श्री श्री सार्वजनिक काली पूजा कमेटी ब्राह्मण टोला आदित्यपुर के काली पूजा पंडाल का हुआ उद्घाटन
सरायकेला/आदित्यपुर
रविवार को श्री श्री सार्वजनिक काली पूजा कमेटी ब्राह्मण टोला आदित्यपुर के पूजा पंडाल का बिल्डर सूरज बदानी ने फीता काटकर उद्घाटन किया।
सूरज बदानी ने कहा कि काली पूजा पंडाल का उद्घाटन करना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने उद्घाटन को लेकर आमंत्रित करने के लिए कमेटी के अध्यक्ष और सदस्यों को धन्यवाद दिया।सूरज बदानी ने कहा कि मां काली शक्ति की प्रतीक हैं और उनकी पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
कमेटी के अध्यक्ष छोटू राम ने बताया कि 2008 से ही काली पूजा पंडाल का आयोजन किया जा रहा है और इस बार का पूजा पंडाल विशेष रूप से सजाया गया है।
इस अवसर पर कमेटी के अध्यक्ष छोटू राम, वाइस प्रेसिडेंट गोलू गुप्ता, सुमित शर्मा, सुदामा सिंह, जिलाध्यक्ष अनिल पासवान और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी 19 अक्टूबर 2025 -अंधकार से प्रकाश, अहंकार से विनम्रता और नरक से मुक्ति का आध्यात्मिक पर्व
नरक चतुर्दशी क़ो हम अपने भीतर की अंधकारमय प्रवृत्तियों, क्रोध, लोभ, द्वेष, असत्य, आलस्य और नकारात्मक विचारों का वध करने का संकल्प लेते हैं।
आज का नरकासुर,पर्यावरण प्रदूषण, लालच आधारित अर्थव्यवस्था, असमानता, और मानसिक तनाव के रूप में हमारे जीवन को घेर रहा है। अब हमें पहले से भी अधिक प्रासंगिक होना है-एडवोकेट किशन सनमुखदासभावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया/महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर भारत की सांस्कृतिक औरधार्मिक परंपराएँ विश्वभर में अपनी गहराई, आध्यात्मिकता और मानवता के संदेश के लिए जानी जाती हैं। दीपावली का पंचदिवसीय महापर्व केवल एक उत्सव नहीं बल्कि मानव जीवन के आत्मिक उत्थान का प्रतीक माना जाता है।इस पंचदिवसीय श्रृंखला का दूसरा दिन“छोटी दिवाली” या “नरक चतुर्दशी”कहलाता है।वर्ष 2025 में यह पावन दिवस 19 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन का महत्व केवल दीप प्रज्ज्वलन तक सीमित नहीं, बल्कि यह मानव जीवन के भीतर बसे अंधकार,नकारात्मकता और अहंकार को मिटाने का प्रतीकात्मक संदेश देता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह पर्व भारत ही नहीं,बल्कि विश्वभर में बसे भारतवंशियों के बीच भी समान श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। छोटी दिवाली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि यह मानवता के भीतर छिपे अंधकार,जैसे अहंकार, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध और मोह,पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।चूँकि हमें अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से जानना कि आखिर छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी क्यों कहा जाता है, इस दिन किसकी पूजा की जाती है और यह पर्व क्यों मनाया जाता है?
एडवोकेट किशन सनमुखदासभावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
साथियों बात अगर हम छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी क्यों कहा जाता है,इसको जानने की करें तो अधर्म,अहंकार और अंधकार पर धर्म,नम्रता और प्रकाश की विजय का प्रतीक हैँ,छोटी दिवाली का नाम“नरक चतुर्दशी”इसलिए पड़ा क्योंकि यह दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध से जुड़ा हुआ है।हिंदूधर्मग्रंथों के अनुसार, नरकासुर नामक असुर ने अत्याचार और अधर्म का साम्राज्य स्थापित कर रखा था। उसने पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों को आतंकित कर रखा था। नारी की अस्मिता का अपमान, साधुओं का अपमान और दैवीय शक्तियों को चुनौती देना उसका स्वभाव बन गया था। अंततः भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार में,अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर उसका अंत किया।कहा जाता है कि जब नरकासुर का वध हुआ, तो उसने अंतिम समय में श्रीकृष्ण से वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु के दिन जो लोग स्नान और दीपदान करें, उन्हें नरक का भय न रहे। भगवान श्रीकृष्ण ने यह वरदान स्वीकार किया।तभी से यह दिन “नरक चतुर्दशी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसका अर्थ है, वह चतुर्दशी जो नरक से मुक्ति का मार्ग दिखाए।छोटी दिवाली इसीलिए कही जाती है क्योंकि यह मुख्य दिवाली के एक दिन पहले आती है, और इसमें दीप जलाने की परंपरा आरंभ हो जाती है। परंतु इसके पीछे का भाव कहीं अधिक गहरा है,यह दिन हमें सिखाता है कि असली नरक बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और असत्य के रूप में है। जब हम इनसे मुक्त होते हैं, तब सच्ची “छोटी दिवाली” हमारे जीवन में आती है-जब हम अपने भीतर के अंधकार को सटीक दूर कर आत्मिक प्रकाश जलाते हैं आधुनिक वैश्विक संदर्भ में यदि देखें तो “नरक चतुर्दशी” एक सार्वभौमिक संदेश देती है कि प्रत्येक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के भीतर जो अंधकार,अन्याय, हिंसा, लालच और भेदभाव,फैला हुआ है,उसे सत्य, सद्भाव और प्रकाश से मिटाना ही सच्चा उत्सव है। यह दिन हर व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि नरकासुर जैसी प्रवृत्तियाँ हर युग में मौजूद रहती हैं,बस उनके रूप बदलते रहते हैं। आज का नरकासुर पर्यावरण प्रदूषण,लालच आधारित अर्थव्यवस्था, असमानता, और मानसिक तनाव के रूप में हमारे जीवन को घेर रहा है। इसलिए छोटी दिवाली का संदेश आधुनिक समय में पहले से भी अधिक प्रासंगिक है।
