“काम करें, लेकिन शरीर की क्षमता के अनुसार; शरीर को निचोड़ें नहीं।”
BLUE ZONE FOUNDATION का राय है कि 60 वर्ष या इस से अधिक उम्र में के लोग “काम करें, लेकिन शरीर की क्षमता के अनुसार; शरीर को निचोड़ें नहीं।”
हल्की से मध्यम गतिविधि—जैसे पैदल चलना, सामान्य घरेलू काम, हल्का योग, स्ट्रेचिंग—अच्छी हो सकती है। ऐसा व्यायाम जिससे लगातार बहुत अधिक थकान, चक्कर, सांस फूलना, कमजोरी या अगले दिन तक असामान्य दर्द रहे, उससे बचना चाहिए।
उम्र के साथ मांसपेशियों की ताकत और रिकवरी की क्षमता कम हो जाती है, इसलिए आराम और रिकवरी भी व्यायाम का हिस्सा हैं। “जितना ज्यादा व्यायाम, उतना ज्यादा स्वास्थ्य” यह गलत धारणा है। जान लेवा धारणा है। खासकर यदि किसी बुजुर्ग को व्यायाम की आदत नहीं है, तो अचानक भारी जिम या कठिन व्यायाम शुरू करना उचित नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण अंतर “सामान्य थकान” और “शरीर की चेतावनी” में है। हल्की थकान सामान्य हो सकती है; लेकिन सीने में दर्द, असामान्य सांस फूलना, चक्कर, बेहोशी जैसा महसूस होना या तेज/असामान्य धड़कन हो तो व्यायाम नहीं करना चाहिए।
“बुजुर्गों को शारीरिक निष्क्रियता नहीं, बल्कि अति-श्रम से बचना चाहिए।” स्वस्थ वृद्धावस्था में नियमित हलचल + उचित व्यायाम + पर्याप्त आराम का संतुलन सबसे अच्छा है। हमारे साथ जुड़िए। हमारे पोस्ट को शेयर कीजिय। स्वस्थ और सक्रिय शतायु जीवन जीने का हमारे अभियान में जुड़िए। भवदीय अधिवक्ता सत्येन्द्र नारायण सिंह उर्फ मुनि जी, चेयरमैन ब्लू जोन फाउंडेशन, मॉब 9304281035।
बड़े नेताओं की पूजा को कवरेज, गरीब की पूजा को कौन पूछे?
सरायकेला/आदित्यपुर
हर साल गणेश पूजा और दुर्गा पूजा में शहर के बड़े-बड़े पंडालों की धूम रहती है। अधिकारी हों या छोटे से लेकर नेशनल लेवल तक के नेता, सभी पंडालों का उद्घाटन करने पहुँचते हैं। उनके पीछे मीडिया की लाइट, कैमरा और माइक दौड़ते हैं। अगले दिन अखबारों के पहले पन्ने पर उनकी बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपती हैं।
लेकिन सवाल यह है — उस गरीब की पूजा को कौन दिखाएगा, जो बस्ती में चंदा जुटाकर दो बांस और तिरपाल से पंडाल बनाकर बप्पा को बैठाता है? आस्था अमीरी-गरीबी नहीं देखती वार्ड 20 की तंग गलियों में कुछ ऐसा ही जज़्बा देखने को मिलता है। यहाँ श्रीराम बॉयज क्लब के लड़के साल 2012 से लगातार गणेश पूजा करते आ रहे हैं।
ना उनके पास लाखों का स्पॉन्सर है, ना किसी बड़े नेता का हाथ। है तो सिर्फ तीन चीज़ें — भक्ति, मेहनत और बस्ती के लोगों का 10-20 रुपये का चंदा।
इस बार इन युवाओं ने हिम्मत करके 15 फीट की बप्पा की भव्य मूर्ति स्थापित की है। पंडाल की सजावट भी इन्होंने अपने हाथों से की है। सोचिए, बिना पैसे, बिना संसाधन के इतना बड़ा आयोजन करने में कितनी मेहनत और कितना समर्पण लगा होगा? यहाँ VIP नहीं, सब भक्त हैं, इन छोटे पंडालों की सबसे खूबसूरत बात यही है।
यहाँ कानफोड़ू डीजे नहीं, ढोलक की थाप और मंजीरे की खनक पर आरती होती है। यहाँ VIP पास नहीं बँटते, सबके लिए भोग बराबर है। यहाँ दिखावा नहीं, सच्ची आस्था है।
यह पूजा सिर्फ एक मूर्ति स्थापना नहीं है, यह गरीब की आस्था का प्रतीक है। यह उन हज़ारों बस्तियों की कहानी है जहाँ भगवान को अमीरों के चमचमाते पंडालों का इंतज़ार नहीं, बल्कि सच्चे मन से लगाए गए दो फूल ही काफी हैं।
मीडिया से एक अपील बड़े-बड़े पंडालों की भव्यता तो हर कोई दिखाता है। चंदा-वसूली से लेकर लाइटिंग तक की खबरें बनती हैं।
लेकिन हमारी मीडिया से हाथ जोड़कर अपील है — एक बार इन गरीबों के पंडाल की ओर भी कैमरा घुमाइए। इनकी मेहनत, इनके हौसले को भी एक खबर बनाइए।
ताकि अगली बार बस्ती का कोई बच्चा यह न सोचे कि पूजा सिर्फ अमीरों के लिए होती है।
क्योंकि जब भगवान अमीर-गरीब में फर्क नहीं करता, तो फिर मीडिया क्यों करे?
