चांडिल में आदिवासी महिला से पुलिस की बदसलूकी का आरोप।
एसआई यमुना रामपर महिला के साथ मारपीट व कपड़े फाड़ने का आरोप।
सरायकेला/चांडिल
सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल थाना क्षेत्र में एक आदिवासी महिला के साथ कथित पुलिसिया दुर्व्यवहार का मामला सामने आया है। चांडिल थाना में पदस्थापित एसआई यमुना राम पर आरोप है कि उन्होंने एक आदिवासी महिला के साथ मारपीट की, उसके कपड़े फाड़ दिए तथा गाली-गलौज की। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे पुलिस की कार्यशैली पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार, शुक्रवार को एसआई यमुना राम एक नाबालिग युवक बलराम सिंह मुंडा की तलाश में रुचाप बस्ती स्थित उसके घर पहुंचे थे। परिजनों का आरोप है कि बलराम घर पर नहीं मिलने के बाद पुलिसकर्मी उसकी मामी से उलझ गए। वायरल वीडियो में महिला के साथ कथित रूप से गाली-गलौज और धक्का-मुक्की होती दिखाई दे रही है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि महिला को डंडे से पीटा गया तथा उसके साथ अमर्यादित व्यवहार किया गया।
परिजनों के अनुसार, बलराम मुंडा (जन्म तिथि 07 जनवरी 2010) नाबालिग है। बताया जाता है कि 10 जून की रात वह स्नान कर घर लौट रहा था। इसी दौरान उसने रास्ते में गणेश सिंह सरदार और रोहित आदित्यदेव को आपस में विवाद करते देखा। आरोप है कि वहां पहुंचते ही रोहित आदित्यदेव ने उसे गणेश का सहयोगी समझकर धक्का-मुक्की की। बाद में रोहित की शिकायत पर पुलिस बलराम को पकड़ने उसके घर पहुंची थी।
पीड़ित परिवार का कहना है कि बलराम के माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है। घटना के बाद घायल महिला का चांडिल अस्पताल में प्राथमिक उपचार कराया गया।मामले को लेकर पीड़ित परिवार ने एसआई यमुना राम के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। परिजनों ने कहा है कि वे न्याय की मांग को लेकर जिले के पुलिस अधीक्षक से भी मुलाकात करेंगे।
अपर उपायुक्त ने ईचागढ़ अंचल कार्यालय का किया निरीक्षण।
सरायकेला/ईचागढ़
सरायकेला-खरसावां के अपर उपायुक्तजयबर्धन कुमार द्वारा ईचागढ़ अंचल कार्यालय का निरीक्षण कर अंचल में संचालित विभिन्न राजस्व एवं भूमि संबंधी कार्यों की विस्तृत समीक्षा की गई। इस दौरान अंचल के सभी संबंधित कर्मियों के साथ बैठक कर लगान वसूली, पंजी-2 के संधारण एवं सुधार तथा अर्जित भूमि से संबंधित नामांतरण मामलों की प्रगति की समीक्षा की गई।
समीक्षा के क्रम में उपर्युक्त कार्यों की प्रगति अपेक्षित स्तर के अनुरूप नहीं पाए जाने पर अपर उपायुक्त ने संबंधित कर्मियों को आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि राजस्व एवं भूमि अभिलेखों से संबंधित मामलों का समयबद्ध निष्पादन प्रशासन की प्राथमिकताओं में शामिल है तथा इसमें किसी प्रकार की शिथिलता स्वीकार्य नहीं होगी।
अपर उपायुक्त ने सभी संबंधित कर्मियों को निर्देशित किया कि लगान वसूली में प्रगति लाते हुए पंजी-2 के संधारण एवं सुधार कार्य तथा अर्जित भूमि से संबंधित लंबित नामांतरण मामलों के निष्पादन में विशेष अभियान चलाकर आवश्यक सुधार सुनिश्चित करें। उन्होंने उक्त तीनों बिंदुओं पर 15 दिनों के भीतर उल्लेखनीय प्रगति सुनिश्चित करने का निर्देश देते हुए निर्धारित अवधि के उपरांत की गई कार्रवाई का अनुपालन प्रतिवेदन (Compliance Report) उपलब्ध कराने को कहा।
समीक्षा के दौरान अपर उपायुक्त ने स्पष्ट निर्देश दिया कि राजस्व एवं भूमि अभिलेखों से संबंधित कार्यों में शत-प्रतिशत पारदर्शिता, समयबद्धता एवं उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि आम नागरिकों से जुड़े मामलों के निष्पादन में अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए तथा लंबित मामलों के निष्पादन हेतु विशेष प्रयास किए जाएं। साथ ही अभिलेखों के अद्यतनकरण, राजस्व संग्रहण में वृद्धि एवं भूमि संबंधी मामलों के त्वरित निष्पादन को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप कार्य करने का निर्देश दिया।
अपर उपायुक्त ने कहा कि नियमित समीक्षा एवं सतत अनुश्रवण के माध्यम से राजस्व प्रशासन को और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा, जिससे आम नागरिकों को बेहतर, पारदर्शी एवं सुगम सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें।
लगभग डेढ़ महीने बीत जाने के बाद भी पीड़िता को नहीं मिला न्याय, सरायकेला खरसावां की कानून व्यवस्था पर उठ रहे सवाल।
सरायकेला/आदित्यपुर
लगभग डेढ़ महीने बीत जाने के बावजूद भी पीड़िता को नहीं मिला न्याय कानून व्यवस्था पर उठ रहे कई सवाल पीड़िता की निगाहें अब उपयुक्त पर टिकी।
ज्ञात हो कि 25/04/2026 को सरायकेला खरसावां जिले के आदित्यपुर थाना क्षेत्र के महिंद्रा शोरूम स्थित SDS TOWER के निवासी झारखंड क्राईम रिपोर्टर ( हिंदी दैनिक अखबार ) के संपादक भरत सिंह की पत्नी रेणु देवी ने अपनी एवं अपने परिवार की जान की सुरक्षा की गुहार लगाते हुए आदित्यपुर थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।
लिखित शिकायत के मुताबिक SDS TOWER के निवासी अनुज श्रीवास्तव नमक व्यक्ति द्वारा लगातार रेणु देवी एवं उनके पति भरत सिंह को जान से मार देने की धमकी दी जा रही थी एवं घर खाली करवा देने की भी धमकियां लगातार मिल रही थी जिस पर रेनू देवी ने अपनी जान माल की सुरक्षा के लिए आदित्यपुर थाना की पुलिस से सुरक्षा एवं न्याय की गुहार लगाई थी।
लिखित शिकायत में रेणु देवी ने बताया है कि अनुज श्रीवास्तव नामक व्यक्ति द्वारा तीसरी बार उनके साथ गाली गलौज एवं मारपीट कर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया साथ ही जान से मार देने की धमकी दी गई।
लिखित शिकायत में रेणु देवी द्वारा यह भी कहा गया था कि लगातार इस तरह अनुज श्रीवास्तव द्वारा मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है अगर आगे चलकर किसी तरह की जान माल की क्षति पहुंचती है तो इसका जिम्मेदार सीधी रूप से अनुज श्रीवास्तव होगा आगे उन्होंने इस मामले पर आदित्यपुर थाना से सुरक्षा एवं न्याय की गुहार लगाई है।
वहीं आदित्यपुर थाना पुलिस द्वारा मामले की जांच शुरू की गई। और आदित्यपुर थाना पुलिस द्वारा भारत सिंह को कहा गया कि मामले की जांच की गई है अथवा जांच की रिपोर्ट सरायकेला खरसावां के अनुमंडल पदाधिकारी को दे दी गई है लेकिन लगभग डेढ़ महीने बीत जाने के बावजूद भी जांच का कोई परिणाम सामने आता हुआ नहीं दिखाई दे रहा।
वहीं इस मामले पर पीड़िता रेणु देवी के पति भरत सिंह ने कहा कि आदित्यपुर थाना में शिकायत किए हुए लगभग डेढ़ महीने बीत चुके हैं लेकिन इस पर किसी तरह की कोई कार्यवाही होती दिखाई नहीं दे रही है साथ ही उन्होंने कहा कि इस मामले पर सरायकेला के अनुमंडल पदाधिकारी से भी जानकारी लेने की कोशिश की गई लेकिन सरायकेला के अनुमंडल पदाधिकारी करने कहा कि ऐसे किसी मामले की कोई जांच रिपोर्ट उन तक नहीं पहुंची है और ना ही ऐसे किसी मामले की उन्हें सूचना मिली है।
वहीं भारत सिंह ने आगे कहा कि कहीं ना कहीं आदित्यपुर थाना एवं एसडीएस टावर के निवासी अनुज श्रीवास्तव के मिली भगत के कारण यह मामला अब तक अटका हुआ है साथ उन्होंने कहा कि वे पीछे नहीं हटेंगे न्याय के लिए उच्च अधिकारी तक पहुंचेंगे एवं अपने न्याय की गुहार लगाएंगे। आगे उन्होंने कहा कि अब इस मामले को लेकर उपायुक्त के समक्ष न्याय की गुहार लगाएंगे अब न्याय की उम्मीद उपयुक्त से की जाएगी।