साथियों बात अगर हम नरक चतुर्दशी के दिन किसकी पूजा की जाती है, इसको समझने की करें तो,नरक चतुर्दशी के दिन तीन प्रमुख देवताओं की पूजा की परंपरा है,यमराज,भगवान श्रीकृष्ण,और देवी लक्ष्मी।(क)यमराज पूजा-इस दिन यमराज की पूजा का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले स्नान कर यमराज को दीपदान करता है, उसे मृत्यु का भय नहीं सताता और उसे यमलोक का दर्शन नहीं करना पड़ता। इसे “यम दीपदान” कहा जाता है।घर के बाहरदक्षिण दिशा में एक दीप जलाकर कहा जाता है,”मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालिना श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम ॥” इसका अर्थ है कि इस दीप के माध्यम से मैं यमराज को प्रसन्न कर उनसे दीर्घायु और सुखमय जीवन की प्रार्थना करता हूँ।(ख) श्रीकृष्ण पूजा-भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन अधर्म पर विजय प्राप्त की थी, इसलिए उन्हें विजयी और धर्म के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। भक्त उनके चरणों में पुष्प, फल और दीप अर्पित करते हैं। उनके साथ देवी सत्यभामा की भी पूजा की जाती है, क्योंकि नरकासुर के वध में देवी का योगदान महत्वपूर्ण रहा था। (ग) लक्ष्मी पूजा और रूप चौदस-इस दिन “रूप चौदस” भी कहा जाता है। प्रातःकाल तेल स्नान, उबटन, और शुद्धिकरण के बाद सौंदर्य और स्वास्थ्य की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन स्नान और शुद्ध आचरण करता है, उसके शरीर और मन में दीर्घकालिक सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।रूप चौदस के दिन स्त्रियाँ और पुरुष दोनों अपने रूप, स्वास्थ्य और आभा की रक्षा के लिए स्नान, तेल, चंदन और सुगंधित वस्तुओं का उपयोग करते हैं। यह न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि यह शरीर से विषाक्त तत्वों को निकालने और त्वचा को स्वस्थ रखने का उपाय माना गया है।आधुनिक वैश्विक समाज में जहां “वेलनेस” और “मेंटल हेल्थ” की चर्चा प्रमुख हो गई है, नरक चतुर्दशी की यह परंपरा हमें यह बताती है कि आत्मिक और शारीरिक शुद्धता दोनों का संगम ही सच्चा स्वास्थ्य है।
साथियों बात अगर हम नरक चतुर्दशी क्यों मनाई जाती है इसको समझने की करें तो,आत्मशुद्धि, पाप मुक्ति और प्रकाश की ओर मानव यात्रा का उत्सव हैँ,नरक चतुर्दशी का मुख्य उद्देश्य केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और पापमुक्ति का मार्ग है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन में हर मनुष्य से भूलें होती हैं, और उन भूलों से ऊपर उठने के लिए आत्मचिंतन, स्नान और दीपदान के माध्यम से हम भीतर का “नरक” साफ कर सकते हैं।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करता है, वह पापों से मुक्त होता है। इस स्नान को “अभ्यंग स्नान” कहा जाता है। यह केवल शारीरिक शुद्धि नहीं,बल्कि मानसिक और भावनात्मक शुद्धि का भी प्रतीक है। कहा जाता है कि तेल से स्नान करने से शरीर से नकारात्मक ऊर्जा निकलती है, और मन में प्रकाश का प्रवेश होता है।नरक चतुर्दशी हमें यह सिखाती है कि हर व्यक्ति के भीतर दो शक्तियाँ होती हैं,एक अंधकारमय (नरकासुर जैसी) और दूसरी प्रकाशमय (कृष्ण जैसी)। इस दिन हम अपने भीतर की अंधकारमय प्रवृत्तियों,जैसे क्रोध, लोभ, द्वेष, असत्य, आलस्य और नकारात्मक विचारों का वध करने का संकल्प लेते हैं। जब व्यक्ति इस अंतर्द्वंद से ऊपर उठता है, तभी वह सच्चा “प्रकाश” प्राप्त करता है।आज जब पूरी दुनिया तनाव, असमानता,युद्ध औरआत्मकेंद्रित जीवनशैली से जूझ रही है, तब नरक चतुर्दशी जैसे पर्व वैश्विक समाज को यह प्रेरणा देते हैं कि आत्मशुद्धि, विनम्रता और प्रकाश की ओर बढ़ना ही मानवता का मार्ग है। यह केवल धार्मिक दिन नहीं बल्कि “स्पिरिचुअल रीसेट डे” कहा जा सकता है,जब हम अपने भीतर के अंधकार को पहचानते हैं और उसे मिटाने का संकल्प लेते हैं।
साथियों बातें अगर हम छोटी दिवाली का सांस्कृतिक, सामाजिक और वैश्विक महत्व की करें तो,भारत में छोटी दिवाली का उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक एकता, पारिवारिक प्रेम और सामूहिक स्वच्छता का भी प्रतीक है। गाँवों और नगरों में लोग इस दिन अपने घरों की अंतिम सफाई करते हैं, मिट्टी के दीये जलाते हैं, और पड़ोसियों के साथ मिठाइयाँ बांटते हैं। यह पर्व समाज में “साझा प्रकाश” का संदेश देता है कि अंधकार केवल अपने घर से नहीं, पूरी बस्ती से मिटाना चाहिए।अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में छोटी दिवाली का संदेश सार्व भौमिक है,यह केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं। आज अमेरिका,ब्रिटेन,कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में बसे भारतीय समुदाय इस दिन न केवल दीप जलाते हैं बल्कि स्थानीय समाज को भी इसमें शामिल करते हैं। संयुक्त राष्ट्र, यूरोपियन संसद और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ दीपावली को “ग्लोबल सेलिब्रेशन ऑफ़ लाइट ” के रूप में मान्यता दे चुकी हैं। ऐसी स्थिति में छोटी दिवाली का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह मुख्य दीपावली से एक दिन पहले मानवता के भीतर के नरक को मिटाने की तैयारी का दिन है।नरक चतुर्दशी का गूढ़ अर्थ केवल पौराणिक कथा तक सीमित नहीं है।