नए चेहरों को वक्त दें, तभी परखें उनकी कार्यक्षमता: आनंद मोहन
सरायकेला/आदित्यपुर
बिहार के पूर्व सांसद और वरिष्ठ राजनेता आनंद मोहन सोमवार को आदित्यपुर पहुंचे। यहां वे एम-टाइप में पूर्व ईचागढ़ विधायक अरविंद सिंह के निवास पर गए, जहां आदित्यपुर नगर निगम के उपमहापौर अंकुर सिंह ने उनका स्वागत किया।
इस अवसर पर मीडिया से चर्चा करते हुए आनंद मोहन ने बिहार के सियासी हालात, लोकतंत्र में विपक्ष की अहमियत और नव-निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के कामकाज पर अपनी राय व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि किसी भी नवनिर्वाचित प्रतिनिधि के कार्यों का आकलन करने से पहले उसे कम से कम छह महीने से एक साल तक का समय अवश्य देना चाहिए। उपमहापौर अंकुर सिंह की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि युवा नेताओं को अपनी योग्यता साबित करने का पूरा मौका मिलना जरूरी है।
लोकतंत्र में स्वस्थ आलोचना और वैचारिक मतभेद को उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने वाला बताया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में राज्य ने सुशासन और तरक्की के मामले में अलग पहचान स्थापित की है।
आनंद मोहन ने स्पष्ट किया कि उनका जमशेदपुर आना किसी सियासी मकसद से नहीं है, बल्कि पुराने संबंधों को और प्रगाढ़ करने तथा सामाजिक एकता का संदेश देने के उद्देश्य से है।
कार्यक्रम में वार्ड पार्षद सुधीर चौधरी, मनोज आनंद, मनोज सिंह, जगदीश नारायण चौबे, संजय सिंह हितैषी, डॉ. मृत्युंजय सिंह, लाल बाबू सिंह सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।
राष्ट्रीय अभियंता दिवस 2026: विश्वेश्वरैया की विरासत से विकसित भारत के संकल्प तक।
नवाचार, तकनीकी आत्मनिर्भरता और राष्ट्र निर्माण में अभियंताओं की भूमिका लगातार हो रही व्यापक
भारत में प्रत्येक वर्ष 15 सितंबर को राष्ट्रीय अभियंता दिवस मनाया जाता है। यह दिन महान अभियंता, दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता और भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती के अवसर पर देश के अभियंताओं के योगदान को सम्मानित करने के लिए समर्पित है। राष्ट्रीय अभियंता दिवस केवल किसी एक पेशे की उपलब्धियों को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक, नवाचार और इंजीनियरिंग के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की यात्रा को समझने और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार होने का अवसर भी है।वर्ष 2026 में भारत जिस तेजी से तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, उसमें अभियंताओं की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, डिजिटल तकनीक, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष विज्ञान, साइबर सुरक्षा, हरित ऊर्जा, आधुनिक परिवहन और स्मार्ट अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में भारत की बढ़ती क्षमता के पीछे इंजीनियरों का ज्ञान, कौशल और नवाचार महत्वपूर्ण आधार है।
सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को कर्नाटक के मुद्देनहल्ली में हुआ था। उन्होंने पुणे में इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर भारत के महान सिविल इंजीनियरों तथा प्रशासकों में अपना विशिष्ट स्थान बनाया।विश्वेश्वरैया का जीवन इस बात का उदाहरण है कि इंजीनियरिंग केवल तकनीकी ज्ञान हासिल करने का नाम नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं के व्यावहारिक और टिकाऊ समाधान खोजने का माध्यम है। जल प्रबंधन, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में उनके कार्यों ने उन्हें देश-विदेश में प्रतिष्ठा दिलाई। खड़कवासला जलाशय से जुड़ी बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था और कृष्णराज सागर बांध जैसी परियोजनाओं में उनका योगदान भारतीय इंजीनियरिंग इतिहास में विशेष महत्व रखता है। उन्होंने जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के माध्यम से विकास की संभावनाओं को समझा। उनके कार्यों में तकनीकी दक्षता के साथ-साथ दूरदर्शी योजना और सार्वजनिक हित का समन्वय दिखाई देता है।विश्वेश्वरैया की प्रतिभा केवल इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं रही। उन्होंने मैसूर राज्य के दीवान के रूप में प्रशासनिक और आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उद्योग, शिक्षा, बैंकिंग, सिंचाई और सार्वजनिक संस्थानों के विकास के प्रति उनका दृष्टिकोण व्यापक था। वे मानते थे कि किसी राष्ट्र की प्रगति के लिए आधुनिक तकनीक के साथ अनुशासन, शिक्षा, उत्पादकता और संस्थागत विकास भी जरूरी है।राष्ट्र ने उनके योगदान को सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। वर्ष 1955 में उन्हें भारत रत्न प्रदान किया गया। उनका निधन 1962 में हुआ, लेकिन उनकी विचारधारा और कार्य आज भी इंजीनियरिंग जगत के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।