ईचागढ़ थाना क्षेत्र में हाथी के हमले से एक वृद्ध महिला की हुई मौत।
सरायकेला/ईचागढ़
सरायकेला-खरसावां जिला के ईचागढ़ थाना क्षेत्र में हाथियों का उत्पात थमने का नाम नहीं ले रहा है। आज दिन हाथियों द्वारा जान माल की क्षति पहुंचाई जा रही है। हाथी ने ईचागढ़ थाना क्षेत्र के लाबा टोला वनडीह में बीते रात को 60 वर्षीय चंपा सिंह मुण्डा को पटक-पटक कर जान से मार दिया। वहीं चंपा सिंह मुण्डा के घर को भी छोड़ दिया।घटना की सुचना मिलते ही वन रक्षी कैलाश महतो एवं ईचागढ़ पुलिस घटनास्थल पर पहुंचे व लाश को कब्जे में लेकर थाना परिसर में सुरक्षित रखा गया।शुक्रवार को लाश का पोस्टमार्टम हेतु सरायकेला सदर अस्पताल भेज दिया गया।
वन विभाग द्वारा तत्काल 50 हजार रुपए मुआवजा राशि मृतक की बेटी मालती सिंह मुण्डा को दिया गया एवं कागजी प्रक्रिया के बाद साढ़े तीन लाख रूपए मुआवजा देने की बात कही गई। मिली जानकारी के अनुसार गुरुवार की रात को चंपा सिंह मुण्डा अपने घर से बाहर निकल रही थी,कि जंगली हाथी के चपेट में आ जाने से मौके पर ही उसकी मौत हो गई। मालूम हो कि ईचागढ़ के हाड़ात गांव में 24 अप्रैल को मां बेटी को हाथी द्वारा जान से मार दिया गया था। वहीं दो महिने के अंदर ईचागढ़ व तिरूलडीह थाना में 5 व्यक्तियों की हाथियों के मुठभेड़ से मौत हो गई है।
फिर सुलग़ रही खाड़ी: होर्मुज जलडमरूमध्य बंद,दुनियाँ में हड़कंप-भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर मंडराता संकट? -व्यापक समग्र विश्लेषण
गोंदिया/महाराष्ट्र
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद से केवल क्षेत्रीय नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका की संभावना?, इस जलमार्ग में व्यवधान का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर दिखाई देता है
ईरान नें होर्मुज जलडमरूमध्य बंद से ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार मुद्रास्फीति और आर्थिक स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं
वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बन गया है। 11 जून 2026 को स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ईरान ने अमेरिका के साथ बढ़ते सैन्य टकराव के बीच दुनियाँ के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य, को सभी वाणिज्यिक जहाजों और तेल टैंकरों के लिए बंद करने की घोषणा कर दी। ईरानी सैन्य नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश करने वाले किसी भी जहाज को निशाना बनाया जाएगा। यह कदम कथित रूप से अमेरिका और ईरान के बीच समुद्री टकराव तथा अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों के बाद उठाया गया है। इसके साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी बेचैनी फैल गई है। ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 95.40 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई लगभग 92.6 डॉलर प्रतिबैरल तक पहुंच गया है। दुनियाँ की लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस आपूर्ति इसी मार्ग से गुजरती है, इसलिए इस घटनाक्रम ने ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, मुद्रास्फीति और आर्थिक स्थिरता को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत ने भी खाड़ी क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों पर बढ़ते हमलों और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताव्यक्त की है।
वर्तमान घटनाक्रम केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह बिल्कुल सही है क़ि होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा व्यवस्था की धुरी माना जाता है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री मार्ग सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, इराक और ईरान जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों के निर्यात का मुख्य रास्ता है। सामान्य परिस्थितियों में प्रतिदिन करोड़ों बैरल तेल और विशाल मात्रा में एलएनजी इसी मार्ग से दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचती है। यही कारण है कि जब भी इस जलमार्ग में व्यवधान आता है, उसका असर सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर दिखाई देता है। वर्तमान संकट में भी निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों ने आपूर्ति बाधित होने की आशंका को देखते हुए तेल खरीदना शुरू कर दिया,जिसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में तत्काल उछाल देखने को मिला।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय बाजारों की पहली प्रतिक्रिया तेल कीमतों में तेजी के रूप में सामने आई है। ब्रेंट क्रूड लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है जबकि डब्ल्यूटीआई भी 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि जलडमरूमध्य लंबे समय तक बंद रहता है या सैन्य संघर्ष और बढ़ता है तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर भी जा सकती हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी अस्थिरता बढ़ने की आशंका है क्योंकि ऊर्जा लागत लगभग हर आर्थिक गतिविधि को प्रभावित करती है।
साथियों, भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी आवश्यकता का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से पूरा होता है और उसका एक बड़ा भाग होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। इसलिए इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट का सीधा असर भारतीय ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। यदि तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा,चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है। ऊर्जा आयात पर बढ़ती लागत अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचती है और महंगाई को बढ़ावा देती है।सबसे पहला प्रभाव पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने से भारतीय तेल विपणन कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। यदि मौजूदा तनाव कुछ और दिनों या सप्ताहों तक बना रहता है तो पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का अनुमान है कि लंबी अवधि तक ऊंचे तेल मूल्य बने रहने पर ईंधन की कीमतों में कई रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका सीधा असर आम नागरिकों, किसानों, उद्योगों और परिवहन क्षेत्र पर पड़ेगा।पेट्रोल और डीजल केवल वाहन चलाने का साधन नहीं हैं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं। डीजल की कीमत बढ़ने का अर्थ है कि ट्रकों, बसों और मालवाहक वाहनों की परिचालन लागत बढ़ जाएगी। जब परिवहन महंगा होता है तो फल, सब्जियां, दूध, अनाज, दवाइयां और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। यही कारण है कि तेल कीमतों में वृद्धि को अक्सर ‘महंगाई की जननी’ कहा जाता है। एक बार यदि ईंधन लागत बढ़ती है तो उसका असर अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र में सटीकता से दिखाई देता है।