“नरक”का अर्थ है,मानसिक पीड़ा,अवसाद,लालच,और वह अंधकार जो मनुष्य के भीतर उसे असत्य के मार्ग पर ले जाता है। “चतुर्दशी” का अर्थ है — पूर्णता के पूर्व की अवस्था, अर्थात् वह क्षण जब प्रकाश पूरी तरह प्रकट होने वाला है। इसलिए नरक चतुर्दशी का दिन आत्मिक परिवर्तन का समय है,जब मनुष्य अपने भीतर झाँककर कहता है:“अब मैं अंधकार से मुक्त होकर प्रकाश की ओर बढ़ूँगा।” यह आत्मसंवाद ही नरक चतुर्दशी का सार है। श्रीकृष्ण का नरकासुर वध केवल बाह्य घटना नहीं, बल्कि एक प्रतीक है,जब मनुष्य अपनी इच्छाओं और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करता है, तब वह “नरकासुर”का अंत करता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि इस प्रकार छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी केवल दीपों का पर्व नहीं,बल्कि आत्मज्ञान, शुद्धि और अहंकार मुक्ति का दिन है। यह हमें सिखाती है कि असली उत्सव बाहर नहीं, भीतर मन में होता है। जब हम अपने भीतर के अंधकार को दूर करते हैं, तो पूरी दुनिया रोशन होती है।इस दिन किया गया दीपदान केवल घर के द्वार को नहीं, बल्कि आत्मा के द्वार को भी प्रकाशित करता है। यमराज की आराधना हमें मृत्यु का भय नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सजगता सिखाती है। श्रीकृष्ण की पूजा हमें धर्म की रक्षा और अन्याय के अंत का संदेश देती है, जबकि लक्ष्मी पूजा हमें सिखाती है कि सौंदर्य केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक पवित्रता में निहित है।छोटी दिवाली 2025 इसीलिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि मानवता को यह स्मरण कराने का अवसर है कि जब तक भीतर का अंधकार मिटेगा नहीं, तब तक बाहर के दीप अधूरे रहेंगे। यह पर्व विश्व के हर कोने में रहने वाले व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है,“हम अपने भीतर का नरकासुर समाप्त करें, तभी सच्ची दिवाली आएगी।”
संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावानानी गोंदिया महाराष्ट्र
खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी सुबीर रंजन द्वारा मिठाई दुकानों, रेस्टोरेंट तथा फास्ट फूड स्टालों का सघन निरीक्षण किया गया।
सरायकेला-खरसावाँ
उपायुक्त नितिश कुमार सिंह के निर्देशानुसार अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, सरायकेला के नेतृत्व में दिनांक 18 अक्टूबर 2025 को खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी सुबीर रंजन द्वारा सरायकेला जिला मुख्यालय के संजय चौक, वार्ड-4 एवं गैरेज चौक स्थित मिठाई दुकानों, रेस्टोरेंट तथा फास्ट फूड स्टालों का सघन निरीक्षण किया गया।
निरीक्षण के दौरान दूध एवं दूध से बने उत्पादों, जैसे — लड्डू, बूंदी, जलेबी, ड्राई फ्रूट्स से बनी मिठाई, तथा चाऊमीन, समोसा और पैकेटबंद खाद्य सामग्रियों की गुणवत्ता की जांच की गई। जांच में एक मिठाई दुकान से एक किलो छेना मानक के अनुरूप न पाए जाने पर उसे तत्काल नष्ट किया गया।
सभी दुकानदारों को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि किसी भी खाद्य सामग्री को अखबार में पैक कर या रखकर न बेचा जाए, क्योंकि इससे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भविष्य में किसी भी दुकान में ऐसे प्रकरण पाए जाने पर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के अंतर्गत सख्त कार्रवाई की जाएगी।
निरीक्षण के दौरान “सरायकेला लड्डू” नामक प्रतिष्ठित मिठाई दुकान से एक नमूना जांच हेतु लिया गया है, जिसे विधि अनुसार परीक्षण के लिए प्रयोगशाला भेजा गया है। जांच प्रतिवेदन प्राप्त होने के उपरांत नियमानुसार अग्रेतर कार्रवाई की जाएगी।
खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी श्री सुबीर रंजन ने बताया कि उपायुक्त महोदय के निर्देशानुसार त्योहारों के मद्देनज़र जिले में खाद्य प्रतिष्ठानों का औचक निरीक्षण अभियान लगातार जारी रहेगा। आम नागरिकों से भी अपील की गई है कि यदि किसी प्रतिष्ठान में अस्वच्छ, संदिग्ध या मिलावटी खाद्य सामग्री की बिक्री की जाती है, तो उसकी सूचना तत्काल जिला प्रशासन अथवा खाद्य सुरक्षा विभाग को दें ताकि समय पर आवश्यक कार्रवाई की जा सके। खाद्य सुरक्षा जांच दल में घनपत महतो एवं कार्तिक महतो भी सम्मिलित थे।
प्रखण्ड सरायकेला के अन्तर्गत धातकीडीह गाँव में सर्पो की देवी माता मानस की भव्य प्रतिमा स्थापित कर भक्ति भाव से पूजा अर्चना की गई। पूजा की शुरुआत घटवारी से हुई।शुक्रवार शाम को श्रद्धालुओं द्वारा घट में जल भरकर मन्दिर परिसर लाया गया। जहाँ पंडित रामानाथ होता एव रूपक होता ने घट की स्थापना कर विधिवत मंत्रोउच्चरण के साथ सर्पो की देवी माता मानसा की पूजा अर्चना की। वहीं गाँव के श्रद्धांलुओं ने निर्जला उपवास रहकर अपने व परिवार की सुख समृद्धि व वैभव देवी माता से मांगी। पूजा के बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया।
इस अवसर पर मुख्य रूप से उपस्थित एल आई सी ,जमशेदपुर के अधिकारी सोहन लाल मुखी ने बताया कि मनसा की पूजा गांवों में मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहारों में एक है। इस पूजा का गाँव में विशेष महत्व है, मां मनसा को लेकर कई मान्यताएं हैं. सांप-बिच्छू व बरसाती कीड़ों के विष से बचने के लिए मां मनसा की पूजा लोक परंपरा है.
महालिमोरूप क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता हेमसागर प्रधान ने बताया कि गांवों में मां मनसा की पूजा पूरे भक्तिभाव से मनाने के पीछे भी मान्यता है कि मां मनसा की पूजा-अर्चना से सांप-बिच्छुओं के खतरों से उन्हें सुरक्षा मिलती है. इसी कारण गांव के लोग मां मनसा की आराधना पूरे भक्तिभाव से करते हैं.