भारत में 15 सितंबर को राष्ट्रीय अभियंता दिवस मनाने की परंपरा वर्ष 1968 में शुरू हुई। इसका उद्देश्य विश्वेश्वरैया की महान विरासत को स्मरण करने के साथ देश के विकास में अभियंताओं की व्यापक भूमिका को सम्मान देना है।दरअसल आधुनिक सभ्यता की आधारभूत संरचना में इंजीनियरिंग की भूमिका हर जगह दिखाई देती है। सड़क, पुल, रेलवे, मेट्रो, बिजली संयंत्र, जलापूर्ति व्यवस्था, अस्पताल, औद्योगिक इकाइयां, संचार नेटवर्क और डिजिटल सेवाएं—इन सभी के निर्माण और संचालन में अभियंताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।आज जब देश तेजी से शहरीकरण और औद्योगीकरण की ओर बढ़ रहा है, तब सुरक्षित, टिकाऊ और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप अवसंरचना तैयार करना बड़ी चुनौती है। इसी चुनौती का समाधान तकनीकी विशेषज्ञता और वैज्ञानिक सोच के माध्यम से संभव है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए विकास का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि नहीं है। इसके साथ ऊर्जा सुरक्षा, जल सुरक्षा, रोजगार, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण विकास, शहरी सुविधाओं और सामाजिक आवश्यकताओं का संतुलन भी जरूरी है।इंजीनियर इस संतुलन को कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी सड़क या पुल का निर्माण केवल उसकी लागत और समय से निर्धारित नहीं हो सकता। उसकी सुरक्षा, गुणवत्ता, पर्यावरणीय प्रभाव, भविष्य की क्षमता और रखरखाव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। बाढ़, भूकंप, भूस्खलन, चक्रवात और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को देखते हुए आपदा-रोधी अवसंरचना की आवश्यकता बढ़ रही है। ऐसे में इंजीनियरिंग समाधान केवल निर्माण तक सीमित नहीं रह सकते। उनमें जोखिम का आकलन, सुरक्षा मानक और दीर्घकालिक स्थायित्व भी शामिल होना चाहिए।
21वीं सदी ने इंजीनियरिंग की परिभाषा को और व्यापक कर दिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, रोबोटिक्स, ड्रोन, 3-डी प्रिंटिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा ने इंजीनियरिंग के पारंपरिक स्वरूप में बड़ा बदलाव किया है।आज एक इंजीनियर के लिए केवल अपने विषय में दक्ष होना पर्याप्त नहीं है। उसे डेटा, सॉफ्टवेयर, स्वचालन, डिजिटल सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभाव की समझ भी विकसित करनी पड़ रही है। आने वाले समय में बहुविषयक ज्ञान और विभिन्न क्षेत्रों के बीच सहयोग तकनीकी समाधान का महत्वपूर्ण आधार बनेगा।कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग ने इंजीनियरों के सामने नए अवसरों के साथ नई जिम्मेदारियां भी खड़ी की हैं। तकनीक को अधिक सक्षम बनाने के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उसका उपयोग सुरक्षित, पारदर्शी और मानव हित में हो।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ने के लिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। भारत को डिजाइन, अनुसंधान, तकनीकी विकास और उच्च गुणवत्ता वाले विनिर्माण में अपनी क्षमता मजबूत करनी होगी।सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में इंजीनियरों की भूमिका निर्णायक है। स्वदेशी तकनीक का विकास न केवल आर्थिक अवसर पैदा करता है, बल्कि देश की रणनीतिक और तकनीकी क्षमता को भी मजबूत करता है।रक्षा क्षेत्र में आधुनिक प्रणालियों का स्वदेशी विकास, ऊर्जा क्षेत्र में सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार, हरित हाइड्रोजन तथा ऊर्जा भंडारण तकनीक और कृषि क्षेत्र में स्मार्ट सिंचाई, सेंसर तथा ड्रोन जैसी तकनीकें देश के विकास को नई दिशा दे सकती हैं।
तकनीक की शक्ति जितनी बढ़ रही है, उसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ रही है। आज डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता, पर्यावरणीय प्रभाव और तकनीकी असमानता जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण हो गए हैं।इसलिए आधुनिक इंजीनियर के लिए तकनीकी दक्षता के साथ नैतिक दृष्टिकोण भी आवश्यक है। किसी तकनीक की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वह कितनी तेज या सस्ती है, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि उसका समाज और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा।विश्वेश्वरैया की कार्यशैली इसी अनुशासन और कर्तव्यबोध की प्रेरणा देती है। उनके लिए इंजीनियरिंग व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं अधिक राष्ट्र और समाज की सेवा का माध्यम थी।