साथियों, 7 जून 2026 से मृग लग गया है व खेती के कार्य शुरू हो चुके हैं,कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहेगा। भारत में सिंचाई, कृषि मशीनरी और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला का बड़ा हिस्सा डीजल पर निर्भर है। डीजल महंगा होने से किसानों की लागत बढ़ेगी और इसका असर खाद्यान्न कीमतों पर पड़ सकता है। इसके अलावा उर्वरक उद्योग प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर निर्भर है। यदि ऊर्जा लागत बढ़ती है तो उर्वरकों का उत्पादन भी महंगा हो सकता है।विमानन क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ सकता है। विमान ईंधन की लागत एयरलाइंस के कुल खर्च का बड़ा हिस्सा होती है। यदि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई किराए में वृद्धि संभव है। इससे पर्यटन उद्योग, व्यापारिक यात्राओं और विमानन क्षेत्र की मांग पर असर पड़ सकता है।
साथियों, भारत के लिए चिंता का एक और बड़ा विषय एलएनजी यानी तरल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति है। भारत कतर सहित खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में एलएनजी आयात करता है और उसका महत्वपूर्ण हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। यदि इस मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान रहता है तो सीएनजी और पीएनजी की उपलब्धता तथा कीमतों पर असर पड़ सकता है। इससे घरेलू उपभोक्ताओं के साथ- साथ बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण और औद्योगिक इकाइयों की लागत भी बढ़ सकती है।हालांकि स्थिति गंभीर है, लेकिन भारत पूरी तरह असहाय नहीं है। पिछले वर्षों में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। देश के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद हैं जिनका उपयोग आपातकालीन परिस्थितियों में किया जा सकता है।विशाखापट्टनम मैंगलोर और पादुर जैसेस्थानों पर स्थापित भूमिगत भंडारण सुविधाएं सीमित अवधि के लिए देश को राहत प्रदान कर सकती हैं। ये भंडार किसी भी अचानक आपूर्ति संकट के दौरान महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच साबित हो सकते हैं।इसके अतिरिक्त भारत नेऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है। रूस से बढ़ते तेल आयात ने भारत को एक वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत उपलब्ध कराया है। रूस से आने वाला तेल सामान्यतः अन्य समुद्री मार्गों से आता है, इसलिए होर्मुज संकट की स्थिति में यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। यदि आवश्यकता हुई तो भारत रूस तथा अन्य गैर-खाड़ी आपूर्ति कर्ताओं से आयात बढ़ाने की दिशा में सटिका से कदम उठा सकता है।
साथियों, सऊदी अरब,यूएई और अन्य खाड़ी देशों के पास भी कुछ वैकल्पिक पाइपलाइन मार्ग उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से सीमित मात्रा में तेल निर्यात किया जा सकता है। हालांकि ये मार्ग होर्मुज के पूर्ण विकल्प नहीं हैं, फिर भी वे वैश्विक बाजार में आपूर्ति के पूर्ण ठहराव को रोकने में मदद कर सकते हैं। इसी कारण ऊर्जा बाजारों में अभी भी आशा बनी हुई है कि राजनयिक प्रयासों के माध्यम से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकेगा।भू-राजनीतिक दृष्टि से यह संकट केवल तेल या गैस तक सीमित नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व समुद्री व्यापार के सबसे संवेदनशील मार्गों में से एक है। इसके बंद होने से बीमा लागत, माल ढुलाई शुल्क और शिपिंग समय में वृद्धि होती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक कंपनियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ते हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। कोविड-19 महामारी और यूक्रेन संकट के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही आपूर्ति व्यवधानों का अनुभव कर चुकी है; ऐसे में होर्मुज संकट नई चुनौतियां पैदा कर सकता है।
साथियों, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि क्षेत्र में बढ़ते हमले और समुद्री असुरक्षा वैश्विक व्यापार तथा भारतीय नागरिकों दोनों के लिए चिंता का विषय हैं। भारत की प्राथमिकता अपने नागरिकों, व्यापारिक जहाजों और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसलिए नई दिल्ली स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक समाधान का समर्थन कर रही है।वर्तमान परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह संकट कितने समय तक चलता है। यदि राजनयिक प्रयास सफल होते हैं और जलडमरूमध्य जल्द खुल जाता है तो तेल बाजारों में स्थिरता लौट सकती है। लेकिन यदि सैन्य टकराव बढ़ता है या मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका लग सकता है। तेल की कीमतें तीन अंकों तक पहुंच सकती हैं, महंगाई बढ़ सकती है और कई आयात- निर्भर देशों को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना केवल पश्चिम एशिया का संकट नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, महंगाई, समुद्री सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता,सभी इस एक समुद्री मार्ग से जुड़े हुए हैं। भारत के लिए यह समय ऊर्जा स्रोतों में विविधता, रणनीतिक भंडारों के विस्तार और दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयासों को और तेज करने का है।आने वाले दिनों में दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया पर टिकी रहेंगी, क्योंकि होर्मुज की स्थिति केवल तेल की कीमतों का नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता का भी निर्धारण करेगी।
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425
जियाडा रेगुलेशन 2026′ के ड्राफ्ट को लेकर उद्यमियों की बैठक सम्पन्न।
रांची/झारखंड
JIADA द्वारा सोमवार को रांची के होटल रेडिसन ब्लू में एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। JIADA द्वारा राज्य में निवेश को बढ़ावा देने और नियमों को सरल बनाने के लिए नया ‘जियाडा रेगुलेशन 2026’ लाने की तैयारी में है. जिसे लेकर के उक्त कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला में झारखंड की प्रस्तावित नई औद्योगिक नीति एवं ड्राफ्ट रेगुलेशंस पर राज्यभर के विभिन्न औद्योगिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने विस्तार से चर्चा की।
इसरो प्रतिनिधिमंडल ने औद्योगिक नीति के मसौदे से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को तथ्यात्मक रूप से जियाड़ा के प्रबंध निदेशक वरुण रंजन एवं उनकी टीम के समक्ष रखा। साथ ही संगठन की ओर से लिखित सुझाव सौंपते हुए औद्योगिक क्षेत्रों में आधारभूत संरचनाओं के विकास और सुविधाओं में सुधार की मांग की गई।
आपको बताते चलें कि जियाडा द्वारा राज्य में निवेश को बढ़ावा देने और नियमों को सरल बनाने के लिए नया ‘जियाडा रेगुलेशन 2026’ लाने की तैयारी में है.
वहीं कार्यशाला में जियाडा के एमडी वरुण रंजन ने विभिन्न उद्योग संगठनों के उद्यमियों से सीधा संवाद किया और उनसे पूछा कि वे कैसा रेगुलेशन चाहते हैं? एमडी ने स्पष्ट किया कि सरकार का मुख्य उद्देश्य निवेश को आसान बनाना और उद्यमियों की समस्याओं को दूर करना है.