मौक पर सोहनलाल मुखी, अशोक महतो, धीरेंद्र महतो, सुभाष चंद्र महतो, नगेन महतो, कृष्णा महतो, बुधेश्वर् दास, कमलदेव दास, लखिन्द् नायक समेत अन्य उपस्थित थे।
सरायकेला-खरसावां जिला के ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र में धनतेरस पर शनिवार को बाजारों में खास रौनक रहा । मीट्टी के दीए, वर्तन,बांस का सुप, टोकरी , झाड़ू एवं पूजा भंडार, बाइक शोरूम , ज्वेलरी दुकानों आदि पर लोगों का दिन भर भीड़ रहा । मिलन चौक एवं सितु बाजार में लोगों का काफी भीड़-भाड़ देखा गया।
धनतेरस का बाजार को देखते हुए ईचागढ़ पुलिस मिलन चौक और सितु बाजार में सड़क पर वाहनों को नियंत्रित करने में दिन भर जुटे रहे। सड़क किनारे बाइक व चार पहिया वाहन रखने के लिए जगह काफी कम पढ़े। खरीदारों को आकर्षित करने के लिए दुकानों को खास सजाया गया था। सुबह से देर शाम तक लोगों का बाजारों में काफी चहल-पहल रहा ।
वहीं ईचागढ़ थाना के एएसआई मनिंदर सिंह ने लोगों को नियंत्रित और संयमित होकर बाजारों में खरीदारी करने का अपील करते देखे गए। उन्होंने कहा कि सड़क किनारे जहां तहां बाइक और चार पहिया वाहनें खड़ा करने से मिलन चौक में जाम लग गया, जिससे वाहनों को सड़क किनारे से हटाया गया।
दीपावली का त्योहार पर लोग खरीद रहे हैं विभिन्न प्रकार के दिया।
मुसाबनी संवाददाता।
दीपावली का त्योहार सोमवार को मनाया जाना है। इसको लेकर बाजार में रौनक बढ़ गई है, हर तरफ लोग खरीदारी में लगे हुए हैं, विशेष कर पारंपरिक दिया की खरीदारी हो रही है, इसको लेकर कई प्रकार के दिया बाजार में देखे जा रहे हैं। दुकानदार बताते हैं कि₹20 दर्जन बड़ा दिया छोटा दिया ₹10 का, एक कलश 10 से ₹15 का, धूप दानी ₹20 की बिक रही है।
इसके साथ ही बाजार में कई आकर्षक लक्ष्मी गणेश की मूर्ति भी बेची जा रही है, जो₹50 से लेकर ₹200 तक की बिक रही है। इसकी खरीदारी को लेकर बाजार में भीड़ लगी हुई है। इसके साथ ही शगुन के रूप में लोग झाड़ू बर्तन सोना चांदी की खरीदारी भी कर रहे हैं। दुकानदार बताते हैं कि चाइना लाइट बाजार में खूब बिक रही है, जिसके कारण दिया की बिक्री काफी कम हो गई है। दीया जलाने में इस्तेमाल होने वाला तेल भी काफी महंगा बिक रहा है। जिसके कारण दीया की बिक्री कुछ कम हो गई है।
आर.आई.टी थाना क्षेत्र में दबंगों का तांडव चरम सीमा पर पहुंचा,, स्थानीय थाना खामोश,, शिकायत के 15 दिन बीत जाने के बावजूद भी कोई कार्यवाही नहीं।
सरायकेला/आर.आई.टी
( सोनू कुमार सिंह की रिपोर्ट )
सरायकेला खरसावां के आदित्यपुर अंतर्गत आर.आई.टी थाना क्षेत्र में चल रहा है दबंगों की मनमानी राहगीर हो रहे हैं परेशान और घायल आर.आई.टी थाना प्रभारी है खामोश।
आर.आई.टी थाना प्रभारी ( संजीव कुमार )
आपको बताते चले कि पिछले कई दिनों से आर.आई.टी थाना अंतर्गत हर अवैध कारोबार का खुलेआम जाल बिछा हुआ है। वहीं आर.आई.टी थाना प्रभारी को खबर होने के बावजूद भी कान में रूई डालकर एक कमरे में खामोशी से बैठे नजर आते हैं। आपको बताते चलें कि आर.आई.टी थाना क्षेत्र में दबंगों द्वारा लापरवाही से गाड़ी चलाने के दौरान कई लोग घायल हो रहे हैं लेकिन थाना प्रभारी की कान में जूं तक नहीं रेंग रही है। अभी पिछले दिनों ही एक गरीब परिवार आदित्यपुर की ओर से प्रभात खबर ऑफिस के रास्ते होते हुए अपने घर मिरुडीह वापस जा रहे हैं थे तभी प्रभात खबर के ऑफिस के पास में एक दबंग ने हाई स्पीड में फोर व्हीलर चलाते हुए धक्का मार कर भाग निकला जिसकी शिकायत आर.आई.टी थाना में होने के बावजूद भी थाना प्रभारी की कान में जूं तक नहीं रेंग रही है और काफी लापरवाही अंदाज में दो टूक शब्दों में कहते रहते हैं की अनुसंधान चल रहा है।
पुलिस अधीक्षक ( सरायकेला खरसावां )
अब बात अगर हम जनता की सुरक्षा की करें तो थाने में शिकायत करने के 15 दिनों से ऊपर बीत जाने के बावजूद भी कोई कार्रवाई न हो तो जनता का विश्वास वर्दी पर से उठता नजर आ रहा है अगर यही आलम रहा तो विश्व हिंदू रक्षा परिषद के प्रदेश प्रभारी भरत सिंह ने कहा कि शीघ्र ही जनहित में बड़ी आंदोलन होगी।
यह है मामला:-
आपको बताते चलें कि सरायकेला खरसावां जिले केआर.आई.टी थाना क्षेत्र अंतर्गत मिरुडीह निवासी मुस्कान सिंह 1 अक्टूबर महानवमी के दिन जब अपने पति के साथ मोटरसाइकिल वाहन से रात के लगभग 11 से 12 बजे के बीच आदित्यपुर की ओर से वापस अपने घर की ओर जा रही थी इसी क्रम में प्रभात खबर ऑफिस के आगे एक सफेद रंग की Swift Dzire कार ने जोरदार धक्का मार कर फरार हो गया जिसकी शिकायत मुस्कान सिंह ने लिखित तौर पर आर.आई.टी थाने में की है लेकिन शिकायत के 15 दोनों बीत जाने के बावजूद भी स्थानीय थाना की ओर से कोई भी कार्यवाही होती नजर नहीं आ रही है सवाल करने पर हर बार बस यही कहा जाता है कि अनुसंधान जारी है लेकिन अनुसंधान का कोई भी परिणाम दिखाई नहदे रहा है।
आपको बताते चलें कि मुस्कान सिंह ने थाने को यह भी सूचना दी है कि जिस जगह पर दुर्घटना हुई है उस रास्ते में कई सारी फैक्ट्रियां हैं जिसमें सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं जिसके माध्यम से कार का नंबर आसानी से निकाला जा सकता है इसके बावजूद भी इतने दिनों बीच जाने के बाद पुलिस की ओर से कोई कार्यवाही होती नजर नहीं आ रही है इतना ही नहीं पुलिस अब तक सीसीटीवी फुटेज निकालने में भी नाकामयाब रही है।