राष्ट्रीय अभियंता दिवस युवाओं को विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा देने का भी अवसर है। आज इंजीनियरिंग विद्यार्थियों के सामने पारंपरिक रोजगार के अलावा अनुसंधान, स्टार्टअप, उद्यमिता और नवाचार के अनेक अवसर हैं।जरूरत इस बात की है कि युवा इंजीनियर केवल नौकरी तलाशने वाले पेशेवर न बनें, बल्कि समस्याओं का समाधान खोजने वाले नवोन्मेषक बनें। जल संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा, ग्रामीण विकास, कम लागत वाली चिकित्सा तकनीक, साइबर सुरक्षा और कृषि तकनीक जैसे क्षेत्रों में छोटे-छोटे नवाचार भी समाज पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।इंजीनियरिंग शिक्षा में भी केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की बजाय प्रायोगिक शिक्षा, उद्योग से जुड़ाव, शोध, प्रोजेक्ट और वास्तविक समस्याओं के समाधान पर अधिक जोर देने की आवश्यकता है।भविष्य की इंजीनियरिंग के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम करना है। बढ़ते शहर, औद्योगिक विस्तार और ऊर्जा की बढ़ती मांग के बीच प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी जरूरी है।ग्रीन बिल्डिंग, ऊर्जा-कुशल मशीनें, जल पुनर्चक्रण, कचरा प्रबंधन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, सार्वजनिक परिवहन और नवीकरणीय ऊर्जा इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इंजीनियरों को ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी जो आर्थिक रूप से व्यवहार्य होने के साथ पर्यावरण के प्रति भी जिम्मेदार हो।
भारत ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में इंजीनियरिंग और तकनीकी मानव संसाधन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। आधुनिक अवसंरचना, उन्नत विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और सामाजिक विकास के लिए बड़ी संख्या में कुशल तकनीकी विशेषज्ञों की आवश्यकता होगी।लेकिन चुनौती केवल इंजीनियरों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। गुणवत्ता, अनुसंधान, पेटेंट, उद्योग-अकादमिक सहयोग, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उत्कृष्टता भी आवश्यक है।भारत को ऐसे अभियंताओं की आवश्यकता है जो समस्याओं को केवल किताबों में न देखें, बल्कि जमीन पर उतरकर उन्हें समझें। जो गांव, किसान, श्रमिक, उद्योग, शहर और पर्यावरण की वास्तविक आवश्यकताओं को समझते हुए ऐसे समाधान तैयार करें जिनका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके।
डॉ. विश्वेश्वरैया की विरासत केवल बांधों, सिंचाई परियोजनाओं या तकनीकी उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। उनकी वास्तविक विरासत वैज्ञानिक सोच, अनुशासन, कार्य के प्रति समर्पण, संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की भावना है। राष्ट्रीय अभियंता दिवस इसलिए अतीत को याद करने के साथ भविष्य की दिशा तय करने का भी दिन है। यह अभियंताओं को सम्मान देने के साथ समाज को यह समझने का अवसर देता है कि तकनीकी प्रगति तभी सार्थक है, जब वह मानव जीवन को बेहतर बनाए और राष्ट्र के विकास को गति दे।15 सितंबर 2026 को जब देश अभियंताओं के योगदान को नमन करेगा, तब विश्वेश्वरैया की विरासत से प्रेरणा लेते हुए यह संकल्प भी जरूरी है कि विज्ञान और तकनीक का उपयोग मानवता, पर्यावरण और राष्ट्र के व्यापक हित में किया जाए।
इंजीनियर केवल पुल, सड़क, भवन या मशीन नहीं बनाते। वे भविष्य की नींव तैयार करते हैं। उनकी असली शक्ति ईंट, स्टील और मशीन से आगे विचार, नवाचार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समस्या के समाधान में निहित है। यही शक्ति भारत को तकनीकी रूप से सक्षम, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
BREAKING NEWS: इस वक्त की बड़ी खबर, आदित्यपुर थाना क्षेत्र में अवैध नशीले पदार्थ और सट्टे का धंधा जोरों पर, चोरी की वारदातों में इजाफा।
सरायकेला/आदित्यपुर
आदित्यपुर से इस वक्त की बड़ी खबर आदित्यपुर निकाल कर सामने आ रही है जहां पर आदित्यपुर थाना अंतर्गत कई इलाकों में अवैध नशीले पदार्थ, अवैध स्क्रैप टाल सट्टा और जुआ का धंधा बेधड़क चल रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार शाम ढलते ही कई जगहों पर भीड़ जुटती है और देर रात तक यह अवैध कारोबार चलता है।
सूत्रों का कहना है कि इस धंधे में कई युवा बर्बाद हो रहे हैं और नशे की लत के कारण पैसों के लिए क्षेत्र में चोरी, छिनतई और अन्य आपराधिक घटनाओं में भी तेजी आई है। पिछले एक महीने में गम्हरिया, बड़ाकाठी और आदित्यपुर-2 के इलाकों में बाइक चोरी और घरों में चोरी की कई घटनाएं सामने आई हैं। इतना ही नहीं आदित्यपुर क्षेत्र में कई अवैध स्क्रैप टाल भी संचालित किया जा रहे हैं जहां पर चोरी की गई सामानों की खरीद बिक्री करने की सूचनाएं प्राप्त हो रही है
स्थानीय लोगों में आक्रोश स्थानीय निवासियों ने बताया कि कई बार थाना में शिकायत की गई लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हुई। लोगों का कहना है कि पुलिस की गश्ती बढ़नी चाहिए और ऐसे अवैध अड्डों पर छापेमारी कर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
स्थानीय पुलिस ने कहा: इस संबंध में आदित्यपुर थाना से संपर्क करने पर बताया गया कि सूचना मिलने पर कार्रवाई की जाएगी और रात में गश्ती बढ़ा दी गई है।
स्थानीय जनता ने एसपी सरायकेला-खरसावां से मांग की है कि क्षेत्र में चल रहे अवैध कारोबार पर जल्द से जल्द रोक लगाई जाए ताकि शांति व्यवस्था कायम रह सके।
हिंदी दिवस 2026:अनुच्छेद 343 से राजभाषा कानून तक: हिंदी क़ा संवैधानिक सफ़र -भाषाई विविधता से वैश्विक डिजिटल युग तक हिंदी की नई यात्रा -समग्र व्यापक विश्लेषण।
एआई और इंटरनेट के दौर में हिंदी की अगली क्रांति? मोबाइल से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक बदल रही है भाषा की पूरी दुनियाँ?