कार्यक्रम में शामिल FJCCI, JASSIA और AIADA के प्रतिनिधियों ने जियाडा के सामने अपनी कई महत्वपूर्ण मांगें और सुझाव रखें. जिसमें उद्यमियों ने कहा कि पहले औद्योगिक क्षेत्रों में 99 साल की लीज पर जमीन मिलती थी, जिसे घटाकर 30 साल कर दिया गया है. बिहार समेत कई राज्यों ने इसे दोबारा 99 साल कर दिया है, झारखंड में भी यही व्यवस्था लागू होनी चाहिए. साथ ही साथ निवेशकों ने ऐसे ‘प्लग एंड प्ले’ परिसरों की मांग की जहां विकसित भूमि, तैयार शेड, बिजली, पानी, सड़क और अपशिष्ट प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) जैसी सुविधाएं पहले से उपलब्ध हों, ताकि उद्योग तुरंत शुरू हो सकें. ओनरशिप ट्रांसफर (स्वामित्व हस्तांतरण) को आसान बनाने के लिए ज्वाइंट वेंचर के प्रावधान शामिल करने का भी सुझाव दिया गया. इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्रों में कर्मचारियों के लिए 10 फीसदी आवासीय सुविधा की मांग की गई. इस पर जियाडा की ओर से बताया गया कि इंडस्ट्रियल एरिया में वर्किंग वुमेंस हॉस्टल का निर्माण कराया जा रहा है.
कार्यक्रम में जियाडा आदित्यपुर के क्षेत्रीय निदेशक प्रेम रंजन तथा आरडीडी दिनेश रंजन भी उपस्थित रहे। इसरो प्रतिनिधिमंडल में अध्यक्ष रुपेश कटरियार, उपाध्यक्ष समीर सिंह, अशोक सतपति, महासचिव संदीप मिश्रा, सचिव राजीव शुक्ला, कार्यकारिणी सदस्य गौतम महापात्रा एवं अवनीत मूतरेजा शामिल थे।
फूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड्स (पैकेजिंग) रेगुलेशन 2018 (सुरक्षा मानक खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम,2006) – अखबार में भोजन या खाद्य सामग्री परोसी तो कार्रवाई होगी -एफएसएसएआई की चेतावनी का समग्र व्यापक विश्लेषण
अखबार में भोजन या खाद्य सामग्री परोसने का खतरा: एफएसएसएआई की चेतावनी, सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती और सुरक्षित खाद्य संस्कृति की आवश्यकता
खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) नियम, 2018 के अंतर्गत अखबारों अथवा अन्य अनधिकृत सामग्रियों का उपयोग भोजन रखने,लपेटने या परोसने के लिए नहीं किया जा सकता
गोंदिया/महाराष्ट्र
वैश्विक स्तरपर खाद्य सुरक्षा आज केवल एक स्वास्थ्य संबंधी विषय नहीं रह गई है,बल्कि यह मानव जीवन, आर्थिक विकास,सामाजिक स्थिरता और सतत विकास का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुकी है। जिस प्रकार स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु और सुरक्षित आवास मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक हैं, उसी प्रकार सुरक्षित भोजन भी स्वस्थ जीवन की आधारशिला है। यदि भोजन ही दूषित हो जाए तो वह पोषण का स्रोत बनने के बजाय बीमारी का कारण बन जाता है। हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा जारी की गई चेतावनी ने खाद्य सुरक्षा के एक ऐसे पहलू को उजागर किया है जिसे आमतौर पर लोग सामान्य और हानिरहित मान लेते हैं। एफएसएसएआई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अखबार में भोजन पैक करना या परोसना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है।
मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया सिटी सहित भारत के हर शहर में यह देखते आ रहा हूं क़ि दशकों से भारत के अनेक हिस्सों में समोसा,पकौड़े, वड़ा- पाव, जलेबी, पराठा और अन्य खाद्य पदार्थों को अखबार में लपेटकर देने की परंपरा रही है। कई लोगों को यह सामान्य और सुविधाजनक लग सकता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक गंभीर स्वास्थ्य जोखिम है। एफएसएसएआई की चेतावनी केवल एकप्रशासनिक निर्देश नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।यह सलाह उस समय जारी की गई जब मुंबई में एक वड़ा-पाव विक्रेता द्वारा भोजन को अखबार में पैक और परोसने का मामला सामने आया। घटना के बाद एफएसएसएआई के पश्चिमी क्षेत्रीय कार्यालय और ग्रेटर मुंबई नगर निगम ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए खाद्य विक्रेताओं को निर्देश जारी किए। यह घटना केवल मुंबई तक सीमित नहीं है। भारत के लगभग सभी राज्यों में छोटी- बड़ी खाद्य दुकानों पर आज भी अखबारों का उपयोग भोजन लपेटने के लिए किया जाता है। कई बार ग्राहक भी इसे सामान्य मानकर स्वीकार कर लेते हैं, जबकि इसके पीछे छिपे स्वास्थ्य जोखिमों से अनजान रहते हैं।यही कारण है कि हर वर्ष विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाकर सरकारों, नियामक संस्थाओं, उद्योगों और नागरिकों को खाद्य सुरक्षा के प्रति जागरूक किया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दूषित भोजन के कारण दुनिया भर में करोड़ों लोग बीमार पड़ते हैं और लाखों लोगों की मृत्यु तक हो जाती है।बैक्टीरिया, वायरस,परजीवी,रसायन और भारी धातुएं खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करके गंभीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न कर सकती हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां सड़क किनारे खाद्य विक्रेताओं से लेकर बड़े रेस्तरां और खाद्य उद्योग तक करोड़ों लोगों को प्रतिदिन भोजन उपलब्ध कराते हैं।
साथियों, वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो अखबारों में उपयोग की जाने वाली मुद्रण स्याही भोजन के संपर्क में आने के लिए नहीं बनाई जाती। समाचार पत्रों को छापने में विभिन्न प्रकार के रसायनों, पिगमेंट, सॉल्वेंट, बाइंडर और भारी धातुओं का उपयोग किया जाता है। इनमें सीसा (लेड), कैडमियम और अन्य रासायनिक तत्व शामिल हो सकते हैं। जब गर्म, तेलीय या नमी युक्त खाद्य पदार्थ सीधे अखबार के संपर्क में आते हैं, तो इन रसायनों के भोजन में स्थानांतरित होने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि खाद्य वैज्ञानिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से अखबार में भोजन परोसने का विरोध करते रहे हैं।सीसा जैसे भारी धातु मानव शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक माने जाते हैं। इनके लंबे समय तक सेवन से तंत्रिका तंत्र, मस्तिष्क, यकृत, गुर्दे और रक्त निर्माण प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। बच्चों में सीसा विषाक्तता का प्रभाव और भी गंभीर होता है क्योंकि इससे उनकी मानसिक एवं शारीरिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है।गर्भवती महिलाओं में भी ऐसे रसायनों का प्रभाव भ्रूण के विकास पर पड़ सकता है। इसलिए खाद्य सुरक्षा केवल तत्काल बीमारी से बचाव का विषय नहीं है बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य संरक्षण का भी मुद्दा है।
साथियों, अखबार से जुड़ा दूसरा बड़ा खतरा स्वच्छता का है। अखबार छपाई के बाद विभिन्न स्थानों से होकर गुजरते हैं। उन्हें गोदामों में रखा जाता है, परिवहन के दौरान अनेक लोगों द्वारा छुआ जाता है और वितरण के दौरान विभिन्न प्रकार की धूल, गंदगी तथा रोगाणुओं के संपर्क में आते हैं। कई बार अखबार जमीन पर रखे जाते हैं या अस्वच्छ वातावरण में संग्रहित होते हैं। ऐसे में उन पर बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्मजीव मौजूद हो सकते हैं। यदि इन्हीं अखबारों में भोजन लपेटा जाता है तो रोगाणु भोजन तक पहुंच सकते हैं और उपभोक्ताओं को बीमार कर सकते हैं।