वहीं स्थानीय थाना की ओर से कोई कार्यवाई न होने से पीड़िता मुस्कान सिंहने सरायकेला खरसावां जिले के पुलिस अधीक्षक से गुहार लगाई है कि मेरे साथ हुए दुर्घटना का अभी तक केस दर्ज नहीं हो पाया है कृपया कर मुझे न्याय दिलाने का कोशिश करें।
आपको बताते चलें कि आर.आई.टी थाना क्षेत्र में दबंग की मनमानी चरण सीमा पर है कोई अपनी गाड़ी में मॉडिफाई साइलेंसर लगाकर स्थानीय लोगों को परेशान कर रहा है तो कोई मॉडिफाई होरन लगाकर एवं हाई स्पीड में गाड़ी चला कर स्थानीय लोगों का जीना मुहाल कर रखा है लेकिन आईआईटी थाना प्रभारी की ओर से कोई कार्यवाही होती दिखाई नहीं दे रही है इतना ही नहीं गुप्त सूत्रों ने यह भी जानकारी दी है कि कई ऐसे होटल एवं कई ऐसे दुकान है जिसमें अवैध तरीके से शराब की बिक्री की जा रही है। छोटे होटलों में चोरी छुपे महुआ शराब की बिक्री की जा रही है
वहीं आर.आई.टी थाना क्षेत्र के रहने वाले कई निवासी ने यह भी बताया है कि पुलिस अधीक्षक साहब से शीघ्र ही मिलकर आर.आई.टी थाना की शिकायत की जाएगी। अगर थाना नहीं सुनी तो जिले के कप्तान से कहेंगे और कप्तान भी ना सुने तो कोर्ट के शरण में भी हम जरूर जाएंगे क्योंकि थाना में न्याय मिले ना मिले लेकिन आज भी लोगों को न्यायपालिका कोर्ट पर विश्वास है।
त्योहारों के मद्देनज़र खाद्य प्रतिष्ठानों का औचक निरीक्षण,, सरायकेला-खरसावाँ जिला प्रशासन की सख्त कार्रवाई
सरायकेला-खरसावाँ
उपायुक्त नितिश कुमार सिंह (भा.प्र.से.) के निर्देशानुसार अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी, सरायकेला के नेतृत्व में आज दिनांक 17 अक्टूबर, 2025 को खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी श्री सुबीर रंजन द्वारा आदित्यपुर क्षेत्र के शेरे पंजाब चौक, इमली चौक तथा गम्हरिया क्षेत्र स्थित विभिन्न मिठाई दुकानों का सघन निरीक्षण किया गया।
निरीक्षण के दौरान पनीर, खोवा एवं दूध से बनी मिठाइयों, लड्डू, बूंदिया, चाट तथा समोसे में प्रयुक्त मसालों की गुणवत्ता की जाँच की गई। जाँच में पाया गया कि कुछ दुकानों में समोसा मसाला पैकेटों पर समुचित लेबल नहीं थे, जिस कारण कुल 30 पैकेट मसाला मौके पर ही नष्ट कराए गए।
साथ ही, सभी दुकानदारों को यह निर्देश दिया गया कि अखबार में लपेटकर खाद्य सामग्री का विक्रय न करें। निरीक्षण के दौरान उपलब्ध सभी अखबार-निर्मित पैकेटों को नष्ट किया गया। दुकानदारों को सख्त चेतावनी दी गई कि भविष्य में ऐसा करते पाए जाने पर उनके विरुद्ध खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के अंतर्गत सख्त कार्रवाई की जाएगी।
निरीक्षण के क्रम में दो दुकानों से खाद्य पदार्थों के नमूने जांच हेतु लिए गए हैं, जिन्हें प्रयोगशाला परीक्षण के लिए विधि अनुसार भेजा गया है।जाँच प्रतिवेदन प्राप्त होने के उपरांत आवश्यक अग्रेतर कार्रवाई की जाएगी।
खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी सुबीर रंजन ने बताया कि उपायुक्त के निर्देशानुसार त्योहारों के मद्देनज़र जिले में खाद्य प्रतिष्ठानों का औचक निरीक्षण अभियान लगातार जारी रहेगा। साथ ही, आम जनता से अपील की गई है कि यदि किसी प्रतिष्ठान में अस्वच्छ या मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री की जा रही हो, तो उसकी सूचना तत्काल जिला प्रशासन अथवा खाद्य सुरक्षा विभाग को दें।
“आदि कर्मयोगी अभियान” में सरायकेला-खरसावाँ की असाधारण उपलब्धि — महामहिम राष्ट्रपति महोदया द्वारा उपायुक्त को सम्मान
सरायकेला-खरसावाँ
सरायकेला-खरसावाँ जिले के लिए आज का दिन ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण है। जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा संचालित “आदि कर्मयोगी अभियान” एवं “धरती आबा जनभागीदारी अभियान” के अंतर्गत देश के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जिलों में सरायकेला-खरसावाँ जिले का चयन किया गया है।
इस अवसर पर दिनांक 17 अक्टूबर, 2025 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित “आदिकर्मयोगी अभियान नेशनल कॉन्क्लेव” में महामहिम राष्ट्रपति महोदया द्वारा सरायकेला-खरसावाँ जिले के उपायुक्त श्री नितिश कुमार सिंह (भा.प्र.से.) को सम्मान प्रदान किया गया।
यह सम्मान जिले में जनजातीय सशक्तिकरण, समावेशी विकास, नवाचार आधारित प्रशासनिक कार्यशैली और समुदाय की सक्रिय भागीदारी के उत्कृष्ट परिणामों के लिए दिया गया है।
🟢 प्रमुख उपलब्धियाँ:-
जनजातीय ग्रामों में इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट – आवास, सड़क, शिक्षा, पोषण, पेयजल और आजीविका के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य।
PESA अंतर्गत पंचायतें – 132
Forest Rights Act (FRA) अंतर्गत पंचायतें – 67 (ग्रामों की संख्या – 311)
शैक्षणिक संस्थान – प्राथमिक विद्यालय 818, मध्य विद्यालय 502, उच्च विद्यालय 101 (कुल 1421 विद्यालय)