संविधान सभा में लंबी और गहन बहस, विचार- विमर्श के बाद 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार करने का ऐतिहासिक निर्णय सामने आया था -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं, सांस्कृतिक परंपराओं और विविध धार्मिक-सामाजिक विरासत से नहीं बनती,बल्कि उसकी भाषाई विविधता भी भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है।देश के अलग-अलग राज्यों,क्षेत्रों और समुदायों में अनेक भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं,जिनमें प्रत्येक अपने भीतर सदियों का इतिहास, साहित्य लोक-स्मृति,संस्कृति और सामाजिक अनुभव समेटे हुए है।तमिल,तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी,सिंधी बंगाली,पंजाबी,असमिया,उड़िया सहित भारत की अनेक भाषाएं देश की साझा सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं।इसी व्यापक भाषाई परिदृश्य में हिंदी काअपना विशिष्ट स्थान है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं,बल्कि साहित्य,संस्कृति,संवेदना, विचार और सामाजिक जुड़ाव की एक महत्वपूर्ण भाषा है।इसलिए हिंदी को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल एक भाषा का विस्तार नहीं,बल्कि भारत की बहुभाषी लोकतांत्रिक संस्कृति में एक प्रभावी संपर्क और ज्ञान- माध्यम को मजबूत करना भी है। यही विचार हर वर्ष 14 सितंबर को मनाए जाने वाले हिंदी दिवस को सटीकता से विशेष महत्व प्रदान करता है।
साथियों बात अगर हम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तरपर 14 सितंबर 2026 को हिंदी दिवस मनाने की करें तो,देश भर में राष्ट्रीय हिंदी दिवस गौरव और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस विशेष अवसर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा मुंबई में छठे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का भव्य आयोजन (14-15 सितंबर) किया गया है, जिसका उद्घाटन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा किया जा रहा है।इस सम्मेलन में सरकारी कामकाज में हिंदी के सरल उपयोग को बढ़ावा देने और तकनीकी क्षेत्रों में राजभाषा को सशक्त बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।इसके साथ ही केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के नेतृत्व में देश भर के स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में राजभाषा सप्ताह के तहत विभिन्न साहित्यिक व सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं।पंचायती राज मंत्रालय के सचिव और मंत्री स्तर पर देश की सभी ग्राम पंचायतों से अपील जारी की गई है कि वे ग्रामीण स्तर पर हिंदी दिवस मनाएं और स्थानीय शासन में आधिकारिक तौर पर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग बढ़ाएं।वैश्विक स्तर पर,विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों में प्रवासी भारतीयों और अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के लिए हिंदी उत्सव और कवि सम्मेलनों का आयोजन किया जा रहा है,जो हिंदी को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान और सुदृढ़ता सटीकता से प्रदान कर रहा है।
साथियों,14 सितंबर भारतीय भाषाई और संवैधानिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण तारीख है।14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था।स्वतंत्र भारत के सामने उस समय अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न थे और उनमें संघ के सरकारी कामकाज की भाषा का प्रश्न भी अत्यंत संवेदनशील था। यहां हम कह सकते हैं कि राजभाषा हिंदी बनाम भारत की भाषाई विविधता:संविधान ने हिंदी को राजभाषा का अधिकार दिया हैँ। भारत एक ऐसा देश था जहां विभिन्न क्षेत्रों में अलग- अलग भाषाएं प्रचलित थीं।इसलिए भाषा का निर्णय केवल प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं था, बल्कि यह देश की एकता, विविधता, लोकतांत्रिक संवेदनशीलता और भविष्य की राष्ट्रीय व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ था। संविधान सभा में इस विषय पर लंबी और गहन बहस हुई।राजभाषा से संबंधित विचार-विमर्श के बाद 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार करने का ऐतिहासिक निर्णय सामने आया और उसके लिए देवनागरी लिपि निर्धारित की गई।यही प्रावधान आगेचलकर संविधान के भाग 17 में शामिल हुए।
साथियों,यहां एक महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य को समझना आवश्यक है कि संविधान ने हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा घोषित नहीं किया है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी है। इसी संवैधानिक व्यवस्था में संघ के आधिकारिक कामकाज में अंकों के प्रयोग तथा अंग्रेजी के उपयोग को जारी रखने से संबंधित प्रावधान भी किए गए थे। बाद में संसद को कानून के माध्यम से संघ के आधिकारिक कार्यों में अंग्रेजी के उपयोग से जुड़ी व्यवस्था करने का अधिकार दिया गया।इसलिए हिंदी दिवस को समझते समय संवैधानिक शब्दावली की शुद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी हिंदी के प्रति हमारी भावनात्मक प्रतिबद्धता। हिंदी का सम्मान तभी सार्थक होगा जब वह संवैधानिक मर्यादा, भाषाई सह-अस्तित्व और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़े।