साथियों, विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि खाद्य जनित रोग विश्व स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं।साल्मोनेला, ई- कोलाई, लिस्टेरिया और नोरोवायरस जैसे रोगजनक सूक्ष्मजीव दूषित भोजन के माध्यम से फैल सकते हैं। इनके कारण दस्त, उल्टी, पेट दर्द, बुखार और गंभीर मामलों में अस्पताल में भर्ती होने तक की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों, बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह खतरा और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए भोजन की तैयारी, भंडारण, परिवहन और परोसने की प्रत्येक प्रक्रिया में सुरक्षा मानकों का पालन आवश्यक है।एफएसएसएआई ने अपनी चेतावनी में यह भी स्पष्ट किया है कि खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) नियम, 2018 के अंतर्गत अखबार या अन्य गैर- अनुमोदित सामग्री में भोजन रखने,लपेटने या परोसने की अनुमति नहीं है। यह नियम केवल औपचारिकता नहीं बल्किवैज्ञानिक अनुसंधान और स्वास्थ्य सुरक्षा के सिद्धांतों पर आधारित है। पैकेजिंग सामग्री को खाद्य-ग्रेड होना चाहिए ताकि वह भोजन के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया न करे और उसमें कोई हानिकारक तत्व न छोड़े। यही कारण है कि विकसित देशों में खाद्य पैकेजिंग के लिए अत्यंत कठोर मानक लागू किए जाते हैं।
साथियों, भारत में खाद्य व्यवसायों का दायरा अत्यंत व्यापक है। इसमें सड़क किनारे के विक्रेता, छोटे रेस्तरां, होटल, कैटरिंग सेवाएं, क्लाउड किचन, क्विक सर्विस रेस्तरां, हॉकर और मोबाइल फूड वेंडर शामिल हैं। एफएसएसएआई की सलाह इन सभी पर समान रूप से लागू होती है। यह संदेश स्पष्ट है कि चाहे व्यवसाय छोटा हो या बड़ा, उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराना उसकी जिम्मेदारी है। आर्थिक सुविधा या पारंपरिक आदतों के नाम पर स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जा सकता।खाद्य सुरक्षा का विषय केवल नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है उपभोक्ताओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि ग्राहक स्वयं अखबार में पैक भोजन लेने से इंकार करें और सुरक्षित पैकेजिंग की मांग करें, तो बाजार में सकारात्मक परिवर्तन तेजी से आ सकता है। उपभोक्ता जागरूकता अक्सर कानूनों से अधिक प्रभावी साबित होती है क्योंकि बाजार अंततः उपभोक्ता की मांग के अनुसार स्वयं को ढालता है।बता दें,आज विश्व भर में टिकाऊ और सुरक्षित पैकेजिंगसमाधानों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या को देखते हुए जैव-अवक्रमणीय पर्यावरण-अनुकूल और खाद्य- ग्रेड पैकेजिंग सामग्री विकसित की जा रही है। भारत भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। बायो-बेस्ड पैकेजिंग, खाद्य- ग्रेड पेपर,बांस आधारित सामग्री और अन्य नवीन विकल्प खाद्य उद्योग में लोकप्रिय हो रहे हैं। इनका उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण ही नहीं बल्कि उपभोक्ताओं की स्वास्थ्य सुरक्षा भी है।
साथियों, हाल के वर्षों में खाद्य सुरक्षा के प्रति भारत का दृष्टिकोण अधिक सख्त और वैज्ञानिक हुआ है।एफएसएसएआई नियमित रूप से निरीक्षण, परीक्षण और जागरूकता कार्यक्रम संचालित कर रहा है। मई महीने में एक वायरल वीडियो के बाद ट्रेन संख्या 12223 लोकमान्य तिलक टर्मिनस-एर्नाकुलम दुरंतो एक्सप्रेस में बर्तनों की अस्वच्छ हैंडलिंग के आरोपों पर आईआरसीटीसी को कानूनी नोटिस जारी किया जाना इसी दिशा में उठाया गया कदम था। यह दर्शाता है कि नियामक संस्थाएं अब खाद्य सुरक्षा संबंधी शिकायतों को गंभीरता से ले रही हैं और जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही हैं।रेलवे, हवाई अड्डों, स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक आयोजनों में भोजन की सुरक्षा विशेष महत्व रखती है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में लोगों को भोजन परोसा जाता है। यदि किसी एक स्थान पर स्वच्छता मानकों की अनदेखी होती है तो उसका प्रभाव हजारों लोगों पर पड़ सकता है। इसलिए खाद्य सुरक्षा का सिद्धांत फार्म टू फोर्क अर्थात खेत से थाली तक प्रत्येक चरण में लागू होना चाहिए। साथियों, वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में भी सुरक्षित और पौष्टिक भोजन को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। खाद्य सुरक्षा का संबंध केवल बीमारी रोकने से नहीं बल्कि गरीबी उन्मूलन, बेहतर स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण जीवन और आर्थिक उत्पादकता से भी है। बीमारियों के कारण स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है, कार्य क्षमता घटती है और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसलिए सुरक्षित भोजन में निवेश वास्तव में मानव पूंजी में निवेश है।भारत जैसे देश में जहां स्ट्रीट फूड संस्कृति अत्यंत लोकप्रिय है, वहां संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। स्ट्रीट फूड भारतीय खानपान की पहचान है और लाखों लोगों की आजीविका का स्रोत भी है। उद्देश्य इसे समाप्त करना नहीं बल्कि इसे अधिक सुरक्षित और स्वच्छ बनाना है। प्रशिक्षण, जागरूकता, सस्ती खाद्य-ग्रेड पैकेजिंग की उपलब्धता और नियमित निगरानी के माध्यम से इस क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि एफएसएसएआई की अखबार में भोजन न परोसने संबंधी चेतावनी हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि खाद्य सुरक्षा छोटे-छोटे व्यवहारों से शुरू होती है। जो चीजें वर्षों से सामान्य लगती रही हों, वे वैज्ञानिक परीक्षणों में असुरक्षित सिद्ध हो सकती हैं। इसलिए परंपरा से अधिक महत्व विज्ञान और स्वास्थ्य को दिया जाना चाहिए। सुरक्षित भोजन प्रत्येक नागरिक का अधिकार और प्रत्येक खाद्य व्यवसाय की जिम्मेदारी है। यदि सरकार, उद्योग, विक्रेता और उपभोक्ता मिलकर खाद्य सुरक्षा के सिद्धांतों का पालन करें, तो न केवल बीमारियों को रोका जा सकता है बल्कि एक स्वस्थ, उत्पादक और सुरक्षित समाज का निर्माण भी किया जा सकता है। विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस का वास्तविक उद्देश्य भी यही है कि भोजन केवल पेट भरने का माध्यम न रहे, बल्कि स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानव गरिमा का आधार बने।
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425
कोवाली थाना प्रभारी पर मारपीट व घूस मांगने का लगा आरोप, थाना प्रभारी ने सभी आरोप को बताया बेबुनियाद।
पूर्वी सिंहभूम/पोटका