आंगनबाड़ी केंद्र – 1373
स्वास्थ्य केंद्र – PHC: 14, CHC: 08
संचालित छात्रावासों की संख्या – 28
कौशल प्रशिक्षण – DDU-GKY अंतर्गत 5793 लाभार्थी एवं राज्य कौशल मिशन के तहत 705 बैच
प्रशिक्षित शिक्षक – 4001
डिजिटल लर्निंग सेंटर – 199
इन पहलों से जिले के जनजातीय समुदायों के जीवन स्तर में ठोस सुधार हुआ है और प्रशासन ने विकास योजनाओं के शत-प्रतिशत सैचुरेशन का संकल्प लिया है।
इस अवसर पर झारखण्ड राज्य के सरायकेला-खरसावाँ, पाकुड़, जामताड़ा, सिमडेगा और लोहरदगा जिलों को भी सम्मानित किया गया।
यह उपलब्धि साबित करती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद, समर्पण, नवाचार और जनभागीदारी के बल पर समावेशी विकास का सशक्त मॉडल प्रस्तुत किया जा सकता है।
इस सम्मान से न केवल जिले की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और सशक्त हुई है, बल्कि यह हर नागरिक के लिए गर्व का विषय है।
दीपावली व धनतेरस को लेकर कोल्हान का सबसे बड़ा सप्ताहिक बाजार में जमकर हुई खरीदारी
सरायकेला/ईचागढ़
(मालखान महतो)
सरायकेला-खरसावां जिला के कुकड़ु प्रखंड क्षेत्र के कोल्हान का सबसे बड़ा कुकड़ू सप्ताहिक बाजार में शुक्रवार को दीपावली व धनतेरस को लेकर लोगों ने जमकर खरीदारी किया। मिट्टी के दीया, वर्तन एवं बकरों का दुकानों में काफी भीड़-भाड़ रहा। लोग गोवर्धन पूजा व गौ माता की पूजा के लिए भी सिंदुर एवं रंग बिरंगी रंगों और साजो समानों का खरीदारी किया। काली पूजा को लेकर बकरों का बिक्री पांच हजार से लेकर 15 हजार रुपए तक हुई। सप्ताहिक पशु व कृषि बाजार में अन्य सप्ताह के तुलना में काफी भीड़-भाड़ रहा। बाइक और चार पहिया वाहन रखने का तक जगह कम पड़ रहा था।
वहीं ग्रामीणों ने बताया कि धनतेरस,काली पूजा एवं बांदना पर्व को लेकर मीट्टी का दीया, वर्तन,बांस के टोकरी ,झाड़ू ,सुप एवं पशु धनों के लिए साजो सामान का खरीदारी किया गया। मालूम हो कि कुकड़ू सप्ताहिक पशु व कृषि बाजार में झारखंड के अलावा बंगाल और बिहार के भी पशु व्यवसायिक , कपड़े व्यापारी आदि पहुंचते हैं। दीपावली को लेकर लोगों में खास उत्साह देखा गया।
चीनी लाइटों और चीनी दीया से पारम्परिक स्वदेशी मीट्टी कारीगरों पर आ रही
सरायकेला/ईचागढ़
(मालखान महतो)
पारम्परिक मीट्टी के दीए और दीवाली पर सजने वाले मीट्टी के साजो सामान पर चीनी वस्तुओं से ग्रहण लग रहा है। जहां दीपावली में लोग मीट्टी के दीए से अपने घर और आंगन को सजाते थे, मीट्टी के बर्तनों का जमकर उपयोग किया जाता था,आज चीनी लाइटों, दीया और प्लास्टिक उत्पादों ने जगह बना ली, जिससे पारम्परिक स्वदेशी मीट्टी के वस्तुओं के निर्माता खास कर कुम्हारों की स्थिति दयनीय होते जा रहा है।
ईचागढ़ प्रखंड क्षेत्र के नदीसाईं एवं बोड़ा गांव में आज भी पारम्परिक रूप से प्राचीन काल की तरह कुम्हार अपने चक्की को घुमाकर मीट्टी के दीए , वर्तन,हंडी आदि का निर्माण कर रहे हैं। आधुनिक तकनीकी के इस युग में भी कुम्हार आज भी पारम्परिक चक्की को लाठी के सहारे चलाकर जी तोड़ मेहनत कर मीट्टी का समानों का निर्माण कर अपने पारम्परिक कारीगरी को जिंदा रखे हुए हैं। ऐसे समय में चीनी लाइट, दीया व अन्य सामान मीट्टी के समानों का स्थान ले रहा है, जिससे पारम्परिक और मीट्टी का समान निर्माण करने वाले कारीगरों के सामने बड़ा चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इस दिवाली के लिए कुम्हार अपने पारम्परिक रूप से दीया व वर्तन आदि का निर्माण में लगे हुए हैं। रंजीत कुम्हार बताते हैं कि सरकारी सहायता के अभाव में आज के युग में भी पारम्परिक चक्की से मीट्टी का दीया व वर्तन का निर्माण किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पुरे परिवार एक महीने से इस काम में लगे हुए हैं। दिवाली में बिकने वाले दीया पहले जैसा नहीं बिक रहा है। उन्होंने कहा कि अगर सरकारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी और आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराई जाएगी तो कम समय में अधिक निर्माण होगा और आमदनी भी बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि ऐसा ही स्थिति रहा तो आने वाले समय में पारम्परिक मिट्टी का निर्माण बंद हो जाएगा, चुंकि आधुनिकता इस दौड़ में युवा वर्ग पुराने जमाने का निर्माण विधि को अपनाना नहीं चाहते हैं।
धनतेरस 18 अक्टूबर 2025- समृद्धि, स्वास्थ्य, आस्था और वैश्विक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक पर्व
भारत में धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ, वाहन और गहने खरीदने की परंपरा है