साथियों,14 सितंबर 1949 के ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति में हिंदी दिवस मनाने की परंपरा 1953 से शुरू हुई। तब से यह दिन हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार, प्रयोग और विकास के प्रति जागरूकता पैदा करने का अवसर बन गया है। भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा तथा हिंदी माह जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। राजभाषा के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने वाले व्यक्तियों और संस्थानों को सम्मानित भी किया जाता है। लेकिन हिंदी दिवस का वास्तविक उद्देश्य केवल सरकारी समारोहों, पुरस्कारों और औपचारिक भाषणों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसका व्यापक उद्देश्य यह होना चाहिए कि हिंदी को जीवन, प्रशासन, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान और डिजिटल संचार के प्रभावी माध्यम के रूप में लगातार विकसित किया जाए। साथियों,आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम हिंदी का सम्मान केवल 14 सितंबर को करते हैं, या फिर वर्ष के 365 दिन अपने व्यवहार और कार्यक्षेत्र में भी हिंदी को उचित स्थान देते हैं? भाषा किसी कैलेंडर की एक तारीख से जीवित नहीं रहती। भाषा तब जीवंत रहती है जब लोग उसे बोलते हैं, लिखते हैं, पढ़ते हैं, उसमें ज्ञान अर्जित करते हैं, नए विचार व्यक्त करते हैं और आने वाली पीढ़ियों तक उसे पहुंचाते हैं। इसलिए हिंदी दिवस आत्ममंथन का भी अवसर है। हमें यह देखना होगा कि हिंदी का प्रयोग केवल भावनात्मक या सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तक सीमित है अथवा वह आधुनिक ज्ञान और अर्थव्यवस्था की बदलती जरूरतों के साथ भी कदम मिला रही है।
साथियों, इक्कीसवीं सदी में भाषा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल दूसरी भाषाओं से प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि तकनीकी परिवर्तन की गति है। इंटरनेट, मोबाइल फोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया, डिजिटल शिक्षा और ऑनलाइन सेवाओं ने भाषाओं के स्वरूप को तेजी से बदल दिया है। इस डिजिटल परिवर्तन ने हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर भी पैदा किए हैं। आज करोड़ों लोग हिंदी में समाचार पढ़ते हैं, वीडियो देखते हैं, सामाजिक माध्यमों पर संवाद करते हैं, ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करते हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपने विचार व्यक्त करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार के साथ हिंदी के लिए मशीन अनुवाद, वॉयस टेक्नोलॉजी, डिजिटल कंटेंट, भाषा मॉडल और भारतीय भाषाओं के बीच संवाद के नए रास्ते भी खुल रहे हैं। लेकिन इस अवसर को वास्तविक शक्ति में बदलने के लिए उच्च गुणवत्ता वाली हिंदी डिजिटल सामग्री, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली, विश्वसनीय अनुवाद, शोध- संसाधन और आधुनिक भाषा -प्रौद्योगिकी का निरंतरविकास आवश्यक होगा। साथियों, हिंदी के भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका विस्तार नहीं, बल्कि उसका समावेशी चरित्र होना चाहिए। भारत की भाषाई विविधता को चुनौती मानने के बजाय उसे अपनी ताकत के रूप में स्वीकार करना होगा। हिंदी को आगे बढ़ाने का अर्थ तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, पंजाबी, असमिया, उड़िया या किसी अन्य भारतीय भाषा को पीछे धकेलना नहीं हो सकता। वास्तव में सच्चा भाषाई सम्मान तभी संभव है जब हर भारतीय भाषा को उसके साहित्य, इतिहास, ज्ञान और सांस्कृतिक योगदान के साथ सम्मान मिले। हिंदी ऐसी संपर्क भाषा बन सकती है जो विभिन्न भाषाई समुदायों के बीच संवाद को आसान बनाए, लेकिन यह भूमिका सहयोग और सम्मान पर आधारित होनी चाहिए, प्रभुत्व पर नहीं।
साथियों,हमें ऐसी हिंदी की आवश्यकता है जो सरल हो, सहज हो और आम नागरिक तक आसानी से पहुंचे; ऐसी हिंदी जो प्रशासनिक जटिलताओं को कम करे और ज्ञान को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाए; ऐसी हिंदी जो साहित्य और संस्कृति की भाषा होने के साथ विज्ञान, तकनीक, अर्थव्यवस्था, कानून, चिकित्सा, शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भाषा भी बने। वैश्विक स्तर पर हिंदी की संभावनाएं तभी मजबूत होंगी जब वह आधुनिक ज्ञान- संसार से सक्रिय रूप से जुड़ेगी। हिंदी में उच्च स्तरीय शोध, विश्वस्तरीय शैक्षणिक सामग्री, वैज्ञानिक लेखन, डिजिटल संसाधन और अंतरराष्ट्रीय संवाद की क्षमता विकसित करना आज की आवश्यकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि हिंदी दिवस केवल अतीत की उस संवैधानिक घटना को याद करने का दिन नहीं है,बल्कि भविष्य की भाषा -नीति पर विचार करने का अवसर भी है।14 सितंबर 1949 ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में संवैधानिक पहचान दी थी; अब इक्कीसवीं सदी की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि हिंदी ज्ञान, तकनीक,नवाचार और वैश्विक संवाद की सक्षम भाषा बने। हिंदी से प्रेम का अर्थ दूसरी भारतीय भाषाओं का विरोध नहीं, बल्कि भारत की पूरी भाषाई विरासत का सम्मान करते हुए हिंदी को आगे बढ़ाना है। यदि हिंदी अपनी जड़ों से जुड़ी रहते हुए तकनीक,विज्ञान और वैश्विक संचार की नई दुनिया से स्वयं को जोड़ लेती है,तो उसका भविष्य अत्यंत व्यापक हो सकता है।इसलिए हिंदी दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही होना चाहिए,भाषा को विभाजन का नहीं, जुड़ाव का माध्यम बनाएं; हिंदी का सम्मान करें,लेकिन भारत की हर भाषा का सम्मान करते हुए;क्योंकि भारत की भाषाई विविधता ही उसकी सांस्कृतिक शक्ति है और भाषाई सह-अस्तित्व ही उसकी लोकतांत्रिक आत्मा हैँ।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत नाम जुड़वाने की अंतिम तिथि 15 सितंबर 2026
