 2027 के प्रथम चरण के सफल संचालन हेतु जागरूकता वाहनों को DY- DRDA एवं ADC के द्वारा हरी झंडी दिखाकर किया गया रवाना

सरायकेला/खरसावां

जनगणना 2027 के प्रथम चरण अंतर्गत मकान सूचीकरण एवं मकानों की गणना कार्यक्रम के व्यापक प्रचार-प्रसार एवं जन-जागरूकता के उद्देश्य से दो जागरूकता वाहनों को निदेशक, डीआरडीए अजय तिर्की एवं अपर उपायुक्त जयवर्धन कुमार द्वारा संयुक्त रूप से हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया।

दोनों जागरूकता वाहन आगामी सात दिनों तक जिले के दोनों अनुमंडलों के विभिन्न प्रखंडों अंतर्गत ग्राम पंचायतों का भ्रमण कर जनगणना 2027 से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियों का व्यापक प्रचार-प्रसार करेंगे तथा आमजन को जनगणना कार्य में सक्रिय सहभागिता एवं सहयोग के प्रति जागरूक करेंगे।

अभियान के दौरान नागरिकों को जनगणना की प्रक्रिया, मकान सूचीकरण एवं मकानों की गणना के दौरान पूछी जाने वाली जानकारियों, अपेक्षित दस्तावेजों तथा जनगणना के महत्व के संबंध में विस्तृत जानकारी प्रदान की जाएगी। साथ ही यह भी बताया जाएगा कि जनगणना से प्राप्त आंकड़े विकास योजनाओं के निर्माण, संसाधनों के समुचित आवंटन तथा विभिन्न जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन का आधार बनते हैं।

इस अवसर पर आमजन से अपील की गई कि वे जनगणना संबंधी जानकारी प्राप्त करें, जनगणना कर्मियों को सही एवं पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराएं तथा किसी भी प्रकार की भ्रांति अथवा अफवाह पर ध्यान न दें। साथ ही सभी संबंधित पदाधिकारियों एवं कर्मियों को जन-जागरूकता गतिविधियों का प्रभावी संचालन सुनिश्चित करने तथा अभियान के सफल क्रियान्वयन हेतु समन्वित रूप से कार्य करने के आवश्यक निर्देश दिए गए।

“हमारी जनगणना, हमारा विकास” के संदेश के साथ जिलेवासियों से इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभियान को सफल बनाने हेतु सक्रिय सहयोग एवं सहभागिता सुनिश्चित करने की अपील की गई।

इस अवसर पर जिला जनसंपर्क पदाधिकारी अविनाश कुमार, अपर जिला जनगणना पदाधिकारी कमलेश कुमार दास सहित विभिन्न विभागों के पदाधिकारी एवं कर्मी उपस्थित थे।

उपायुक्त ने प्रखंड -सह- अंचल कार्यलय नीमडीह का किया औचक निरीक्षण।

उपायुक्त ने प्रखंड -सह- अंचल कार्यलय नीमडीह का किया औचक निरीक्षण।

सरायकेला/खरसावां

उपायुक्त सरायकेला-खरसावां नितिश कुमार सिंह द्वारा प्रखंड -सह- अंचल कार्यालय नीमडीह का औचक निरीक्षण किया गया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने कार्यालय परिसर, विभिन्न शाखाओं, अभिलेखों के संधारण, राजस्व संबंधी कार्यों, लंबित मामलों एवं आमजनों को उपलब्ध कराई जा रही सेवाओं की समीक्षा की।

निरीक्षण के क्रम में उपायुक्त ने कार्यालय में उपस्थित पदाधिकारियों एवं कर्मियों को समयबद्ध, पारदर्शी एवं जवाबदेह तरीके से कार्य निष्पादन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि आम नागरिकों से जुड़े मामलों का निर्धारित समय-सीमा के भीतर निष्पादन किया जाए तथा अनावश्यक विलंब एवं लापरवाही किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होगी।

उपायुक्त ने दाखिल-खारिज, परिमार्जन, राजस्व वसूली, भूमि संबंधी मामलों एवं अन्य अंचल स्तरीय कार्यों की प्रगति की समीक्षा की। निरीक्षण के क्रम में उन्होंने विभिन्न शाखाओं में संचालित कार्यों एवं अभिलेखों के संधारण का अवलोकन किया तथा कार्यों के संतोषजनक निष्पादन पर प्रसन्नता व्यक्त की। साथ ही लंबित मामलों के शीघ्र निष्पादन, कार्यालय अभिलेखों के सुव्यवस्थित संधारण एवं नियमित अद्यतन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आमजनों को गुणवत्तापूर्ण एवं सुलभ सेवाएं उपलब्ध कराना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। सभी पदाधिकारी एवं कर्मी संवेदनशीलता एवं जवाबदेही के साथ कार्य करें तथा कार्यालय आने वाले नागरिकों की समस्याओं का यथासंभव त्वरित समाधान सुनिश्चित करें।

निरीक्षण के दौरान उपायुक्त ने कार्यालय पहुंचे स्थानीय नागरिकों से संवाद कर उनकी समस्याओं एवं शिकायतों की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने संबंधित पदाधिकारियों को प्राप्त आवेदनों एवं मामलों का नियमानुसार समयबद्ध निष्पादन सुनिश्चित करने तथा आमजनों को अनावश्यक रूप से कार्यालय का चक्कर न लगाना पड़े, इसके लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

निरीक्षण के दौरान उपायुक्त ने कार्यालय परिसर की स्वच्छता, अनुशासन एवं कार्य संस्कृति को और बेहतर बनाने पर बल देते हुए कहा कि सुशासन, पारदर्शिता एवं जनकल्याण की भावना के अनुरूप कार्य करते हुए प्रशासन और जनता के बीच विश्वास को मजबूत करना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