पूर्वी सिंहभूम जिले से एक चौंका देने वाली खबर सामने आ रही है और इस खबर ने पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी है क्षेत्रवासी यह सोंच में पड़े हैं कि जब थाना प्रभारी ही घूस लेने लगे और साथ ही आम जनमानस के साथ मारपीट करने लगे अगर अगर थाना प्रभारी का यही रवैया रहा तो क्षेत्र का उद्धार कैसे होगा आम जनमानस की सुरक्षा कौन करेगा।
मामले के संबंध में मिली जानकारी के अनुसार कोवाली थाना प्रभारी मुकेश कुमार साव पर हेंसडा निवासी श्यामा प्रसाद बेरा के साथ कथित रूप से मारपीट करने और घूस मांगने का आरोप लगाया गया है।
इस संबंध में श्यामा प्रसाद बेरा के पुत्र कर्ण बेरा ने वरीय पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को पत्र सौंपकर मामले की निष्पक्ष जांच एवं न्याय की मांग की है।
कर्ण बेरा ने अपने आवेदन में आरोप लगाया है कि शनिवार रात को कोवाली पुलिस संदेह के आधार पर उनके पिता श्यामा प्रसाद बेरा को घर से उठाकर थाने ले गई। वहां उनके साथ बेरहमी से मारपीट की गई, जिससे उनकी हालत गंभीर हो गई। तबीयत बिगड़ने पर उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, पोटका में भर्ती कराया गया।
उन्होंने बताया कि रविवार सुबह सूचना मिलने पर वह अस्पताल पहुंचे, जहां उनके पिता की स्थिति काफी गंभीर थी। आरोप है कि गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के बावजूद पुलिस ने उन्हें जबरन अस्पताल से छुट्टी दिलाकर वापस थाने ले आई। कर्ण बेरा के अनुसार उस समय उनके पिता का शुगर स्तर 400 से अधिक था।
कर्ण बेरा का कहना है कि उनके पिता पर लगाए गए किसी भी आरोप की पुष्टि नहीं हुई है और न ही उनके पास से कोई आपत्तिजनक सामान बरामद हुआ है। इसके बावजूद उनके साथ मारपीट की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि कोवाली पुलिस द्वारा एक लाख रुपये की घूस की मांग भी की गई थी।
मामले को लेकर कर्ण बेरा ने पोटका विधायक संजीव सरदार, वरीय पुलिस अधीक्षक सहित अन्य अधिकारियों को पत्र सौंपकर दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
वहीं, इस संबंध में कोवाली थाना प्रभारी मुकेश कुमार साव ने सभी आरोपों को निराधार बताया है। उन्होंने कहा कि श्यामा प्रसाद बेरा के साथ किसी प्रकार की मारपीट नहीं की गई है और न ही किसी तरह के पैसे की मांग की गई है। उनके ऊपर लगाए गए सभी आरोप बेबुनियाद हैं।
हाथियों के चपेट में आने से एक अधेड़ गंभीर रूप से हुआ जख्मी।
सरायकेला/ईचागढ़
सरायकेला खरसावां जिले के ईचागढ़ थाना क्षेत्र के तुता सालटांड़ गांव में रविवार की अहले सुबह करीब 5 बजे शौच के लिए मैदान की ओर जा रहे 65 वर्षीय गोलोक महतो उर्फ छुटु महतो हाथियों का चपेट में आने से वह गंभीर रूप से घायल हो गया। परिजनों ने तत्काल इलाज हेतु मिलन चौक के एक नर्सिंग होम में भर्ती कराया। सुचना मिलते ही वन पाल मुकेश महतो व वन रक्षी कैलाश महतो नर्सिंग होम पहुंचे और मामले का जानकारी लिया।
मिली जानकारी के अनुसार गोलोक महतो रोज की तरह ही अपने घर से सुबह शौच के लिए गया निकलते हैं। अचानक हाथियों का झुंड देखकर वह भागने का प्रयास भी करते हैं तभी एक हाथी से उनका सामना हो जाता है , जिससे वह घायल हो गया जाते हैं।
वन पाल मुकेश महतो ने बताया कि तुता दुलमीडीह के बीच जंगल में एक दर्जन हाथी मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों को बार बार चेतावनी दिया जा रहा है कि, हाथी प्रभावित गांवों के ग्रामीण अहले सुबह एवं रात को घर से बाहर नहीं निकले । हाथियों को दिन में देखने से पत्थर बाजी व छेड़छाड़ नहीं करें।
उन्होंने कहा कि छेड़छाड़ करने से हाथी उग्र हो जाता है और उत्पात मचाने लगते है। उन्होंने कहा कि घायल गोलोक महतो को बेहतर इलाज हेतु एमजीएम अस्पताल भेजा जाएगा, ताकि वह जल्दी स्वस्थ हो सके। उन्होंने कहा कि क्षेत्र से हाथियों को वन क्षेत्र की ओर भगाने का लगातार प्रयास किया जा रहा है।
सरायकेला सदर अस्पताल के एसी, क्यू मैनेजमेंट और आधुनिक सुविधाओं को मिली मंजूरी।
सरायकेला
जिला परिषद अध्यक्ष सोनाराम बोदरा की अध्यक्षता में सरायकेला सदर अस्पताल, सरायकेला के प्रशासनिक ढांचे और चिकित्सा व्यवस्था को अधिक प्रभावी व व्यवस्थित बनाने के लिए अस्पताल प्रबंधन समिति की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई।
बैठक का मुख्य उद्देश्य अस्पताल आने वाले मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना था। इसके तहत अस्पताल के विभिन्न विभागों के शौचालयों के जीर्णोद्धार, ओपीडी और इमरजेंसी वार्ड में एयर कंडीशनर (एसी) लगाने तथा एक्स-रे कक्ष व स्टोर रूम में नए दरवाजे लगाने के प्रस्तावों पर विस्तृत चर्चा की गई।
अस्पताल की कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए ‘क्यू मैनेजमेंट सिस्टम’ और ‘इन्टरकॉम टेलीफोन सिस्टम’ स्थापित करने पर भी सहमति बनी। इसके अतिरिक्त, कॉन्फ्रेंस हॉल के नवीनीकरण, आवश्यक दवाओं, रसायनों व चिकित्सा उपकरणों की खरीद तथा ब्लड बैंक के पास मरीजों के परिजनों के लिए वेटिंग एरिया निर्माण को हरी झंडी दी गई। परिसर में पेयजल और पंखों जैसी मूलभूत सुविधाओं को सुदृढ़ करने पर विशेष जोर दिया गया।
इस बैठक में स्थानीय विधायक के प्रतिनिधि सनद आचार्य, सिविल सर्जन डॉ. सरयू प्रसाद, उपाधीक्षक डॉ. नकुल प्रसाद चौधरी और अस्पताल प्रबंधक संजीत राय सहित समिति के कई सदस्य मुख्य रूप से उपस्थित थे।
सात महीने बाद जेल से रिहा हुए जेएल केएम नेता तरूण महतो, क्षेत्र में जोरदार स्वागत
सरायकेला/ईचागढ़
(मालखान महतो)
झारखंड लोकतांत्रिक क्रान्तिकारी मोर्चा के केंद्रीय उपाध्यक्ष तरुण महतो के लगभग सात माह बाद जेल से रिहा होकर लौटने पर उनका भव्य स्वागत किया गया। इस अवसर पर चौका, टीकर,डुमटांड़ ,मिलन चौक, तिरूलडीह,सीरूम, रघुनाथपुर सहित चौक चौराहों पर भव्य स्वागत किया गया। तरूण महतो सैकड़ों समर्थकों के साथ बाइक, चार पहिया व ट्रैक्टर रैली कर पुरे ईचागढ़ क्षेत्र का भ्रमण कर अन्याय के खिलाफ जनसमर्थन का अपील किया।
उन्होंने कहा कि लोगों का अपार समर्थन मिला। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में अन्याय,शोषण व जुल्म के खिलाफ लड़ाई जारी रहेगी। विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने कहा कि तरुण महतो ने क्षेत्र में अवैध बालू एवं पत्थर खनन के खिलाफ लगातार संघर्ष किया है। जनहित एवं प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए उनकी लड़ाई सराहनीय है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के विभिन्न जनहित के मुद्दों पर एकजुट होकर संघर्ष जारी रखा जाएगा। मौके पर उच्च न्यायालय रांची के अधिवक्ता रितेश महतो,जेएलकेएम नेत्री बेबी महतो,भानुमति महतो, प्रखंड अध्यक्ष नंदकिशोर महतो,फूलचंद महतो,मुकेश महतो,बंशीधर महतो सहित सैकड़ों कार्यकर्ता उपस्थित थे।
अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026- एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड का रास्ता बंद करने की कवायद, भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए नई चुनौती?
अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 और भारत की वैश्विक रणनीति: क्या भारत पहले से कर रहा है संभावित झटके की तैयारी?
भारतीय मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, सेमीकंडक्टर मिशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण तथा वैश्विक सप्लाई चेन से भारतीय प्रतिभा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास।
गोंदिया/महाराष्ट्र
वैश्विक प्रतिभा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आर्थिक राष्ट्रवाद के बीच अमेरिका की आव्रजन नीति एक नए निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। राष्ट्रपति ट्रम्प के सत्ता में लौटने के बाद अमेरिकी प्रशासन ने कानूनी आव्रजन कार्यक्रमों, विशेषकर एच-1बी वीजा प्रणाली, पर लगातार सख्ती का रुख अपनाया है। उच्च वेतन आधारित चयन प्रणाली की वकालत, वीजाआवेदनों की कड़ी जांच, रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में बाधाएं, विदेशी श्रमिकों की भर्ती पर बढ़ती निगरानी, अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता देने वाली नीतियां तथा विदेशी छात्रों के लिए उपलब्ध अवसरों को सीमित करने जैसे अनेक कदम इस व्यापक नीति परिवर्तन का हिस्सा माने जा रहे हैं। इसी क्रम में टेक्सास से रिपब्लिकन सांसद द्वारा अमेरिकी संसद में प्रस्तुत अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 ने वैश्विक स्तर पर बहस छेड़ दी है। यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है तो एच-1बी वीजा धारकों के लिए ग्रीन कार्ड प्राप्त करने का मार्ग अत्यंत कठिन हो जाएगा, वीजा अवधि घट सकती है, ओपीटी कार्यक्रम समाप्त हो सकता है और अमेरिका में कार्यरत लगभग 12 लाख भारतीय मूल के पेशेवरों तथा उनके परिवारों के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यह केवल एक आव्रजन सुधार प्रस्ताव नहीं, बल्कि अमेरिका की बदलती आर्थिक, राजनीतिक और श्रम नीति का प्रतीक माना जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि एच-1बी वीजा पिछले कई दशकों से अमेरिका की तकनीकी और नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। इस कार्यक्रम के माध्यम से अमेरिकी कंपनियां विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे क्षेत्रों में उच्च कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं। विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों ने इस कार्यक्रम का सबसे अधिक लाभ उठाया है।विश्व की प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों में कार्यरत हजारों भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, डेटा वैज्ञानिक और अनुसंधान विशेषज्ञ एच-1बी वीजा के माध्यम से अमेरिका पहुंचे हैं। यही कारण है कि एच-1बी वीजा में किसी भी प्रकार का परिवर्तन भारत के तकनीकी समुदाय और छात्रों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।
साथियों वैश्विक भू-राजनीति, आर्थिक राष्ट्रवाद और प्रतिभा आधारित प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अमेरिका द्वारा प्रस्तावित अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 केवल एक आव्रजन सुधार विधेयक नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैश्विक प्रतिभा प्रवाह, तकनीकी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार के पुनर्गठन के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेष रूप से भारत के संदर्भ में यह विधेयक अत्यंत महत्वपूर्ण है,क्योंकि एच- 1बी वीजा प्रणाली के सबसे बड़े लाभार्थियों में भारतीय पेशेवर शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपनाई गई अमेरिका फर्स्ट नीति, कानूनी और अवैध दोनों प्रकार के आव्रजन पर सख्ती,एच-1बी वीजानियमों की समीक्षा तथा अमेरिकी नौकरियों को प्राथमिकता देने की रणनीति ने भारत को यह संकेत पहले ही दे दिया था कि भविष्य में अमेरिकी श्रम बाजार भारतीय पेशेवरों के लिए पहले जैसा खुला नहीं रह सकता। यही कारण है कि भारत समानांतर रूप से अपने आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक विकल्पों को मजबूत करने में जुटा हुआ दिखाई देता है। साथियों, रिपब्लिकन सांसद का तर्क है कि लगभग चार दशकों के इतिहास में एच-1बी कार्यक्रम का व्यापक दुरुपयोग हुआ है। उनके अनुसार अमेरिकी नियोक्ताओं ने कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर अमेरिकी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्र के कर्मचारियों के अवसरों को सीमित किया है। उनका दावा है कि कंपनियों ने कर्मचारियों की कथित कमी का हवाला देकर सस्ते विदेशी श्रमिकों को प्राथमिकता दी जबकि अनेक अमेरिकी नागरिक रोजगार और वेतन संबंधी चुनौतियों का सामना करते रहे। इसी सोच के आधार पर उन्होंने अमेरिकन व्हाइट- कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट प्रस्तुत किया है, जिसका घोषित उद्देश्य अमेरिकी व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है।इस विधेयक का सबसे विवादास्पद प्रावधान एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड तक पहुंचने के रास्ते को समाप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम है। वर्तमान व्यवस्था में एच-1बी धारक अमेरिका में कार्य करते हुए रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं। यही कारण है कि लाखों विदेशी पेशेवर अमेरिका में दीर्घकालिक करियर और पारिवारिक भविष्य की योजना बनाते हैं। प्रस्तावित कानून इस अवधारणा को बदलना चाहता है। इसके अनुसार एच-1बी वीजा केवल अस्थायी कार्य वीजा रहेगा और इसे स्थायी निवास प्राप्त करने के साधन के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इससे अमेरिका में बसने की आकांक्षा रखने वाले लाखों लोगों की योजनाओं पर सटीकता से गहरा प्रभाव पड़ सकता है। साथियों, विधेयक का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ड्यूल इंटेंट सिद्धांत को कमजोर करना है।वर्तमान प्रणाली में एच -1बी धारक अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करते हुए भविष्य में स्थायी निवास के लिए आवेदन कर सकते हैं। लेकिन प्रस्तावित व्यवस्था में आवेदक को यह साबित करना होगा कि उसका स्थायी निवास अमेरिका के बाहर है और वह अंततः अपने देश लौटने का इरादा रखता है। यह परिवर्तन अमेरिकी आव्रजन दर्शन में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि इससे एच-1बी वीजा का स्वरूप मूलतः अस्थायी रोजगार कार्यक्रम तकसीमित हो जाएगा।विधेयक में एच-1बी वीजा की अधिकतम अवधि छह वर्ष से घटाकर केवल दो वर्ष करने काप्रस्ताव भी शामिल है। वर्तमान में अधिकांश पेशेवर छह वर्षों तक अमेरिका में रहकर कार्य कर सकते हैं और ग्रीनकार्ड प्रक्रिया लंबित होने की स्थिति में अतिरिक्त विस्तार भी प्राप्त कर सकते हैं। यदि नई व्यवस्था लागू होती है तो कंपनियों के लिए दीर्घकालिक प्रतिभा प्रबंधन कठिन हो सकता है। कर्मचारियों को भी अपने करियर और पारिवारिक निर्णयों को लेकर अधिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।