आधुनिक युग में धनतेरस ने अपने धार्मिक स्वरूप से आगे बढ़कर वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों को भी अपने साथ जोड़ा है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया/महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर भारत की संस्कृति में दीपावली केवल एक दिन का उत्सव नहीं,बल्कि पाँच दिवसीय आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा है। इस यात्रा की शुरुआत जिस दिन से होती है,वह दिन है धनतेरस,समृद्धि, आरोग्य और शुभारंभ का पर्व। वर्ष 2025 में धनतेरस 18 अक्टूबर, शनिवार को मनाया जा रहा है। यह दिन न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में बसे करोड़ों भारतीयों के लिए दिवाली की शुरुआत का प्रतीक है। आधुनिक युग में धनतेरस ने अपने धार्मिक स्वरूप से आगे बढ़कर वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों को भी अपने साथ जोड़ा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि धनतेरस का उद्भव वैदिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। पुराणों में उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय, देवताओं और असुरों के बीच जब अमृत कलश प्राप्त हुआ,उसी समय धन्वंतरि भगवान,जो आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं,अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे।यही दिन त्रयोदशी तिथि का था, जो कार्तिक कृष्ण पक्ष की होती है। इसी कारण इसे धन्वंतरि त्रयोदशी कहा गया,जो आगे चलकर“धनतेरस”के नाम से प्रसिद्ध हुआ।धन्वंतरि देव का आगमन जीवन में स्वास्थ्य, दीर्घायु और संतुलन का प्रतीक है। भारत में प्राचीन काल से ही स्वास्थ्य को धन के समान माना गया है “आरोग्यं परमं भाग्यं, स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्।” अर्थात् आरोग्य ही सबसे बड़ा धन है। इसीलिए धनतेरस पर लोग न केवल सोना-चांदी या बर्तन खरीदते हैं,बल्कि आरोग्य, स्वच्छता और संतुलित जीवन के संकल्प भी लेते हैं।
साथियों बात अगर हम धनतेरस: शुभ क्रय और आर्थिकप्रतीकवाद को समझने की करें तो, भारत में धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ, वाहन और गहने खरीदने की परंपरा है। इसे शुभ मुहूर्त का प्रतीक माना जाता है। यह दिन वर्ष का वह क्षण होता है जब अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता भावनाओं का चरमोत्कर्ष देखा जाता है। 2025 के लिए अनुमान है कि भारतीय बाजार में धनतेरस पर लगभग 65,000 करोड़ रूपए से अधिक का कारोबार होगा,जिसमें आभूषण उद्योग,वाहन,मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण,गृह सज्जा और स्टील-बर्तन उद्योग अग्रणी होंगे।इस दिन का आर्थिक महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुबई, लंदन, न्यूयॉर्क, सिंगापुर, मेलबर्न, टोरंटो और नैरोबी जैसे महानगरों में बसे प्रवासी भारतीय समुदाय भी इस दिन ‘धनतेरस शॉपिंग फेस्टिवल’आयोजित करते हैं। यह दर्शाता है कि भारतीय परंपरा अब एक वैश्विक ब्रांड पहचान में परिवर्तित हो चुकी है।
साथियों बात अगर हम आयुर्वेद और स्वास्थ्य का दिवस:धन्वंतरि पूजा का गूढ़ अर्थ, पर्यावरणीय दृष्टिकोण व सामाजिक एकजुट को समझने की करें तो धनतेरस केवल धन-संपदा का नहीं,बल्कि स्वास्थ्य-संपदा का पर्व हैभगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है। इस दिन चिकित्सक, वैद्य, फार्मासिस्ट, योग प्रशिक्षक और स्वास्थ्य संस्थान विशेष पूजन-अर्चन करते हैं।2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन और आयुष मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से “ग्लोबल आयुर्वेदा वैलनेस डे” के रूप में धनतेरस को मान्यता देने की पहल भी चल रही है। यह एक ऐसी ऐतिहासिक दिशा होगी जिसमें भारतीय चिकित्सा ज्ञान को वैश्विक आयुर्विज्ञान के मानचित्र पर स्थान मिलेगा।धनतेरस और पर्यावरणीय दृष्टिकोण-धनतेरस का एक गहरा संदेश“संपन्नता के साथ स्थिरता”का भी है। वर्तमान समय में जब उपभोक्तावाद चरम पर है, यह पर्व हमें याद दिलाता है कि वास्तविक समृद्धि वही है जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखे।मिट्टी के दीपक जलाना, तांबे- पीतल के बर्तन खरीदना, और स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देना पर्यावरणीय दृष्टि से भी सार्थक कदम हैं।
वर्ष 2025 में पर्यावरणविदों ने यह आह्वान किया है कि धनतेरस पर इको-फ्रेंडली खरीदारी की जाए,जैसे ऊर्जा-संवर्धन करने वाले उपकरण, सौर लैंप, या स्थायी धातु से बने उत्पाद। यह कदम “ग्रीन धनतेरस” की अवधारणा को आगे बढ़ा रहा है।धनतेरस और सामाजिक एकजुटता-धनतेरस का एक बड़ा पक्ष सामाजिक समरसता और सहानुभूति का है। परंपरागत रूप से इस दिन घर में दीप जलाए जाते हैं ताकि अंधकार, गरीबी और दुख को दूर किया जा सके। आधुनिक संदर्भ में इसका अर्थ है,समाज के वंचित वर्ग तक प्रकाश पहुँचाना।अनेक सामाजिक संगठन और एनजीओ धनतेरस के दिन गरीबों को वस्त्र, बर्तन और मिठाइयाँ वितरित करते हैं।कटनी, वाराणसी, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, दुबई और न्यूयॉर्क जैसे शहरों में प्रवासी भारतीय संगठन इस दिन “शेयर द लाइट मूवमेंट”नामक कार्यक्रम चलाते हैं,जिसमें जरूरतमंद परिवारों के घर रोशनी और मुस्कान पहुँचाई जाती है।