बरडीहा/गढ़वा
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कार्यक्रम के अंतर्गत, निर्वाचन आयोग द्वारा नागरिकों के लिए फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि 15 सितम्बर 2026 निर्धारित की गई है। प्रखंड विकास पदाधिकारी द्वारा सभी पात्र भारतीय नागरिकों से अपील की गई है कि वे निर्धारित समय-सीमा के भीतर मतदाता सूची में अपने नाम एवं विवरण की भली-भांति जांच कर लें और आवश्यकतानुसार अपने फॉर्म समय पर जमा करें।
विभिन्न कार्यों के लिए निर्धारित फॉर्म विवरण: फॉर्म-6: मतदाता सूची में नया नाम जुड़वाने हेतु, एक मतदान केंद्र से दूसरे मतदान केंद्र, एक विधानसभा क्षेत्र से दूसरे विधानसभा क्षेत्र अथवा एक राज्य से दूसरे राज्य में नाम स्थानांतरित करवाने के लिए। फॉर्म-8: प्रारूप मतदाता सूची में दर्ज विवरण में सुधार करवाने के लिए। फॉर्म-7: मतदाता सूची में किसी नाम के समावेश पर आपत्ति दर्ज कराने अथवा नाम विलोपन (हटाने) के लिए।
प्रखंड विकास पदाधिकारी ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि SIR के तहत तैयार की जाने वाली मतदाता सूची को एक स्थायी अभिलेख (Permanent Document) के रूप में संरक्षित किया जाता है। इसलिए, सभी पात्र नागरिकों से अनुरोध है कि वे इस अवसर का पूरा लाभ उठाएं और यह सुनिश्चित करें कि सूची में उनका तथा उनके परिवार का नाम व विवरण बिल्कुल सही दर्ज हो।
प्रवीण कुमार सिंह प्रखंड विकास पदाधिकारी सह अतिरिक्त सहायक निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी 077, विश्रामपुर विधानसभा क्षेत्र बरडीहा, गढ़वा
मजदूर जागरूकता अभियान 2026: कोल्हान एवं टायो मजदूर यूनियन का बड़ा आह्वान, 20 सितंबर को बनेगी मजदूर श्रृंखला।
सरायकेला/आदित्यपुर
मजदूरों के अधिकार, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा को लेकर कोल्हान एवं टायो मजदूर यूनियन ने बड़े आंदोलन का ऐलान किया है। यूनियन द्वारा “मजदूर जागरूकता अभियान – 2026” के तहत 20 सितंबर 2026 (रविवार) को मजदूर श्रृंखला एवं विशाल मजदूर सभा का आयोजन किया जाएगा।
कार्यक्रम की थीम “जागरूक मजदूर – सशक्त समाज – समृद्ध भारत” रखी गई है। आयोजकों के अनुसार, इसका उद्देश्य मजदूरों की समस्याओं, रोजगार, वेतन, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक हितों के प्रति जागरूकता पैदा करना है।
कार्यक्रम का विवरण: • मजदूर श्रृंखला: सुबह 10 बजे से आदित्यपुर खरकाई पुल से टायो गेट तक मानव श्रृंखला बनाई जाएगी।
• विशाल मजदूर सभा: श्रृंखला के पश्चात घोड़ा बाबा मंदिर परिसर में विशाल जनसभा होगी।
निवेदक पूर्व विधायक ईचागढ़ अरविन्द सिंह की ओर से जारी आमंत्रण पत्र में सभी मजदूर भाई-बहनों, श्रमिक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों से अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर कार्यक्रम को सफल बनाने की अपील की गई है।
पत्र में कहा गया है, “यह संघर्ष किसी जाति, धर्म या वर्ग के विरुद्ध नहीं, बल्कि मजदूरों के हक, अधिकार और सम्मान के लिए है। आइए, एकजुट होकर सम्मानजनक रोजगार एवं न्यायपूर्ण श्रम व्यवस्था के लिए लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज बुलंद करें।”
यूनियन ने नारा दिया है – “मजदूर जागेगा तो हक मिलेगा!”, “मजदूर एकता जिंदाबाद!”, “श्रम ही शक्ति है!”
SDS Towers में दुर्गा पूजा 2026 की तैयारी जोरों पर, भोग और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का शेड्यूल जारी
सरायकेला/आदित्यपुर
SDS Towers सोसाइटी में इस वर्ष दुर्गा पूजा को लेकर उत्साह चरम पर है। SDS Towers Durga Puja Committee द्वारा 2026 के पूजा कार्यक्रम, भोग (लंच) और सांस्कृतिक आयोजनों की समय-सारणी जारी कर दी गई है।
कमेटी के अध्यक्ष K. Upadhyay एवं उपाध्यक्ष श्री D. D. Bhattacharjee और सचिव M. S. Mandal के नेतृत्व में पूरी आयोजन समिति तैयारियों में जुट गई है। इस बार पूजा को और भी भव्य बनाने की योजना है।
6 दिनों तक चलेगा माँ की आराधना और भोग का कार्यक्रम:
पूजा का शुभारंभ 16 अक्टूबर, शष्ठी को बोधन, आमंत्रण और अधिवास के साथ शाम 5:57 बजे होगा।
17 और 18 अक्टूबर सप्तमी को नबपत्रिका प्रवेश, स्थापना और सप्तमी पूजा सुबह 7:14 बजे से होगी। दोपहर 12 बजे देवी भोग और 1:30 बजे से सभी के लिए भोग (लंच) की व्यवस्था रहेगी। शाम 8 बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा।
19 अक्टूबर, महा अष्टमी को मुख्य संधि पूजा सुबह 7:26 बजे शुरू होगी। इस दिन पुष्पांजलि, देवी भोग के बाद दोपहर भोग और शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन है।
20 अक्टूबर, महानवमी को विशेष आकर्षण के रूप में *डांडिया नाइट* का आयोजन शाम 7 बजे से किया जाएगा। भोग दोपहर 12:30 बजे तक चलेगा।
दशमी (21 अक्टूबर) को सिंदूर खेला, दशमी पूजा और विसर्जन सुबह 6:14 बजे से होगा, शाम को विजया सम्मेलनी का आयोजन 8 बजे होगा।
प्रतिदिन भोग की व्यवस्था: रोजाना पूजा के लिए भोग की व्यवस्था मौसमी रॉय, सुनीता रॉय, माधुरी मंडल, मोहिनी जी, मौसमी बिस्वास, पिंकी बनर्जी और मोनालिसा जी की देखरेख में की जाएगी।
कमेटी के समन्वयक सुदीप बनर्जी और कैशियर पिंकी बनर्जी ने सभी निवासियों और श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे सपरिवार पूजा में शामिल होकर माँ दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करें।