साथियों, एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव ग्रीन कार्ड प्रक्रिया लंबित रहने की स्थिति में मिलने वाले वीजा विस्तार को समाप्त करना है। आज अनेक भारतीय पेशेवर वर्षों तक ग्रीन कार्ड की प्रतीक्षा सूची में रहते हैं और इस दौरान एच-1बी विस्तार के माध्यम से अमेरिका में कार्य करते रहते हैं। प्रस्तावित कानून इस सुविधा को समाप्त कर सकता है। परिणामस्वरूप हजारों लोग ग्रीन कार्डस्वीकृत होने से पहले ही अमेरिका छोड़ने के लिए बाध्य हो सकते हैं। इस विधेयक का एक और महत्वपूर्ण आयामवैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण अर्थात ओपीटी कार्यक्रम को समाप्त करने का प्रस्ताव है। ओपीटी अमेरिकी विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करने वाले विदेशी छात्रों को डिग्री पूर्ण करने के बाद सीमित अवधि तक अमेरिका में कार्य करने का अवसर देता है। भारतीय छात्र इस कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल हैं। ओपीटी समाप्त होने की स्थिति में अमेरिकी शिक्षा प्राप्त करने वाले विदेशी छात्रों के लिए रोजगार के अवसर काफी सीमित हो सकते हैं। इससे अमेरिका की उच्च शिक्षा प्रणाली की वैश्विक आकर्षण क्षमता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।संसद और उनके समर्थकों का कहना है कि वर्तमान लॉटरी आधारित एच-1बी प्रणाली योग्यता और आर्थिक मूल्य के बजाय भाग्य पर आधारित है। इसलिए विधेयक में लॉटरी समाप्त कर उच्च वेतन वाली नौकरियों को प्राथमिकता देने का प्रस्ताव रखा गया है। इस मॉडल के समर्थकों का मानना है कि इससे केवल अत्यधिक कुशल और उच्च मूल्य वाले पेशेवरों को अवसर मिलेगा। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि इससे छोटे और मध्यम आकार के नियोक्ताओं के लिए प्रतिभाशाली विदेशी कर्मचारियों की भर्ती कठिन हो सकती है।ट्रंप प्रशासन के दौरान एच-1बी नीति को लेकर पहले भी अनेक सख्त कदम देखे गए थे और अब पुनः ऐसी चर्चाएं तेज हो गई हैं। अमेरिकी श्रम बाजार में घरेलू कर्मचारियों को प्राथमिकता देने,विदेशी श्रमिकों के वेतन मानकों को बढ़ाने, आवेदनों की जांच को कठोर बनाने तथा रोजगार-आधारित आव्रजन को सीमित करने जैसे विचार रिपब्लिकन राजनीति के एक प्रभावशाली वर्ग में लंबे समय से मौजूद रहे हैं। अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट इन्हीं विचारों का विधायी विस्तार माना जा रहा है।
साथियों, इस पूरे विवाद का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय समुदाय पर पड़ सकता है। भारत एच-1बी वीजा प्राप्त करने वाले देशों में लंबे समय से अग्रणी रहा है। अमेरिकी तकनीकी उद्योग में भारतीय इंजीनियरों और पेशेवरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बड़ी संख्या में भारतीय परिवारों ने अमेरिका में स्थायी भविष्य की योजना एच-1बी से ग्रीन कार्ड की पारंपरिक यात्रा के आधार पर बनाई है। यदि यह मार्ग सीमित या बंद हो जाता है तो लाखों लोगों की दीर्घकालिक योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।भारतीय छात्रों के लिए भी यह प्रस्ताव चिंता का विषय है। हर वर्ष हजारों छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं और ओपीटी तथा बाद में एच-1बी वीजा के माध्यम से अपने करियर की शुरुआत करते हैं। यदि ओपीटी समाप्त हो जाता है और एच-1बी प्राप्त करना अधिक कठिन हो जाता है, तो अमेरिका की तुलना में अन्य देशों जैसे कनाडा , ऑस्ट्रेलिया , यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी अधिक आकर्षक विकल्प बन सकते हैं।हालांकि यह समझना आवश्यक है कि यह अभी केवल एक प्रस्तावित विधेयक है। अमेरिकी विधायी प्रक्रिया में किसी भी बिल को कानून बनने के लिए प्रतिनिधि सभा, सीनेट और राष्ट्रपति की स्वीकृति सहित अनेक चरणों से गुजरना पड़ता है। इसलिए इसका अंतिम रूप वर्तमान प्रस्ताव से भिन्न भी हो सकता है। फिर भी इसने अमेरिकी आव्रजन नीति की दिशा को लेकर गंभीर बहस शुरू कर दी है। समर्थकों का मानना है कि यह कानून अमेरिकी श्रमिकों की रक्षा करेगा, वेतन स्तर बढ़ाएगा और घरेलू प्रतिभा को प्राथमिकता देगा। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि अमेरिका की तकनीकी श्रेष्ठता का एक बड़ा कारण दुनिया भर से प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करने की क्षमता रही है। यदि विदेशी पेशेवरों और छात्रों के लिए अवसर सीमित किए जाते हैं तो दीर्घकाल में अमेरिकी नवाचारक्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अमेरिकन व्हाइट -कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 केवल एच-1बी वीजा सुधार का प्रस्ताव नहीं है,बल्कि यह अमेरिका में रोजगार, आव्रजन, राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और आर्थिक राष्ट्रवाद के बीच चल रही व्यापक बहस का प्रतिनिधित्व करता है। यदि यह विधेयक पारित होता है तो एच-1बी वीजा का स्वरूप मूल रूप से बदल सकता है और विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों, छात्रों तथा उनके परिवारों के लिएअमेरिका में अवसरों की संरचना नई चुनौतियों से भर सकती है। आने वाले महीनों में अमेरिकी कांग्रेस में इस विधेयक पर होने वाली चर्चा न केवल अमेरिका बल्कि वैश्विक प्रतिभा प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425