साथियों बात अगर हम विश्व पटल पर धनतेरस का विस्तार को समझने की करें तो, आज धनतेरस केवल भारतीयों का त्योहार नहीं रह गया है। यह एक ग्लोबल सांस्कृतिक इवेंट बन चुका है।लंदन में “दिवाली ऑन द स्क्वायर ” नाम से जो आयोजन होता है,वहाँ हर वर्ष लाखों लोग भाग लेते हैं। इस आयोजन की शुरुआत धनतेरस के दिन होती है।सिंगापुर, मलेशिया, फिजी, मॉरीशस, ट्रिनिडाड, और कनाडा जैसे देशों में धनतेरस के अवसर पर “फेस्टिवल ऑफ़ वेल्थ एंड हेल्थ”नाम से सार्वजनिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।2025 में अमेरिका के न्यू जर्सी, डलास, और कैलिफोर्निया के भारतीय संघों ने भी धनतेरस पर “ग्लोबल धन्वन्तरि कांफ्रेंस 2025” आयोजित करने की घोषणा की है। इस सम्मेलन में स्वास्थ्य, योग, आयुर्वेद और वित्तीय जागरूकता पर चर्चा होगी,जो दिखाता है कि यह पर्व कितनी बहुआयामी प्रासंगिकता रखता है। साथियों बात अगर हम धनतेरस और डिजिटल युग कीकांबिनेशन को समझने की करें तो ,वर्तमान डिजिटल युग में धनतेरस ने नई पहचान प्राप्त की है। ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म्स जैसे अमेज़ॉन, फ्लिपकार्ट टाटा क्लिक, और रिलायंस डिजिटल इस दिन विशेष “धनतेरस फेस्टिव सेल ” लॉन्च करते हैं।2025 में इन ऑनलाइन बिक्री से भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में लगभग 25,000 करोड़ रूपए का अतिरिक्त प्रवाह होने का अनुमान है।डिजिटल पेमेंट्स, यूपीआई और रुपे कार्ड जैसी तकनीकें इस दिन के आर्थिक व्यवहार को पारदर्शिता और गति देती हैं।
धनतेरस अब केवल बाजारों की चमक तक सीमित नहीं, बल्कि यह डिजिटल समृद्धि का प्रतीक भी बन चुका है,जो “नए भारत” की पहचान को दर्शाता है। साथियों बात अगर हम परिवार और परंपरा,घर की लक्ष्मी का स्वागत व धनतेरस और आधुनिक युवा पीढ़ी को समझने की करें तो,धनतेरस के दिन भारतीय घरों में सुबह से ही सजावट शुरू हो जाती है। लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करते हैं, नए वस्त्र पहनते हैं और द्वार पर स्वस्तिक और शुभ-लाभ के चिन्ह बनाते हैं। सायंकाल के समय दीपदान किया जाता है,विशेषकर तुलसी और मुख्य द्वार पर दीप जलाने का विधान है।गृहस्थ इस दिन “यम दीपदान” भी करते हैं,मान्यता है कि इस दीपक की ज्योति से मृत्यु और भय का निवारण होता है। यह प्रतीकात्मक रूप से “प्रकाश से अंधकार पर विजय” का संदेश देता है। घर की स्त्रियाँ इस दिन “लक्ष्मी आराधना” का प्रारंभ करती हैं, जिससे दीपावली की मुख्य पूजा का मंगल आरंभ माना जाता है।धनतेरस और आधुनिक युवा पीढ़ी-नई पीढ़ी के लिए धनतेरस केवल पूजा का दिन नहीं,बल्कि स्व-विकास और वित्तीय अनुशासन की प्रेरणा भी है।भारत के शहरी युवाओं में धनतेरस पर म्यूचुअल फंड, सोने के बॉन्ड, या डिजिटल गोल्ड में निवेश करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।2025 में वित्त विशेषज्ञों ने इसे “फाइनेंसियल वैलनेस फेस्टिवल” का नाम दिया है,जो दर्शाता है कि आज की पीढ़ी इस परंपरा को आर्थिक साक्षरता के माध्यम से पुनःपरिभाषित कर रही है।
साथियों बात अगर हम धनतेरस और भारतीय अर्थव्यवस्था का मनोवैज्ञानिक पहलू व धनतेरस और महिला सशक्तिकरण को समझने की करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था में त्योहारों का प्रभाव गहरा होता है।धनतेरस वह क्षण है जब करोड़ों उपभोक्ता नई खरीदारी के लिएसकारात्मक मानसिकता में होते हैं। इसउत्साह से मांग बढ़ती है,उत्पादन को गति मिलती है,और रोज़गार सृजन को बल मिलता है। अर्थशास्त्रियों का मत है कि भारत की जीडीपी में त्योहारों के सीज़न के दौरान लगभग 2पेर्सेंट तक का उछाल देखा जा सकता है।इस प्रकार धनतेरस केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि आर्थिक इंजन का उत्प्रेरक भी है।धनतेरस और महिला सशक्तिकरण -धनतेरस के दिन घर की “गृहलक्ष्मी” को केंद्र में रखा जाता है। यह सांस्कृतिक रूप से नारी शक्ति का सम्मान है।आज के युग में महिलाएँ न केवल परिवार की रक्षक हैं, बल्कि वित्तीय निर्णयों में समान भागीदारी निभा रही हैं। इस दिन कई बैंक और फिनटेक संस्थान महिलाओं के लिए “स्वर्ण निवेश योजना” या “धन लक्ष्मी सेविंग प्रोग्राम” जैसी योजनाएँ लॉन्च करते हैं।यह दिखाता है कि परंपरा और आधुनिकता का संगम किस प्रकार महिला सशक्तिकरण के माध्यम से सामाजिक समृद्धि में परिवर्तित हो रहा है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि धनतेरस समृद्धि का नया अर्थ, धनतेरस 2025 केवल तिथि नहीं, बल्कि एक विचार हैँ कि सच्चा धन वह है जो बाँटने से बढ़ता है, और सच्ची समृद्धि वह है जो सबके जीवन में प्रकाश लाए। चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक हो या आध्यात्मिक धनतेरस हमें यह सिखाता है कि हर उपलब्धि का अर्थ तभी है जब वह साझी खुशी में परिवर्तित हो। इसलिए जब 18 अक्टूबर 2025 की संध्या में दीपक जलें, तो वे केवल घरों में नहीं, मानवता के हृदयों में भी उजियारा करें।यह धनतेरस नई चेतना,नईजिम्मेदारी और नई वैश्विक संस्कृति का उद्घोष बने,जहाँ आरोग्य, समृद्धि और सद्भाव एक साथ दीपित हों।
संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतर्राष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि सीए(एटीसी) संगीत माध्यमा एडवोकेट किशन सनमुखदास भावानानी गोंदिया महाराष्ट्र