कोल्हान में मजदूरों के शोषण के खिलाफ सिंहनाद, 20 तारीख को विशाल रैली और जनसभा।
सरायकेला/आदित्यपुर
कोल्हान में मजदूरों के शोषण, न्यूनतम वेतन और सुरक्षा को लेकर कोल्हान एवं टायो मजदूर यूनियन ने बिगुल फूंक दिया है।
यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं ईचागढ़ के पूर्व विधायक माननीय अरविंद सिंह ने बताया कि कोल्हान के औद्योगिक क्षेत्रों से लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि कंपनियों में मजदूरों को न्यूनतम वेतन तक नहीं दिया जा रहा और सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं हैं।
इसी के विरोध में 20 तारीख को सुबह 9:00 बजे से एक विशाल रैली और जनसभा का आयोजन किया गया है।
रैली का रूट: यह विशाल रैली आदित्यपुर कोल्हान टायो मजदूरी यूनियन के हेड ऑफिस से शुरू होकर घोड़ा बाबा मंदिर तक जाएगी, जहाँ विशाल जनसभा में तब्दील हो जाएगी।
अरविंद सिंह ने कहा कि इस रैली में श्रम विभाग के अधिकारी, इंडस्ट्रियलिस्ट और हजारों मजदूर एक साथ एक मंच पर होंगे ताकि मजदूरों के हक और सुरक्षा की बात मजबूती से रखी जा सके।
उन्होंने कोल्हान के सभी मजदूर भाइयों से अपील की है कि अपने हक की लड़ाई के लिए 20 तारीख को सुबह 9 बजे समय पर पहुंचकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं।
मुख्य मांगें: 1. सभी कारखानों में सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन लागू हो 2. मजदूरों को ESI, PF, हेलमेट, सेफ्टी शूज और सुरक्षा सुविधा मिले 3. शोषण करने वाली कंपनियों पर श्रम विभाग सख्त कार्रवाई करे
स्थान: आदित्यपुर यूनियन ऑफिस से घोड़ा बाबा तक समय: 20 तारीख, सुबह 9:00 बजे
चोटील पैर के साथ 175 किलो का दम, जमशेदपुर की स्नेहा ने विश्व मंच पर लहराया परचम।
जमशेदपुर
हौसले के आगे चोट भी छोटी पड़ गई. जमशेदपुर की 26 वर्षीय पावरलिफ्टर स्नेहा कुमारी ने दाएं पैर में फ्रैक्चर होने के बावजूद किर्गिस्तान में कमाल कर दिया।
8 से 11 सितंबर तक चली 13वीं वर्ल्ड स्ट्रेंथलिफ्टिंग और इंक्लाइन बेंच प्रेस चैंपियनशिप 2026 में स्नेहा ने 58 किलो वेट कैटेगरी में भारत का प्रतिनिधित्व किया और दो गोल्ड मेडल अपने नाम किए.
स्ट्रेंथलिफ्टिंग इवेंट में उन्होंने 175 किलोग्राम वजन उठाकर पहला स्थान हासिल किया. इस लिफ्ट के साथ वह इस चैंपियनशिप की सबसे मजबूत महिला एथलीट भी बनीं. इसके बाद इंक्लाइन बेंच प्रेस में 60 किलोग्राम उठाकर उन्होंने दूसरा स्वर्ण पदक जीता.
खास बात यह है कि प्रतियोगिता से कुछ दिन पहले ही अभ्यास के दौरान उनके दाएं पैर में फ्रैक्चर हो गया था. इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और मैदान में उतरने का फैसला किया.
इस टूर्नामेंट में मेजबान किर्गिस्तान के साथ कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका सहित कई देशों के खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था.
मानगो के गौर बस्ती कृष्णानगर निवासी स्नेहा इससे पहले भी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में झारखंड और देश का नाम रोशन कर चुकी हैं. उनके पिता कामेश्वर ठाकुर बिजनेसमैन हैं और मां चंचला देवी हाउसवाइफ हैं. उन्होंने तमुलिया स्थित गोविंद विद्यालय से पढ़ाई की है और फिलहाल नेताजी सुभाष विश्वविद्यालय से फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं.
जिला उप निर्वाचन पदाधिकारी ने ईचागढ़ प्रखंड में एस आई आर के तहत दावा-आपत्ति प्रक्रिया का किया निरीक्षण।
सरायकेला/ईचागढ़
ईचागढ़ व कुकड़ू प्रखंड में संचालित एस आई आर कार्य के अंतर्गत दावा-आपत्ति प्रक्रिया का जिला उप निर्वाचन पदाधिकारी श्रीमती पारुल सिंह द्वारा निरीक्षण किया गया। निरीक्षण के दौरान संबंधित पदाधिकारियों एवं कर्मियों से कार्य की प्रगति की जानकारी लेते हुए दावा-आपत्ति से संबंधित कार्यों का निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप निष्पादन सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।
निरीक्षण के क्रम में एस एन प्लस हाई स्कूल, टीकर, ईचागढ़, राजकीय +2 हाई स्कूल, तिरुलडीह, कुकड़ू तथा कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय का भ्रमण किया गया। इन विद्यालयों में इएलसी क्लब गतिविधियों का आयोजन कर विद्यार्थियों को मतदान एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति जागरूक किया गया। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की छात्राओं द्वारा मतदाता जागरूकता से संबंधित चित्रकला एवं आकर्षक रंगोली तैयार की गई, जिसकी सराहना की गई।
इस दौरान विद्यार्थियों से मतदान एवं मतदाता सूची से संबंधित विषयों पर संवाद करते हुए प्रश्नोत्तरी आयोजित की गई तथा सही उत्तर देने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया। विद्यालय पहुंचने पर छात्राओं द्वारा पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत भी किया गया।
इएलसी गतिविधियों के माध्यम से 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने वाले एवं मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने से वंचित पात्र युवाओं को फार्म-6 के माध्यम से अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने की प्रक्रिया की जानकारी दी गई। साथ ही, मतदान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए युवाओं को जागरूक मतदाता के रूप में अपने मताधिकार का प्रयोग करने तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया एवं राष्ट्र निर्माण में सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया गया।