निरीक्षण के दौरान प्रखंड विकास पदाधिकारी नीमडीह कुमार अभिनव, अंचल अधिकारी नीमडीह अभय कुमार द्विवेदी सहित अंचल कार्यालय के अन्य पदाधिकारी एवं कर्मी उपस्थित रहे।

कागज कलम पर चल रहा चापाकल मरम्मती, पानी के लिए तरस रहे ग्रामीण।

कागज कलम पर चल रहा चापाकल मरम्मती, पानी के लिए तरस रहे ग्रामीण।

सरायकेला/ईचागढ़

सरायकेला-खरसावां जिला के ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र में दर्जनों चापाकल और सौर ऊर्जा चालित जल मीनार खराब है, जिससे कई गांवों में जलसंकट से ग्रामीण जुझ रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण सोड़ो पंचायत में देखने को मिला। सोड़ों गांव में अमुल्य प्रामाणिक के घर के पास चापाकल दो सप्ताह से खराब है, जारगोडीह में सुबोध राय के घर के पास चापाकल एवं जल मीनार खराब है, बिस्टाटांड़ में जल मीनार व चापाकल,ताला पीढ़ी में चापाकल व जल मीनार, तुता पंचायत के बड़ा चुनचुड़ीया में चापाकल व जल मीनार सहित कई गांवों में महिनों से दर्जनों चापाकल व जल मीनार खराब है, जिससे इस गर्मी के समय लोगों को खेतों में बने सिंचाई कुआं से पानी लाकर प्यास बुझाना पड़ रहा है।

उपायुक्त के निर्देश पर पंचायतों व पीएच ईडी विभाग को खराब चापाकलों का मरम्मती कराने का निर्देश दिया गया है एवं हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया गया है, लेकिन उपायुक्त का निर्देश के बावजूद चापाकल व जल मीनारों का मरम्मती के नाम पर सिर्फ और सिर्फ कागजी प्रक्रिया तक सीमित है। सुबोध राय ने बताया कि इसकी सुचना देने के बाद भी मरम्मती के लिए विभाग पहल नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि पानी के लिए लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि विभाग से बात करने पर बताया जा रहा है कि चापाकल मरम्मती का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ ओर है, सिर्फ कागज पर ही मरम्मती कार्य किया जा रहा है। उन्होंने जल्द से जल्द चापाकल व जल मीनार का मरम्मती कराने का मांग किया है।

संस्कृति समिति का छऊ झूमर उत्सव का हुआ समापन।

संस्कृति समिति का छऊ झूमर उत्सव का हुआ समापन।

सरायकेला/ईचागढ़

प्रखंड क्षेत्र के चोगा आदारडीह में दो दिवसीय छऊ झुमर महोत्सव का समापन किया गया।संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से मानभूम सांस्कृतिक समिति के द्वारा आयोजित दो दिवसीय छऊ झूमर उत्सव का समापन हुआ। समापन समारोह के अवसर पर जिला जनसंपर्क पदाधिकारी पूर्वी सिंहभूम पंचानन उरांव, जिला परिषद सदस्य ईचागढ़ पश्चिम सुभाषिनी देवी, उप प्रमुख ईचागढ़ दीपक कुमार साव, वरिष्ठ नागपुरी लोक कलाकार रांची सुनील कुमार, सोरों पंचायत के मुखिया नयन सिंह मुंडा,ठाकुर दास महतो आदि बहुत सारे गणमान्य लोग मौजूद रहे।

सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रथम प्रस्तुति भवतारण महतो एवं साथी के दरबारी झूमर से हुआ द्वितीय प्रस्तुति गूंजे झारखंड कला केंद्र रांची के द्वारा नागपुरी झूमर की प्रस्तुति से लोग झूम उठे वहीं तीसरी प्रस्तुति सुचांद महतो चोगा सरायकेला खरसावां के द्वारा मानभूम छऊ नृत्य की प्रस्तुति से लोगों को भाव विभोर कर दिया तथा अंतिम प्रस्तुति ममता महतो एवं संप्रदाय कोठशिला पश्चिम बंगाल के द्वारा कुरमाली झूमर से लोग काफी उत्साहित हुए। नटराज कला केन्द्र चोगा के सचिव प्रभात कुमार महतो ने कहा कि लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।

मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के तहत 12 यूनिट बकरियों का वितरण।

मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के तहत 12 यूनिट बकरियों का वितरण।

सरायकेला/ईचागढ़

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने तथा पशुपालन आधारित आजीविका को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के अंतर्गत ईचागढ़ प्रखंड में चयनित लाभुकों के बीच शुक्रवार को 12 यूनिट बकरी पालन योजना के तहत बकरियों का वितरण किया गया।

इस अवसर पर लाभुकों को वैज्ञानिक तरीके से बकरी पालन, पशुओं के स्वास्थ्य प्रबंधन, टीकाकरण एवं पोषण संबंधी आवश्यक जानकारियां भी प्रदान की गईं, ताकि वे योजना का समुचित लाभ प्राप्त कर आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। योजना के माध्यम से ग्रामीण परिवारों को आय का अतिरिक्त स्रोत उपलब्ध कराने तथा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण साबित होगी।

संबंधित अधिकारियों ने लाभुकों से पशुओं की उचित देखभाल करने तथा विभागीय दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए बकरी पालन को आय सृजन का सशक्त माध्यम बनाने का आग्रह किया। मुख्यमंत्री पशुधन विकास योजना के तहत जिले में पात्र लाभुकों को पशुपालन गतिविधियों से जोड़कर उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने की दिशा में लगातार कार्य किया जा रहा है।

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